राम मिथ या इतिहास…भाग – 8 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

.हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें।  आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए  अग्रिम आभार – तृषाकान्त
 (8)  रावण का प्रेतकर्म – (दण्डकारण्य एवं राक्षस)
विगत 5 से क्रमांक 7 तक के अंको के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि मानवीय विकास के इतिहास के प्रारम्भिक काल के कतिपय ऐसे साक्ष्य हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि उस कालखण्ड में मानव शवग्रहों में मानव शवों के मृत पशुओं अथवा उनके अंगो को भी दफन किया जाता था। विद्वानों का ऐसा मानना है कि ऐसा संभवतः धार्मिक कारणों से होता रहा होगा। आश्वलयन गृहसूत्र और रामायण के उदाहरणों से इसकी पुष्टि की जा सकती है। ऐसे शवगृह Shanidarईराक, Kebra इजरायल और Krapenia क्रोशिया में पाए गए हैं। इसके सबसे पुराने प्रमाण Skhulcave at Qatzeh इजराइल में खोजे गए हैं जो 1,30,000  (एक लाख तीस हजार) वर्ष पुराने माने जाते हैं।
      क्या रामायण के सन्दर्भ में ऐसे प्रमाण खोजे जा सकते हैं। रामायण में राक्षस संस्कृति के अनुयायिओं के साथ ऐसी संभावना बनती है कि उनके ’’शवों के साथ’’ पशु अंश दफनाए जाते हों। विराध के उदाहरण से राक्षसों के शवों का दफनाया जाना तो प्रमाणित है ही। रावण की चिता का उदाहरण शव के साथ पशु चर्म अथवा अंग और कतिपय यंत्रो को शव को समर्पित करने का उदाहरण है। दोनो उदाहरणों को साथ रखकर देखें तो इस बात का निषेध जरा कठिन है कि कतिपय राक्षस अपने शवों के साथ मृत पशु या उसके अंग और शव के उपयोग की सामग्री न दफन करते हों।
      अतः भारत वर्ष के उस भाग में जिससे रामायण कालीन राक्षसों का संबंध रहा हो ऐसे शवगृहों की खोज की जानी चाहिए। रामायण में ऐसे दो स्थान चिन्हित किए जा सकते हैं
1-   दण्डकारण्य     2-    लंका।
इन स्थानों में ’’दण्डकारण्य’’ का सीमांकन विद्वानों में लगभग असंदिग्ध है जबकि लंकाको चिन्हित किए जाने पर विद्वान एकमत नही है। अतः प्रथमतः हम दण्डकारण्य की भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण करते हैं ताकि ऐसे शवगृहों की खोज कर उनका समय जाना जा सके।
दण्डकारण्य का भूगोल
रामायण में ’’दण्डकारण्य’’ का सर्वप्रथम परिचय हम आरण्यकाण्ड के प्रथम श्लोक में पाते हैं –
प्रविश्य तु महाराण्यं दण्डकारण्यमात्मवान।।
वन कैसा है: इसकी वीभत्सता और दण्डकारण्य के भौगोलिक विस्तार को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझने के बाद हमें इस रामायण कालीन दण्डकारण्य एवं वर्तमान बस्तर’ (छत्तीसगढ़) एवं आन्ध्रा, उड़ीसा, महाराष्ट्र तक विस्तृत सीमाओं वाले इस क्षेत्र के वर्तमान आदिवासी निवासियों, एवं उनकी संस्कृति एवं परम्पराओं आदि का विश्लेषण करना होगा।
      रामायण के अनुसार यह वन अत्यन्त घना है। इतना सघन कि काले मेघ के समान दिखाई देता है। वन्य पशुओं के अतिरिक्त नरभक्षी राक्षसों का इस क्षेत्र में साम्राज्य है। इस दण्डकारण्य को आधुनिक विद्वानों ने चिह्नांकित किया है।
Wickipedia encyclopedia – Dandakarnaya is specritually significant region in india. It is roughly equivalent to the Baster District in the central east past of India. It covers about 35600 square miles (92,000 kms) of land which includes the “Abajhmar” hills in the west and the eastern ghat in the east. including parts of the Chattisgarh, Orissa, Maharastra and Andhrapradesh states. It spans 200 miles (320km) from north to south and about 300 miles (480km) from east to west.
Fro – Dandakaranya – Wikipedia ……. encyclopedia.
en.wikipedia.org/wiki/dandakranya.

