राम मिथ या इतिहास…भाग – 5 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(5) रावण का प्रेतकर्म
विगत अंको में आपने ’’रामायण में अश्व’’ पर परिचर्चा को पढ़ा। इस अंक में मैं एक अन्य दृष्टि से इस विषय को प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। रामायण युद्ध काण्ड सर्ग 111 श्लोक संख्या 108 से 118 रावण की शवयात्रा एवं दाह संस्कार से संबंधित है। इन श्लोकों में से कुछ श्लोक ही विषय की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है। 112:- आगे जाकर रावण के विमान को एक पवित्र स्थान में रखकर अत्यन्त दुखी हुए। विभीषण आदि राक्षसों ने मलय, चन्दन, काष्ठ, पदमक्, उशीर, खस तथा अन्य प्रकार के चन्दनों द्वारा वेदोक्त विधि से चिता बनाई और उसके ऊपर रंकु नामक मृग का चर्म विछाया।’’ 114-115- उसके ऊपर राक्षसराज के शव को सुलाकर उन्होने उत्तम विधि से उसका पितृ मेध किया (दाह संस्कार) उन्होने चिता के दक्षिण पूर्व में वेदी बनाकर उस पर यथास्थान दधिमिश्रित घी से भरी हुई स्रुवा रावण के कंधे पर रखी और जांघो पर उलूखल रखा। 116:- काष्ठ के सभी पात्र, अरणि, उत्तराणि और मूसल आदि को भी यथा स्थान रखा। 117-118:- वेदोक्त विधि और महर्षियों द्वारा रचित विधि से वहां सारा कार्य हुआ। राक्षसों ने मेध्य पशु का हनन करके राजा रावण की चिता पर फैलाए मृगचर्म को घी से तर करके फिर रावण के शव को चन्दन और फूलों से अलंकृत करके वे राक्षस मन ही मन दुख का अनुभव करने लगे। 119:- फिर विभीषण के साथ अन्यान्य राक्षसों ने भी चिता पर नाना प्रकार के वस्त्र और लावा बिखेरे ………………। मैं उपरोक्त में से कुछ तथ्यों को अलग करता हूँ:- 1- रंकु नामक मृग का चर्म विछाना (श्लोक 112) 2- दधिमिश्रित घी से भरी श्रुवा रावण के कंधे पर व उलूखल जांघों पर रखना (115) 3- काष्ठ के सभी पात्र अरणि, उत्तराणि और मूसल आदि को यथा स्थान रखना (116) 4- मेध्य पशु का हनन करके राजा रावण की चिता पर ………….. मृगचर्म को घी से तर करके …………….. राक्षस मन ही मन दुःख का अनुभव करने लगे। कृपया प्रस्तुत तथ्यों को पुनः ध्यान से पढ़िए। पुनश्च डा0 बाबा साहब अंबेडकर द्वारा अपनी पुस्तक “The untouchables” हिन्दी अनुवाद’’ अछूत कौन और कैसे द्वारा आचार्य जुगुल किशोर बौद्ध में मृत क्रिया कर्म के संबंध में ’’आश्वलायन गृहसूत्र’’ से उल्लिखित इस क्रिया कर्म से तुलना करिए। (अछूत कौन और कैसे – डॉ0 बी.आर. अम्बेडकर अनुवादक (जुगुल किशोर बौद्ध) – पृष्ठ 89 से 90 अध्याय – क्या हिन्दुओं ने गौ मांस कभी नही खाया।) आश्वलायन गृहसूत्र 1. उसे तब निम्नलिखित (बलि के) औजारों को (मृत के शव पर) रख देना चाहिए। (यह यज्ञ-साधन है) 2. दाहिने हाथ में (चम्मच कहा जाने वाला) गुहु। 3. बाएं हाथ में (दूसरा चम्मच जिसे कहते हैं) उपभृत। 4. दाहिनी ओर स्फ्य कहा जाने वाली लकड़ी की बलिकर्म वाली खड्ग (तलवार), उसके बांई ओर अग्निहोत्री हवनी (अर्थात कलछी जिसके द्वारा अग्निहोत्र बलि का चढ़ावा चढ़ाया जाता है)। 