सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है …… [कविता] – अमिता मिश्र ‘नीर’

 सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है
अपना ऑंचल फहराती है
केसरी जलधि नभ नील बना
मेरे मन की नैया जिसमें
क्यूं थिरक थिरक रह जाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

चलने का अन्त नहीं होता
फिर भी चलना पडता हमको
सुख दुख है इस जग की छाया
हमको तो यही बताती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

कितने ही जीवन के पथ में
हरिताभ मरूस्थल भी आये
सूरज डूब गया लेकिन
चन्द्रोदय की कुछ आस नहीं
लो पीडा कण बरसाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

कल्पना कुसुम क्या ‘नीर’ हुये
हैं सत्य कभी मन उपवन के
कुछ यक्ष प्रश्न इस जीवन में
युग युग से छोडे ज़ाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है
अपना ऑंचल फहराती है
©तृषा’कान्त’

वाट निहारूं किसकी … [कविता] – अमिता ’नीर’

सूनी राहें सूना है मन
वाट निहारूं किसकी
आकुलता बढ़ती जाती है
चैन नहीं है पल की

सुख बयार सिहरन सी लगती
घना अँधेरा छाया
क्रूर कुटिल जीवन की रूढ़ी
सब धीरज चुक आया

पथ कंटकाकीर्ण हुआ है
आतप फिर आ घेरे
जीवन क्षण भंगुर लगता है
व्याकुल नैना मेरे

निशि दिन नभ तकते मेघों हित
चातक और पपीहा
निर्झर बहते मेरे नैना
करते पी हा पी हा

कहाँ छिपे घनश्याम राधिका
तुझको तेरी पुकारे
शीश धरूँ चरणों पर मोहन
अब तो कंठ लगा रे

ह्रदय बहुत आकुल है मितवा
मुरली मधुर सूना दे
ओ मेरे जीवन प्रिय कृष्णा
आतप दूर भगा दे

तरसे तेरी चकोरी चंदा
ये संताप मिटा दे
जीवन राग सुनूँ मधुवन में
निर्झर जीवन रस बरसा दे

मन मेरा चहूंओर भटकता
अब तो दरश दिखा दे
विरह कठिन अंतस के दीपक
ह्रदय प्रकाशित कर दे
©तृषा’कान्त’

सुपर डैड …… [कहानी] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

“अंश ….”मोबाइल के स्क्रीन पर नाम देखते ही आंखों में आश्चर्य के साथ उसने पूछा। 

“अरे ऎसा कुछ नहीं.. यह तो बस घर का नाम … मैंने पहले ही कहा था| नाम बस अंग्रेजी के ए अक्षर से ही आरम्भ होगा। एग्जामिनेशन रोल वगैरा में ऊपर आता है। बाकी आप सब लोग जो भी नाम रखना चाहें। कृति ने मन की भावनायें छुपाने का असफल प्रयास किया।

“मुझे इससे कोई अंतर नहीं पड़ता .. ’अंश’ अच्छा नाम है। इसे ही रख लेंगे पहले उसे इस दुनिया में आने दो…” वर्षों की आकुल प्रतीक्षा के बाद मातृत्व सुख की देहरी पर खड़ी उस नव मां के उभरे हुये पेट पर उसने एक दृष्टि डाली और बात टालने के लिये दूसरे कमरे में चला आया।
बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी। … उसके मष्तिष्क में विचारों की आंधी उठ रही थी। 
उसका मस्तिष्क बस यही सोच रहा था कि सारे नाम…… सारी चर्चा ऎसी क्यों जिससे आभास हो कि बेटा ही आयेगा… कपड़े .. बातें भावी योजनायें सब से ऎसा प्रतीत होता कि आने वाले बेटे की बातें हो रही हैं… दादी, नानी, ताई और सम्भावी मां सब.. परिवार में छोटे बच्चे से बात करते तो उसके आने वाले भाई की बातें ही करते ….

