क्या यह राष्ट्र एक परिवार की जागीर है .. ? [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

यह राष्ट्र मेरा है। अचानक कहे गए इस कथन से चल रही बहस में एक ठहराव सा आ गया। तुम ऐसा कैसे कह सकते हो। यह कहते हुए कुछ क्षणो बाद मेरे साम्यवादी मित्र ने उस मरघटी शानित को भंग करते हुए कहा। मैने जबाब दिया – तू ही बता अब तेरी बारी है। आखिर मैं इस राष्ट्र का मालिकाना दावेदार क्यों नही हो सकता।

मित्र ने अपने तर्कों की धार को पैना किया हथियारों को परखा और बार कर दिया – तुम यह किस आधार पर कह रहे हो मुझे नही मालूम। अगर तुम ऐसा मानते हो कि हिन्दू या ब्राहम्ण होने के नाते इस राष्ट्र पर तुम्हारा ज्यादा हक बनता है। तो ठीक है, फासीवादी सोच के कारण तुम ऐसा मान सकते हो। किंतु हिन्दुओ के पूर्वज यानी कि आर्य तो इस देश के थे ही नही तो तुम्हारा दावा मजबूत कैसे हुआ ? और अगर तुम यह मानते हो कि तुम पहले विजेता थे तो भी किसी एक आक्रमणकारी का दावा किसी दूसरे से ज्यादा मजबूत कैसे हुआ।

मुझे लगा बहस सदियों से घर कर गए तर्कों की तरफ मुड़ गर्इ है। कुछ कहता इससे पहले ही अगला वार हुआ। इस बार दलित मित्र ने आक्रमण किया था – बोले – वैसे भी भारत के मूल निवासी तो दलित, शोषित, आदिवासी वनवासी बंधु है। जिन्हें आक्रान्ता आर्यों ने जंगलो में धकेल दिया और स्वंय शासक बन गए। उन्होने अपने कथन के समर्थन में कुछ दलित विचारकों को भी उदघृत किया। किंतु बाबा साहेब अंबेडकर जी तो ऐसा नही मानते और आप सहमत होंगे कि उनसे बड़ा दलित चिंतक अभी तक भारत में नही हुआ। मैने जबाब दिया। मैने दलित मित्र को संतुष्ट करने के लिए माननीय डा0 अम्बेडकर लिखित कुछ संदर्भ ग्रन्थो का हवाला देने की कोशिश की किंतु तभी एक और आक्रमण हुआ। इस वार का हमला सेक्युलर मित्र की ओर से था – काफिले आते गए और कारवां बनता गया। अमां इन आने वाले काफिलों में कौन तेरा था और कौन मेरा। किसे पता। फिर सबसे बाद में और लम्बे समय तक य हां आकर बसने वाले काफिलों में इस्लामिक काफिले थे। तुम तो जानते ही हो कि प्रगतिवादी ए वं आधुनिक मुसलमान होने के नाते मैं कभी दारूल हरम या दारूल हरब की अवधारणाओं में नही उलझ ता। किंतु तुम्हे भी माइनारिटी के हकों को समझ ना होगा। इसीलिए पणिडत नेहरू जैसे विचारकों ने इसे सेक्यूलर स्टेट माना। साम्यवादी ए वं दलित मित्रों ने सेक्युलरी भाव की हाँ में हाँ मिलार्इ। उन्होने मुझे ऐसे देखा मानो शिकार पर निकले शिकारी ने दिन भर की दौड़ धूप के बाद एक मुर्गाबी का शिकार कर लिया हो। अब मैने उत्तर दिया – मेरा यह दावा इस आधार पर है कि मै मानता हूँ कि मैं राहुल गांधी हूँ। मैं संजय गाँधी या राजीव गाँधी था। क्या तो भी यह बहसें जिन्दा रहती हैं। बाकी मित्र कुछ कह पाते कि पाण्डेय जी ने बहस खत्म की – चलो यारों देर हो रही है घर चलें। वैसे भी सकल भूमि गोपाल की। झगड़ना कैसा। चलो कल मिलते हैं और बहस खत्म हो गर्इ।
©तृषा’कान्त’

