दीपावली शौर्य पर्व है ! [आलेख ] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

मित्रों, दीपावली मंगलमय हो। भारतीय हिन्दू परम्परा में पर्व अपने पूर्वजों की महान परम्पराओं को स्मरण करने ए वं उनका यशोगान करने का अवसर देते हैं। संभवत: ऐसा सभी महान संस्कृतियों में होता है। मैं भी इस पर्व पर आपसे कुछ विचार सहभाग करना चाह रहा हूँ।

आपको याद होग जब हमने बचपन में दीपावली पर निबन्ध याद किए होंगे तो हमने रटा होगा कि दीवाली मुख्यत: वैश्य वर्ग का त्यौहार है इस दिन वह अपने खातों की पूजा करते हैं और नए खातों का श्री गणेश करते हैं। यह भी पढ़ा होगा कि इस दिन श्रीराम लंका युद्ध जीतकर अयोध्या वापस आए थे और उनके स्वागत में अयोध्या को दीप-मालिकाओं से अलंकृत किया गया था। इसी के स्मरण में दीपावली मनार्इ जाती है।

दीपावली से कुछ दिन पूर्व हमने रामलीलाओं का मंचन देखा। दशहरा या विजयादशमी मनार्इ। शस्त्र पूजन किया। उससे कुछ दिन पूर्व श्राद्ध पक्ष मनाया। एक पक्ष तक अपने पूर्वजों को स्मरण किया। ब्राहम्णी कर्मकाण्ड किए और अन्तत: आज कार्तिक मास कृष्णपक्ष अमावस विक्रमी सम्वत 2068 तदनुसार 26 अक्टूबर 2011 को आज हम दीपावली मना रहे हैं। वस्तुत: इन सभी पर्वों को एक गुच्छ के रू प में देखा जाना चाहिए।

रामकथा के अनेक आधुनिक विचारक ए वं लेखक इस बात पर ए कमत हैं कि यदि सीता का अपहरण न भी होता तो भी युद्ध अवश्यंभावी था। वस्तुत: यह एक सांस्कृतिक ए वं राजनीतिक आक्रमण का प्रतिकार था। विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा में राक्षसों का विध्वंस, विराध आदि का वध अत्रि मुनि के आश्रम में अत्रि द्वारा राम को इन्द्र का संदेश देना ए वं अस्त्र – शास्त्रादि सौंपना, तत्पश्चात अगिन में प्रवेश कर स्वर्गारोहण करना पुन: महर्षि अगस्त द्वारा भी राम को दिव्यास्त्र सौंपना आदि विभिन्न घटनाओं को ए कसूत्र में रखकर विद्वानों का यह निष्कर्ष कि राम-रावण युद्ध अवश्यंभावी था और सीता के अपहरण आदि ने उसको निकट ला दिया। इस तथ्य की उपेक्षा नही की जानी चाहिए।

किसी भी महान युद्ध से पूर्व सेनाएं प्राय: युद्ध की रणनीतियां बनाती हैं। इस क्रम में पूर्व में हुए ऐसे युद्धो की चर्चा करके रणनीति ए वं उस समय के सेनापतियों द्वारा किए गए कार्यो की चर्चा भी होती है। सेना की प्रत्येक टुकड़ी के ऐसे नायकों का शौर्यगान उस टुकड़ी में युद्धोत्साह का संचार करती है और सैनिकों को अपने नायकों की भांति पराक्रम करने की प्रेरणा देती है। संभवत: पितृपक्ष वही युद्ध के तत्काल पूर्व की रणनीतिक तैयारी का समय है। जब हम किसी भी युद्ध के अनितम और निर्णायक चरण में होते हैं तो एक बार पुन: अपने सर्वाधिक विध्वंसक और घातक अस्त्र शस्त्रों का परीक्षण करते हैं। यह शस्त्र पूजन है और इसके तत्काल बाद ही हम विजयलाभ करते हैं अर्थात निर्णायक विजय यानी कि विजयादशमी।

अब तो राष्ट्र ने एक निर्णायक युद्ध जीता है। संस्कृति के द्वार पर जो जीवन मरण का प्रश्न था। उसमें पूर्ण विजय हुर्इ है। तो विजेताओं का, शूरवीर नायकों का स्वागत तो हर्षोल्लास के साथ होना ही चाहिए और विजेताओं का स्वागत दीपमालिकाएं जलाकर मिष्ठान खिलाकर और विजेता होने का उत्साह संचारित करने वाले शोरगुल पटाखों अथवा आग्नेय अस्त्रों की भीषण आवाज से ही आज भी किया जाता है। तो फिर तो दीपावली ही मनानी पड़ेगी न। और हाँ। युद्ध के बाद शानित की आवश्यकता है। कृषि उधोग धंधो, सांस्कृतिक कार्यों का विस्तार होगा तो वैभव तो बढ़ेगा ही। तो गणेश ए वं लक्ष्मी पूजन का भी औचित्य बनता ही है किंतु भूलिए मत। विकास, धन, वैभव ए वं शानित की अक्षुण्णता सदैव युद्धाश्रयी है। अत: जीवन संघर्ष भूमि है। य हां स्थायी युद्ध विराम कभी नहीं होता। अत: दीपावली के बाद भी माघ शुक्ल पक्ष शौर्य की नवदेवियों का पूजन अर्थात नवदुर्गा होती है। स्मरण रखिए! हम हिन्दू सदैव से शौर्यप्रेमी रहे हैं। अभी विजयादशमी से पूर्व भी हमने मार्घशीर्ष क्वार माह नवदुर्गाओं का पूजन किया है। तो मित्रों दीपावली विजेताओं के स्वागत का पर्व है शौर्य दिवस है तो आइए ! शौर्य दिवस का स्वागत करें।
©तृषा’कान्त’

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