जापान का रेडियोधर्मी विकिरण और हमारी परमाणु सुरक्षा चिंताए [3] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

11 मार्च 2011 से जिस प्रबल प्राकृतिक

….भारत सरकार मानसून सत्र में परमाणु सुरक्षा पर दो विधेयक लाने पर भी विचार कर रही है तो जैतापुर परमाणु संयत्र ने सुरक्षा के मुद्दे पर आन्दोलन तेज हो गया है। स्पष्ट है परमाणु सुरक्षा को लेकर लोगो की चिंता गंभीर है….

……रिपोर्ट के तथ्यों से स्पष्ट है कि परमाणु संयंत्रो के दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में परमाणु विकिरण का रिसाव एक गंभीर समस्या हो सकता है। इसके अतिरिक्त रेडियो विकिरण के कारण परिस्थितिकी में आने वाला परिवर्तन एक अन्य चिंता का विषय हो सकता है। ऐसे मे सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों के साथ हम सभी लोगो की एक सामूहिक जिम्मेदारी है……

प्रकोप का शिकार जापान हुआ उसकी पीड़ा से माह एक माह बाद भी उबर नही पाया है। इधर फुकूशिमा परमाणु संयंत्रो से हो रहे तीव्र रेडियो विकिरण रिसाव ने एक नयी प्रकार की सुरक्षा चिंताओ से विश्व को रूबरू कराया है। हालिया समाचारों के अनुसार फुकूशिमा परमाणु संयंत्रो के निकटवर्ती समुद्र में रेडियोधर्मिता की मात्रा अब तक की सर्वाधिक मात्रा मापी गई। परमाणु संयंत्र से 30 किमी0 की दूरी पर समुद्र से लिए गए नमूनों में आयोडीन – 131 का स्तर उच्चतम सीमा से 23 गुना ज्यादा और सीजियम – 137 का स्तर भी अब तक का सर्वाधिक पाया गया। मेरे लिए तो आयोडीन – 131 एवं सीजियम – 137 मात्र ऐसे शब्द हैं जिनसे यह अनुमान लगा सकता हूं कि ये रेडियोधर्मी कण पर्यावरण एवं मानवीय स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक घातक होंगे।जानकार.. सुधी पाठकों को चाहिए कि जनजाग्रति की दृष्टि से इस पर कुछ प्रकाश डालेंगे तो अच्छा रहेगा। इस बीच भारतीय ऊर्जा निगम के निदेशक श्रेयांस चक्रवर्ती ने भारतीय परमाणु संयत्रो में अतिरिक्त सुरक्षा बढ़ाये जाने पर बल दिया है। भारत सरकार मानसून सत्र में परमाणु सुरक्षा पर दो विधेयक लाने पर भी विचार कर रही है तो जैतापुर परमाणु संयत्र ने सुरक्षा के मुद्दे पर आन्दोलन तेज हो गया है। स्पष्ट है परमाणु सुरक्षा को लेकर लोगो की चिंता गंभीर है।

विगत दिनो जापान की फुकूशिमा परमाणु दुर्घटना के पश्चात प्रारम्भ हुए रेडियो विकरण रिसाव के चलते उत्पन्न होने वाली सुरक्षा चिंताओ पर कतिपय मित्रों की प्रतिक्रिया कुछ उपेक्षात्मक थी। ऐसा लगा कि मानो वह कह रहे हैं कि रेडियो विकिरण कोई गंभीर समस्या नहीं है। ऐसे मित्रो को संबोधित करते हुए मैं चेर्नोबिल परमाणु दुर्घटना-यूक्रेन रूस से संबंधित कुछ तथ्य हिन्दी दैनिक अमर उजाला में प्रकाशित एक रिपोर्ट से साभार प्रस्तुत कर रहा हूं।

इस रिपोर्ट के अनुसार फूकुशिमा में रेडिएशन स्तर चेरनोबिल हादसे को पार कर चुका है। 26 अप्रैल 1986 यूक्रेन के चेरनोबिल परमाणु संयंत्र के रिएक्टर-4 में हुए परमाणु हादसे में रिएक्टर की छत उड़ गई और जो आग लगी वह नौ दिनो तक धधकती रही। रिएक्टर के बाहर कंक्रीट की दीवार न होने के कारण रेडियोधर्मी मलवा वायुमण्डल में फैल गया जिसके विकिरण से 32 लोगो की मृत्यु हो गई। अगले कुछ दिनो में रेडियोधर्मी बीमारियों के कारण 39 अन्य लोग मारे गए। चेर्नोबिल परमाणु हादसा विश्व परमाणु इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना सिध्द हुई। इसका रेडियोधर्मी पदार्थ यूक्रेन, रूस और बेलारूस तक फैल गया था। प्रदूषण को रोकने के लिए 18 अरब रूबल खर्च किए गए। 1986 से 2000 तक 350450 लोगो को यूक्रेन, रूस, वेलारूस के प्रदूषित इलाको से निकालकर दूसरी जगह बसाना पड़ा। इस हादसे के बाद धरती एक बड़ा भाग प्रदूषित हो गया और हजारो लोगो को अपनी रोजी-रोटी गंवानी पड़ी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार उस हादसे में मरने वालो की संख्या-4000 तक हुई हो सकती हैं यही नहीं इस हादसे के लोगो पर जो मानसिक आघात हैं उसकी गणना नहीं की जा सकती। हादसे के बाद तमाम लोग शराबी हो गए और बहुतो ने आत्महत्या कर ली।

