चक्रव्यूह में … अभिमन्यु …. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

घिर गया है फिर…..
चक्रव्यूह में …
आज का अभिमन्यु
भ्रष्टाचार का दुर्योधन
सत्ता के रथ पर सवार
कर रहा है निरंतर
वार पर वार

राजनीति के द्रोणाचार्य ने
रचा है मानव मूल्यों से दूर
अनैतिकता का व्यूह
सत्ता की भूमि जायेगी
शायद इस बार
इनके साथ साथ
मृत्यु महानद के पार
अब किसी भोज का
‘शोणित पत्र’ करता नहीं
विचलित इन्हें

वंचना के कृपाचार्य
कीर्ति कवलित कर्ण
मानव मर्यादाओं से दूर
राष्ट्र अभिमन्यु पर
नित नवीन वार

देशप्रेम नैतिकता
निष्ठा के अर्जुन
घिर गये हैं
समरांगण से दूर

क्षत विक्षत घायल
आज फिर अभिमन्यु
परिचित अपरिचित
एक द्रष्टि
उसके तुणीर में
एक नयी स्रष्टि
शिष्य हूँ कृष्ण का
रणछोड घरछोड क़ा
होगी नहीं पुनरावृत्ति
उस विगत इतिहास की

अतः हे तात
आधुनिक राष्ट्र के दुयोधन
और सप्त महारथी सुनो
जन्म ले चुका है
एक नया अभिमन्यु
 इस राष्ट्र के गर्भ से