5. उसकी छाती पर ध्रुवा (बलिकर्म की बड़ी जो कलछी कहलाती है)। उसके सिर पर पकवान। उसके दांतो में ठूंसे जाने वाले पत्थर। 6. नाक के दोनो ओर, छोटे बलिकर्म की कलछियां जिन्हें स्त्रुवा कहते हैं। 7. अथवा, यदि केवल एक स्त्रुवा उपलब्ध है, इसे तोड़कर (दो भाग करें)। 8. उसके दोनो कानों पर दो प्रसित्रहरण (अर्थात वे बर्तन, जिनमें ब्राहम्णों का बलि भोजन) रखा जाता है। 9. अथवा, यदि केवल एक प्रसित्रहरण है, इसे तोड़ दिया जाए (दो टुकड़ो में)। 10. पेट पर पत्री नामक बर्तन। 11. चपक (कप) जिसमें कटे हुए (बलि का भोजन) रखे जाते हैं। 12. उसके गुप्तांग पर सामी नाम की लाठी। 13. उसकी जंघाओ पर जलती लकड़ियां। 14. उसकी टांगो पर खल्ल (गारा) और मूसल। 15. उसके पैरों पर दो टोकरियां। 16. अथवा, यदि केवल एक (टोकरी) है, इसे तोड़कर दो भाग कर लिया जाए। 17. वह औजार जिनमें सूराख हैं (जिसमें तरल पदार्थ उडे़ले जा सकते हैं) छिड़काए गए मक्खन से भर लिए जाएं। 18. (मृतक का) पुत्र अपने लिए चक्की के नीचे और ऊपर के पाट ले ले। 19. तांबे, लोहे और मिटटी के बने औजार। 20. किसी मादा-पशु का झिल्ली (व्उमदजनउ) निकालकर उससे सिर और मुख (मृत व्यक्ति का) ढांक दे। (ऋग्वेद दस 16.7) का यह श्लोक पढ़े ’किन्तु अग्नि के विरूद्ध (जो तेरी रक्षा करेगा) कवच की गऊओं से प्राप्त होता है। 21. पशु के आंड (अण्डकोष) लेकर, वह उन्हें (मृत व्यक्ति के) हाथों में डाल दे, इस श्लोक (ऋग्चेद दस 14.10) के साथ शमीम के पुत्रों, दोनो कुत्तों से बचे दाहिना गुर्दा दाहिने हाथ में और बायां गुर्दा बाएं हाथ में हो। 22. पशुओं का हृदय मृतक के हृदय पर रख दें। 23. और कुछ आचार्यों के अनुसार आटे या चावल के दो पिंड। 24. केवल जब यदि आचार्य के अनुसार अंडकोष न हों। 25. पूरे (पशु के) अंग-अंग बांटने के बाद (इसके भिन्न-भिन्न अंग मृतक के वैसे ही अंगो पर रखकर) और उसे खाल से ढांक कर, वह उच्चारण करता है। हे अग्नि ! जब प्रणीता जल आगे ले जाया गया है तो इस कप को उलट मत देना’ (ऋग्वेद दस 16.8)। 26. अपने बांए घुटने को झुकाकर उसे बलि का चढ़ावा (नैवेद्य) दक्षिणा को अग्नि में इस मंत्र के साथ डालना चाहिए ’अग्नेय स्वाहा, कामाय स्वाहा, लोकाय स्वाहा, अनुमतये स्वाहा’। 27. (नैवेद्य) का पांचवा भाग मृतक के वक्ष पर इस मंत्र के साथ, ’निश्चय ही इससे हजारों का जन्म हुआ है। अब वह इसमें से पैदा हो स्वर्ग के लिए स्वाहा।’ आश्वलायन गृहसूत्र से उद्धृत ऊपर के परिच्छेद से यह स्पष्ट है कि प्राचीन इंडो-आर्यों में जब कोई व्यक्ति मर जाता था, एक पशु को मारा जाता था और शव को जलाने से पूर्व पशु के भागों को मृतक व्यक्ति के शरीर पर सभी भागों पर रखा जाता था।’’ यदि आश्वालयन गृहसूत्र में वर्णित उपरोक्त क्रिया से रामायण की दाह क्रिया की तुलना करें तो काफी कुछ समानता दिखाई देती है। इतना ही नही क्रमांक-23 इस शव निस्तारण की आदिम कर्मकाण्डीय प्रक्रिया को हिन्दुओं में प्रचलित आधुनिक शवदाह की प्रक्रिया से भी जोड़ता है। (अनवरत्)
©तृषा’कान्त’