उक्त रिपोर्ट के तथ्यों से स्पष्ट है कि परमाणु संयंत्रो के दुर्घटनाग्रस्त होने की स्थिति में परमाणु विकिरण का रिसाव एक गंभीर समस्या हो सकता है। इसके अतिरिक्त रेडियो विकिरण के कारण परिस्थितिकी में आने वाला परिवर्तन एक अन्य चिंता का विषय हो सकता है। ऐसे मे सरकारी एवं गैर सरकारी संगठनों के साथ हम सभी लोगो की एक सामूहिक जिम्मेदारी है कि योग्यता एवं क्षमता के अनुसार लोगो को इस विषय में जागरूक एवं शिक्षित करने का प्रयास करें।

दिनांक : 03 अप्रैल 2011
शिवेन्द्र कुमार मिश्र
बरेली।

जापान का रेडियोधर्मी विकिरण और हमारी परमाणु सुरक्षा चिंताए [2] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

……..क्या आम भारतीय जन ”रेडियो विकिरण” के प्रभावों के विषय में पर्याप्त जानकार है ? क्या यह दुर्घटना ऐसा समय नहीं था कि आम जनता को परमाणु दुर्घटनाओं से उत्पन्न दुष्प्रभावों के विषय में सावधान किया जाता ? क्या चेर्नोबिल दुर्घटना के साक्षी रूस की तुलना में भौगोलिक रूप से जापान हमारे अधिक समीप नहीं है ?
…….

अन्तत: सुदृढ़ जिजीविषा के ‘जापान’ ने हार मानकर फुकूशिमा परमाणु संयंत्र को बंद करने का निर्णय ले ही लिया। चार परमाणु रिएक्टरों को तत्काल बंद करने का निर्णय लिया गया जबकि शेष दो परमाणु रिएक्टरों को बंद करने का निर्णय स्थानीय विचार विमर्श के पश्चात लिया जायेगा। यह निर्णय प्लांट आपरेटर टेपको इलेक्ट्रिक पावर कंपनी ने (टेपको) अपने 66 वर्षीय अध्यक्ष शिमीजू के विकिरण के कारण बीमार पड़ने के बाद लिया। इस बीच संयंत्र के पास के समुद्र के जल में रेडियोधर्मी आयोडीन की मात्रा स्वीकृत सीमा से बढ़कर 4385 गुणा ज्यादा हो गई। वहीं आई.ए.ई.ए. ने अपनी रिपोर्ट में सुरक्षित रेडियोधर्मी सीमाओं का दायरा बढ़ाकर 40 किमी0 कर देने की सिफारिश की। ये सारी सूचनाएं 31 मार्च/1 अप्रैल के समाचार पत्रों के जापान विषयक समाचारों का हिस्सा है।

यहां पर कुछ तथ्य मेरी दिलचस्पी जगाते हैं। जापान सुनामी, भूकंप, ज्वालामुखी से अधिक पीड़ित हुआ या मानवकृत विकास के असुरक्षित संसाधनों से टेपको के अध्यक्ष के बीमार पड़ने के बाद संयंत्रों को बंद करने का निर्णय लिया गया। इस दुर्घटना के एक साल बाद जापान के फुकूशिमा प्रांत की स्थिति अर्थात वहां की उपज, जलवायु और मानवीय जीवन पर पड़ने वाला प्रभाव भी विकिरण के व्यापक प्रभावों के असर को व्याख्यायित करेगा। मेरे इसी विषय पर पिछले पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए एक मित्र ने लिखा है कि विकिरण से घबराने की जरूरत नहीं है। साधारण केला खाने से भी विकिरण हो सकता है। मित्र सही हो सकते हैं। यह विशेषज्ञों का क्षेत्र है और मैं विशेषज्ञ नहीं। किंतु मैं ”आम जन की” सुरक्षा को लेकर एक बार फिर यह कहना चाहूंगा कि उदाहरण आपके सामने है। आपने रेडियो विकिरण के विषय में हमारी चिंताओ को समझकर अपनी प्रतिक्रिया दी किंतु क्या इतने बड़े परमाणु हादसे के बाद भी ”रेडियो विकिरण” के शोर के बीच हमारे तंत्र ने आम जन को ”रेडियो विकिरण” के विषय में जागरूक करने की कोशिश की ? क्या आम भारतीय जन ”रेडियो विकिरण” के प्रभावों के विषय में पर्याप्त जानकार है ? क्या यह दुर्घटना ऐसा समय नहीं था कि आम जनता को परमाणु दुर्घटनाओं से उत्पन्न दुष्प्रभावों के विषय में सावधान किया जाता ? क्या चेर्नोबिल दुर्घटना के साक्षी रूस की तुलना में भौगोलिक रूप से जापान हमारे अधिक समीप नहीं है ?

