अन्ना आन्दोलन बनाम भ्रष्टाचार …….. [आलेख] – शिवेंद्र कुमार मिश्र

पूज्य अन्ना का जनान्दोलन भ्रष्टाचार के विरूद्ध सशक्त विधायी संस्था लोकपाल की माग के साथ प्रारम्भ हुआ। देखते ही देखते लगातार की गर्इ रणनीतिक त्रुटियों के कारण यह आन्दोलन तीव्र गति पकड़ गया। जिन्हें जेoपीo के आन्दोलन की याद थी वह इससे तुलना करने लगे। लोकपाल का स्वरूप धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा।रामलीला मैदान का जनसैलाब न उन लोगों का हे जिन्हें भ्रष्टाचार की पर्याप्त समझ है और न ही उन लोगों का जो अण्णा की तरह शुचिता का दम भर सकें और अण्णा की ही तरह यह दावा कर सकें कि उनके दामन पर एक छोटा सा भी दाग नहीं है। मेरे एक मित्र का मानना है कि यह लोग जो भ्रष्टाचार किए हैं अथवा करते हैं वह तंत्र का दबाब है न कि उनकी स्वेच्छा। क्या अण्णा के सहयोगी भी ऐसा ही मानते हें। लगता तो नहीं। वह लोग टीoवीo चैनलों पर जो दावे कर रहे हैं उससे तो लगता है कि वह एक ऐसा तंत्र चाहते हैं जो चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री तक की जाच कर सके। वह सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक को इसकी परिधि से मुक्त नहीं करना चाहतें। राजनेताओं के साथ साथ राजकीय कर्मचारी विशेष रूप से उनके निशाने पर है। जहा तक राजकीय कर्मचारियों का प्रश्न हैं तो वह बलि का बकरा बन चुका है। उसकी साख का जनता के बीच समाप्त होने की बडी वजह उसके राजनैतिक और आर्इoएoएसo सम्प्रभु है। मित्र की बात का यदि समर्थन करें तो उसके भ्रष्टाचार की एक बडी वजह तंत्र का दबाब उसके विरूद्ध अपनी सम्पूर्ण र्इमानदारी के साथ न लड़ पाने की उसकी अक्षमता जिसके पीछे प्राय: उसका परिवार और कभी-कभी जनदबाव भी रहता है। जनदबाब ऐसे भ्रष्टाचार का समर्थन,प्रोत्साहन अपने निजी समूहगत कारणों से करता है। यानी कि कह सकते हैं कि जनसंस्थाएं भी ऐसे भ्रष्टाचार का बडा कारण हैं।


तथाकथित सिविल सोसाइटी इन जनसंस्थाओं द्वारा किए जाने वाले भ्रष्टाचार के बारे में कुछ भी नहीं कहती। मसलन अण्णा कहते हैं कि उन्होने अपनी संस्थाओं के लिए करोडों के प्रोजेक्ट लिए किन्तु कभी भी एक भी पैसा रिश्वत नहीं दी तो क्या सभी और उनके कर्ता धर्ता ऐसा ही दावा करता हैं। सब लोग जानते है कि एनoजीoओo अपनी संस्थाओं के लिए फण्ड लेने के लिए कैसी मारकाट करते हैं और क्या-क्या हथकण्डे अपनाते हैं। तो सारे एनoजीoओo लोकपाल के दायरें में क्यो नहीं आने चाहिए?

आप सभी जानते हैं कि भारत की लगभग 70प्रतिशत जनता वह है जिसकी दैनिक व्यय क्षमता 20रूo मात्र है। देश की अदालतों में करोडों मामले जो लमिबत है वह अधिकांशत: इसी जनता के है। प्रशान्त भूषण और शान्तिभूषण जैसे लोग भली भांति जानते हैं कि हमारे वकील मित्र अपने क्लाइण्ट से फीस की वसूली कितना चेक के माध्यम से करते हैं या कर सकते हैं। उनकी ऊँची-ऊची फीसे और कानूनों के मकडजाल से खुद को सुरक्षित रखने की उनकी काबिलियत किस तरह से सुरक्षित दूरी पर रहते हुए भी तथा कथित न्यायिक भ्रष्टाचार को बढावा देने में सहायक होती है और वह स्वयं इसमें लिप्त रहते हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं हैं। इनको लोकपाल या किसी के कठोर नियंत्रण में लाए जाने की आवश्यकता क्यो नही है। चेरेटी के नाम पर चलाए जाने वाले अस्पताल एवं विभिन्न संस्थाए किस प्रकार की चेरिटी कर रही हैं। यह छिपी हुर्इ बात नहीं है। 

शायद आप सहमत हों कि यह संस्थाएं स्वयं तो आयकर मुक्त जीवन बिताती ही हैं दूसरों को भी आयकर चोरी में सहायता करती हैं। इन्हें लोकपाल या उससे भी सख्त संस्था के दायरे में क्यो नहीं आना चाहिए।