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प्रसिद्घ वेबज़ीन साहित्य शिल्पी 1 मई से कलेवर में


साहित्य शिल्पी के सभी मित्रों को सादर अभिवादन …!
  जैसा कि विदित है आदरणीय सूरज प्रकाश जी प्रधान संपादक के रूप में 1 मई से साहित्यशिल्पी के नये अंक को प्रस्तुत करेंगे। संलग्न है उनके पत्र का संदेश … आभार – तृषाकान्त

प्रिय मित्र ..!
   आपसे ये बात शेयर करते हुए मुझे बेहद खुशी हो रही है कि मैं प्रसिद्घ वेबज़ीन साहित्‍यशिल्‍पी (sahityashilpi.com) के संपादन का कार्यभार संभालने जा रहा हूं। 

पहली मई 2012 का अंक नये कलेवर में निकलेगा। इसमें पहले की तरह कहानी, साक्षात्‍कार, यात्रा वृतांत, कविता, ग़ज़ल, आदि तो रहेंगे ही, हम कुछ नये कॉलम भी शुरू करने जा रहे हैं। ये नये स्‍तंभ इस तरह से होंगे: · 

आओ धूप- इसमें रचनाकार की अब तक कहीं भी अप्रकाशित रचना लेंगे। इसके साथ लेखक से आशय का पत्र भी लेंगे कि ये लेखक की पहली रचना है और अब तक कहीं प्रकाशित नहीं है। नेट पर तो बिलकुल भी नहीं। · 

भाषा सेतु- इसमें हम दूसरी भाषाओं से अनूदित स्‍तरीय रचनाएं आमंत्रित करेंगे। कहानी, कविता या मानविकी, विज्ञान। · 

मेरे पाठक – हम ये नया कॉलम शुरू करेंगे जिसमें हम किसी भी वरिष्‍ठ रचनाकार से उसके पाठकों से मिले अनुभव अपने पाठकों के लिए लेंगे। हर लेखक पाठकों के लिए ही लिखता है और उन्‍हीं के बलबूते पर लेखन में जिंदा भी रहता है। कई पाठक तो लेखकों को ऐसे ऐसे अनुभव दे कर जाते हैं कि लेखक को एक नयी रचना की ज़मीन मिलती है। हम यही अनुभव लेना चाहेंगे। · 

विरासत- इस कालम में हम कालजयी रचनाओं को पेश करना चाहेंगे। ये किसी बड़ी रचना का सार संक्षेप भी हो सकता है और रचना छोटी होने की स्थ्‍िति में जस का तस भी। · 

देस परदेस – इसमें महीने में एक बार हम उपलब्‍ध होने पर प्रवासी साहित्‍य लेना चाहेंगे। · हम एक कालम और शुरू करेंगे जिसमें नेट मीडिया पर अन्‍यत्र छपी बेहतरीन रचनाओं की, चल रही बहस की, उठाये गये मुद्दों की बात करेंगे। · 

