ओ पिता ! ….. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’


फादर्स डे पर विशेष – पिता अर्थात एक अमिट अस्तित्व .. एक वजूद जो अपने स्वप्नों .. अपनी आकांक्षाओं को सन्तति के उज्ज्वल भाविष्य के लिये प्रसन्नता के साथ त्याग देता है .. अखिल विश्व के ऎसे सभी पिताओं को समर्पित अनुभूति पर मेरी एक रचना.. नमन – तृषाकान्त
ओ पिता !
लगा है एक युग मुझे,
पहचानने में तुम्हें

माँ होती है धरती,
गेहूँ अथवा जौ
बोया गया किस खेत में,
कोई अन्तर नहीं पडता,
हृदय पोषित तत्व से
उगती है जो फसल,
नाम क्या.. पहचान क्या,
फिर कौन हूँ मैं ..
वह तो है बोया बीज,
मैं जो भी हूँ वह हो तुम

हे पिता !
पीड़ा दी है
बहुत तुम्हें ..
स्वयं को त्यागी..
महान और वीतरागी,
सिद्ध करने के दर्प में,
क्षमा याची .. ढूंढता हूं
तुम्हारी गोद ,..
सब कुछ भूल,
आश्वासन बचपन का,
आज फिर
चिपट कर लिपट कर
रोना चाहता हूं ..
और पुकारता हूं..

हे पिता !
लगा है एक युग मुझे
पहचानने में .. तुम्हें,
दर्द से आकुल
सीने से उठता ज्वार
फूट पड़ता है आंखों से,
और तभी
केवड़े की गंध से
भर जाता है मेरा कमरा,
खिड़की से प्रवेश करता है
हवा का एक झोंका
मेरे आंसू सुखाने लगता है.
©तृषा’कान्त’

राम मिथ या इतिहास…भाग – 9 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र


राम मिथ या इतिहास आलेखमाला    की अद्यतन कड़ियां प्रत्येक बुधवार को प्रात: 08:30 प्रकाशित होती हैं।  – तृषाकान्त 
(09)  रावण का प्रेतकर्म