जहां तक परमाणु ऊर्जा और विकास की बात है तो वह अध्याय माननीय संसद द्वारा स्वीकृति देने के बाद बंद हो चुका है। किंतु परमाणु ऊर्जा से उत्पन्न बिजली के महंगे उत्पादन का व्यय भी आम राजस्व से लिया जाए क्या इस पर बहस नहीं होनी चाहिए। क्या आम उपभोक्ता जरूरत की बिजली, सिंचाई और पर्यावरण की चिंता स्थानीय स्तर पर किए जाने की सोच पिछड़ापन है। क्या इसदेश में सभी पशु द्वारा चालित वाहन और उत्पादन एवं परिवहन के साधनों में पशुओं का प्रयोग बन्द हो गया है ? नहीं न। ऐसी कदापि नहीं हुआ है और विकास की तीव्र से तीव्र गति भी एक शताब्दी तक इसे समाप्त नहीं कर पायेगी। इसका अभिप्राय हुआ कि देश में बेटी के दहेज के लिए हेलिकाप्टर और 1-1 करोड़ रू0 भेंट देने वाले लोग हैं तो बेटियों के विवाह के लिए सरकारी सहायता पर निर्भर रहने वाले भी। 5-7 करोड़ की कारों की अग्रिम बुकिंग कराने वाले लोग हैं तो बेटी को सरकारी साइकिल प्राप्त कराने के लिए लम्बी लाइनें लगाने व सिफारिशें कराने वाले भी। अगर ऐसे लोगो के लिए बिजली स्थानीय स्तर पर गोबर गैस वायु ऊर्जा या अन्य साधनों से सस्ते दर पर उपलब्ध कराई जाए तो क्या बुराई है ? इससे परमाणु ऊर्जा से होने वाला विकास कहां प्रभावित होता है ? इसी तरह से स्थानीय नदियों एवं बड़ी नदियों को जोड़कर गांवो में तालाब और कुओं की संख्या बढ़ाकर आम आदमी के लिए सिंचाई और शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जा सके तो इसमें क्या बुरी बात है। शेर-चीते के विलुप्तीकरण की चिंता तो सारी दुनिया कर रही है क्योंकि उसमें व्यापार है, पैसा है और विलासिता भी। किंतु गांव की गौरेया और मैना के लुप्त होने की चिंता कौन करेगा ? आपको लगे मैं बहक गया हूं नहीं। मैं तो केवल विकास के मानको के मध्य यथासंभव संतुलन स्थापित करने की बात कर रहा हूँ।

अब मैं पुन: परमाणु रिएक्टरों की सुरक्षा संबंधी प्रश्न पर वापस लौटता हूं। हमारे एक मित्र ने कहा है कि भारत के परमाणु रिएक्टरों Passive automatic convection cooling mechanism का प्रयोग करते हैं जिसके लिए परमाणु रिएक्टर बंद होने की स्थिति में किसी जनरेटर की आवश्यकता नहीं होती। यह भी विशेषज्ञता का क्षेत्र है अत: विशेषज्ञों की राय का ही आदर किया जाना चाहिए। किंतु कतिपय प्रश्न आपके समक्ष अवश्य करना चाहूंगा :-

1- कुल कितने लाख करोड के परमाणु ठेके हुए हैं और इनमे पूर्ण पारदर्शिता बरती गई हैं

2- क्या कोई सक्षम संस्थान यह उत्तरदायित्व लेने को तैयार है कि इनमें किसी प्रकार की दलाली नहीं ली गई है।

3- क्या निर्माण आई.ए.र्इ्र.ए. अथवा भारत सरकार द्वारा तय अन्तर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप है।

4- और क्या परमाणु आपदा की स्थिति में हम तदनुरूप आपदा प्रबंधन मे सक्षम है ?

इन मुद्दों पर क्यों चर्चा नहीं होनी चाहिए। जहां तक आपदा प्रबंधन की कुशलता का प्रश्न है तो हम आत्म सम्मोहित लोग हैं अन्यथा लाटूर, टिहरी में आए भूकंपो को भूले नहीं होते जहां भारी मानवीय क्षति हुई थी। भुज के भूकंप में भी मानवीय क्षति कम नही हुई थी अपितु सराहना करनी चाहिए नरेन्द्र मोदी के विकास और पुननिर्माण की योग्यता की। एक और समाचार जो शायद हर सवेंदनशील व्यक्ति को भयभीत करेगा और वह यह कि ”हम विश्व के सबसे भ्रष्ट राष्ट्रो में नं0 चार पर है” अगर अभी हम न भूले हों तो याद होगा कि बिहार की बाढ़ में कुछ वर्ष पूर्व एक जिलाधिकारी अपने राहत कार्यों के लिए विश्व प्रसिध्द ”टाइम” पत्रिका के कवर पेज पर छपे थे और बाद में उसी बाढ़ राहत घोटाले में जेल गए। समस्या परमाणु ऊर्जा नहीं है अपितु झोल है आकण्ठ भ्रष्टाचार में डूबे हुए हम लोग जिनके लिए यह भ्रष्ट व्यवस्था समर्पित है। हम एक छोटे राष्ट्र नहीं है। हम हैं 121 करोड़ की भारी भरकम आबादी वाले विकासशील देश। जहां छोटी सी गलती भारी तबाही लाती है। यहां आज भी लोग भूख से मरते हैं। ऐसे में परमाणु सुरक्षा की चिंताए पारदर्शी नीति से ही कम की जा सकती हैं।

