राम मिथ या इतिहास…भाग – 6 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें।  आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(6 )  रावण का प्रेतकर्म (– गंताक से आगे )
आश्वालयन गृहसूत्र मृतक के हृदय पर मेध्य पशु का हृदय रखने के स्थान पर, मृतक के हृदय पर चावल या आटे के दो पिंड रखने का विकल्प प्रदान करता हैं। वह इस प्रेत कर्म पद्धति को आधुनिक हिन्दू समाज से जोड़ती है। इस प्रकार से रावण के दाहसंस्कार विधि का विश्लेषण करें तो जहां इसका एक सिरा आदिम मानवीय समाज तक जाता है तो वहीं दूसरी ओर यह आधुनिक हिन्दू समाज से जुड़ता है।
अरण्य काण्ड सर्ग 17 श्लोक 22 में शूपर्णखा राम को अपना परिचय देते हुए कहती है -’’वीरो विश्रवसः पुत्रो’’। यह वाक्य उसने स्वंय को रावण की बहिन बताने के बाद रावणादि का परिचय देते हुए कहा है। ’’विश्रवा’’ को आनुषांगिक साक्ष्यों में आर्य ऋषि माना गया है। इससे ’रावण’ राक्षस नाम्ना आदिम जाति का आर्य मुखिया सिद्ध होता है। ’शव’ के दाहसंस्कार की पद्धति संभवतः इसी कारण से राक्षसों द्वारा स्वीकार की गई हो। किंतु राक्षसों की कतिपय अन्य शाखाओं में ’शव’ को मिटटी में दबाने की (वर्तमान में मुस्लिम अथवा कतिपय अन्य धर्मानुयायियों की तरह) परम्परा थी। इस विषय में स्वंय वाल्मीकि रामायण ही प्रमाण है। अरण्यकाण्ड सर्ग 4 श्लोक 22 एवं 23 में विराध स्वंय को गड्ढे में गाड़ने के विषय में राम और लक्ष्मण से अनुरोध करते हुए कहता है –
अवटे चापि माँ राम निक्षिप्य कुशली ब्रज रक्षसां गतसत्त्वानामेब धर्मः सनातनः।
श्री राम ! आप मेरे शरीर को गड्ढे में गाड़कर कुशलपूर्वक चले जाइए। मरे हुए राक्षसों के शरीर को गड्ढे में गाड़ना सनातन धर्म है। (परम्परागत धर्म)

’’अवटे ये निधीयन्ते तेषां लोकाः सनातनः’’

जो राक्षस गड्ढे में गाढ़ दिए जाते हैं। उन्हें सनातन लोकों की प्राप्ति होती है।’’ इससे ऐसी सूचनाग्रहण की जा सकती है कि राक्षसों की स्थापित परम्परा ’शव’ को कब्र में दफन करने की है। किंतु रावण एवं उसके वंशजो ने दाहसंस्कार की परम्परा को अपनाया है। आश्वालयन गृहसूत्र में वर्णित विधि से विराध के कथन तक कुल मिलाकर एक ऐसा संकेत प्राप्त होता है जो संभवतः ठोस साक्ष्यों की ओर ले जाता है।

प्राचीन विश्व/भारत में कब्रों से प्राप्त साक्ष्य: आश्वालयन गृहसूत्र क्या किसी प्रचलित ’’शव निस्तारण’’ संबंधी कर्मकाण्ड का उल्लेख करता है अथवा किसी सुनी गई पूर्व परम्परा के तथ्यों को प्रचलित परम्परा के साथ मिलाकर प्रस्तुत करता है। मैं दूसरे के साथ हूँ।

विकीपीडिया इनसाइक्लोपीडिया:- Burial – wikipedia-en. International Burial, particularly with “grave goods, may be one of the earliest detectable forms of religious practice since as “Phillip Liberman” suggests, it may signify a “concern for the dead that transcends daily life.

Disputed, evidence suggests that the “Neanderthals” were the first human species to intentionally bury the dead. doing so in shallow graves along with stone tools and animal bones. इसके उदाहरण के लिए Shanidar ईराक में, इजराइल में Kebra और क्रोशिया में Krapenia. ऐसी कब्रों के सबसे पुराने प्रमाण 130000 वर्ष पुराने हैं। ऐसी कब्र Skhul cave at Qatzeh इजराइल में खोजी गई हैं।

Burial wekipedia encylopedia से ग्रहीत उपरोक्त उद्धरण से यह समझा जा सकता है कि 130000 वर्ष पुराने ऐसी कब्रों के पुरातत्विक साक्ष्य उपलब्ध हैं जो यह सिद्ध कर सकते हैं कि मानव के मृत शरीर के साथ मृत पशु अथवा उसके विभिन्न अंगो को मानवीय लाश के साथ दफनाया जाता था। किंतु प्रस्तुत साक्ष्य भारत उपमहाद्वीप से बाहर के हैं।
                                                                     (अनवरत्)
©तृषा’कान्त’

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