’कान्त’ पत्थर वोट का संसद से चलाया जायेगा …. [गजल] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’


तुम हमारे जख्म फिर से मत कुरेदो

वक्त का मरहम हटाया जायेगा

लहू से लोहित हुयी सरयू अभी मैली पड़ी
आज क्या फिर से वही लोहू बहाया जायेगा

तारीख़ के पन्नों से निकली धुंध फिर सबओर है
राम को घर से हटा बाब़र बिठाया जायेगा

उनको अब तो छोड़ दो दो जून रोटी के लिये
टूटी ठेलों को कहीं फिर से जलाया जायेगा

पड़ोसी वाशिद की आंखें आज फिर ये पूंछतीं
भूखे बच्चों को तेरे घर पे सुलाया जायेगा

भरोसा अब कांच की उन बन्द खिड़की के सहन
’कान्त’ पत्थर वोट का संसद से चलाया जायेगा

तुम हमारे जख्म फिर से मत कुरेदो

वक्त का मरहम हटाया जायेगा