अण्णा की र्इमानदारी या सत्यनिष्ठा पर कोर्इ दाग नहीं है। क्या ऐसा ही अण्णा के बाकी सहयोगी भी कर सकते हैं अथवा उनके दावे पर भरोसा किया जा सकता है। मैगसेस पुरस्कार विजेताओं को विभिन्न मानवीय मनोवैज्ञानिक कारणों से हताशा एवं अवसाद ग्रस्त ऐसे लोगों की आड में जो वहा पर अपनी अपनी समझ के भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए इकटठा हैं जैसे महगार्इ,गलत भूमि कानूनों के शिकार,आदि क्या लोकतांत्रिक विधि मूल्यों से खिलवाड की इजाजत दी जानी चाहिए।

अब हम जे0पी0 आन्दोलन के आर्इने में भी जरा झांक लें। जे0पी0 ने सत्ता को एवं प्रजातांत्रिक मूल्यों को बंधक बनाने का आन्दोलन नहीं चलाया। उन्होने सत्ता परिवर्तन कर प्रजातांत्रिक मूल्यों की पुर्नस्थापना का आन्दोलन चलाया किन्तु अण्णा के शूरवीर ऐसी कोर्इ माग नहीं करते। इतना ही नहीं जनता के नाम पर पारदर्शिता की कोर्इ बडी लकीर भी वो खींचना नहीं चाहते। उदाहरणार्थ वह लोग सरकार पर तो यह आरोप लगा रहे हैं कि वह एक लचर बिल प्रस्तुत कर रही है और जनलोकपाल बिल के प्राविधानों को जा ज्यादा भ्रष्टाचार विरोधी हैं संसद के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले प्रस्ताव में शामिल नहीं कर रहे। अब वह अपना ही जन लोकपाल बिल प्रस्तुत करने पर अडे हैं। क्या यह उचित समय नहीं है कि हम अपने प्रजातंत्र को अधिक पारदर्शी बनाएं और लोकपाल के विभिन्न ड्राफ्ट जनता की रायशुमारी के आधार पर तैयार करें और फिर जनमत संग्रह के आधार पर उसको पारित कराएं। मैं मानता हू यह रास्ता लम्बा है किन्तु प्रजातंत्र को भीड द्वारा बन्धक बनाए जाने के तरीके से कहीं बेहतर। देश गांधीवादी अंहिसात्मक आमरण अनशन जो प्रजातांत्रिक मूल्यों के नाम पर किए गए थे कर्इ दुष्परिणाम आज तक भोग रहा हैं। कहीं ऐसा न हो अण्णा अनशन से उत्पन्न दुष्परिणामों से भावी पीढि़या कराहती रहें। 

चक्रव्यूह में … अभिमन्यु …. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

घिर गया है फिर…..
चक्रव्यूह में …
आज का अभिमन्यु
भ्रष्टाचार का दुर्योधन
सत्ता के रथ पर सवार
कर रहा है निरंतर
वार पर वार

राजनीति के द्रोणाचार्य ने
रचा है मानव मूल्यों से दूर
अनैतिकता का व्यूह
सत्ता की भूमि जायेगी
शायद इस बार
इनके साथ साथ
मृत्यु महानद के पार
अब किसी भोज का
‘शोणित पत्र’ करता नहीं
विचलित इन्हें

वंचना के कृपाचार्य
कीर्ति कवलित कर्ण
मानव मर्यादाओं से दूर
राष्ट्र अभिमन्यु पर
नित नवीन वार

देशप्रेम नैतिकता
निष्ठा के अर्जुन
घिर गये हैं
समरांगण से दूर

क्षत विक्षत घायल
आज फिर अभिमन्यु
परिचित अपरिचित
एक द्रष्टि
उसके तुणीर में
एक नयी स्रष्टि
शिष्य हूँ कृष्ण का
रणछोड घरछोड क़ा
होगी नहीं पुनरावृत्ति
उस विगत इतिहास की

अतः हे तात
आधुनिक राष्ट्र के दुयोधन
और सप्त महारथी सुनो
जन्म ले चुका है
एक नया अभिमन्यु
 इस राष्ट्र के गर्भ से

अन्ना ! आपको वंदेमातरम किंतु आपत्तियों के साथ ….[आलेख ]- शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….. पता लगा कि वंदेमातरम से परहेज करने वाले शुतुरमुर्गी राजनेताओं को दरकिनार कर कैसे जनता वहीं नमाज पढ़ती अथवा रोजा इफ्तार करती है जहां उनसे भिन्न आस्था रखने वाले उनके भार्इ वंदेमातरम का जयघोष करते हैं और जनमाष्टमी मनाते हैं।

….. अन्ना मैं आपकी जीत से खुश तो हूँ पर सम्मोहित नहीं। आपके मुददो से मेरी कतिपय विनम्र असहमति है। आपके भक्त मुझे पत्थर मारे, अनसुना कर दें अथवा मेरी आवाज दबा दें। पर मैं कौन उनसे कह रहा हूं। मैं तो आप से कह रहा हूं। मेरी बात कृपया सुनें अवश्य क्योंकि मैं 12 दिन का अनशन नहीं कर सकता।