मैं समाप्ति से पूर्व एक विषय और विचारार्थ रखना चाहूंगा। उद्योगों में सुरक्षा के मानक किस आधार पर तय होने चाहिए ? आम मानवीय क्षति पर्यावरण को हानि, राजस्व का जनता के हित में लाभकारी नियोजन और राष्ट्रीय सुरक्षा। (इसमें स्थानीय लोककला, संस्कृति, एवं भाषा आदि की सुरक्षा को भी शामिल किया जाना चाहिए) को वरीयता मिलनी चाहिए अथवा उद्योगपतियों-पूंजीपतियों की जान एवं उनके लाभ की सुरक्षा को वरीयता दी जानी चाहिए। जापान के विषय में विचार करें तो टेपको कम्पनी ने अपने अध्यक्ष शिमीजू के विकिरण की चपेट में आने के बाद परमाणु संयंत्रो को ठिकाने लगाने का निर्णय लिया अन्यथा तमाम कर्मचारियों की जान जोखिम में डालकर भी रिएक्टरों को ठण्डा करने का प्रयास जारी था। साथ ही यह भी संज्ञान लेना होगा कि आई.ए.ई.ए. 2008 में ही इन परमाणु संयंत्रो के कालबाधित हो जाने और उन्हें बंद करने का परामर्श दे चुकी थी फिर भी उन्हें आम जापानी नागरिक एवं राष्ट्र के मूल्य पर चलाए रखने की अनुमति दी गई। यदि जापान जैसे राष्ट्र में यह संभव हो तो भारत में जहां रोज एक नया घोटाला खुलता है वहां क्या संभव नहीं। अत: परमाणु संयंत्रों के विषय में सुरक्षा चिंताओं को शायद हल्के में लेना ठीक नहीं।

दिनांक : 03 अप्रैल 2011
शिवेन्द्र कुमार मिश्र
बरेली।

जापान का रेडियोधर्मी विकिरण और हमारी परमाणु सुरक्षा चिंताए [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

……..इस बीच परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर सहित अन्य परमाणु वैज्ञानिक विभिन्न टी0वी0 चैनलों पर आकर जिस तरह अपने परमाणु ऊर्जा सयंत्रो की सुरक्षा को लेकर बयान दे रहे थे : वह आश्वस्त करने के बजाय भय अधिक पैदा कर रहे थे। वैसे भी ये सारे सरकारी लोग हैं और इनका काम सरकार की अपेक्षाओं को ही प्रसारित करना है न कि वास्तविक सुरक्षा चिंताओ को जनता के सामने रखना।…….