मैंने पढ़ी किताब – इस कॉलम में हम विभिन्‍न स्रोतों से सद्य प्रकाशित किताबों के बारे में अपने पाठकों को बतायेंगे। हो सके तो किताब के कवर का स्‍केन, प्रकाशन संबंधी जानकारी भी देंगे। इसी कालम में हम स्‍तरीय किताबों के पढ़े जाने के बारे में भी फीडबैक लेंगे। · 

पठनीय – इसमें हम स्‍तरीय किताबों की समीक्षा आमंत्रित करेंगे और किताबें मिलने पर समीक्षाएं करवा कर प्रकाशित भी करेंगे। तो मित्रो, ये पत्रिका तो आप सब की है, आप सब के लिए है और निश्चित रूप से आप सबके रचनात्‍मक सहयोग से ही चलने वाली है। आपकी रचनाओं का हमें बेसब्री से इंतज़ार रहेगा1 हां, रचना भेजते समय ये ज़रूर देख लें कि वह पहले से ही नेट पर किसी और पत्रिका, ब्‍लॉग या वेबसाइट पर उपलब्‍ध न हो। 

आप यूं मान लीजिये कि हम अपने पाठकों को आपकी नवीनतम रचना के पाठ का सुख देना चाहेंगे। आपकी रचना के साथ आपका प्रोफाइल और फोटो भी मिले तो सोने में सुहागा। आप अपनी रचना मुझे mail@surajprakash.com पर या सीधे ही पत्रिका के पते sahityashilpi@gmail.com पर भेज सकते हैं। 

आपका अपना ही 

– सूरज प्रकाश 

वावरे ..! किस चाह में ….. [ गीत ] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

जीव जीवन पथ अकेला 
आदि से जग राह में 
क्यों फिरे उद्विग्न अंतस  
वावरे ..! किस चाह में 

नगर में मेले मिले तो 
भीड़ भी पुरशोर है 
डगर पथरीली कठिन भी 
मनुज मन कमजोर है 
बह गया बहुधा लहर से 
तुमुल करतल वाह में 
वावरे ..! किस चाह में 

कालिमा कुत्सित तमस की 
हाय मानव छल गयी 
मोह माया रज्जु बन्दी 
सकल उर्जा जल गयी 
डोर अब अव्यक्त खींचे 
ढोर बांधे रज्जु से 
छूटते सब संग साथी 
दिव्य आभा पुंज से 
अहा अब अभिसिक्त यौवन 
अलौकिक किस राह में 
वावरे..! किस चाह में 
©तृषा’कान्त’