…… देश की अदालतों में लम्बित मुकदमों की संख्या इतनी ज्यादा है कि डर है कि अदालती व्यवस्था ही कहीं चरमरा न जाए। ऐसे में लेाकपाल क्या करेगा ? जांच करेगा। एफ. आर्इ.आर. करेगा फिर चार्जशीट और अन्तत: न्यायालय। अन्ना ! यह काले कोट वाले जनता के कपड़े उतरवा लेंगे चाहें आप वाले हों या उनके वाले।

आज हमने अपनी आंखो से देखा, अनुभव किया कि एक व्यक्ति का आत्मिक बल कैसे जनसमुद्र में राष्ट्रभक्ति का ज्वार उठा देता है। सत्ताएं झुकती हैं और सिंहासन कांपने लगते हैं। अस्तु: आपने सिद्ध कर दिया कि – दिल दिया है जान भी देंगे ऐ! वतन तेरे लिए केवल एक बालीवुडिया गीत नहीं है। कोर्इ देश का दीवाना इसे मंत्र भी बना देता है। यह हमने आज जाना। हमने आज यह भी जाना कि कैसे व्यवस्थाएं लोकचेतना को अपने लिए खतरा मान लेती है और भयग्रस्त हो आपसी मतभेद भुलाकर व्यवस्था के स्तम्भ जनचेतना के विरोध में एक हो जाते हैं। हमें यह भी पता लगा कि वंदेमातरम से परहेज करने वाले शुतुरमुर्गी राजनेताओं को दरकिनार कर कैसे जनता वहीं नमाज पढ़ती अथवा रोजा इफ्तार करती है जहां उनसे भिन्न आस्था रखने वाले उनके भार्इ वंदेमातरम का जयघोष करते हैं और जनमाष्टमी मनाते हैं। ऐसे आंदोलनों को जाति और मजहब के नाम पर अथवा आर०एस०एस० का भय दिखाकर तोड़ने की कोशिश करने वाले सियासतदां, बुद्धिजीवी और पत्रकारों के चेहरे भी देखे तो जनचेतना द्वारा इनको दिया गया मौन जवाब भी। ऐसे चैनलों पर भी निगाह गर्इ जो जन सरोकारों से पर्याप्त दूरी बनाये रहे। पर अंत भला तो जग भला। अन्तत: अण्णा जीत गए। भारत की जनता अर्थात भारतीय संविधान की प्रस्तावना में वर्णित हम भारत के लोग विजयी हुए और विजयी हुर्इ संविधान में वर्णित व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता, अखण्डता व पंथनिरपेक्षता। 



अन्ना..!   राष्ट्र का प्रणाम आप स्वीकार करें जयहिन्द ! वंदेमातरम। 

पर अन्ना मैं आपकी जीत से खुश तो हूँ पर सम्मोहित नहीं। आपके मुददो से मेरी कतिपय विनम्र असहमति है। आपके भक्त मुझे पत्थर मारे, अनसुना कर दें अथवा मेरी आवाज दबा दें। पर मैं कौन उनसे कह रहा हूं। मैं तो आप से कह रहा हूं। मेरी बात कृपया सुनें अवश्य क्योंकि मैं 12 दिन का अनशन नहीं कर सकता।

1- संस्था बनाम लोकतंत्र :- कतिपय संस्थाएं संवैधानिक होती हैं और लोकतंत्र को मजबूत करती हैं। किंतु संस्थाएं बड़ी आसानी से चुनिन्दा मस्तिष्कों की साजिश का शिकार हो जाती हैं और फिर उनके स्वार्थों की पूर्ति का माध्यम। यह बात भारतीय जनतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं को लेकर अपने अनुभव के आधार पर जानते हैं। आखिर लोकतंत्र का मंदिर संसद भी किस तरह से जनचेतना के बहाव को समझने में इतना वक्त लगाता रहा। यह बात इसी से स्पष्ट हो जाती है। आपका लोकपाल भी कलावती वाले राहुल बाबा की कृपा से निर्वाचन आयोग की तरह संवैधानिक संस्था बनने वाला है। शेषन जी… ! हैं तो सावधान। राहुल जी को लगता है कि निर्वाचन आयोग की तरह लोकपाल के संवैधानिक संस्था बनाने पर कसबल ढीले किए जा सकते हैं। अत: कृपया भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने में ग्राम संसद जैसा कि आप कहते हैं (ग्राम सभा) को भी अधिकार प्रदान किए जायें।

2- ग्राम संसद (सभा) और भ्रष्टाचार :- आप ग्राम सभा को ग्राम संसद कहते हैं और देश की संसद से बड़ा मानते हैं, तो भ्रष्टाचार से निपटने में ग्राम सभा के खुले सत्र के माध्यम से प्रत्येक नागरिक को जनतंत्र की रक्षा का दायित्व क्यों न दिया जाए। ग्राम सभाएं अपने ग्रामों के लिए कानून बनाएं, उनका पालन कराएं। सीमित मात्रा में न्याय करें और एक ग्राम में काम करने वाले सभी सरकारी कर्मचारी ग्राम सभा के बहुमत के निर्णय के अन्तर्गत हों। यहां मतदान अनिवार्य हो।