11 मार्च 2011 नि:सन्देह मानव सभ्यता के इतिहास में बेहद त्रासदी भरी तिथि के रूप में अंकित हो गई। प्रकृति के भीषण उत्पात भूकंप (9 मात्रक की तीव्रता वाला) तत्पश्चात् सुनामी विकिरण, ज्वालामुखी विस्फोट उसके बाद 18 मार्च तक निरन्तर आते रहे भूकंप के झटके मानो प्रकृति ‘जापान’ नामक राष्ट्र को उसके किसी अज्ञात कर्म का भीषण दण्ड दे रही हो। सारा विश्व जापान की घटनाओं से दहल उठा। सम्पूर्ण विश्व भय से कांपने लगा। इस भय का बड़ा कारण इस भीषण प्राकृतिक विपदा के पश्चात् ‘जापान’ के बिजली उत्पादक परमाणु ऊर्जा सयंत्रो का एक-एक करके ध्वस्त होते जाना और भारी मात्रा में ‘रेडियोधर्मी विकरण’ प्रसारित करना है। यह स्थिति अभी भी नियंत्रण से बाहर है। जहां एक ओर इस समय दु:ख, भय, पीड़ा की घड़ी में जापानी भाई-बन्धुओं को पहुंचने वाली सहायता में प्रकृति ने पुन: ”हिमपात” रूपी विपदा खड़ी कर दी है। वहीं जापान से प्रसारित होने वाला रेडियोधर्मी विकरण सम्पूर्ण विश्व के लिए गंभीर चुनौती एवं चिंता का विषय बन गया है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा नियामक इकाई(AIEA) के वैज्ञानिकों सहित अमेरिका तथा अन्य राष्ट्र भी जापान के परमाणु ऊर्जा विकरण को रोकने के लिए प्रयत्नशील हैं किंतु अभी तक कोई ठोस परिणाम सामने नही आए हैं। अब ”रेडियोधर्मी विकरण” का जिन्न जापान से बाहर निकलकर रूस के ब्लाडीवोस्टक एवं सखालिन द्वीप तक जा पहुंचा है। इसके फैलने के भय से रूस, अमेरिका, चीन सहित अनेक देशों को चिंता में डाल दिया है। अब तो तृतीय परमाणु ऊर्जा संयंत्र के ध्वस्त होने की घोषणा के साथ जापान सरकार ने परमाणु विकरण मामले में हाथ खड़े कर दिए हैं। 
जापान में आई सुनामी ने जिस तरह ‘जापान’ के विद्युत उत्पादक परमाणु ऊर्जा सयंत्रो को एक के बाद एक ध्वस्त करते हुए सम्पूर्ण जापान में रेडियोधर्मी विकिरण के फैलाव को जन्म दिया। वह वास्तव में परमाणु ऊर्जा के माध्यम से विकास की बैलगाड़ी को अंतरिक्षयान बनाने के स्वप्न को बड़ा धक्का है। जापान की इस घटना के बाद अमेरिका, फ्रांस, चीन, ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया सहित अन्य तमाम राष्ट्रों ने जो परमाणु ऊर्जा के माध्यम से बिजली उत्पादन कर रहे हैं : अपने परमाणु संयंत्रो की सुरक्षा व्यवस्था की पुर्नसमीक्षा प्रारम्भ कर दी है। तमाम राष्ट्रों ने फिलहाल परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को स्थगित भी कर दिया। हमारे प्रधानमंत्री ने अपने वक्तव्य में एक सधी हुई प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि परमाणु सयंत्रो की सुरक्षा की समीक्षा की जायेगी। इस सम्बन्ध में भारत सरकार की हुई एक बैठक के बाद आवश्यक निर्देश भी सरकार द्वारा जारी कर दिए गए। किंतु इस बीच परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर सहित अन्य परमाणु वैज्ञानिक विभिन्न टी0वी0 चैनलों पर आकर जिस तरह अपने परमाणु ऊर्जा सयंत्रो की सुरक्षा को लेकर बयान दे रहे थे : वह आश्वस्त करने के बजाय भय अधिक पैदा कर रहे थे। वैसे भी ये सारे सरकारी लोग हैं और इनका काम सरकार की अपेक्षाओं को ही प्रसारित करना है न कि वास्तविक सुरक्षा चिंताओ को जनता के सामने रखना। इनके बयानो को सारांश यह था :-
1- हमारे रिएक्टरों का डिजायन ज्यादा आधुनिक और सुरक्षित है।
2- इसे निरंतर बिजली देने वाले जनरेटर काफी ऊंचाई पर रखे गए हैं जहां तक सुनामी लहरें नही पहुंच सकती।
3- ये भूकंप जोन में नही हैं।
इस सम्बन्ध में यह जान लेना आवश्यक है कि इनमें से किसी भी वैज्ञानिक ने आंकड़ो के साथ उपरोक्त तथ्य टी0वी0 चैनलों पर नहीं रखें। उदाहरण के तौर पर निम्नलिखित तथ्य ध्यान देने योग्य हैं :-
1- भारत में लगभग 20 परमाणु ऊर्जा सयंत्र हैं। जिनमें कुछ कार्य कर रहे हैं व कुछ निर्माणाधीन हैं इलमें से किसी परमाणु ऊर्जा सयंत्र के निर्माण की तकनीक ”कुकीनाका” जापान से उच्च स्तर की है अथवा किसकी उससे पूर्व की। ऐसा कोई तथ्य सम्मानीय वैज्ञानिकों ने जनता के समक्ष नहीं रखा।
2- किस परमाणु ऊर्जा संयंत्र को लगातार बिजली उपलब्ध कराने वाले जनरेटर कितनी ऊंचाई पर रखे हैं। इसका आंकड़ा भी उपलब्ध नहीं है।