राम मिथ या इतिहास…भाग – 4 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(4) इतिहासोपयोगी रामकथा
राम से संबंधित सामग्री का प्रमाणिक ग्रंथ है रामायण। जिसके कृतित्व का श्रेय ’वाल्मीकि’ को दिया जाता है। जैसा कि विगत अंको में मैने ’रामायण’ के साक्ष्य के आधार पर कहा है कि रामायण संहिता है जिसका अभिप्राय है कि मूलकथा को समय-समय पर विस्तार दिया गया। डॉ0 फादर कामिल बुल्के जैसे ’रामकथा’ के प्रसिद्ध शोधकर्ता रामायण के बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को प्रामणिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए उन्हें प्रक्षिप्त मानते हैं। डॉ0 बुल्के को आधार मानते हुए यदि सप्तखण्डीय प्रचलित रामायण में महीनतम् छलनी लगाकर ’’ऐतिहासिकता’’ के अनुसंधान हेतु ’रामकथा’ को शब्दो, आनुवांशिक कथाओं एवं अलंकारादि से रहित कर तलाश किया जाए तो ’रामकथा’ कुछ इस प्रकार कही जा सकती है।
संक्षिप्त ’’रामकहानी’’
श्री बुल्के के शोध प्रबन्ध के आधार पर प्राप्त तथ्यों के निचोड़ से जो रामकथा बनती है और हम जिसको राम एवं उनके समकालिकों की खोज में प्रयोग करने वाले हैं वह इस प्रकार है –
ऋग्वेद में ’राम’ दशरथ और इक्ष्वाकु का उल्लेख मिलता है। मिश्र के शासक रोमेसिस एवं मध्य एशिया की आर्य जाति ’मितान्नि’ में दशरथ नामक राजा का उल्लेख मिलता है। इन दोनों का काल 1300 से 1400 ई0सदी पूर्व श्री बुल्के मानते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहानी यों कही जा सकती है कि इक्ष्वाकु के वंश में दशरथ पुत्र राम का (1300-1400 ई0सदीपू0) जन्म हुआ। राम पिता की आज्ञा से अनुज लक्ष्मण एवं पत्नी सीता सहित 14 वर्षों के लिए वन चले गए। वन में पत्नी सीता का त्रैलोक्यजयी, महान विजेता, राक्षस राज रावण के द्वारा अपहरण कर लिया गया। राम ने वानर, गृद्ध, ऋक्ष आदि कबीलाई शासकों/समूहों के सहयोग से रावण का उसकी समस्त सेना के सेनापतियों, भाई बान्धवों सहित वध करके उसके ही भाई विभीषण को लंका का राज्य हस्तगत करवा दिया।
इतनी सी कथा का आलंकारिक विस्तार रामायण में है जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों की गवेषणा कर राम का ऐतिहासिक कालक्रम निर्धारित करना है। यह कार्य समुद्र से एक सच्चा मोती तलाश करने जैसा दुरूह कार्य है। हम कामिल बुल्के के तथ्यों को प्रथम दृष्ट्या अमान्य करते हैं। श्री बुल्के के काल निर्धारण को इसलिए स्वीकार नही किया जा सकता क्योंकि उनका शोध, रामकथा की ऐतिहासिकता की तलाश है। न कि राम रावण युद्ध के घटनाक्रम के ऐतिहासिकता की। ’रामकथा’ के पात्रों के नाम जहां तक प्राप्त हुए हैं श्री बुल्के उस कालखण्ड तक पहुंचे हैं किंतु रामायण में वर्णित तथ्यों पर उन्होने कोई भी अनुसंधानात्मक दृष्टि नही डाली है। अतः उनका मत (1300-1400 ई0 सदी पू0) अस्वीकार्य किए जाने के योग्य है।
©तृषा’कान्त’

राम मिथ या इतिहास…भाग – 3 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(3) अश्व बनाम गदहा ?
विकीपीडिया इनसाइक्लोपीडिया हमें जानकारी देता है कि गधे लगभग 5000 वर्ष से 4000 वर्ष में इजिप्ट या मेसोपोटामिया में पालतू बनाये गये और फिर वहां से सारे संसार में फैल गये। ’गदहा’ अश्व परिवार का पालतू जानवर है। घोड़े को संभवतः 3000 वर्ष से 4000 वर्ष में पालतू बनाया गया।