3- सरकारी कर्मचारी बनाम प्राइवेट संस्थाएं, एन.जी.ओ. आदि :- जो त्रि सूत्रीय प्रस्ताव संसद ने पास किया है उससे गैर सरकारी संगठन (एन.जी.ओ.) कम्पनियां, फर्में, ट्रस्ट के विषय में सिथति स्पष्ट नहीं है। यदि यह संस्थाएं लोकपाल की जांच के दायरे में नहीं तो क्या मजाक है। 50रू० घूस खाने वाला लेखपाल या चपरासी की जांच लोकपाल करेगा और करोड़ो का फण्ड डकारने वाले एन. जी.ओ.ट्रस्ट कम्पनियां और उनके उच्च वेतनभेागी सी.र्इ.ओ. इसकी जांच से दूर। इनमें से तमाम खुद तो आयकर देते नहीं और चंदा लेकर दूसरों को भी टैक्स चोरी में मदद करते हैं।

4- लोकपाल कहीं वकीलों की आय का जरिया न बन जाए :- देश की अदालतों में लम्बित मुकदमों की संख्या इतनी ज्यादा है कि डर है कि अदालती व्यवस्था ही कहीं चरमरा न जाए। ऐसे में लेाकपाल क्या करेगा ? जांच करेगा। एफ. आर्इ.आर. करेगा फिर चार्जशीट और अन्तत: न्यायालय। अन्ना ! यह काले कोट वाले जनता के कपड़े उतरवा लेंगे चाहें आप वाले हों या उनके वाले।

5- वकीलों की सामाजिक जिम्मेदार और जूरी :- इस देश की बहुसंख्यक जनता 20 रू प्रतिदिन व्यय कर सकती है। इनमें से तमाम लोग कानूनी पचड़ो में पड़ जाते हैं। सरकारी नि:शुल्क सलाहकार संस्थाएं हैं फिर भी मुकदमा यही लोग लड़ाते हैं। न तो इनकी फीस तय न जिम्मेदारी। लाखों रू0 प्रति पेशी पर लेते हैं इनका भी कुछ किया होता और हां जब लोकपाल आरोप तय करती तो जूरी को भी जगह देते ताकि जनलोकपाल वास्तव में जनता को ताकत देता दिखार्इ देता।

अन्ना ! कहीं ऐसा न हो कि आपके लोगों की कठपुतली सरीखा हो लोकपाल। एक और संस्था। भगवान बचाए इन संस्थाओं से। समस्या भ्रष्टाचार से लड़ने में आम नागरिक की सक्षमता व सहयोग की है न कि संस्थाओं को खड़ा करने की। और हाँ सांसदों का वी.वी.आर्इ.पी. दर्जा अर्थात संसदीय दायित्वों के औचित्य पूर्ण निर्वहन के अतिरिक्त सारे कार्य जांच के दायरे में हों। ठीक बात है किंतु जन लोकप्रियता के सहारे संसद को बंधक जैसी स्थिति में पहुंचा देना, हमारे प्रजातंत्र के स्वास्थ्य के लिए कहां तक उचित है विचारणीय है। बातें और भी हैं पर अभी तो आप की यानी अपनी जीत का जश्न मनाना है।

प्रणाम अन्ना प्रणाम युवाभारती … जय हिन्द [इतिहास] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

अन्ना के ऐतिहासिक जनलोकपाल आन्दोलन के लिये विगत 12 दिनों से चले आ रहे अनशन की समाप्ति की घोषणा का वह ऐतिहासिक पल अभी कुछ समय पूर्व ही भोगा है। अपार जन समूह और मेस में टी वी के सामने बैठे हुये सैनिकों के समूह जब राष्ट्रगान की टी वी पर की जाने वाली अपील पर अन्ना की सावधान की आवाज पर सावधान मुद्रा में खड़े होकर टी वी की ध्वनि के साथ साथ जनगण मन गा रहे थे तो किसी को भी रोमांच होना स्वाभाविक ही है… भोगा है पल पल इस इतिहास को और जिया भी है।

जय हो भारतीय गणतंत्र और अन्ना के अहिंसात्मक आन्दोलन की। 12 दिन ….. और कहीं कोई हुड़्दंग नहीं। वह भी तब जब कि व्यवस्था परिवर्तन के नाम पर मिस्र और सीरिया सहित हमारे पड़ोस में भी निरीह जनता का रक्त सड़कों पर रक्तपात से बह रहा हो। भारतीय युवा तुम्हें नमन …… जे पी के आन्दोलन का यह सक्रिय युवा विद्यार्थी आज आप पर गर्व करता है।

नमन तुम्हारी अनथक उर्जा को और तुम्हारे धैर्य सहित भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की जिजीविषा को। 

