राम मिथ या इतिहास…भाग – 9 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र


राम मिथ या इतिहास आलेखमाला    की अद्यतन कड़ियां प्रत्येक बुधवार को प्रात: 08:30 प्रकाशित होती हैं।  – तृषाकान्त 
(09)  रावण का प्रेतकर्म

(अब तक श्रृंखला के इस  भाग के अन्तर्गत हमने इस शव निस्तारण पद्धति अथवा मृतकर्म संस्कार को काल निर्धारण हेतु विचार किया। मृतक के शव के साथ – साथ पशु अंगो को दफन किए जाने के आधार पर आगे बढ़ते हुए हमने रामायण के राक्षसों की कर्मभूमि ’’दण्डकारण्य’’ की पहचान स्थापित की। साथ ही ’’राक्षसों’’ को भी चिहिन्त करने का काम किया। अब आगे पढ़े) –
’’दण्डकारण्य’’ ही राक्षसों की वह कर्म भूमि है जहां से हम अपनी खोज यात्रा आगे बढ़ाते हैं। (दण्डकारण्य के विषय में अधिक जानने के लिए पढ़े – आदिवासी बस्तर का वृहद इतिहास – रामायण का पुरातत्व द्वारा डा0 हीरालाल शुक्ल) यद्यपि राक्षसों के विषय में डॉ0 बुल्के के मत से हम परिचित हो चुके हैं किंतु डा0 शुक्ल ने इस विषय पर विस्तृत साक्ष्यों सहित प्रकाश डाला है। डा0 शुक्ल गोंडो को ’’राक्षस’’ सिद्ध करने के सिद्धान्त का खण्डन करते हैं और रामायणकालीन लंका को गोदावरी के डेल्टे (आन्ध्रप्रदेश) में सिद्ध करने के उपरान्त  राक्षसों के संबंध में अपना मत इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं – ’’राक्षस’’ मध्यवर्ती द्रविण परिवार के मूल पुरूष रहे होंगे। ’’प्राक मध्यवर्ती द्रविण’’ जन या आन्ध्रजन को रामायण का राक्षस माना जा सकता है। श्री शुक्ल ऐसा संकेत देते हैं कि – ’’सातवाहन नृपति क्या राक्षवसंश प्रसूत थे ? (विस्तार से पढे़ ’’रामायण का पुरातत्व’’)
राक्षस गोंड आदिवासी हो अथवा ऐतरेय ब्राहम्ण और पुराणों के ’’आन्ध्र’’। किंतु यह स्वीकृत तथ्य है कि दण्डकारण्य क्षेत्र में इनका आव्रजन मार्ग दक्षिण ही रहा है। यही संकेत रामायण भी देती है। यहां पर यह स्पष्ट करना भी प्रासंगिक है कि गोंड आदिवासियों अथवा आन्ध्रों में से जिसे भी राक्षस माना जाए उनकी राजवंशीय परम्परा के सूत्र आगे भी प्राप्त होते हैं जैसे आंध्रवंश के सातवाहन नरेश एवं गोंडो में 15130 से 15410 तक गढ़ा मण्डला का राजवंश संग्रामशाहि (हीरलाल शुक्ल – पूर्वोक्त)
गोदावरी नदी के घाटी क्षेत्र की पुरातात्विक खोज:- कर्नाटक के नरिसंहपुरा के कावेरी बेसिन के उत्खनन से शवगृहों में जो सामग्री प्राप्त हुई है, उसके विषय में यह उल्लेख दृष्टव्य है – Upper Kaberi Basin has established …….. a date claming from the part of the first half of the second millennium B.C. ……… The systematic ground excavation compressing trivial ground remnants, potteries, graffiti, stone implements, metal objects, leads and bangles, animal remains human scenes wood remains etc”. (An Authoritative report on the excavations at T. Narsipur “by prof. M. Seshdre Director of Archeology of mysore publishers of in 1971 provides a detailed insight into the Ancient pre-historic cebilization learnings Ancient pre-historic cerrlization learnings of T. Narsipura and its surroundings)
यदि हम इन तथ्यों का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि गोदावरी, कावेरी बेसिन के पुरातात्विक शवगृहों से धातु, पत्थर, लकड़ी के औजार, मनके, मानव एवं पशु अंश प्राप्त हुए हैं। ये तथ्य रामायण एवं गृहसूत्रों में शव को समर्पित वस्तुओं से मेल खाती है। नरसिंहपुरा के उत्खन्न से प्राप्त पूर्ववत अवशेषों का समय First half of second millennium B.C. प्रो0 शेषाद्री द्वारा माना गया है। यहां यह स्पष्ट कर दूं कि रावण ’’राक्षसाधिपतिः’’ अवश्य है किंतु वह स्वंय राक्षस हैं ऐसा रामायण पुष्टं नहीं करती। संभव है राजा होने के कारण रावण ने अपनी मूल परम्पराओं के साथ प्रजाजन की परम्पराएं भी स्वीकार करके एक मिश्रित परम्परा अपना ली हो।
उपरोक्त साक्ष्यों के आधार पर निर्विवाद रूप से मात्र यह स्वीकार किया जाना चाहिए कि कावेरी, गोदावरी वेसिन का यह क्षेत्र दीर्घकालीन अतीत से मानवीय सभ्यताओं के विकास के अनुकूल रहा है।
यद्यपि जो साक्ष्य अपनी सीमाओं के अन्तर्गत मैं खोज पाया हूं उनके आधार पर स्पष्टतया किसी तिथ की ओर इंग्ति करना असंभव है साथ यह कहना भी असंभव है कि ’’रावण – प्रेतकर्म’’ शीर्षक मैं जिस तरह की ’’शव सामग्री’’ की साक्ष्य के रूप में अपेक्षा है, ऐसा विशिष्ट प्रकृति की ’’शव सामग्री’’ किस स्थान विशेष से प्राप्त हुई है। किंतु प्रस्तुत साक्ष्य आश्वलायन गृह सूत्र एवं रामायण के आधार वाली ’’शव सामग्री’’ के प्राप्त होने की घोषणा तो करते ही हैं। फिर भी प्रो0 शेषाद्री द्वारा निर्धारित समय अति दूरस्थ है।
यहां पर एक तथ्य और उद्धृत करना समीचीन होगा कि ’’अश्व’’ श्रृंखला के साक्ष्य 10000 बी0सी0 पुराने घटनाक्रम का उल्लेख करते हैं। भारत में Hunting Gathering Age हम 100000 से 10000 बी0सी0 पुरानी मानी जाती है। इस युग को तीन चरणों में बांटा जाता है प्रथम चरण – 100000 बी0सी0, द्वितीय चरण – 100000 से 40000 बी0सी, तृतीय चरण 40000 से 10000 बी0सी0। कृष्णा गोदावरी बेसिन के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, मिर्जापुर, वाराणसी, जौनपुर में ऐसी 200 से भी अधिक पुरातात्विक साइट्स पायी गयी हैं जो यह सिद्ध करती हैं कि गंगा घाटी के इस क्षेत्र में 8000 से 90000पू0 में मानवीय गतिविधियां अत्यन्त तीव्र हो गयी थीं।
अतः प्रथम दृष्टया यह स्वीकार किये जाने में कोई आपत्ति नही होनी चाहिए कि राम एवं उनके समकक्षों के लिए एक समयावधि कम से कम 8000 से 90000पू0 रखी जा सकती है।
(अनवरत)