Advertisements

सांप्रदायिकता बनाम बहुलतावाद कुछ ज्वलन्त प्रश्न एवं विश्लेषण . . . . [आलेख] – शिवेंद्र कुमार मिश्र

…. चोट तुम्हें भी लगी है और घाव हमने भी खाए हैं । अगर तुम हमेशा अपनी चोटें खुली रखोगे तो घाव सीना हम भी सीख नहीं पायेंगे। अत: उचित समय है कि इन कठमुल्ला, मौलवियों, पणिडतों और ढोंगी भगवाधारियों, बुद्धिजीवियों, नेताओं, कथित मानवाधिकार एवं सोशल कर्मियों और मीडिया की फ्लश लाइटों से बचिए। दो कदम तुम चलो और दो कदम हम चलें ताकि इस बहुलतावादी समाज को बचाया जा सके वरना कोर्इ राक्षस ब्रोविक पैदा हो जायेगा।

  प्रात: प्रतीची से उदित होते हुए सूर्य की प्रथम रश्मि संग कभी मंदिरों से प्रात:कालीन आरती और भजनों की यान्त्रिक और मानवीय ध्वनि सुनार्इ दिया करती थी किंतु अब ऐसी ध्वनियां विशेषत: मानवीय ध्वनियां अतीत की बात हो गर्इ हैं। अजान के स्वर अब भी मुंह अन्धेरे ही सुनार्इ देते हैं और साथ ही कावा में दफन होने की ख्वाहिश और किसी गाजी की प्रशंसा के गीत भी। मैं पंथनिरपेक्षता में पूर्ण विश्वास करता हूँ किंतु यह पंथनिरपेक्षता धार्मिक सहिष्णुता के गर्भ से उत्पन्न होती है और इसका समर्थन संविधान भी करता है। किंतु यह दुर्भाग्य है कि जब हमारे देवी-देवताओं के भजन-कीर्तनों के कार्यक्रमों को भी यदा-कदा छोटी सी शिकायत पर बन्द करा दिया जाता है और हमारे लोग नपुसंक क्रोध से मुठिठयां भींचते रहते हैं। दूसरी तरफ अन्य मत के लोग जरा सी बात पर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। दुकाने फूंक दी जाती हैं। लोग मार दिए जाते हैं। थोड़े दिन कर्फ़्यू लगता है। यदि हिंसा एक विशेष प्रकार के लोगो के खिलाफ होती है तो पंथनिरपेक्ष प्रशासन, आधुनिकता, पंथनिरपेक्षता के प्रतीक बुद्धिजीवी, मीडिया कोर्इ भी इस बात पर ध्यान नहीं देता। जबकि आतंकवाद के नाम पर ऐसी सुनियोजित हिंसा  कई बार किसी क्षेत्र विशेष से हिन्दू आबादी को निर्मूल कर देती है और कहीं कोई आवाज तक नहीं आती। शायद स्मृति पर बल दें तो स्मरण आ जाए। एक दशक पूर्व की एक हृदय विदारक घटना। जब कश्मीर घाटी एवं पाकिस्तान एक भयंकर भूकंप का शिकार हुआ था। अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के दौरे पर थे। ऐसे समय में भी जिहादी आतंकवादियों ने उस मानवीय आपदा के भीषण क्षणों में भी लगभग दस सिखों की नृशंस हत्या कर दी थी। 