प्रणाम अन्ना ………..  प्रणाम भारती … जय हिन्द।

अन्ना आन्दोलन के सौन्दर्यवादी तत्व [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

पिछले कुछ दिनों से अन्ना के आन्दोलन की हर तरफ धूम है। पिछले दिनों अन्ना तिहाड़ में थे और लोग सड़कों पर। ऐसे ही समय एक सुबह आपने शायद अपने टी0वी0 स्क्रीन पर सड़क पर अखबार बिछाकर अपने पिता की गोद में सर रखकर निशिचन्तता से सोर्इ हुर्इ एक 14-15 वर्षीया मासूम सी बालिका को देखा होगा। उसके पिता ने टी0वी0 संवाददाता को शायद बताया था कि उसके तीन बच्चे है। वह उन्हें इस आन्दोलन में इसलिए लाया था ताकि वह स्वयं देख सके। और महसूस कर सके कि उनके भविष्य की बुनियाद ऐसे ही आन्दोलनों से मजबूती से रखी जा सकेगी। कुछ ऐसा हो।

आपने उस सोती हुर्इ मासूम बालिका के चेहरे को गौर से देखा? क्या लगा? मुझे तो लगा जैसे कोर्इ योद्धा युद्ध के कुछ समय के लिए थम जाने के कारण सो गया हों। चलो कुछ देर थकान उतार लें ” लेकिन जैसे ही कोर्इ आहट होगी अपनी बन्दूक थामें उठ जायेगा और चीखेगा”थम। पिता की गोदरूपी बैरक उसकी सुरक्षित चाहर दीवारी है जहा दुश्मन की गोलियां असर नही कर सकती।

दृश्य:-2 इस आन्दोलन ने संसद की सर्वोच्चता को बहस के दायरे में ला दिया। किसी ने कहा संसद सर्वोच्च नहीं है किन्तु जनता ने अपनी सर्वोच्चता सांसदों के माध्यम से संसद में निहित की है। भले ही टी0वी0 बहस में उठी यह आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज सिद्ध हो किन्तु हाब्स लाक रूसो का राज्योत्पति का सिद्धान्त भी तो यही कहता है कि लोगों ने अपनी सम्प्रभुता पारस्परिक सहमति से राज्य को हस्तान्तरित की। भारतीय संविधान तो अपने होने की वजह ही भारत के लोगों को स्वीकारता है:- ” हम भारत के लोग

एतदद्वारा इस संविधान को आत्मार्पित एवं समर्पित करते है। इसे माने तो संविधान ने संसद और उसकी सर्वोच्चता को जन्म दिया और संविधान की यह शक्ति ” हम भारत के लोगो” द्वारा उसे स्वीकार करने पर उसको प्राप्त हुर्इ। चलो हम भारत के लोग बहस का विषय तो बने।
दृश्य:-3 आन स्क्रीन बहस में कुछ लोगों को इस आन्दोलन में दलित भागीदारी नजर नहीं आर्इ और यह आन्दोलन मध्य मवर्गीय एवं उच्चजातियों का नजर आया। पूज्य डा० अम्बेडकर के संविधान निर्माता होने के कारण उसकी सुरक्षा की ठेकदारी का अहसास भी उन्हें अपना नितान्त निजी लगा। आन्दोलन के मध्य मवर्गीय होने से तो हमें भी कोर्इ एतराज नहीं किन्तु भैय्या …! स्वत: स्फूर्त आन्दोलन में भागीदारों की जाति पूछना कुछ ज्यादा नहीं हो गया ? क्या पाकिस्तान की गोली से शहीद होने वाले सैनिक को भी अल्पसंख्यक, दलित, पिछडा और सामान्य में बाटोंगे। अब बस भी करो यारों।

अन्ना आंदोलन और…….लोकतंत्र [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

अन्ना के आंदोलन से इधर कर्इ नर्इ चीजें जन्म लेने लगी हैं। उन सबकी सराहना नहीं की जा सकती। निस्सन्देह उनके साथ जो व्यवहार हुआ वह कदापि प्रशंसनीय नहीं था किन्तु यह तो मानना पडेगा कि उनके प्रति कटु व्यवहार ने ही उन्हें अपार जनसमर्थन प्रदान किया और आज ”अण्णा शायद अपने जीवन की अप्रतिम लोकप्रियता का आनन्द उठा रहे है। अन्ना का रास्ता हर तरह से गांधीवादी रास्ता है। अत: गाँधी की लोकप्रियता पर सत्ता का सुख भोगने वालों को उनसे कोर्इ शिकायत नहीं होनी चाहिए।