’’आमचो बस्तर’’ – श्री राजीव रंजन प्रसाद: श्री प्रसाद के इस औपन्यासिक वर्णन से पाठकों को ’’दण्डकारण्य’’ को समझने में सुविधा होगी – ’’बस्तर के भूगोल को नजरदांज नही किया जा सकता। चूंकि, यह केरल राज्य से भी बड़े भू मात्र का परिचय है। यहां कि मनोरम हरित वसना धरती पहाड़ों, पठारों और मैदानों में विभाजित है। उड़ीसा, महाराष्ट्र और आन्ध्रप्रदेश से घिरे इस वनांचल को मिलता है। पठार अपने विस्तार में दक्षिण की ओर गोदावरी के मैदानों से जा मिलता है तो पूर्व में इन्द्रावती नदी के मैदान हैं। लगभग दक्षिण में बैलाडिला की पहाड़ियों ने बस्तर को सजाया है। तो उत्तर-पश्चिम् में ’’अबूझमाड़’’ की पहाड़ियां सदियों से रहस्यमय रही हैं। दंतेवाड़ा की तराइयों, बीजापुर की ऊँचाइयों और केशकाल घाटी की खाइयों ने बस्तर की विविधता, विचित्रता और उन्मुक्ता दी है। तो रहस्य और रोमांच भी।’’ (आमचो बस्तर – रा0रं0 प्रसाद पृष्ठ-31) श्री प्रसाद बचेली (दंतेवाड़ा) छत्तीसगढ़ दक्षिण बस्तर के निवासी हैं और उन्हें लब्धख्यात आंचलिक उपन्यासकारों की श्रेणी में रखा जा सकता है। श्री प्रसाद के अनुसार बस्तर (दण्डकारण्य) के विस्तार को प्राकृतिक दृष्टि से छः भागों में बांटा जा सकता है
(अ) उत्तर का निम्न मैदान भाग – इसका विसतार उत्तर वस्तर, परलकेट, प्रतापपुर, कोटालीबेड़ा और अंतागढ़ तक है।
(ब) केशकाल – यह घाटी तेलिन सती घाटी से प्रारम्भ होकर जगदलपुर के दक्षिण में स्थित तुलसी डोंगरी तक लगभग 160 वर्गमील क्षेत्र में विस्तृत है।  
स- अबूझमाढ़ – यह क्षेत्र वस्तर के मध्य स्थित है। यहां कच्चे लोहे के विशाल भण्डार हैं।
द- उत्तरपूर्वी पठार – यह पठार कोडागांव और जगदलपुर में फैला है।
ई- दक्षिण का पहाड़ी क्षेत्र – इसके अंतर्गत दंतेवाड़ा, बीजापुर, व कोंटा के उत्तरी क्षेत्र आते हैं।
फ- दक्षिणी निम्न भूमि – इसके अंतर्गत कोंटा क्षेत्र का सम्पूर्ण भाग तथा बीजापुर क्षेत्र का दक्षिणी भाग आता है।
मैं समझता हूं कि ’’दण्डकारण्य’’ की ऐतिहासिक भूमि का भूगोल समझने में सुधी पाठकों को सहायता मिलेगी।
3 अप्रैल 2012 हिन्दी समाचार पत्र (अमर उजाला काम्पैक्ट) के समाचार इस पूर्वोक्त ’’दण्डकारण्य’’ का एक भाग ’’अंबूझमाड़’’ के सघन वन प्रदेश में स्वतंत्रता के पश्चात पहली बार पुलिस ने प्रवेश किया है और कुछ नक्सलियों को पकड़ा है। बस्तर दंतेवाड़ा अबूझमाड़ आदि आज भी नक्सली शस्त्र धारकों को भीषण हिंसा के शिकार हैं तो राम के समय में दण्डकरण्य की वाल्मीकि वर्णित भयावहता को पाठक समझ सकते हैं।
      इस तरह सम्पूर्ण वर्तमान बस्तर तथा आस-पास के कुछ क्षेत्र प्राचीन बस्तर या दण्डाकरण्य कहे जा सकते हैं। (आमचो बस्तर – रा0रं0 प्रसाद पृष्ठ – 48)
रामायण के राक्षस:- डा0 फादर कामिल बुल्के अपने शोध प्रबन्ध में रामायण के राक्षसों पर अपना मत प्रस्तुत करते हैं – ’’रायपुर जिले में रहने वाले गोंड़ अपने को रावण का वशंज मानते हैं। (पी0डेहों: रेलिजन एण्ड कस्टमस् ऑव दिन उराओंस, मैग्बयार्स ऑव दि एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल मात्र पृ0 16) उराँव भी मानते हैं कि रावण से उनकी जाति की उत्पत्ति हुई है और इसीलिए उनको उराँव नाम मिला (पूर्वोक्त) (बुल्के रामकथा – पृ0 92 – उपरोक्त स्त्रोत भी साक्ष्य हेतु श्री बुल्के ने ही उल्लिखित किए हैं)                                           (अनवरत्)

