राम मिथ या इतिहास…भाग – 8 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

.हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें।  आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए  अग्रिम आभार – तृषाकान्त
 (8)  रावण का प्रेतकर्म – (दण्डकारण्य एवं राक्षस)
विगत 5 से क्रमांक 7 तक के अंको के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि मानवीय विकास के इतिहास के प्रारम्भिक काल के कतिपय ऐसे साक्ष्य हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि उस कालखण्ड में मानव शवग्रहों में मानव शवों के मृत पशुओं अथवा उनके अंगो को भी दफन किया जाता था। विद्वानों का ऐसा मानना है कि ऐसा संभवतः धार्मिक कारणों से होता रहा होगा। आश्वलयन गृहसूत्र और रामायण के उदाहरणों से इसकी पुष्टि की जा सकती है। ऐसे शवगृह Shanidarईराक, Kebra इजरायल और Krapenia क्रोशिया में पाए गए हैं। इसके सबसे पुराने प्रमाण Skhulcave at Qatzeh इजराइल में खोजे गए हैं जो 1,30,000  (एक लाख तीस हजार) वर्ष पुराने माने जाते हैं।
      क्या रामायण के सन्दर्भ में ऐसे प्रमाण खोजे जा सकते हैं। रामायण में राक्षस संस्कृति के अनुयायिओं के साथ ऐसी संभावना बनती है कि उनके ’’शवों के साथ’’ पशु अंश दफनाए जाते हों। विराध के उदाहरण से राक्षसों के शवों का दफनाया जाना तो प्रमाणित है ही। रावण की चिता का उदाहरण शव के साथ पशु चर्म अथवा अंग और कतिपय यंत्रो को शव को समर्पित करने का उदाहरण है। दोनो उदाहरणों को साथ रखकर देखें तो इस बात का निषेध जरा कठिन है कि कतिपय राक्षस अपने शवों के साथ मृत पशु या उसके अंग और शव के उपयोग की सामग्री न दफन करते हों।
      अतः भारत वर्ष के उस भाग में जिससे रामायण कालीन राक्षसों का संबंध रहा हो ऐसे शवगृहों की खोज की जानी चाहिए। रामायण में ऐसे दो स्थान चिन्हित किए जा सकते हैं
1-   दण्डकारण्य     2-    लंका।
इन स्थानों में ’’दण्डकारण्य’’ का सीमांकन विद्वानों में लगभग असंदिग्ध है जबकि लंकाको चिन्हित किए जाने पर विद्वान एकमत नही है। अतः प्रथमतः हम दण्डकारण्य की भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण करते हैं ताकि ऐसे शवगृहों की खोज कर उनका समय जाना जा सके।
दण्डकारण्य का भूगोल
रामायण में ’’दण्डकारण्य’’ का सर्वप्रथम परिचय हम आरण्यकाण्ड के प्रथम श्लोक में पाते हैं –
प्रविश्य तु महाराण्यं दण्डकारण्यमात्मवान।।
वन कैसा है: इसकी वीभत्सता और दण्डकारण्य के भौगोलिक विस्तार को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझने के बाद हमें इस रामायण कालीन दण्डकारण्य एवं वर्तमान बस्तर’ (छत्तीसगढ़) एवं आन्ध्रा, उड़ीसा, महाराष्ट्र तक विस्तृत सीमाओं वाले इस क्षेत्र के वर्तमान आदिवासी निवासियों, एवं उनकी संस्कृति एवं परम्पराओं आदि का विश्लेषण करना होगा।
      रामायण के अनुसार यह वन अत्यन्त घना है। इतना सघन कि काले मेघ के समान दिखाई देता है। वन्य पशुओं के अतिरिक्त नरभक्षी राक्षसों का इस क्षेत्र में साम्राज्य है। इस दण्डकारण्य को आधुनिक विद्वानों ने चिह्नांकित किया है।
Wickipedia encyclopedia – Dandakarnaya is specritually significant region in india. It is roughly equivalent to the Baster District in the central east past of India. It covers about 35600 square miles (92,000 kms) of land which includes the “Abajhmar” hills in the west and the eastern ghat in the east. including parts of the Chattisgarh, Orissa, Maharastra and Andhrapradesh states. It spans 200 miles (320km) from north to south and about 300 miles (480km) from east to west.
Fro – Dandakaranya – Wikipedia ……. encyclopedia.
en.wikipedia.org/wiki/dandakranya.