अन्ना की अपार लोकप्रियता ने ”अण्णा के हौसलों को भी बाबा रामदेव की तरह परवान चढा दिया है। उनकी मांगों का दायरा भी रामदेव की तरह बढ़ा दिया है किन्तु ”अण्णा” की बढती मांगों ने एक प्रश्न अवश्य खडा कर दिया है। क्या किसी को भी लोकप्रियता के कंधो पर चढ कर व्यवस्था को बंधक बनाने का अधिकार दिया जाना चाहिए। हांलाकि यह भी गाधीवादी तरीका है। मैने ऊपर कहा कि कर्इ नर्इ चीजें जन्म लेने लगी हैं। एक यक्ष प्रश्न जो अभी नेपथ्य में है किन्तु उसकी अनुभूति की जा सकती है। प्रश्न यह है कि संसदीय लोकतंत्र में संसद की सर्वोच्चता के बहाने विधि-निर्माण के संसदीय कार्य में जनता का भी परोक्ष अथवा प्रत्यक्ष सहयोग नहीं लिया जाना चाहिए। तकनीकी और प्रौद्योगिकी के युग में जनता का सहयोग विधि निर्माण में लिया जाना सम्भव है। इसमें बुरार्इ भी क्या है आखिर सांसद जिस संसदीय सर्वोच्चता का उपयोग कर समाज के शीर्ष पर स्थापित हो जाते है संसद को वह सर्वोच्चता वस्तुत: जनता ने ही प्रदान की है। विधि निर्माण में जनसहयोग से ही ”अण्णा” जैसे लोगों द्वारा लोकप्रियता के कंधों पर चढ कर व्यवस्था को बंधक बनाने के प्रयासों को रोका जा सकता है।

हम एक व्यकितपूजक एवं वीरपूजक समाज हैं। ऐसे समाज प्राय: अपने नायकों के अंधसमर्थक होते हैं और नायकों की गलतियों को छिपाने में ही अपना बड़प्पन समझ ते हैं। ऐसे में नायक को जब कोर्इ आर्इना दिखाने वाला नही रहता तो वह एक तानाशाह की तरह व्यवहार करता है और स्वयं को सर्वज्ञ एवं सम्प्रभु मान लेता है। समाज उसकी स्वयंभू संप्रभुता उसके व्यकितत्व के आभामण्डल एवं लोभी उपनायकों के कारण स्वीकार भी कर लेता है। भारत ऐसे ही स्वयंभू सम्प्रभु नायकों की गलतियों का खामियाजा आज तक भुगत रहा है जो इतिहास का हिस्सा है। कमजोर प्रतिद्वन्दी ऐसे नायकों के हौसले को सातवें आसमान पर चढ़ा देते हैं। यदा-कदा इतिहास ऐसे नायकों के प्रति हिंसात्मक प्रतिक्रिया दोहरा देता है। यह भी इतिहास में खोजा जा सकता हैं।

यह एक विशेष प्रकार का मनोविज्ञान है। भारत आज इसी मनोविज्ञान के दोराहे पर है। यदि हम इतिहास की गलतियां दोहराने से बचना चाहते है तो संसदीय सर्वोच्चता में जनता की सहभागिता बढ़ानी होगी। सुरक्षा सम्बन्धी बहस को छोड़कर प्रत्येक संसदीय एवं उसकी समितियों की बहस सार्वजनिक करनी होगी। कम्प्यूटर, इण्टरनेट, टी०वी० आदि के उपयोग से जनता को विधि निर्माण से जोड़ना होगा। प्रत्येक बिल का मसौदा कम से कम 6 माह पूर्व सार्वजनिक करना होगा। शायद यह व्यवस्था एक ” समूह को व्यवस्था को बंधक बनाने के प्रयासों को खारिज कर सके। यह आगे की सोच है किन्तु जब आप यह याद करेगें कि हिटलर जैसा तानाशाह भी लोकप्रियता के कंधों पर ही वहां तक पहुंचा था तो आपको इस पर विचार करना पड़ेगा।

तब अन्ना अब रामदेव …. [राजनीतिक विश्लेषण] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

4 जून 2011 से प्रारम्भ हुए आन्दोलन पर आपत्ति में फिल्म कलाकार, भोंपू राजनेता और पत्रकार भी थे… उनका कहना था कि हमारा सनातन धर्म सन्यासी से राजनीति करने की अपेक्षा नही करता।

…… इनमें से किसी ने यह नहीं बताया कि क्या सनातन धर्म, चोगें, मक्कारों, जनता का विश्वास हार चुके धूर्तो को राजनीति करने की इजाजत देता है। …. जब छवि दूषण से भी काम नही चला तो आन्दोलन को कुचलने के लिए बाबा को ही आधी रात में उठा लिया।

अब बाबा अनशन पर है। सरकार उच्चतम न्यायालय के कटघरे में और काग्रेस पार्टी पब्लिक के जूते पर।

राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की प्र्रतिक्रियाएं बेहद खामोशी भरी है। दक्षिण के राजनेता, कम्युनिस्ट और ममता बनर्जी जैसे लोग चुप है तो माया और मुलायम की प्रतिक्रिया बेहद नपी तुली। भगवा ब्रिगेड गुस्से में है तो बाबा के अनुयायी और देश का आमजन स्तब्ध।
प्रश्न कई हैं। बाबा के राजनीति पर प्रश्नचिन्ह है तो मौलाना मदनी या अन्य धर्मगुरूओं की राजनीति या प्रश्नचिन्ह क्यों नही लगता।

