राम मिथ या इतिहास…भाग – 4 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(4) इतिहासोपयोगी रामकथा
राम से संबंधित सामग्री का प्रमाणिक ग्रंथ है रामायण। जिसके कृतित्व का श्रेय ’वाल्मीकि’ को दिया जाता है। जैसा कि विगत अंको में मैने ’रामायण’ के साक्ष्य के आधार पर कहा है कि रामायण संहिता है जिसका अभिप्राय है कि मूलकथा को समय-समय पर विस्तार दिया गया। डॉ0 फादर कामिल बुल्के जैसे ’रामकथा’ के प्रसिद्ध शोधकर्ता रामायण के बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को प्रामणिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए उन्हें प्रक्षिप्त मानते हैं। डॉ0 बुल्के को आधार मानते हुए यदि सप्तखण्डीय प्रचलित रामायण में महीनतम् छलनी लगाकर ’’ऐतिहासिकता’’ के अनुसंधान हेतु ’रामकथा’ को शब्दो, आनुवांशिक कथाओं एवं अलंकारादि से रहित कर तलाश किया जाए तो ’रामकथा’ कुछ इस प्रकार कही जा सकती है।
संक्षिप्त ’’रामकहानी’’
श्री बुल्के के शोध प्रबन्ध के आधार पर प्राप्त तथ्यों के निचोड़ से जो रामकथा बनती है और हम जिसको राम एवं उनके समकालिकों की खोज में प्रयोग करने वाले हैं वह इस प्रकार है –
ऋग्वेद में ’राम’ दशरथ और इक्ष्वाकु का उल्लेख मिलता है। मिश्र के शासक रोमेसिस एवं मध्य एशिया की आर्य जाति ’मितान्नि’ में दशरथ नामक राजा का उल्लेख मिलता है। इन दोनों का काल 1300 से 1400 ई0सदी पूर्व श्री बुल्के मानते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहानी यों कही जा सकती है कि इक्ष्वाकु के वंश में दशरथ पुत्र राम का (1300-1400 ई0सदीपू0) जन्म हुआ। राम पिता की आज्ञा से अनुज लक्ष्मण एवं पत्नी सीता सहित 14 वर्षों के लिए वन चले गए। वन में पत्नी सीता का त्रैलोक्यजयी, महान विजेता, राक्षस राज रावण के द्वारा अपहरण कर लिया गया। राम ने वानर, गृद्ध, ऋक्ष आदि कबीलाई शासकों/समूहों के सहयोग से रावण का उसकी समस्त सेना के सेनापतियों, भाई बान्धवों सहित वध करके उसके ही भाई विभीषण को लंका का राज्य हस्तगत करवा दिया।
इतनी सी कथा का आलंकारिक विस्तार रामायण में है जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों की गवेषणा कर राम का ऐतिहासिक कालक्रम निर्धारित करना है। यह कार्य समुद्र से एक सच्चा मोती तलाश करने जैसा दुरूह कार्य है। हम कामिल बुल्के के तथ्यों को प्रथम दृष्ट्या अमान्य करते हैं। श्री बुल्के के काल निर्धारण को इसलिए स्वीकार नही किया जा सकता क्योंकि उनका शोध, रामकथा की ऐतिहासिकता की तलाश है। न कि राम रावण युद्ध के घटनाक्रम के ऐतिहासिकता की। ’रामकथा’ के पात्रों के नाम जहां तक प्राप्त हुए हैं श्री बुल्के उस कालखण्ड तक पहुंचे हैं किंतु रामायण में वर्णित तथ्यों पर उन्होने कोई भी अनुसंधानात्मक दृष्टि नही डाली है। अतः उनका मत (1300-1400 ई0 सदी पू0) अस्वीकार्य किए जाने के योग्य है।
©तृषा’कान्त’

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