’’आमचो बस्तर’’ – श्री राजीव रंजन प्रसाद: श्री प्रसाद के इस औपन्यासिक वर्णन से पाठकों को ’’दण्डकारण्य’’ को समझने में सुविधा होगी – ’’बस्तर के भूगोल को नजरदांज नही किया जा सकता। चूंकि, यह केरल राज्य से भी बड़े भू मात्र का परिचय है। यहां कि मनोरम हरित वसना धरती पहाड़ों, पठारों और मैदानों में विभाजित है। उड़ीसा, महाराष्ट्र और आन्ध्रप्रदेश से घिरे इस वनांचल को मिलता है। पठार अपने विस्तार में दक्षिण की ओर गोदावरी के मैदानों से जा मिलता है तो पूर्व में इन्द्रावती नदी के मैदान हैं। लगभग दक्षिण में बैलाडिला की पहाड़ियों ने बस्तर को सजाया है। तो उत्तर-पश्चिम् में ’’अबूझमाड़’’ की पहाड़ियां सदियों से रहस्यमय रही हैं। दंतेवाड़ा की तराइयों, बीजापुर की ऊँचाइयों और केशकाल घाटी की खाइयों ने बस्तर की विविधता, विचित्रता और उन्मुक्ता दी है। तो रहस्य और रोमांच भी।’’ (आमचो बस्तर – रा0रं0 प्रसाद पृष्ठ-31) श्री प्रसाद बचेली (दंतेवाड़ा) छत्तीसगढ़ दक्षिण बस्तर के निवासी हैं और उन्हें लब्धख्यात आंचलिक उपन्यासकारों की श्रेणी में रखा जा सकता है। श्री प्रसाद के अनुसार बस्तर (दण्डकारण्य) के विस्तार को प्राकृतिक दृष्टि से छः भागों में बांटा जा सकता है
(अ) उत्तर का निम्न मैदान भाग – इसका विसतार उत्तर वस्तर, परलकेट, प्रतापपुर, कोटालीबेड़ा और अंतागढ़ तक है।
(ब) केशकाल – यह घाटी तेलिन सती घाटी से प्रारम्भ होकर जगदलपुर के दक्षिण में स्थित तुलसी डोंगरी तक लगभग 160 वर्गमील क्षेत्र में विस्तृत है।  
स- अबूझमाढ़ – यह क्षेत्र वस्तर के मध्य स्थित है। यहां कच्चे लोहे के विशाल भण्डार हैं।
द- उत्तरपूर्वी पठार – यह पठार कोडागांव और जगदलपुर में फैला है।
ई- दक्षिण का पहाड़ी क्षेत्र – इसके अंतर्गत दंतेवाड़ा, बीजापुर, व कोंटा के उत्तरी क्षेत्र आते हैं।
फ- दक्षिणी निम्न भूमि – इसके अंतर्गत कोंटा क्षेत्र का सम्पूर्ण भाग तथा बीजापुर क्षेत्र का दक्षिणी भाग आता है।
मैं समझता हूं कि ’’दण्डकारण्य’’ की ऐतिहासिक भूमि का भूगोल समझने में सुधी पाठकों को सहायता मिलेगी।
3 अप्रैल 2012 हिन्दी समाचार पत्र (अमर उजाला काम्पैक्ट) के समाचार इस पूर्वोक्त ’’दण्डकारण्य’’ का एक भाग ’’अंबूझमाड़’’ के सघन वन प्रदेश में स्वतंत्रता के पश्चात पहली बार पुलिस ने प्रवेश किया है और कुछ नक्सलियों को पकड़ा है। बस्तर दंतेवाड़ा अबूझमाड़ आदि आज भी नक्सली शस्त्र धारकों को भीषण हिंसा के शिकार हैं तो राम के समय में दण्डकरण्य की वाल्मीकि वर्णित भयावहता को पाठक समझ सकते हैं।
      इस तरह सम्पूर्ण वर्तमान बस्तर तथा आस-पास के कुछ क्षेत्र प्राचीन बस्तर या दण्डाकरण्य कहे जा सकते हैं। (आमचो बस्तर – रा0रं0 प्रसाद पृष्ठ – 48)
रामायण के राक्षस:- डा0 फादर कामिल बुल्के अपने शोध प्रबन्ध में रामायण के राक्षसों पर अपना मत प्रस्तुत करते हैं – ’’रायपुर जिले में रहने वाले गोंड़ अपने को रावण का वशंज मानते हैं। (पी0डेहों: रेलिजन एण्ड कस्टमस् ऑव दिन उराओंस, मैग्बयार्स ऑव दि एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल मात्र पृ0 16) उराँव भी मानते हैं कि रावण से उनकी जाति की उत्पत्ति हुई है और इसीलिए उनको उराँव नाम मिला (पूर्वोक्त) (बुल्के रामकथा – पृ0 92 – उपरोक्त स्त्रोत भी साक्ष्य हेतु श्री बुल्के ने ही उल्लिखित किए हैं)                                           (अनवरत्)

नोट:- अगले अंक में हम इतिहासकारों के अनुसार दण्डकारण्य की पहचान करेंगे एवं तत्पश्चात् ही इस क्षेत्र में ईराक, क्रोशिया और ईजराइल की भांति ऐतिहासिक अथवा प्राग्ऐतिहासिक शव गृहों की खोज कर काल निर्धारण का प्रयास करेंगे।
©तृषा’कान्त’

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2 टिप्पणियाँ (+add yours?)

  1. praveen pandit
    जून 01, 2012 @ 06:41:28

    नितांत अनछुए विषय पर अकूत और सारगर्भित जानकारी देखकर मन प्रसन्न भी हुआ व जिज्ञासा भी बढ़ी |प्रतीक्षा है |

    प्रतिक्रिया

  2. Arvind Kumar
    जून 04, 2012 @ 16:33:25

    pandity purn aalekh

    प्रतिक्रिया

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