  एक समाचार बरबस मेरा ध्यान खींचता है। केरल की विधानसभा में प्रस्तुत किए जाने हेतु प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण संबंधी एक बिल पर कैथोलिक चर्च द्वारा उठार्इ गर्इ आपत्ति। इस बिल में दो से अधिक संतान उत्पन्न करने वाले को 10000-रू0 अर्थदण्ड या एक वर्ष की सजा या दोनो का प्राविधान है। चर्च की आपत्ति निरन्तर कम होती र्इसार्इ जनसंख्या एवं हिन्दू जनसंख्या की ओर है। चर्च ने अपने हिन्दू मित्रों का ध्यान आकृष्ट करते हुए केरल के शीघ्र ही मुस्लिम बाहुल्य राज्य मे परिवर्तित हो जाने का उल्लेख किया है। अन्य संप्रदायों की तुलना में एक पंथ विशेष के अनुयायियों की बढ़ती जनसंख्या, जनसांख्यिक एवं राजनैतिक विषमता तो उत्पन्न करेगी ही।

  यह चिन्ता मेरे जैसे कलमघिस्सू भारतीय हिन्दू की ही हो ऐसा नहीं है। इसके सरोकार विश्व व्यापी हैं। यदि आपकी स्मृतियों पर समय की धूल की मोटी परत न चढ़ी हो तो मैं आपका ध्यान नार्वे की एक हिंसक घटना और उसके कर्ता की चिन्ताओं की ओर ले जाना चाहता हूँ। यहां स्पष्ट कर दूँ कि उस हिंसक घटनाकाण्ड की न तो प्रशंसा की जा सकती है और ही उस आतातायी की। किंतु यदि हिंसा के मूल में उस अपराधी की चिन्ताओं के सरोकार पर ध्यान न दिया जाए तो यह न्याय और बदलते मानविकी भूगोल से मुंह मोड़ लेना होगा।

  जुलार्इ 2011 यूरोप के सामान्यत: सबसे शान्त देश नार्वे में एडर्स बेहरिंग ब्रेविक नामक एक नवयुवक ने एक भीषण नरसंहार को अंजाम दिया। लगभग 98 लोग मारे गए। हम इस युवक को बड़ी सहजता से विक्षिप्त या मानसिक रोगी करार दे सकते हैं। किंतु सच्चे जनतंत्र में विक्षिप्तों और मानसिक रोगियों को भी सुने जाने में कोर्इ हानि नही है। यहां भारत में हम उच्च पदस्थ मानसिक रोगियों को नित्य ही सुनते हैं और मीडिया में उन्हे प्रमुखता भी मिलती है तो ब्रेविक को सुने जाने में भी हानि नही है।

  ब्रेविक द्वारा 1500 पन्नो में लिखे अपने दस्तावेज – 2083 : अ यूरोपीय डिक्लेरेशन आफ इण्डिपेंडेंस में अपनी चिंताओं को व्यक्त किया है। ब्रेविक की चिंताओ में बहुलतावादी यूरोपीय समाज में मुसिलमों द्वारा स्वंय को अलग-थलग रखने, पाकिस्तान में हिन्दू, र्इसार्इ, अल्पसंख्यकों का बलात धर्मान्तरण आदि और दूरगामी चिंताओं में यूरोप में अनेक छोटे-छोटे मुस्लिम राष्ट्रों की कल्पना आदि थी। वस्तुत: उसने बहुलतावादी संस्कृति के उस स्वरूप पर भी सवाल उठाए हैं जहां मुस्लिम लड़कियों को यूरोपीय समाज में मिश्रित होने पर पाबन्दी होती है और मुस्लिम युवक नार्वे की लड़कियों को अच्छी नजर से नही देखते।