वह यह सब देखता सुनता और स्वयं को आहत अनुभव करता। वह जितना सोचता.. बेटा और बेटी के बीच भेद भावना उसे प्रमुख रूप से महिलाओं में अधिक प्रतीत होती। उसका अपना जीवन तो महिलाओं के संरक्षण को सपर्पित था। पारिवारिक और सामाजिक विरोध की प्रतिकूल आंधी में भी नारी जागरूकता को समर्पित सामाजिक संस्था से वह निरन्तर से जुड़ा रहा। अपनी संस्था के माध्यम से आर्थिक अथवा सामाजिक वंचना की शिकार कई मानसिक बेटियों को उच्च शिक्षा ग्रहण कर समाजिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करने में सहयोग किया है।  यदि वह स्वयं भी इसी भेदभाव की भावना से विचार करता तो उसके कन्या समतामूलक आन्दोलन का क्या होता …? उन बच्चियों को सर्वांगीण प्रगति और स्वाभिमान का रास्ता उसने कैसे दिखाया होता। उसने सोचा…

किन्तु आज अपने ही घर में सबकी दृष्टि से ओझल इस अनजाने से होने वाले व्यवहार को वह अपने चिन्तन में भी नहीं सहन कर पा रहा है। उसने अनुभव किया कि सामाजिक कार्य के लिये अपने वैचारिक आन्दोलन को पुन: उसे घर से ही आरम्भ करना होगा अन्यथा अपने आन्दोलन से सम्बद्ध अनेकों बेटियों के माध्यम से समाज में वैचारिक परिवर्तन के उद्देश्य को प्राप्त करने का आजीवन प्रयास व्यर्थ हो जायेगा।

“ पापा आप भी आ जायें कृति दी को आपरेशन थियेटर में ले गये हैं…” सेल पर छोटी बेटी की आवाज उसका चिन्तन भंग करती है। “ हां बेटा मैं अभी आता हूं ….” फोन रखते ही वह घर से निकल पड़ा।
उसने सोचा.. नवजात तो कोई भी हो सकता है …… कन्या भी। इन महिलाओं का पता नहीं उसको ध्यान में रखकर कोई कपड़े रखे हों अथवा नहीं। यदि बेटी हुयी तो … बाद में यह सब जानकर क्या उसे हीन भावना नहीं होगी कि मैं तो अनाहूता हूं। मेरे लिये किसने तैयारी की थी। बस आ गयी तो ठीक है अन्यथा कोई विशेष बात नहीं।
“नहीं नहीं …ऎसा नहीं है। मैं हूं ना तुम्हारी मां का पापा … तुम्हारा पापा … तुम्हारी छॊटी मासी की हास्टल फ़्रेंडस, सभी लड़्कियों का सुपर डैड” उसने अपने आप से कहा।
“तुम्हारे लिये वैसी ही फ्राक ला रहा हूं जो कभी, तुम्हारी मां के लिये पहली बार ली थी। तुम अपनी मां और अपने पापा की नहीं अपितु अपने “सुपर डैड” की बेटी होगी मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं अपनी बेटी की फिर से अपनी बाहों में लेने के लिये। हम दोनों मिलकर बदलेंगे इस सामाजिक सोच को। मैं पुरूषों में और तुम महिलाओं में … ” अपने आपमें बुदबुदाते हुये उसकी दृष्टि नर्सिंग होम के रास्ते में शोरूम में टंगी हुयी फ्राक पर अटक गयी और उसके कदम तेजी से काउण्टर की ओर बढ़ चले।
 

पीड़ा …….. [कविता] – अमिता ’नीर’

उर में पीड़ा रोये
ऑंखों से लोहू बरसे
तेरी स्मृति की सुरभि
मानस में धीरे बरसे
घन तम में पीड़ा रोयी
आंखों से लोहू बरसा
आंखों का बेकल पँछी
युग युग से तुमको तरसा
दुख दर्द भींच होंठों में
हमने चाहा मुस्काना
बह चली अचानक पीड़ा
आंखों नें रोना जाना
हा देव ! मुझे जलने का
अभिशाप दे दिया अच्छा
पर इस जलते उर पर भी
दो आंसू कण बरसाना

