राम मिथ या इतिहास…भाग -1 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(1) रामायण में ‘अश्व’ 
   रामायण को भारतीय हिन्दू परम्परा इतिहास मानती है। थोड़ा सा संशोधन अपेक्षित है। रामायण में वर्णित घटनाक्रम इतिहास है। जबकि ”रामायण अर्थात ”राम का शौर्य वर्णन” (संस्कृत हिन्दी शब्द कोष-वा.शि. आप्टे पृ0 855) एक संहिता है जो कि प्राचीन काल में वाल्मीकि द्वारा कही गई है। (रामायण लंकाकाण्ड, सर्ग 128, श्लोक संखया 112, 113, 114 एवं 123) इदं काण्यं पुरा वाल्मीकिना कृतम्‌ अथवा चेमां संहितामृषिगणां कृतामं (वाल्मीकि रामायण – गीता प्रेस – गोरखपुर) 
   मेरा जिज्ञासा का विषय रामायणीय घटनाक्रम की ऐतिहासिकता का परीक्षण है। जिसके लिए मैं साक्ष्य रामायण में ही खोजकर उनका परीक्षण करना चाहता हूँ। विषयांकित ‘पशु’ को एक ऐसा ही साक्ष्य मैं स्वीकार करता हूँ। 
रामायण (उपरोक्त संस्करण) अयोध्याकाण्ड प्रथम सर्ग श्लोक-28 ”वारणवाजिनाम्‌” पद का प्रयोग किया गया है अर्थात्‌ हाथी, घोड़े। राम के राज्याभिषेक के समय प्रस्तुत सामग्री में जिन पशुओं का उल्लेख है, वह हैं – (अयो0का0 सर्ग-14 श्लोक 35 से 41) –

”हेमदामपिनद्धश्च ककुद्यान पाण्डुरोवृषा:,
 केसरी च चतुर्द्ष्टो हरिश्रेष्ठो महाबलः।”

   अर्थात स्वर्णमाला से अलंकृत ऊँचे डीलडौल वाला श्वेतपीतवर्ण वृषभ, चार दाढों वाला सिंह एवं महाबलवान उत्तम अश्व।” 