  क्या भारत में भी मुसलमान बहुसंख्यक अथवा अन्य अल्पसंख्यक समाजों के साथ मिश्रित नहीं होते ? भारत में यह समस्या अन्य रूप में है। आम मुस्लिम जन समाज के शेष हिस्से के साथ न केवल मिश्रित होना चाहते हैं अपितु वह स्वंय को शेष समाज का अविभाज्य अंग मानते हैं किंतु यहां के कुछ खास मानसिकता के लोग जो राजनेता, बुद्धिजीवी अथवा मीडियाकर्मी हो सकते हैं। यह नहीं चाहते कि मुस्लिम समाज शेष समाज से एकाकार हो और साझा सोच व संस्कृति का विकास हो। गुजरात दंगो के नाम पर एक विशेष प्रकार की मानसिकता के लोगो को लगातार वरीयता देना, वस्तनावी जैसे आधुनिक प्रगतिशील मुस्लिम विचारक को राष्ट्रीय पटल से पीछे धकेल देना ऐसी ही घटनाएं हैं। इतना ही नही जब अन्ना के आन्दोलनकारी भी मौलाना बुखारी जैसे कटटरपंथियों के यहां उन्हें मनाने पहुंचते हैं तो निशिचत रूप से किसी भी बहुलतावादी समाज में कटटरपंथियों की जिद को वरीयता मिलती है। ऐसे कटटरपंथियों को दुत्कारा जाना चाहिए भले ही वह दाढ़ी वाले हों या टोपी वाले।

  किसी भी ऐसे समाज में जहां विभिन्न, आस्थाओं, मान्यताओं वाले लोग एक साथ रहते हो वहां पारस्परिक समांजस्य एवं सदभाव का दायित्व आम नागरिकों से लेकर बुद्धिजीवियों, सत्ताधीशों एवं समुदाय के नेताओं का समान रूप से होता है। सांप्रदायिक घटनाओं पर समय की धूल डालना, हर प्रकार के कटटरपंथ का कठोरता से दमन, समुदाय को दी जाने वाली सुविधाएं सभी समुदायों को समान रूप दिया जाना, इस सामंजस्य के लिए आवश्यक है। मुस्लिमों को हजयात्रा पर सब्सिडी समझ में आती है पर यही छूट सिक्खों, र्इसाइयों और हिन्दुओं को क्यों नही मिलनी चाहिए।

  गोधरा के दंगो और मोदी को निरन्तर नए जख्म जैसे दुष्प्रचार के रूप में एक दशक से प्रस्तुत किया जा रहा है। तो क्या हाशिमपुरा, मलियाना के दंगो को भी मुसलमानों को याद नहीं रखना चाहिए। एक पूर्व प्रधानमंत्री का सिक्खों के नरसंहार पर दिए गए वक्तव्य को याद करिए – एक बड़ा वृक्ष गिरता है तो थोड़ा बहुत तो धरती कापंती ही है। सन 84 के दंगो को नरसंहार क्यों न कहा जाए। वर्ष 1916 गांधी के खिलाफत असहयोग के कार्यकाल के भीषण मोपला दंगो को याद करिए जहां हजारों हिन्दुओं का कत्ल हुआ, बलात्कार और बलात धर्म परिवर्तन हुए और गांधी तथा उनकी कांग्रेस एक निन्दा प्रस्ताव भी अपराधियों के विरूद्ध पास न कर सकी। डा0 अम्बेडकर जैसे विचारक भारत में सांप्रदायिकता की शुरूआत खिलाफत असहयोग से ही मानते हैं और उक्त दंगो की भीषण निन्दा भी करते हैं। (पाकिस्तान अथवा भारत विभाजन – डा0 बी0आर0 अम्बेडकर) अन्तत: सभी दंश समाज ने भुलाए ही हैं। चोट तुम्हें भी लगी है और घाव हमने भी खाए हैं । अगर तुम हमेशा अपनी चोटें खुली रखोगे तो घाव सीना हम भी सीख नहीं पायेंगे। अत: उचित समय है कि इन कठमुल्ला, मौलवियों, पणिडतों और ढोंगी भगवाधारियों, बुद्धिजीवियों, नेताओं, कथित मानवाधिकार एवं सोशल कर्मियों और मीडिया की फ्लश लाइटों से बचिए। दो कदम तुम चलो और दो कदम हम चलें ताकि इस बहुलतावादी समाज को बचाया जा सके वरना कोर्इ राक्षस ब्रोविक पैदा हो जायेगा।
©तृषा’कान्त’