(Horse – Introduction – Nature – October /  November – 2008 & June – 2010) (www.pbs.org.wnte/ nature/ episode/ horses/ introduction equine evoluation – The history of the horses and pony – By Kate Hinton Equus – Cabalus)
लगभग 55 मिीलयन वर्ष पूर्व एक छोटा प्राणी था जिसे Hyracotherium कहा जाता था। इसका आकार लगभग Terrier की तरह था और सारे समय इसका विकास घोड़े की तरह होता रहा। लगभग 5 मिलियन वर्ष पूर्व Equus का विकास Dino hippus के संबंधी वर्ग की तरह हो गया था। Equus का आकार मध्यम आकार के गदहे की तरह था। Equus उत्तरी अमेरिका के जंगलो से संभवतः आए थे। फासिल्स विशेषज्ञों द्वारा इसे नाम दिया Eohippus – the dawn horse प्रारम्भिक घोड़ा। लगभग 10000 ईसा पूर्व इस तरह के Dawn horses दूसरे प्राणियों जैसे मैमथ की भांति विलुप्त हो गए। निश्चित रूप से इनकी विलुप्ति का कारण बता पाना मुश्किल है। संभवतः पर्यावरणीय परिवर्तन एवं मानव द्वारा किए जाने वाले शिकार के कारण इनका लोप हो गया होगा। रामायण में वर्णित घटनाक्रम के काल निर्धारण में हमें उपरोक्त तथ्यों से कुछ सहायता प्राप्त हो सकती है। Terrier का विकास अब तक Dawn horses की तरह हो चुका था और इसकी प्रजाति अब प्रायः लुप्तप्राय थी। अतः राजाओं के उपयोग के लायक ही बची थी। एक बात और है कि इसके आकार के कारण इसे प्रायः ’खर’ ही कहा जाता था। किंतु इसकी विकसित नस्ल को कुछ लोग तुरंग (तुर+गम्+ खच+ मुम्) कहने लगे थे। अतः Terrier Dawn horses को ’खर’/तुरंग मान सकते है। ’तुर’ उपसर्ग गम् धातु के गमनार्थक अर्थ को गति प्रदान करता है। तुर्+गम्+खच्+मुम्, तुर-तुरेण वेगेन उदाहरण – तुरग खुर हतस्तथा रेणुः (अभि0शाकु0/कालिदास 1/28) लेकिन यह गतिशीलता आधुनिक अश्व की तरह तो निश्चय ही नही रही होगी। यदि हम उपरोक्त तथ्य पर सहमत हों कि रावण के रथ में अरण्यकाण्ड में जुतने वाला ’खर’ और युद्धकाण्ड में रथवाहक बनने वाला ’’तुरंगम’’ वस्तुतः एक ही है और वह है Terrier का वशंज Dawn horses जो कि उस समय अपनी अन्तिम् पीढ़ी के द्वारा रावण को अपनी सेवा दे रहा है तो हम राम अथवा रावण के स्थितिकाल को 10000 ई0पू0 की एक सीमा रेखा के अन्दर रख सकते हैं।(….अनवरत्)

©तृषा’कान्त’ 
(नोट:- तृषाकान्त की ओर हम यह अनुरोध करेंगे की कृपया तथ्य एवं विचारपूर्ण असहमति से अवगत कराएं ताकि एक प्रभावी शोध में सहायता प्राप्त हो) 

राम मिथ या इतिहास…भाग -2 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(2) अश्व बनाम गदहा
रामायण में युद्ध काण्ड तक घोड़ों का उल्लेख पाया तो अवश्य जाता है किंतु अश्व और अश्वारोंहियों की जैसी विशेषताओं से ऋग्वेद हमें परिचित कराता है, रामायण उसके लेशमात्र का भी स्पर्श नहीं कर पाती। इस संबंध में प्रस्तुत आलोचना में रामायण के बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को सम्मिलित नहीं किया गया है क्योंकि रामायण के अधिंकाशतः शोधकर्ता उत्तरकाण्ड एवं बालकाण्ड को प्रक्षिप्त मानते हैं जैसे फादर कामिल बुल्के ’रामकथा’। अतः प्रथम दृष्टया इस बात के पर्याप्त प्रमाण माने जाने चाहिए कि रामायण की मूलकथा ’अश्वों’ से अपरिचित सी है। बाद में संहिताकारों ने समकालिक प्रभाव को ग्रहण करते हुए इस प्राणी को रामकथा से जोड़ दिया। किंतु मूलकथा का भाग न होने के कारण संहिताकारों को वह स्वाभाविकता प्राप्त नहीं हुई जो ऋग्वेद के संहिताकारों को प्राप्त हुई।
यहां पर एक अन्य तथ्य की ओर ध्यान देना आवश्यक है। अयोध्याकाण्ड से युद्ध काण्ड पर्यन्त हम राक्षसराज रावण का प्रथमवार साक्षात्कार अरण्यकाण्ड में करते हैं। अकम्पन के उकसाने पर रावण सीताहरण में सहयोग के लिए आमंत्रित करने हेतु मारीच के पास जा रहा है। रावण का रथ एवं उसके जुते हुए पशु देखिए।