रामलीला मैदान,नई दिल्ली। इतिहास के पन्नो पर दर्ज हुई तारीख 4/5.06.2011 रात्रि 1.30 AM बजे लगभग। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट एवं पंतजलि योगपीठ के स्रष्टा, योग उद्धारक महान योगगुरू को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। अपराध देश की लाखों करोड़ सम्पति विदेशी बैंको में जमा करने वाले भ्रष्टाचारियों को मौत की सजा की माँग, अवैध काले धन को राष्ट्रीय सम्पति घोषित करने की माँग, शिक्षा व्यवस्था भारतीय भाषाओं में देने की माँग इत्यादि।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। जब-जब निर्लिप्त, अनासक्त सन्यासियों, त्यागी वीतरागी, महापुरूषों ने मदान्ध सत्ताओं को राष्ट्रहित, मानवहित, समझानें का प्रयास किया है, तब-तब सत्ताओं ने, सत्ताशीर्ष पर बैठे मदान्धों ने उन्हें ऐसे ही दुत्कारा है, प्रताडित किया है। अपमानित किया है।

आप ईसा से लगभग 325 वर्ष पूर्व का महापदम नन्द का पाटलिपुत्र का वह राजदरबार याद करिये जब वीतरागी विचारक आचार्य चाणक्य विदेशी आक्रान्ताओं से राष्ट्रहित में राजा को सावधान करने जाते है और अपमानित होकर नन्दों के समूल विनाश की भीष्म प्रतिज्ञा करते है। ऐसी ही मदान्ध सत्ता सहस्त्रबाहु कार्तवीर्य अर्जुन की त्रेतायुग की याद करिए। जब तपस्यारत सन्यासी जमदग्नि के आश्रम को नष्ट भ्रष्ट कर हत्याएं की जाती है। और वीतरागी ‘राम’ परशुराम बन जाते है। उसी युग के वह दृष्य भी याद करिए जब अपनी तरह से अपनी जीवन पध्दति जीने वाले आर्यो को रावण की राक्षसी सत्ता जीने नही देती। दमन हत्याओं और रक्तपात से आर्यो की जीवन पध्दति ही संकट में पड जाती है। और इस सत्ता के विरूध्द संघर्ष का बिगुल बजाते हैं दो वीतरागी सन्यासी महान गाधितनय विश्वामित्र जो राम और लक्ष्मण को लेकर देश की आन्तरिक शक्तियों को संगठित करके एक सूत्र में राम के नेतृत्व में खडा करते हैं और दूसरे महान अगस्त जो दुश्मन की सीमा पर बैठकर राम के लिए शक्ति का संगठन करते है। इस देश में यह परम्परा कभी टूटी ही नहीं। गुरूगोविन्द सिंह, वीर वन्दा वैरागी, सन्यासी क्रान्ति, स्वामी दयानन्द एवं विवेकानन्द का जागरण, स्वामी श्रध्दानन्द का बलिदान, सावरकर बंधु महात्मा गाँधी से लेकर विनोवा और जयप्रकाश नारायण तक। और अब पूज्य अन्ना हजारे एवं संत श्री योगगुरू बाबा रामदेव।

4 जून 2011 से प्रारम्भ हुए आन्दोलन में लोगों ने बाबा के आन्दोलन करने पर आपत्ति जताई। इनमें फिल्म कलाकार, भोंपू राजनेता और ऐसे पत्रकार भी थे जो स्वयं को हिन्दू दर्शन का मर्मज्ञ मानते है। उनका कहना था कि हमारा सनातन धर्म सन्यासी से राजनीति करने की अपेक्षा नही करता। कुछ ने कहा…. वह व्यवसायी है। तो कुछ ने कहा बाबा संप्रदायिक ताकतों के साथ है। इत्यादि। इनमें से किसी ने यह नहीं बताया कि क्या सनातन धर्म, चोगें, मक्कारों, जनता का विश्वास हार चुके धूर्तो को राजनीति करने की इजाजत देता है। किसी ने यह भी नही बताया कि बाबा कौन सा मिलावट का व्यापार कर रहा है। अस्तु । जब छवि दूषण से भी काम नही चला तो आन्दोलन को कुचलने के लिए बाबा को ही आधी रात में उठा लिया।