नोट:- अगले अंक में हम इतिहासकारों के अनुसार दण्डकारण्य की पहचान करेंगे एवं तत्पश्चात् ही इस क्षेत्र में ईराक, क्रोशिया और ईजराइल की भांति ऐतिहासिक अथवा प्राग्ऐतिहासिक शव गृहों की खोज कर काल निर्धारण का प्रयास करेंगे।
©तृषा’कान्त’

अथ श्री नारायण कथा .. [ आलेख ] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’


..एनडी तिवारी के खून का नमूना लिया गया—

 ….उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को पहलीबार सम्भवत: 1974-75 में संजय गान्धीके पैर छूते हुये उस आयु में देखा गया था जब वह इन्दिरा गान्धी की आयु के समकक्ष थे.. वह प्रसंग राजनीत हलकों में मुख्यमन्त्री पद की गरिमा के साथ बहुत सारी टीका टिप्पणी के साथ शान्त हुआ। नारायण जी ने कहा मैं इन्दिरा जी को बहन मानता हूं अत: श्री सन्जय गान्धी मेरे भांजे हैं। ब्राह्मण समुदाय में भांजे के पैर छूने की प्रथा को आगे लाकर उस विषय को किसी तरह शान्त किया गया था। वास्तविकता क्या थी वह सब जानते थे किन्तु उत्तर प्रदेश की जनता ने पहली बार अपने आपको लज्जित अनुभव किया था। उसके बाद देश में आपात स्थिति सहित जो भी हुआ वह .. इतिहास है । ……. एक और घटना नारायण कथा के अनेक प्रसंगों में से उल्लेखनीय है। पहली बार देश का कोई मुख्यमन्त्री दिल्ली से सड़क मार्ग से कार द्वारा निकला। सुधी मित्रों को अधिक स्मरण हो तो रास्ते में ही किसी ढाबे पर अथवा किसी अन्य ऐसे ही किसी स्थान पर अपनी सुरक्षा में सन्नद्ध कर्मियों को धता बताकर गायब हो गये। यह विगत समय के अरूणाचल एवं आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमन्त्री के हेलीकाप्टर के गायब होने वाली घटनाओं से कहीं अधिक बड़ी घटना थी। देश के सबसे बड़े प्रांत उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री लापता। सारे देश में लगभग लगभग हाहाकार मच गया। पुलिस से लेकर सुरक्षा तन्त्र की सभी एजेन्सियां खोजने में जुट गयीं। सम्भवत: साढ़े तीन घण्टे के उपरान्त मुख्य मन्त्री जी स्वयमेव प्रकट हो गये कि किसी रिश्तेदार के यहां मिलना था सो चले गये। गोया मुख्यमन्त्री पद पर पदासीन कोई जिम्मेदार व्यक्तित्व न होकर शेखचिल्ली मियां थे जो जिधर मन किया मुंह उठाया चल दिये। सम्भवत: सम्मेलन के स्थान पर कहीं कोई गोपनीय सम्मिलन कार्यक्रम था जो अगले दिन सभी समाचार पत्रों में सुर्खियों के साथ छपा था। ऐसे ही महान व्यक्तित्व की अनगिनत महान गाथायें हैं इतिहास बनाने के लिये … उनके पौरूष पर चर्चा भी सुर्खियों में रही है । बात कुछ अशोभनीय हो जायेगी .. अत: सभी बचे खुचे बुज़ुर्गों की इज़्ज़त का ध्यान करके अब मुंह बन्द कर लेना ही उचित है। अथ श्री नारायण कथा ।

©तृषा’कान्त’

राम मिथ या इतिहास…भाग – 7 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें।  आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