तदेवमुक्त्वा प्रययौ खरमुक्तेन रावणः
     रथेना दिव्यवर्णेन दिशः सर्वाः प्रकाशयन्।
                          (अरण्य का./सर्ग 31/84)
विरोधाभास देखिए। रथ वाहक पशु है गधे और रथ सूर्यतुल्य संभवतः सोने का अथवा सोने जैसा।संस्कृत शब्द कोष ’खर’ का अर्थ करता है – ’गदहा’, खच्चर (वा.शि. आप्टे पृ0 324) गदहा हो अथवा खच्चर किंतु एक बात दोनों पशुओं में समान है। वह यह कि दोनो ही मन्दगामी पशु है। इन पशुओं की ख्याति गति और शक्ति के लिए नहीं है जैसे अश्व की है। 


पहली बार रावण मारीच तक जाता है। कितु मारीच के समझाने पर लंका वापस आ जाता है। पुनः जब शूपर्णखा लंका आती है। रावण को भड़काती है तो वह सीताहरण के लिए तैयार हो जाता है। पुनः मारीच के पास जाता है। पुनः उसका रथ देखिए !

   कामगं रथमास्थाय कांचनम् रत्नभूषितम्
पिशाचवदनै युर्क्त खरैः कनक भूषणैः।।
                               (अर का/सर्ग 35/6)
यहां स्पष्ट रथ सोने का है और वाहक ’’पिशाचवदनै युर्क्त खरैः अर्थात गदहे।’’ ’’पिशाच वदन’’ विशेषण से खच्चर मान सकते हैं क्या ? जो भी हो कितु मूलभाव यथावत ’’मंदगामी पशु’’। इसी काण्ड के सर्ग 42 में पुनः ’’पिशाच वदनै खरैः’’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। इस प्रकार अरण्यकाण्ड में ’’रावण का वर्णन जहां भी अपने रथ पर सवार योद्धा के रूप में हुआ है। वहां रथवाहक पशु गदहा ही है। 


अरण्यकाण्ड के पश्चात रावण को हम युद्धकाण्ड में प्रहस्त की नील के हाथों मृत्यु के पश्चात रथ पर सवार होकर युद्ध के मैदान में देखते हैं। किंतु यहां उसके रथ में ’’तुरंगोत्तम राजियुक्तम’’ (यु0का0/सर्ग 59/7) उत्तम घोड़ों को जुता हुआ देखते हैं। मेरा प्रश्न यह है कि –

प्र01- यदि अब घेाड़े जोत दिए तो पहले गदहे क्यों जोते थे ? यदि हम यह मानें कि अब रावण युद्ध में जा रहा है। अतः घोड़े जुते हैं। तो ’परनारी’ वह भी राम जैसे शूरवीर की पत्नी के अपहरण में युद्ध नही हो सकता, यह संभावना तो मूर्ख भी नही मानता। रामायणकार तो रावण को महायोद्धा ही नही विद्धान भी मानते हैं। अतः उसे युद्ध की संभावना नहीं होगी यह मानना मूर्खता है और युद्ध हुआ भी ’जटायू के संग’

प्र02- यदि यह तर्क दिया जाए कि रावण को अपमानित करने के लिए गदहे रथ में जुते दिखाए गये तो व्यर्थ का तर्क है। कारण एक तो पहले गदहे जोते तो बाद में घोड़े क्यों जोत दिए ? दूसरे ’’रामायण’’ एक महाकाव्य है। महाकाव्य के वैशिष्ट्य के अनुसार धीरोदत्त नायक के चरित्र को उभारने के लिए वैसा ही श्रेष्ठ खलनायक रखा जाता है न कि विदूषक खलनायक। तीसरे रामायणकार ने अपने सभी पात्रों के चरित्र के पूरी गंभीरता से विस्तार दिया है तो ’रावण’ जो कि महान योद्धा एवं विद्वान है, उसके चरित्र के साथ वह ऐसा मजाक करेंगे, बात गले नही उतरती। तो क्या मान लिया जाए कि तत्समय सम्राटों के प्रयेाग में गदहे हो सकते हैं ?