प्रश्न :- शंका यह है कि इस श्लोक में बैल और सिंह की शरीरगत विशेषताएं कहीं गई है जबकि अश्व की गुण अथवा भावगत। क्यों ? 
   अयोध्याकाण्ड के ही सर्ग 41 श्लोक 21 में रामायणकार राम के वनगमन के समय शोकाकुल नगरी का वर्णन करते हैं। पंक्ति है – ”सनागयोश्व” गणा ननाद च।” ……… हाथी, घोड़े और सैनिको सहित उस नगरी में भयंकर आर्त्तनाद होने लगा। 
   प्रश्न :- राम ”युवराज” हैं। युवराज का अश्व विशेष होगा पालतू पशु संवेदनशील होते हैं और ‘अश्व’ तथा ‘श्वान’ की स्वामिभक्ति तो प्रसिद्ध ही है। कवि की प्रतिभा की द्रष्टि से देखें तो भी यह विशेष अवसर है। ‘राम’ वन जा रहे हैं। उनका प्रिय ‘अश्व’ उनके साथ नहीं जा रहा। ऐसे में इस भाव को व्यक्त करने में कवि अपने विशेष कवि चातुर्य का परिचय दे सकता है। पर उसने ऐसा नही किया क्यों ? एक अन्य प्रश्न भी है ? 
   प्रश्न :- सर्ग 36 में दशरथ राम के साथ कोष और सेना भेजने का निर्देश देते हैं। कैकेयी विरोध करती हैं। सर्ग 39 में वनवास अवधि के प्रत्येक वर्द्गा के लिए सीता को आभूषण दिये जाते हैं। राम और लक्ष्मण सशस्त्र है। धनुष, तूणीर तलवार आदि उनके अस्त्र-शस्त्र हैं। ऐसे में वनवास काल के लिए वह तीनों अश्व क्यों नही ले जाते ? वनयात्रा में घोड़ा सुविधाजनक भी है। उसकी व्यवस्था सहज है। शत्रुओं से रक्षा में भी उपयोगी है। अन्ततः आभूषण, अस्त्र-शस्त्रादि वनवास यात्रा में ढोना आसान कार्य तो नही है। 
   रामायण में यत्र-तत्र सर्वत्र घोड़े का नाम बिखरा हुआ है, जैसे अ0का0 सर्ग 70 में कैकय नरेश अपने भांजे भरत को जो भेंट देते हैं उनमें हाथी, घोड़े, कुत्ते और (खरंज) खच्चर भी दिए। 
   इसी तरह अरण्यकाण्ड सर्ग 22 में राम के प्रतिद्वन्द्वियों में मात्र ‘खर’ के रथ में चितकबरे घोड़ों के जुते होने का उल्लेख है। किंतु अश्वारूढ सेना मे लाखों की संख्या में अश्वों का प्रयोग एका-एक दिखाई देता है जैसे अयोध्या काण्ड सर्ग 103 श्लोक 5 में ”सहस्त्राण्यश्रवनां समारूढ़ानि” पद का प्रयोग हुआ है। अरण्यकाण्ड में खर-दूषण की सेना के प्रस्थान के समय केवल खर के रथ के चितकबरे घोड़ों का उल्लेख है किंतु बाद के सर्गो में दूषण के रथ के घोड़ों सहित राम तमाम हाथी, घोड़ों का वध करते हैं। ऐसे प्रसंग स्थान-स्थान पर दिखाई देते हैं। लंकाकाण्ड, युद्धकाण्ड तक हम ऐसे तमाम प्रसंगो का उल्लेख कर सकते हैं। इस सम्बन्ध में अधिक साक्ष्य प्रस्तुत करने के स्थान पर कतिपय शंकाएं प्रस्तुत हैं – 
   प्र01- चाहें राम हो अथवा अयोध्या अथवा लंकापक्ष के अन्य गणमान्य योद्धा । किसी के भी व्यक्तिगत उपयोग के अश्व का वैशिष्ट्य एवं उसके नामादि सहित उल्लेख नही हैं। जबकि ‘राम’ के व्यक्तिगत उपयोग के हाथी का नाम ‘शत्रुज्जय” (सर्ग 15 श्लोक 46-अयो0का0) उल्लिखित है। जबकि इस सर्ग के प्रारम्भ में राम के गुणों के वर्णन में उन्हे घुडसवारी का श्रेष्ठ ज्ञाता बताया गया है। 
   2- चित्रकूट से दण्डकारण्य तक जगह-जगह ऋद्गिायों के आश्रम हैं। अगस्त जैसे ऋषि शस्त्रजीवी हैं। किंतु इन आश्रमों में शस्त्रागार तो उपलब्ध हैं किंतु अश्वशालाएं नहीं। 
   3- अश्व सेना की अपनी तकनीकी होती है और विशेषता भी। घुड़सवार अपने घोड़े से निजी संबंध विकसित करता है। पालतू पशुओं अथवा सैन्य प्रयोग के पशुओं के नाम रखे जाते हैं। मुगलकाल के राजपूत राजा महाराणा प्रताप और उनके घोड़े चेतक की कहानियां भारतीय इतिहास का हिस्सा हैं। ऐसा रामायण में नही दिखाई देता। 
   4- इस सम्बन्ध में ऋग्वेद के कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं :- ”1/3/24- ‘अश्वारोही इन्दु’, 1/16/4- ”हरिभिरिन्दु केच्चिभिः” केसर अथवा अयालों से युक्त अश्वों से” 1/16/9 में अश्वों की कामना की जाती है। 1/22/3- ”कशा मधुमर्त्या वना कशा” अर्थात घोड़े की चाबुक (उपमा में प्रयोग किया गया है) 1/28/4 में घोड़े की लगाम के लिए ‘उपमार्थक’ प्रयोग में ‘रश्मी’ शब्द का प्रयोग है। 1/30/16 में स्फूर्तिवाद, हिनहिनाते हुए, तीव्रगति वाले ‘अश्वों’ का प्रयोग आया है। 1/33/14 ”अश्व के खुरों से धूल आकाश तक फैल गई।” 1/35/5 ”सूर्यदेव के अश्व श्वेत पैर वाले हैं।” 1/63/5 हमारे अश्वों के मार्ग को मुक्त करें।” 1/64/7 ”लाल वर्ण वाली घोडियों”’ 1/64/8 धब्बेदार घोडियों। 1/73/9 ”हम अपने अश्वों से शत्रुओं के अश्वों ”दूर करें” 1/81/13 युद्धारम्भ होने पर मद टपकाने वाले (उमंग में आने वाले) अश्वों को अपने रथ में न जोड़ें। .1/82/3 ”हे इन्द्र देव आप ‘हरी’ नामक ‘अश्वों को रथ में नियोजित करें’ 1/87/4 स्वसृत पृष्ददश्वो” स्वसृत बिन्दुओं से चिहिन्त अश्व” 1/88/2 ”भूरे वर्ण वाले अश्व” 1/89/7 – बिन्दुवत्‌ चिह्‌नवाले चितकबरे अश्व” आदि। 
   ये ऋग्वेद के नायको एवं ऋषियों का अश्व विद्या एवं अश्वों के सैन्य प्रयोग का ज्ञाता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। (हिन्दी अनुवाद ऋग्वेद सहिता आचार्य श्री श्रीराम शर्मा से लिया गया है)
  रामायण अश्व शब्द के विभिन्न प्रयोग करती तो है किंतु उनमें ऋग्वेद अथवा महाभारत अथवा अनुवर्ती इतिहास की तरह अश्व प्रयोग की कुशलता की बात परिलक्षित नहीं होती। इससे मुझे लगता है कि रामायण में वर्णित ”मूलघटनाक्रम” को जानने वाले भले ही उन्होने इसे श्रुतियों और स्मृतियों के आधार पर जाना हो, उस घटना में अश्वों के प्रयोग से परिचित नहीं हैं। अतः यह सम्भावित है कि रामायण में अश्वों का सैन्य प्रयोग दिखाया जाना प्रक्षिप्त हो सकता है। आप कहेगें कि इससे सिद्ध क्या होता है ? मात्र इतना ही कि यदि हम रामायण में घोड़ों के प्रयोग को संदिग्ध मान लें तो हम रामायण की ऐतिहासिकता की खोज में एक कदम आगे बढ सकते हैं।
(आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए मैं आप सभी का आभारी रहूँगा) ©तृषा’कान्त’

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1 टिप्पणी (+add yours?)

  1. Chandra Prakash
    अप्रैल 05, 2012 @ 08:16:30

    ram ke nam ke sath ek aur shbd judta hai, Maryada Purushottam, jiske ki apne hi mayane hai. Ghatanachakra me kya joda gaya hai ya kya nahi, wo important nahi hai, important hai Ramayan ka Digdarshan.

    प्रतिक्रिया

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