3- अभी तक आई सुनामी में प्राय: 40 से 50 फिट की ऊंचाई तक की समुद्री लहरें उठी हैं। किन्तु इनकी ऊंचाई भूकंप की तीव्रता व भूमि के अन्दर कितनी गहराई पर उसका केन्द्र है, इस पर निर्भर करता है। जापान में आए भूकंप की तीव्रता 8.9 मापी गई है हालांकि कुछ वैज्ञानिक केन्द्र इसे 7.6 भी कहते हैं और इसका केन्द्र (Epicentre) भू-गर्भ में 22.5 कि.मी. अन्दर था। ऐसी स्थिति में लहरों की ऊंचाई 35 से 40 फिट तक थी। यदि तीव्रता 9.5 और भू-गर्भ में केन्द्र 10 कि.मी. होता तो ? यानी की सुनामी लहरों की ऊँचाई कभी को 100 फिट या इससे ज्यादा भी हो सकती हैं। ऐसी स्थिति में बिना स्पष्ट तथ्यों के इस तरह की बातें करना ”आश्वस्त” करने के बजाय ”भय” ही ज्यादा पैदा करता है। एक बात और भी कहना चाहूंगा कि जनता के सामने उपरोक्त तथ्य रखते हुए हमारे वैज्ञानिक शायद इस तथ्य से हमारा ध्यान हटाना चाहते हैं कि ‘जापान’ 52 ऊर्जा उत्पादक परमाणु रिएक्टरों का इस्तेमाल करते हुए विश्व का तीसरे पाएदान का विकसित राष्ट्र है जबकि हम उससे कहीं पीछे खड़े, परमाणु ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में नए खिलाड़ी और विकासशील राष्ट्र हैं। एक दूसरा बड़ा अन्तर दोनो देशों की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय में जमीन-आसमान का अन्तर भी है।
4- हमारे कौन-कौन से परमाणु ऊर्जा सयंत्र किस-किस सीस्मिक जोन (भूकंप आने वाले संभावित संवेदनशील क्षेत्र) में हैं। यह तथ्य भी सम्मानीय वैज्ञानिकों ने नहीं बताए।
भारत के परमाणु ऊर्जा सयंत्रो की सुरक्षा को लेकर जन चिंताओ की कुछ वाजिब वजहें और भी हैं :-
1- परमाणु ऊर्जा सम्बन्धी गोपनीय कानून जिसके कारण यह पता लगाना मुश्किल काम है कि अन्दर क्या पक रहा है ?
2- 2004 में आई सुनामी और भुज के भूकंप का इन स्थानों के निकटवर्ती परमाणु ऊर्जा सयंत्रो पर क्रमश: मद्रास एटामिक पावर स्टेशन, कुंडकुलम पावर प्लांट पर क्या प्रभाव पड़ा ? इसकी कोई भी निष्पक्ष अध्ययन रिपोर्ट जनता के सामने नही आई।
3- पोखरण (राज0) जहां हमारे परमाणु परीक्षण किए जाते रहे हैं : उसके निकटवर्ती 50 कि.मी. तक के दायरे में परमाणु विकरण की क्या स्थिति है ? इस सम्बन्ध में भी कोई निष्पक्ष अध्ययन जनता के सामने नही हैं।
4- अमी 1984 भोपाल, यूनियन कार्बाइड जैसे लीक काण्ड में प्रभावित लोगो के प्रति हमारे तंत्र ने जो संवेदनशीलता और ऐसी घटनाओं से निपटने में आवश्यक तत्वरता दिखाई। वह एक प्रश्नचिहन खड़ा करता है।
5- अभी हाल में सी.वी.सी. की नियुक्ति राष्ट्रमण्डल खेल घोटाला, 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाला आदि घोटालों में जांच भी मा0 सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद हुई हो। हसन अली जैसे 96000 करोड़ के आयकर चोर और अपराधी को गिरफ्तार करने के लिए सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ा है। ऐसे में परमाणु ऊर्जा सयंत्रो के हजारों-लाखों करोड़ के निर्माण ठेकों मे दलाली नही ली गई होगी। इसका विश्वास करना दिन को रात मान लेने जैसा हैं
6- परमाणु ऊर्जा सयंत्रो के निर्माण, डिजायन आदि कितने आधुनिक और तय मानकों के आधार पर मजबूती से बनाए जा रहे हैं अथवा बनाये गये हैं। यह तो किसी जनहित याचिका के माध्यम से उच्चतम न्यायालय की सक्रियता से ही स्पष्ट हो सकता हैं।
विगत प्रस्तर में मैने जापान और भारत की प्रति व्यक्ति वार्षिक आय के बीच बहुत बड़े अन्तर का प्रश्न उठाया था। यह प्रश्न यहां इसलिए स्वाभाविक है क्योंकि हमारे देश के करोड़ो घरो में बिजली का एक बल्व भी जलना मुश्किल है। ऐसी स्थिति में परमाणु ऊर्जा किसका विकास कर रही है और किस कीमत पर ? निश्चित रूप से परमाणु ऊर्जा उद्योग धन्धो की गति तेज कर देगी किंतु इनका निर्माण व्यय आम जनता के राजस्व से व्यय किया जायेगा। तो क्यों न औद्योगिक उत्पादन में व्यय होने वाली ऊर्जा पर समस्त व्यय उद्योगो से लिया जाए क्योंकि अन्तत: तो वह लोग अपने उत्पादों के भारी मूल्यों से इसकी कीमत चुका ही लेंगे तो फिर जनता दोहरा भुगतान क्यों करे। आम जनता के घरेलू व्यय के लिए क्यों न ऊर्जा स्थानीय स्तर पर कुटीर उद्योगो की तर्ज पर उत्पन्न करने का विकल्प तलाश किया जाए। यहीं विकल्प सिंचाई, शुध्द जलापूर्ति और पर्यावरण संरक्षण को लेकर अपनाए जाने की आवश्यकता है।
शिवेन्द्र कुमार मिश्रा
बरेली।

