राम मिथ या इतिहास…भाग – 7 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें।  आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

( 7 )  रावण का प्रेतकर्म   – जादू टोना


     रावण के प्रेत कर्म और मृतक के अन्तिम् क्रिया कर्म से संबंधित आश्वलायन गृहसूत्र में उल्लिखित पद्धति को ध्यान से पढ़े तो ऐसा लगता है कि किसी आदिम युगीन परम्परा के अवशेष हैं। संभव है कि धरती के किसी भाग पर ऐसी अथवा इससे मिलती जुलती शव निस्तारण संबंधी क्रूर परम्पराएं आज भी प्रचलित हों।
            ख्याति प्राप्त अन्तर्राष्ट्रीय यात्री एवं नोबुल पुरस्कार विजेता लेखक श्री बी0एस0 नायपॉल अपनी पुस्तक ’’द मॉस्क आफ अफ्रीका’’ (हिन्दी अनुवाद श्री नवेद अकबर – पेंगुइन प्रकाशन) के पृष्ठ 10 पर युंगाडा के धार्मिक/प्रशासनिक राजा कबाकाके अन्तिम् संस्कार का उल्लेख करते हैं – ’’कबाका मरते नहीं थे, गायब हो जाते थे। ……………..।’’ कबाका की तद्फीन सीधी सादी नही होती थी। इसमें बहुत से कार्य होते थे जो सुदूर अतीत से आए थे। ’(सुदूर क्योंकि जिन लोगों के पास लेखन या किताबें न हों वो अपने दादा, परदादा से आगे की चीजों को याद नहीं रख सकते) राजा की लाश को तीन माह तक धीमी आग पर सुखाया जाता था। फिर जबड़े की हड्डी को अलग करके उस पर मनकों और कौड़ियों का काम किया जाता। इसे मनकों के काम से मुक्त गर्भनाल, लिंग, अण्डकोष के साथ पशु त्वचा की थैली में रखकर यहां दफन कर दिष जाता। बाकी शरीर यानी गैर जरूरी आदमी को कहीं और फेंक दिया जाता।’’ क्या श्री नायपाल के उल्लेख, आश्वलायन के गृहसूत्र के वर्णन और रामायण में रावण के दाहकर्म के वर्णन के मध्य शव निस्तारण प्रक्रिया में वर्णित क्रूरता में कहीं कोई समानता है ? यदि हां तो श्री नायपाल का यह कथन भी मान्य होना चाहिए कि ऐसी मान्यताएं सुदूर अतीत का भाग होना चाहिए। इस प्रकार रामायण अथवा आश्वलायन में वर्णित शव निस्तारण कर्म में आदिमता की झलक स्पष्ट है। संभव है कि अफ्रीका की भांति भारत के आदिवासियों में भी यही अथवा ऐसी ही प्रथा प्रचलित हो।
(अनवरत्)  
                                                                                                                      

नोट:-किंतु श्रुतियों के रूप में हिन्दुओं ने इसका बेजोड़ तोड़ निकाला था। गाथाओं, कहानियों ने स्मृतियों को अक्षुण्ण बनाये रखने एवं ऐतिहासिक बीजों को अगली पीढ़ियों को हस्तान्तरित करने में सफलता प्राप्त की। 
©तृषा’कान्त’

Advertisements

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: