ओ पिता ! ….. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’


फादर्स डे पर विशेष – पिता अर्थात एक अमिट अस्तित्व .. एक वजूद जो अपने स्वप्नों .. अपनी आकांक्षाओं को सन्तति के उज्ज्वल भाविष्य के लिये प्रसन्नता के साथ त्याग देता है .. अखिल विश्व के ऎसे सभी पिताओं को समर्पित अनुभूति पर मेरी एक रचना.. नमन – तृषाकान्त
ओ पिता !
लगा है एक युग मुझे,
पहचानने में तुम्हें

माँ होती है धरती,
गेहूँ अथवा जौ
बोया गया किस खेत में,
कोई अन्तर नहीं पडता,
हृदय पोषित तत्व से
उगती है जो फसल,
नाम क्या.. पहचान क्या,
फिर कौन हूँ मैं ..
वह तो है बोया बीज,
मैं जो भी हूँ वह हो तुम

हे पिता !
पीड़ा दी है
बहुत तुम्हें ..
स्वयं को त्यागी..
महान और वीतरागी,
सिद्ध करने के दर्प में,
क्षमा याची .. ढूंढता हूं
तुम्हारी गोद ,..
सब कुछ भूल,
आश्वासन बचपन का,
आज फिर
चिपट कर लिपट कर
रोना चाहता हूं ..
और पुकारता हूं..

हे पिता !
लगा है एक युग मुझे
पहचानने में .. तुम्हें,
दर्द से आकुल
सीने से उठता ज्वार
फूट पड़ता है आंखों से,
और तभी
केवड़े की गंध से
भर जाता है मेरा कमरा,
खिड़की से प्रवेश करता है
हवा का एक झोंका
मेरे आंसू सुखाने लगता है.
©तृषा’कान्त’

प्रसिद्घ वेबज़ीन साहित्य शिल्पी 1 मई से कलेवर में


साहित्य शिल्पी के सभी मित्रों को सादर अभिवादन …!
  जैसा कि विदित है आदरणीय सूरज प्रकाश जी प्रधान संपादक के रूप में 1 मई से साहित्यशिल्पी के नये अंक को प्रस्तुत करेंगे। संलग्न है उनके पत्र का संदेश … आभार – तृषाकान्त

प्रिय मित्र ..!
   आपसे ये बात शेयर करते हुए मुझे बेहद खुशी हो रही है कि मैं प्रसिद्घ वेबज़ीन साहित्‍यशिल्‍पी (sahityashilpi.com) के संपादन का कार्यभार संभालने जा रहा हूं। 

पहली मई 2012 का अंक नये कलेवर में निकलेगा। इसमें पहले की तरह कहानी, साक्षात्‍कार, यात्रा वृतांत, कविता, ग़ज़ल, आदि तो रहेंगे ही, हम कुछ नये कॉलम भी शुरू करने जा रहे हैं। ये नये स्‍तंभ इस तरह से होंगे: · 

आओ धूप- इसमें रचनाकार की अब तक कहीं भी अप्रकाशित रचना लेंगे। इसके साथ लेखक से आशय का पत्र भी लेंगे कि ये लेखक की पहली रचना है और अब तक कहीं प्रकाशित नहीं है। नेट पर तो बिलकुल भी नहीं। · 

भाषा सेतु- इसमें हम दूसरी भाषाओं से अनूदित स्‍तरीय रचनाएं आमंत्रित करेंगे। कहानी, कविता या मानविकी, विज्ञान। · 

मेरे पाठक – हम ये नया कॉलम शुरू करेंगे जिसमें हम किसी भी वरिष्‍ठ रचनाकार से उसके पाठकों से मिले अनुभव अपने पाठकों के लिए लेंगे। हर लेखक पाठकों के लिए ही लिखता है और उन्‍हीं के बलबूते पर लेखन में जिंदा भी रहता है। कई पाठक तो लेखकों को ऐसे ऐसे अनुभव दे कर जाते हैं कि लेखक को एक नयी रचना की ज़मीन मिलती है। हम यही अनुभव लेना चाहेंगे। · 

विरासत- इस कालम में हम कालजयी रचनाओं को पेश करना चाहेंगे। ये किसी बड़ी रचना का सार संक्षेप भी हो सकता है और रचना छोटी होने की स्थ्‍िति में जस का तस भी। · 

देस परदेस – इसमें महीने में एक बार हम उपलब्‍ध होने पर प्रवासी साहित्‍य लेना चाहेंगे। · हम एक कालम और शुरू करेंगे जिसमें नेट मीडिया पर अन्‍यत्र छपी बेहतरीन रचनाओं की, चल रही बहस की, उठाये गये मुद्दों की बात करेंगे। · 

मैंने पढ़ी किताब – इस कॉलम में हम विभिन्‍न स्रोतों से सद्य प्रकाशित किताबों के बारे में अपने पाठकों को बतायेंगे। हो सके तो किताब के कवर का स्‍केन, प्रकाशन संबंधी जानकारी भी देंगे। इसी कालम में हम स्‍तरीय किताबों के पढ़े जाने के बारे में भी फीडबैक लेंगे। · 

पठनीय – इसमें हम स्‍तरीय किताबों की समीक्षा आमंत्रित करेंगे और किताबें मिलने पर समीक्षाएं करवा कर प्रकाशित भी करेंगे। तो मित्रो, ये पत्रिका तो आप सब की है, आप सब के लिए है और निश्चित रूप से आप सबके रचनात्‍मक सहयोग से ही चलने वाली है। आपकी रचनाओं का हमें बेसब्री से इंतज़ार रहेगा1 हां, रचना भेजते समय ये ज़रूर देख लें कि वह पहले से ही नेट पर किसी और पत्रिका, ब्‍लॉग या वेबसाइट पर उपलब्‍ध न हो। 

आप यूं मान लीजिये कि हम अपने पाठकों को आपकी नवीनतम रचना के पाठ का सुख देना चाहेंगे। आपकी रचना के साथ आपका प्रोफाइल और फोटो भी मिले तो सोने में सुहागा। आप अपनी रचना मुझे mail@surajprakash.com पर या सीधे ही पत्रिका के पते sahityashilpi@gmail.com पर भेज सकते हैं। 

आपका अपना ही 

– सूरज प्रकाश 

वावरे ..! किस चाह में ….. [ गीत ] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

जीव जीवन पथ अकेला 
आदि से जग राह में 
क्यों फिरे उद्विग्न अंतस  
वावरे ..! किस चाह में 

नगर में मेले मिले तो 
भीड़ भी पुरशोर है 
डगर पथरीली कठिन भी 
मनुज मन कमजोर है 
बह गया बहुधा लहर से 
तुमुल करतल वाह में 
वावरे ..! किस चाह में 

कालिमा कुत्सित तमस की 
हाय मानव छल गयी 
मोह माया रज्जु बन्दी 
सकल उर्जा जल गयी 
डोर अब अव्यक्त खींचे 
ढोर बांधे रज्जु से 
छूटते सब संग साथी 
दिव्य आभा पुंज से 
अहा अब अभिसिक्त यौवन 
अलौकिक किस राह में 
वावरे..! किस चाह में 
©तृषा’कान्त’

मेरा आदर्श भी वही है … तुम नहीं राम ..!! [कविता] – रश्मि भारद्वाज

हे राम !
जानते हो तुमसे
क्यों नहीं मांगी
किसी ने अग्निपरीक्षा…..!!??
क्योंकि ये अगाध प्रेम था किसी का
जो नहीं देख सकता था खड़ा
तुम्हें प्रश्नो के दायरे में
जो नहीं चाहता था
खंडित हो तुम्हारी छवि
मर्यादा पुरुषोतम की
इतना निश्चल प्रेम
ईश्वर बना दिया तुम्हें ….!!!!
और ये कैसा प्रेम तुम्हारा
जिसे थी प्रमाण की दरकार
दुनिया के लिए…..!!!

ये कैसा ईश्वरत्व तुम्हारा….!!??
जिसे बचाने के लिए
कर गए परित्याग भी तुम
हमेशा के लिए ………..
साबित कर दिए दुनिया के इल्ज़ाम
वह भी तब
जब सिर्फ तुम्हारी जरूरत थी उसे
तब कैसे पाओगे
तुम भी वह प्रेम……!!!
जो तुम्हारा था कभी
उसे तो जाना ही था
धरती के गर्भ में
आज से सदियों पहले ही
कर गया कोई
अपनी अस्मिता को
बचाने की पहल
प्रेम में होने के बाद भी …….
मेरा आदर्श भी वही है राम
तुम नहीं ……………..!!

 रश्मि भारद्वाज
©तृषा’कान्त’

सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है …… [कविता] – अमिता मिश्र ‘नीर’

 सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है
अपना ऑंचल फहराती है
केसरी जलधि नभ नील बना
मेरे मन की नैया जिसमें
क्यूं थिरक थिरक रह जाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

चलने का अन्त नहीं होता
फिर भी चलना पडता हमको
सुख दुख है इस जग की छाया
हमको तो यही बताती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

कितने ही जीवन के पथ में
हरिताभ मरूस्थल भी आये
सूरज डूब गया लेकिन
चन्द्रोदय की कुछ आस नहीं
लो पीडा कण बरसाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

कल्पना कुसुम क्या ‘नीर’ हुये
हैं सत्य कभी मन उपवन के
कुछ यक्ष प्रश्न इस जीवन में
युग युग से छोडे ज़ाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है
अपना ऑंचल फहराती है
©तृषा’कान्त’

सखी री ! देखो आया वसन्त… [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

सखी री !
देखो आया वसन्त
बौराई पछुआ को लेकर
मदमाती अँगड़ाई लेकर
तन-मन टूटे मदमस्त अंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

वन-वन खिलता द्रुम वनांगार
बासंती आहट ले फुहार
सेमल, टेसू कोयल पुकार
चित-चोर नयन हिय में अनंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

यौवन चंचल काया झूमें
अद्वैत बने प्रिय संग घूमें
कुसुमित उपवन
सब जड़ चेतन
हर्षित मन है उर में उमंग
सखी री !
देखो आया वसन्त
©तृषा’कान्त’

प्रणमामि शारदे् प्रणमामि ..[कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त

प्रणमामि शारदे् प्रणमामि
प्रणमामि शारदे् प्रणमामि
हे! आर्यावृत हे! भरत् पुत्र
हे! बाल्मीकि हे! कालिदास
प्रणमामि मनीषं प्रणमामि
 प्रणमामि ताण्डव सिंहनाद
प्रणमामि महाकाली निनाद

प्रणमामि शारदे् सप्तनाद
प्रणमामि काव्यरस सिन्धुनाद
प्रणमामि भरत् भू परम्परा
ॠषियों की पावन महाधरा
षट्ॠतुओं ने पाँखें खोलीं
मेघों ने अद्भुत रूप धरा
प्रणमामि प्रेरणे! प्रकृतिदेव्
तन्त्री के तार छेडते हो
‘सम्मोहित’ सिन्धु मनीषा से
हे! शारदेय शत् शत् प्रणाम
प्रणमामि मनीषं प्रणमामि
©तृषा’कान्त’

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