(अब तक श्रृंखला के इस  भाग के अन्तर्गत हमने इस शव निस्तारण पद्धति अथवा मृतकर्म संस्कार को काल निर्धारण हेतु विचार किया। मृतक के शव के साथ – साथ पशु अंगो को दफन किए जाने के आधार पर आगे बढ़ते हुए हमने रामायण के राक्षसों की कर्मभूमि ’’दण्डकारण्य’’ की पहचान स्थापित की। साथ ही ’’राक्षसों’’ को भी चिहिन्त करने का काम किया। अब आगे पढ़े) –
’’दण्डकारण्य’’ ही राक्षसों की वह कर्म भूमि है जहां से हम अपनी खोज यात्रा आगे बढ़ाते हैं। (दण्डकारण्य के विषय में अधिक जानने के लिए पढ़े – आदिवासी बस्तर का वृहद इतिहास – रामायण का पुरातत्व द्वारा डा0 हीरालाल शुक्ल) यद्यपि राक्षसों के विषय में डॉ0 बुल्के के मत से हम परिचित हो चुके हैं किंतु डा0 शुक्ल ने इस विषय पर विस्तृत साक्ष्यों सहित प्रकाश डाला है। डा0 शुक्ल गोंडो को ’’राक्षस’’ सिद्ध करने के सिद्धान्त का खण्डन करते हैं और रामायणकालीन लंका को गोदावरी के डेल्टे (आन्ध्रप्रदेश) में सिद्ध करने के उपरान्त  राक्षसों के संबंध में अपना मत इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं – ’’राक्षस’’ मध्यवर्ती द्रविण परिवार के मूल पुरूष रहे होंगे। ’’प्राक मध्यवर्ती द्रविण’’ जन या आन्ध्रजन को रामायण का राक्षस माना जा सकता है। श्री शुक्ल ऐसा संकेत देते हैं कि – ’’सातवाहन नृपति क्या राक्षवसंश प्रसूत थे ? (विस्तार से पढे़ ’’रामायण का पुरातत्व’’)
राक्षस गोंड आदिवासी हो अथवा ऐतरेय ब्राहम्ण और पुराणों के ’’आन्ध्र’’। किंतु यह स्वीकृत तथ्य है कि दण्डकारण्य क्षेत्र में इनका आव्रजन मार्ग दक्षिण ही रहा है। यही संकेत रामायण भी देती है। यहां पर यह स्पष्ट करना भी प्रासंगिक है कि गोंड आदिवासियों अथवा आन्ध्रों में से जिसे भी राक्षस माना जाए उनकी राजवंशीय परम्परा के सूत्र आगे भी प्राप्त होते हैं जैसे आंध्रवंश के सातवाहन नरेश एवं गोंडो में 15130 से 15410 तक गढ़ा मण्डला का राजवंश संग्रामशाहि (हीरलाल शुक्ल – पूर्वोक्त)
गोदावरी नदी के घाटी क्षेत्र की पुरातात्विक खोज:- कर्नाटक के नरिसंहपुरा के कावेरी बेसिन के उत्खनन से शवगृहों में जो सामग्री प्राप्त हुई है, उसके विषय में यह उल्लेख दृष्टव्य है – Upper Kaberi Basin has established …….. a date claming from the part of the first half of the second millennium B.C. ……… The systematic ground excavation compressing trivial ground remnants, potteries, graffiti, stone implements, metal objects, leads and bangles, animal remains human scenes wood remains etc”. (An Authoritative report on the excavations at T. Narsipur “by prof. M. Seshdre Director of Archeology of mysore publishers of in 1971 provides a detailed insight into the Ancient pre-historic cebilization learnings Ancient pre-historic cerrlization learnings of T. Narsipura and its surroundings)
यदि हम इन तथ्यों का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि गोदावरी, कावेरी बेसिन के पुरातात्विक शवगृहों से धातु, पत्थर, लकड़ी के औजार, मनके, मानव एवं पशु अंश प्राप्त हुए हैं। ये तथ्य रामायण एवं गृहसूत्रों में शव को समर्पित वस्तुओं से मेल खाती है। नरसिंहपुरा के उत्खन्न से प्राप्त पूर्ववत अवशेषों का समय First half of second millennium B.C. प्रो0 शेषाद्री द्वारा माना गया है। यहां यह स्पष्ट कर दूं कि रावण ’’राक्षसाधिपतिः’’ अवश्य है किंतु वह स्वंय राक्षस हैं ऐसा रामायण पुष्टं नहीं करती। संभव है राजा होने के कारण रावण ने अपनी मूल परम्पराओं के साथ प्रजाजन की परम्पराएं भी स्वीकार करके एक मिश्रित परम्परा अपना ली हो।
उपरोक्त साक्ष्यों के आधार पर निर्विवाद रूप से मात्र यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि कावेरी, गोदावरी वेसिन का यह क्षेत्र दीर्घकालीन अतीत से मानवीय सभ्यताओं के विकास के अनुकूल रहा है।
यद्यपि जो साक्ष्य अपनी सीमाओं के अन्तर्गत मैं खोज पाया हूं उनके आधार पर स्पष्टतया किसी तिथ की ओर इंग्ति करना असंभव है साथ यह कहना भी असंभव है कि ’’रावण – प्रेतकर्म’’ शीर्षक मैं जिस तरह की ’’शव सामग्री’’ की साक्ष्य के रूप में अपेक्षा है, ऐसा विशिष्ट प्रकृति की ’’शव सामग्री’’ किस स्थान विशेष से प्राप्त हुई है। किंतु प्रस्तुत साक्ष्य आश्वलायन गृह सूत्र एवं रामायण के आधार वाली ’’शव सामग्री’’ के प्राप्त होने की घोषणा तो करते ही हैं। फिर भी प्रो0 शेषाद्री द्वारा निर्धारित समय अति दूरस्थ है।
यहां पर एक तथ्य और उद्धृत करना समीचीन होगा कि ’’अश्व’’ श्रृंखला के साक्ष्य 10000 बी0सी0 पुराने घटनाक्रम का उल्लेख करते हैं। भारत में Hunting Gathering Age हम 100000 से 10000 बी0सी0 पुरानी मानी जाती है। इस युग को तीन चरणों में बांटा जाता है प्रथम चरण – 100000 बी0सी0, द्वितीय चरण – 100000 से 40000 बी0सी, तृतीय चरण 40000 से 10000 बी0सी0। कृष्णा गोदावरी बेसिन के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, मिर्जापुर, वाराणसी, जौनपुर में ऐसी 200 से भी अधिक पुरातात्विक साइट्स पायी गयी हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि गंगा घाटी के इस क्षेत्र में 8000 से 90000पू0 में मानवीय गतिविधियां अत्यन्त तीव्र हो गयी थीं।
अतः प्रथम दृष्टया यह स्वीकार किये जाने में कोई आपत्ति नही होनी चाहिए कि राम एवं उनके समकक्षों के लिए एक समयावधि कम से कम 8000 से 90000पू0 रखी जा सकती है।
(अनवरत)

 ©तृषा’कान्त’