लहरों के आने तक….. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

[जापान में भीषण भूकम्प और विनाशकारी सुनामी के बाद न्यूक्लीयर त्रासदी से जूझती मानवता …. अनसुलझे सवालों की अनवरत श्रंखला है…. वर्षों पूर्व मेरे चिन्तन में जो पृश्न घुमड़ रहे थे उसके फल्स्वरूप लहरों के आने तक कविता का स्रजन हुआ था …..] 
एक नयी खोज ने
सिद्ध कर दिया है
‘बालू’ के कणों’ से निर्मित
‘पिण्ड’ में भी
‘स्व-निर्माण प्रक्रिया’ जारी है

‘समुद्र तट’ पर बने ‘घरौंदों’ में
हो रहा है ‘घरौंदों’ का निर्माण
‘ज्वार भाटे’ की लहरों से बेखबर,
बस घरौंदे को ही …
‘दुनियाँ’ समझने में मगन
‘बालू के पिण्ड’
करते जा रहे हैं
‘असंख्य पिण्डों’ की सृष्टि
बालू कहां से आयी है
बालू कहाँ से आयेगी … ?
जारी है तमाशा
बस ….
‘तूफानी लहरों’ के आने तक

खोज अभी तक जारी है
उस ‘द्रव्य’ की
जो कर देता है आरम्भ…
‘स्वनिर्माण प्रकिया’ को
खोज अभी तक जारी है
उस ‘द्रव्य’ की
जो कर देता है बन्द
इसी प्रकिया को

जापान में भूकम्प और सुनामी: एक त्रासदी अथवा मानवीय सभ्यता के भयंकर अंत की पूर्वदस्तक एवं चेतावनी [आलेख] – शिवेंद्र कुमार मिश्र

[सुनामी का अर्थ, जापान में इतने भूकंप क्यों आते है कब-कब कहॉ-कहॉ भूकम्प आये और जान-माल का कितना नुकसान हुआ यह सब और कही ज्यादा आप तमाम सूचना माध्यमों और दिखाए गए ग्राफिक्स आदि से आप समझ चुके हैं। अत: मै आपको बोर नही करुंगा लेकिन कुछ ऐसी वातें अवश्य कहूंगा जो आपको अटपटी लग सकती है किंतु उन्हें आपके ध्यान की अपेक्षा है। इससे पहले एक खबर शायद आना चाहें।] 
11 मार्च-2011  मानवीय इतिहास की त्रासदी का भीषणतम् तिथियों में से एक तिथि के रुप में अंकित हो गई। इस दिन विश्व के मानचित्र पर विकसित देशों की कतार में नं दो या तीन पर खडे उगते सूर्य के देश के नाम से प्रसिध्द जापान पर द्वितीय विश्व युध्द के पश्चात से सबसे भीषण त्रासदी का दिन था। जापान के स्थानीय समयानुसार राजधानी टोक्यों से 380 कि.मी. उत्तर पूर्व में तड़के दो बजकर 46 मिनट भारतीय समयानुसार सुबह- 6.15 पर आए भयावह भूकंप के झटकों ने मानव जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। (सूचना स्त्रोत दैनिक जागरण 12 मार्च 2011)

    लगभग 9 प्वाइण्ट रिचर स्केल की तीव्रता वाले भूकम्प और उसके पश्चात आई सुनामी की लगभग 13 से 30 फिट ऊंची लहरों ने मानव पर विपदा के वह दृश्य उपस्थित किये है जो भारत-चीन युध्द के पश्चात जन्म लेने वाली पीढी ने तो शायद आज तक महसूस ही नही किये होगें अपितु द्वितीय विश्व युध्द के पश्चात से आजतक ऐसी त्रासदी शायद ही अनुभव की गई हो। भय-आतंक विनाश के दृश्य आपने अपने टी.वी. पटल अथवा इण्टरनेट द्वारा अवश्य देखें होगें। मृतकों के आंकडे आज तक 20000 के आस-पास पहॅच गए है। सम्पति के विनाश के प्राथमिक आंकडे लगभग 100 अरब डालर के आस-पास के हैं। जापान के तीन परमाणु रिएक्टरों में विस्फोट हो चुका है। रेडियो धर्मी पदार्थ का रिसाव होने के संकेत है। इसी बीच शीघ्र ही 7.3 से अधिक तीव्रता वाले भूकंप और पुन: सुनामी आने के वैज्ञानिक कयास भी सामने आये हैं। इससे कहीं अधिक तमाम जानकारी आप समाचार पत्र, टी.वी. और इण्टरनेट के माध्यम से प्राप्त कर चुके होगे अत: उनकी पुनरावृत्ति कर मै आपको पकाना नही चाहूंगा। अस्तु! 

    सुनामी का अर्थ, जापान में इतने भूकंप क्यों आते है कब-कब कहॉ-कहॉ भूकम्प आये और जान-माल का कितना नुकसान हुआ यह सब और कही ज्यादा आप तमाम सूचना माध्यमों और दिखाए गए ग्राफिक्स आदि से आप समझ चुके हैं। अत: मै आपको बोर नही करुंगा लेकिन कुछ ऐसी वातें अवश्य कहूंगा जो आपको अटपटी लग सकती है किंतु उन्हें आपके ध्यान की अपेक्षा है। इससे पहले एक खबर शायद आप देखना चाहें।

 भूकंप जापान में,कलेजे कॉप रहे संभल में   [15 मार्च हिन्दुस्तान-आशीष त्रिपाठी मुरादाबाद]
    इस र्शीषक से प्रकाशित स्थानीय समाचार जापान में व्यापार करने वाले व्यापारियों से संबधित हैं। इसमें स्थानीय जापान में व्यापार करने वाले व्यापारी के माध्यम से प्रकाशित समाचार की यह पंक्तियॉ ध्यान देने योग्य है।-

‘जापान में कोरिया जैसे छोटे मुल्क तक से मदद की 5 फ्लाइट आ चुकी हैं पर इंडिया से अब तक कोई राहत नही आई।