अब बाबा अनशन पर है। सरकार उच्चतम न्यायालय के कटघरे में और काग्रेस पार्टी पब्लिक के जूते पर। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की प्र्रतिक्रियाएं बेहद खामोशी भरी है। दक्षिण के राजनेता, कम्युनिस्ट और ममता बनर्जी जैसे लोग चुप है तो माया और मुलायम की प्रतिक्रिया बेहद नपी तुली। भगवा ब्रिगेड गुस्से में है तो बाबा के अनुयायी और देश का आमजन स्तब्ध।
प्रश्न कई हैं। बाबा के राजनीति पर प्रश्नचिन्ह है तो मौलाना मदनी या अन्य धर्मगुरूओं की राजनीति या प्रश्नचिन्ह क्यों नही लगता। बाबा इसलिए तो निशाने पर नही कि वह हिन्दु पुन: जागरण के प्रतीक न बन जाएं। आपको याद होगा राहत फतेह अली खान पाकिस्तानी गायक का फेरा में गिरफतारी का मामला। सारे नियम कानून ताक पर रखकर उसे छोड़ दिया गया किन्तु उसका भारत स्थित हिन्दू सचिव शायद आज तक जेल में है। सैकडों आतंकवादियों को फांसी देने की फाईल प्रधानमंत्री कार्यालय से राष्ट्रपति कार्यालय तक नही सरकती चाहे लोग आतंकियो को फांसी देने के लिए आत्मदाह ही क्यो न करें किन्तु बाबा का तम्बू आम नागरिक अधिकारों को कुचलते हुए रात्रि 1:30 बजे उखाड़ने का निर्णय प्रधानमंत्री कार्यालय और सोनिया जी ले लेती हैं और पुलिस के वीर सफलता भी हासिल कर लेते है।

एक और मजाक देखें। सोनिया जी के नेतृत्व में सरकार एवं काग्रेस के नुमाइन्दों की उच्चस्तरीय बैठक होती है और उसके बाद के काग्रेसी बयानों से स्पष्ट है छवि मलीनीकरण की राजनीति उच्च पदस्थ काग्रेसियों एवं सरकार की शह पर हो रही है। 1993 के बाद से जो सरकार दाउद को नही पकड़ सकी वह आधी रात में शान्ति प्रिय नागरिकों को पुलिसिया अन्दाज से भगा देती है। जन्तर-मन्तर जहाँ 8 तारीख को अन्ना हजारे को अनशन करना था वहॉ दफा 144 लगा देती है। और मोदी का मर्सिया पढ़ने वाले नागरिक अधिकारों की दुहाई देने वाले, राजनेता, बुध्दिजीवी राजनीतिक दल, मीडिया चैनल कुम्भकर्णी नींद में सोते रहते है। इतना ही नहीं कुछ चैनल तो सरकार की छवि-दूषक संस्कृति के ध्वजा वाहक बन जाते है। न ऐसा पहली बार हुआ है और न आखिरी बार।

ऐसा क्यो होता है? …

वस्तुत यह देश 712 ए0डी0 के बाद से ही निरन्तर दबाया गया है … कुचला गया है। फिर भी भारतीय राष्ट्रवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं जरा सा खाद पानी मिलता है तो अमर बेल की तरह बढ़ने लगती हैं। कांग्रेस को बस यही दर्द है। भारतीय राष्ट्रवाद हिन्दू राष्ट्रवाद तक जाता है जिससे गैर हिन्दू राष्ट्रवादी संस्थाओं को अपनी सत्ता, सुख-चैन सब … छिनता दिखाई देता है। ऐसा कोई भी आंदोलन जिससे भारत मजबूत होगा चाहे वह अन्ना करे या बाबा रामदेव। अगर वह व्यवस्था परिवर्तन से जुड़ा है तो सरकारें उसे कुचलेंगी ही क्योंकि वह भारतीय/हिन्दू राष्ट्रवाद का जनक बन सकता है। अन्यथा यह मजाक नही तो क्या है। कि पिछले दो दशक से बाबा रामदेव, उनके सहयोगी और उनकी संस्थाए काम कर रही है किन्तु सरकार को आज उनमें कोई नेपाली गुण्डा नजर आता है तो संस्थाए करचोर। विडम्बना देखिये …. आज बाबा को व्यापारी कहकर वह सरकार निन्दा कर रही है जिसने विशुध्द भारतीय व्यापारी संत सिंह चटवाल (अमेरिका-प्रवासी) को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया है। क्या सरकार बता सकती है कि श्री चटवाल का देश के विकास में कितना अमूल्य योगदान है?

अब आगे क्या?

बाबा अनशन पर हैं और अन्ना ने लोकपाल बैठकों का बहिष्कार कर दिया है। जनता स्तब्ध है। भगवा ब्रिगेड जो स्वयं को भारतीय राष्ट्रवाद का स्वयंभू लम्बरदार मानती है मौके को भुनाने की कोशिश में हैं/ऐसे में आगे क्या? भारतीय राष्ट्र के लिए आगे के दिन उथल-पुथल भरे हैं और सरकार के लिए मुश्किल पैदा करने वाले। ऎसे में यदि सर्वोच्च न्यायालय महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है तो शायद बाबा और हजारे को भी अनशन नहीं अपितु जनान्दोलन करना पडेगा। अनशन भी जनान्दोलन का ही एक तरीका है किन्तु यहाँ कारागर होगा कहना मुश्किल है। संभव है कि उच्चतम् न्यायालय के निर्देश और निगरानी में बाबा का डेरा फिर दिल्ली में ही जम जाए।


शिवेन्द्र कुमार मिश्र
आशुतोष सिटी, बरेली उ. प्र.।

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