वो देखो एक इंसान ….. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

वो देखो एक इंसान


पागल सा


वर्तमान के चीथड़ों को लपेटे


अतीत की सुई से सीता सा


वो देखो ….



गांधी का डंडा


सुभाष की आवाज


भगत की फाँसी का फन्दा


गले में डालता सा


वो देखो ….



हँसते है सडक़ चलते लोग


छात्र.. नेता … अभिनेता और कर्मचारी


दुकानदार.. पुलिस… अफसर और व्यापारी


होठों मे बुदबुदाते हुये


वंदेमातरम चीखता सा


वो देखो ….



अपने कंधो पर ढोता है अपनी लाश


सुनहले सपने इस देश के आंखो में सजाकर


पहचाने नगर में


परिचित चेहरा ढूँढता सा


वो देखो एक इंसान पागल सा..

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