त्रासदी के पीछे के कारणों की खोज में-

”आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:”
    अर्थात (भद्रक्रतव:) कल्याण करने वाली बुध्दियां (विश्वत:) सभी ओर से (न:) हमारे पास (आ यन्तु) आवे अर्थात ज्ञान की उत्तम धाराए हमें प्राप्त हों।” यह एक वैदिक मंत्र है। इसका उल्लेख मैने यह कहने के लिए किया है कि सभ्यताएं अथवा मानव समूहों ने जब भी अदृश्यके चितंन को आदर्श माना है तो उनका विकास नैतिक सांस्कृतिक एव उच्च मूल्यों वाले समाज के रुप में हुआ जिसे एक संस्कृति के रुप मे अभिहित किया गया। दूसरी ओर वह मानव समूह भी है जिन्होंने विकास निरन्तर सुधरती हुई तकनीक और उसके सापेक्ष निरन्तर आने वाले परिवर्तनों को स्वीकार किया है। तकनीक का सतत परिवर्तन और तत्सापेक्ष विकास, डार्विनवादी विकास प्रक्रिया का माडल है। इस प्रक्रिया में मानवीय सृष्टि व विकास निरन्तर प्राकृतिक तकनीकी के परिमार्जन या उसमें आने वाले बदलाव का नतीजा है जबकि वैदिक संस्कृति अद्रश्य शक्तियों विषयक, चितंन सापेक्ष दृष्टिकोण के कारण मानवीय अथवा सृष्टि के विकास को नियंता का लीला-विलास अथवा कर्मप्रधान मूल्य सापेक्ष सृष्टि के विकास की वात करता है। उपरोक्त मंत्र इसी प्रकार की प्रार्थना है और इसके मूल में- 

”एकोऽहं बहुस्याम, प्रजायेय”

    अर्थात मै अकेला हॅ, बहुत हो जाऊं, प्रजाओं की सृष्टि करु।’ यह ईश्वरीय संकल्प निहित है। भारतीय परम्परा में उल्लिखित अनेकानेक देवासुर संग्रामों के अन्तर में ऐसे ही कारणों को चिह्नित किया जा सकता है।

    डार्विनवादी विकासवादी माडल को मानने वाले निरन्तर तकनीकी परिमार्जन को विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया मानते है और वे प्रकृति के रहस्यों के निरन्तर भेदन में विश्वास करते हैं और तकनीकी विकास की गति को तेज करते है। आधुनिक विकास इसी माडल की देन है। जो तकनीकी विकास की गति को तीव्र रखने के क्रम में प्रकृति के विरोध में जाकर खडा हो जाता है। वैदिक विचारधारा में असुर एवं राक्षस परंपरा को विकास के इस क्रम के साथ खडा कर सकते है अपितु दोनों के मध्य एक मूल अंतर है। किन्तु उसकी चर्चा यहॉ प्रासंगिक नही है।

    इस चर्चा से ऐसा स्वीकार कर लेना मूर्खता होगी कि प्रथम प्रकार के अथवा वैदिक अवधारणा के मानव समूह तकनीकी विकास को महत्व नही देते है। अपितु यह वर्ग तकनीकी विकास को ईश्वरीय वरदान मानता है और इसी कारण प्रक्रति के विरुध्द न जाकर उसके साहचर्य एवं सहवास में प्रसाद स्वरुप तकनीकी का विकास करता है। उदाहरणार्थ ऋषियों ने भी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में असुरों और राक्षसों से उच्चतर स्तर की खोजें की। इस प्रकार विकास का डार्विनवादी माडल निरन्तर तकनीकी विकास की श्रेष्ठता के दंभ को बनायें रखने के क्रम में प्रकृति पर श्रेष्ठता स्थापित करने का प्रयास करता है। इससे प्राकृतिक असंतुलन जन्म ले रहा है। उसको नियंत्रित करने के क्रम में प्राकृतिक उत्पात के साथ मानवीय तकनीक भी नष्ट भ्रष्ट होकर उत्पात मचाना प्रारम्भ कर देती है जैसे परमाणु उर्जा संयत्रों से रेडियोधर्मी पदार्थो का रिसाव। निश्चित ही यह अथवा इस प्रकार की तकनीकी भूलें मानवीय जीवन पर तो भारी पडेंगी ही अपितु प्रकृति ने स्वयं को संतुलित करने के लिए जो विनाश लीला रची है। उसे भी व्यर्थ कर देगी । अर्थात इस विनाश के बाद भी प्रकृति अधिक समय तक संतुलित रह पाए मुश्किल है। 

    मानवीय विकास का डार्विनवादी माडल जो बंदर से मानव को विकसित मानती है और एक कोशकीय जीव से सृष्टि का विकास मानता हैं। दरअसल उसने सम्पूर्ण विकास का तकनीकी और मात्र तकनीकी तथा प्रौद्योगिकी के निर्मम हाथों का खिलौना बना दिया है। जिसमें जिसके हाथ में डुगडुगी यानी तकनीक एवं प्रौद्योगिकी है वह मदारी एंव शेष बंदर । यह मदारी आए दिन अपने दंभ का शिकार होकर प्रकृति को पददलित करके अपने ही विनाश के बीज वो रहा हैं क्या यह चेतावनी है अथवा हमें भी पुराण पुरुष मनु की तरह पछताना पडेगा।

शिवेन्द्र कुमार मिश्र
बरेली