–अमिता ‘नीर’

क्यों अमृत में गरल घोलते …… [कविता] – अमिता ‘नीर’


महामौन तुम नहीं बोलते
क्यों अमृत में गरल घोलते

तुम्हें नहीं बहला पाते हैं
रातें चन्द्रकिरण रस भीनी
ये हिमवर्षी सुन्दर दिन
अतिरंजित सपनें मानव के
क्यों ले मन के विजन डोलते
महामौन तुम नहीं बोलते
क्यों अमृत में गरल घोलते

अरे ! मौन ये भी अच्छा है
अंधकार कितना सच्चा है
पर इसमें भी जुगुनू जैसे
कोटि कोटि तारे प्रदीप्त हैं

अलकें पलकें निशि भर जगकर
कहती हैं क्या टिम टिम करते
महा मौन तुम नहीं बोलते
क्यों अमृत में गरल घोलते

मदमाते यौवन की पावस
कभी बनी जो मधुर विह्वला
किन्तु आज इस सूनेपन में
इस एकाकी नीरवता में
क्यों न हृदय की ग्रन्थि खोलते
महामौन क्यों नहीं बोलते
अनाहूत क्षण क्यों टटोलते

सूनी राहें सूना है मन [कविता] अमिता ‘नीर’

सूनी राहें सूना है मन

वाट निहारूं किसकी

आकुलता बढ़ती जाती है

चैन नहीं है पल की

 

 सुख बयार सिहरन सी लगती

घना अँधेरा छाया

क्रूर कुटिल जीवन की रूढ़ी

सब धीरज चुक आया

 

पथ कंटकाकीर्ण हुआ है

आतप फिर आ घेरे

जीवन क्षण भंगुर लगता है

व्याकुल नैना मेरे

 

निशि दिन नभ तकते मेघों हित

चातक और पपीहा

निर्झर बहते मेरे नैना

करते पी हा पी हा

 

कहाँ छिपे घनश्याम राधिका

तुझको तेरी पुकारे

शीश धरूँ चरणों पर मोहन

अब तो कंठ लगा रे

 

ह्रदय बहुत आकुल है मितवा

मुरली मधुर सूना दे

ओ मेरे जीवन प्रिय कृष्णा

आतप दूर भगा दे

 

तरसे तेरी चकोरी चंदा

ये संताप मिटा दे

जीवन राग सुनूँ मधुवन में

निर्झर जीवन रस बरसा दे

 

मन मेरा चहूंओर भटकता

अब तो दरश दिखा दे

विरह कठिन अंतस के दीपक

ह्रदय प्रकाशित कर दे

मौन

महामौन तुम नहीं बोलते
क्यों अमृत में गरल घोलते

तुम्हें नहीं बहला पाते हैं
रातें चन्द्रकिरण रस भीनी
ये हिमवर्षी सुन्दर दिन
अतिरंजित सपनें मानव के
क्यों ले मन के विजन डोलते
महामौन तुम नहीं बोलते
क्यों अमृत में गरल घोलते

अरे ! मौन ये भी अच्छा है
अंधकार कितना सच्चा है
पर इसमें भी जुगुनू जैसे
कोटि कोटि तारे प्रदीप्त हैं

अलकें पलकें निशि भर जगकर
कहती हैं क्या टिम टिम करते
महा मौन तुम नहीं बोलते
क्यों अमृत में गरल घोलते

मदमाते यौवन की पावस
कभी बनी जो मधुर विह्वला
किन्तु आज इस सूनेपन में
इस एकाकी नीरवता में
क्यों न हृदय की ग्रन्थि खोलते
महामौन क्यों नहीं बोलते
अनाहूत क्षण क्यों टटोलते