( 7 )  रावण का प्रेतकर्म   – जादू टोना


     रावण के प्रेत कर्म और मृतक के अन्तिम् क्रिया कर्म से संबंधित आश्वलायन गृहसूत्र में उल्लिखित पद्धति को ध्यान से पढ़े तो ऐसा लगता है कि किसी आदिम युगीन परम्परा के अवशेष हैं। संभव है कि धरती के किसी भाग पर ऐसी अथवा इससे मिलती जुलती शव निस्तारण संबंधी क्रूर परम्पराएं आज भी प्रचलित हों।
            ख्याति प्राप्त अन्तर्राष्ट्रीय यात्री एवं नोबुल पुरस्कार विजेता लेखक श्री बी0एस0 नायपॉल अपनी पुस्तक ’’द मॉस्क आफ अफ्रीका’’ (हिन्दी अनुवाद श्री नवेद अकबर – पेंगुइन प्रकाशन) के पृष्ठ 10 पर युंगाडा के धार्मिक/प्रशासनिक राजा कबाकाके अन्तिम् संस्कार का उल्लेख करते हैं – ’’कबाका मरते नहीं थे, गायब हो जाते थे। ……………..।’’ कबाका की तद्फीन सीधी सादी नही होती थी। इसमें बहुत से कार्य होते थे जो सुदूर अतीत से आए थे। ’(सुदूर क्योंकि जिन लोगों के पास लेखन या किताबें न हों वो अपने दादा, परदादा से आगे की चीजों को याद नहीं रख सकते) राजा की लाश को तीन माह तक धीमी आग पर सुखाया जाता था। फिर जबड़े की हड्डी को अलग करके उस पर मनकों और कौड़ियों का काम किया जाता। इसे मनकों के काम से मुक्त गर्भनाल, लिंग, अण्डकोष के साथ पशु त्वचा की थैली में रखकर यहां दफन कर दिष जाता। बाकी शरीर यानी गैर जरूरी आदमी को कहीं और फेंक दिया जाता।’’ क्या श्री नायपाल के उल्लेख, आश्वलायन के गृहसूत्र के वर्णन और रामायण में रावण के दाहकर्म के वर्णन के मध्य शव निस्तारण प्रक्रिया में वर्णित क्रूरता में कहीं कोई समानता है ? यदि हां तो श्री नायपाल का यह कथन भी मान्य होना चाहिए कि ऐसी मान्यताएं सुदूर अतीत का भाग होना चाहिए। इस प्रकार रामायण अथवा आश्वलायन में वर्णित शव निस्तारण कर्म में आदिमता की झलक स्पष्ट है। संभव है कि अफ्रीका की भांति भारत के आदिवासियों में भी यही अथवा ऐसी ही प्रथा प्रचलित हो।
(अनवरत्)  
                                                                                                                      

नोट:-किंतु श्रुतियों के रूप में हिन्दुओं ने इसका बेजोड़ तोड़ निकाला था। गाथाओं, कहानियों ने स्मृतियों को अक्षुण्ण बनाये रखने एवं ऐतिहासिक बीजों को अगली पीढ़ियों को हस्तान्तरित करने में सफलता प्राप्त की। 
©तृषा’कान्त’

राम मिथ या इतिहास…भाग – 6 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें।  आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(6 )  रावण का प्रेतकर्म (– गंताक से आगे )
आश्वालयन गृहसूत्र मृतक के हृदय पर मेध्य पशु का हृदय रखने के स्थान पर, मृतक के हृदय पर चावल या आटे के दो पिंड रखने का विकल्प प्रदान करता हैं। वह इस प्रेत कर्म पद्धति को आधुनिक हिन्दू समाज से जोड़ती है। इस प्रकार से रावण के दाहसंस्कार विधि का विश्लेषण करें तो जहां इसका एक सिरा आदिम मानवीय समाज तक जाता है तो वहीं दूसरी ओर यह आधुनिक हिन्दू समाज से जुड़ता है।
अरण्य काण्ड सर्ग 17 श्लोक 22 में शूपर्णखा राम को अपना परिचय देते हुए कहती है -’’वीरो विश्रवसः पुत्रो’’। यह वाक्य उसने स्वंय को रावण की बहिन बताने के बाद रावणादि का परिचय देते हुए कहा है। ’’विश्रवा’’ को आनुषांगिक साक्ष्यों में आर्य ऋषि माना गया है। इससे ’रावण’ राक्षस नाम्ना आदिम जाति का आर्य मुखिया सिद्ध होता है। ’शव’ के दाहसंस्कार की पद्धति संभवतः इसी कारण से राक्षसों द्वारा स्वीकार की गई हो। किंतु राक्षसों की कतिपय अन्य शाखाओं में ’शव’ को मिटटी में दबाने की (वर्तमान में मुस्लिम अथवा कतिपय अन्य धर्मानुयायियों की तरह) परम्परा थी। इस विषय में स्वंय वाल्मीकि रामायण ही प्रमाण है। अरण्यकाण्ड सर्ग 4 श्लोक 22 एवं 23 में विराध स्वंय को गड्ढे में गाड़ने के विषय में राम और लक्ष्मण से अनुरोध करते हुए कहता है –
अवटे चापि माँ राम निक्षिप्य कुशली ब्रज रक्षसां गतसत्त्वानामेब धर्मः सनातनः।
श्री राम ! आप मेरे शरीर को गड्ढे में गाड़कर कुशलपूर्वक चले जाइए। मरे हुए राक्षसों के शरीर को गड्ढे में गाड़ना सनातन धर्म है। (परम्परागत धर्म)