यदि घोड़ो के प्रयेाग को संदिग्ध स्वीकार कर लिया जाए, साक्ष्य जिसकी अनुमति देते हैं, तो गदहे का प्रयोग वास्तविक सा लगता है। प्रश्न पुनः प्रथम अंक की तरह है कि अन्ततः सिद्ध क्या होता है ? बस यही की राम एवं उनके समकालिकों की ऐतिहासिकता की ओर एक कदम और। (अगले अंक में)
©तृषा’कान्त’

नासा – बनाम संस्कृत एवं ब्राहम्ण .. [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

      एक समाचार मेरा ध्यान आकर्षित करता है। मैं संक्षेप में आपका ध्यान उस ओर आकर्षित करता हूँ। दैनिक जागरण, बरेली 26 मार्च 2012 – समाचार शीर्षक संस्कृत बनेगी नासा की भाषा

            यह समाचार यह बताता है कि 1985 में नासा ने संस्कृत भाषा के 1000 प्रकाण्ड विद्वानों को नौकरी देने का प्रस्ताव दिया था जिसे विद्वानो ने अपनी भाषा के विदेशी उपयोग के लिए सेवा देने के आधार पर ठुकरा दिया था। अब वह अपने ही लोगो को इस भाषा में पारंगत बनाने में जुटे हैं। समाचार पत्र की इस रिपोर्ट के अनुसार नासा के मिशन संस्कृतकी पुष्टि उसकी बेबसाइट भी करती है। उसने स्पष्ट लिखा है कि 20 साल से नासा संस्कृत पर काफी पैसा और श्रम व्यय कर चुकी है।

            इस समाचार के दो पक्ष हैं एक संस्कृत भाषा की वैज्ञानिक उपयोगिता और द्वितीय संस्कृत के विद्वानों द्वारा विदेशी प्रगति के लिए अपनी भाषा की सेवा से इन्कार कर देना। सामान्यतः इस देश में संस्कृत के अधिकांशतः विद्वान ब्राह्मण हैं। जब देश में ब्राहमणों पर देश के इतिहास, हिन्दुओं की सामाजिक श्रेणीगत व्यवस्था एवं राजनीति को प्रदूषित करने के आरोप पानी पी-पी कर लगाये जाते हैं। हमें अपमानित करने वाले नारे गढ़े जाते हैं। ऐसे में यह समाचार आंख खोलने वाला है। यह देश हमारा है। इसकी उन्नित में मिटटी की सुगन्ध है। भला पैसा और उच्चस्तरीय जीवन पद्धति उन आदर्शों और देश के मान-सम्मान से प्रतिस्पर्धा कैसे कर सकती है जो हमारे पूर्वजों ने आत्म गौरव के रूप मे हमें विरासत में दिए हैं। मैं जानता हूँ कि धर्म निरपेक्ष, प्रजातांत्रिक भारत में संस्कृत महत्वपूर्ण नहीं हो सकती क्योंकि यह हिन्दुओं की सांस्कृतिक भाषा है। यह ब्राह्मणों की विश्व-मानवता को अमूल्य धरोहर है और ब्राह्मण तो जिताऊ मतदाता नही हो सकता। लेकिन काश ! ब्राह्मण ही अपनी आंखे खोल पाते और संस्कृत के लोक जीवन के लिए संगठित प्रयास कर पाते।
(कृपया विस्तृत समाचार दैनिक जागरण हिन्दी समाचार पत्र दिनांक 26.03.12 पृद्गठ 15 पर देखा जा सकता है)

©तृषा’कान्त’

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