’’अवटे ये निधीयन्ते तेषां लोकाः सनातनः’’

जो राक्षस गड्ढे में गाढ़ दिए जाते हैं। उन्हें सनातन लोकों की प्राप्ति होती है।’’ इससे ऐसी सूचनाग्रहण की जा सकती है कि राक्षसों की स्थापित परम्परा ’शव’ को कब्र में दफन करने की है। किंतु रावण एवं उसके वंशजो ने दाहसंस्कार की परम्परा को अपनाया है। आश्वालयन गृहसूत्र में वर्णित विधि से विराध के कथन तक कुल मिलाकर एक ऐसा संकेत प्राप्त होता है जो संभवतः ठोस साक्ष्यों की ओर ले जाता है।

प्राचीन विश्व/भारत में कब्रों से प्राप्त साक्ष्य: आश्वालयन गृहसूत्र क्या किसी प्रचलित ’’शव निस्तारण’’ संबंधी कर्मकाण्ड का उल्लेख करता है अथवा किसी सुनी गई पूर्व परम्परा के तथ्यों को प्रचलित परम्परा के साथ मिलाकर प्रस्तुत करता है। मैं दूसरे के साथ हूँ।

विकीपीडिया इनसाइक्लोपीडिया:- Burial – wikipedia-en. International Burial, particularly with “grave goods, may be one of the earliest detectable forms of religious practice since as “Phillip Liberman” suggests, it may signify a “concern for the dead that transcends daily life.

Disputed, evidence suggests that the “Neanderthals” were the first human species to intentionally bury the dead. doing so in shallow graves along with stone tools and animal bones. इसके उदाहरण के लिए Shanidar ईराक में, इजराइल में Kebra और क्रोशिया में Krapenia. ऐसी कब्रों के सबसे पुराने प्रमाण 130000 वर्ष पुराने हैं। ऐसी कब्र Skhul cave at Qatzeh इजराइल में खोजी गई हैं।

Burial wekipedia encylopedia से ग्रहीत उपरोक्त उद्धरण से यह समझा जा सकता है कि 130000 वर्ष पुराने ऐसी कब्रों के पुरातत्विक साक्ष्य उपलब्ध हैं जो यह सिद्ध कर सकते हैं कि मानव के मृत शरीर के साथ मृत पशु अथवा उसके विभिन्न अंगो को मानवीय लाश के साथ दफनाया जाता था। किंतु प्रस्तुत साक्ष्य भारत उपमहाद्वीप से बाहर के हैं।
                                                                     (अनवरत्)
©तृषा’कान्त’

झरते हरसिंगार …. [नवगीत] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

उजसित शैशव जीवन सुरभित 
हुलसित मन आगार 
शेफाली शाखों सा झूमे 
झरते हरसिंगार 


मलयानिल सुरभित नासाग्रा 
होंठ वसन्ती कोंपल 
पल पल पुलकित स्पर्शों से 
हस्त पाद मृदु कोमल 
मृदुल मोहिनी शिशु किलकारी 
वारी सब संसार 


अखिल विश्व में नूतन अभिनव 
ईश स्वयं धर रूप सलोना 
डगमग धरता पग धरती पर 
मानवता का भूप खिलौना 
राग द्वेष से मुक्त स्नेह ही 
जीवन का आधार
©तृषा’कान्त’