 ©तृषा’कान्त’

राम मिथ या इतिहास…भाग – 8 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

.हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें।  आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए  अग्रिम आभार – तृषाकान्त
 (8)  रावण का प्रेतकर्म – (दण्डकारण्य एवं राक्षस)
विगत 5 से क्रमांक 7 तक के अंको के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंच सकते हैं कि मानवीय विकास के इतिहास के प्रारम्भिक काल के कतिपय ऐसे साक्ष्य हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि उस कालखण्ड में मानव शवग्रहों में मानव शवों के मृत पशुओं अथवा उनके अंगो को भी दफन किया जाता था। विद्वानों का ऐसा मानना है कि ऐसा संभवतः धार्मिक कारणों से होता रहा होगा। आश्वलयन गृहसूत्र और रामायण के उदाहरणों से इसकी पुष्टि की जा सकती है। ऐसे शवगृह Shanidarईराक, Kebra इजरायल और Krapenia क्रोशिया में पाए गए हैं। इसके सबसे पुराने प्रमाण Skhulcave at Qatzeh इजराइल में खोजे गए हैं जो 1,30,000  (एक लाख तीस हजार) वर्ष पुराने माने जाते हैं।
      क्या रामायण के सन्दर्भ में ऐसे प्रमाण खोजे जा सकते हैं। रामायण में राक्षस संस्कृति के अनुयायिओं के साथ ऐसी संभावना बनती है कि उनके ’’शवों के साथ’’ पशु अंश दफनाए जाते हों। विराध के उदाहरण से राक्षसों के शवों का दफनाया जाना तो प्रमाणित है ही। रावण की चिता का उदाहरण शव के साथ पशु चर्म अथवा अंग और कतिपय यंत्रो को शव को समर्पित करने का उदाहरण है। दोनो उदाहरणों को साथ रखकर देखें तो इस बात का निषेध जरा कठिन है कि कतिपय राक्षस अपने शवों के साथ मृत पशु या उसके अंग और शव के उपयोग की सामग्री न दफन करते हों।
      अतः भारत वर्ष के उस भाग में जिससे रामायण कालीन राक्षसों का संबंध रहा हो ऐसे शवगृहों की खोज की जानी चाहिए। रामायण में ऐसे दो स्थान चिन्हित किए जा सकते हैं
1-   दण्डकारण्य     2-    लंका।
इन स्थानों में ’’दण्डकारण्य’’ का सीमांकन विद्वानों में लगभग असंदिग्ध है जबकि लंकाको चिन्हित किए जाने पर विद्वान एकमत नही है। अतः प्रथमतः हम दण्डकारण्य की भौगोलिक सीमाओं का निर्धारण करते हैं ताकि ऐसे शवगृहों की खोज कर उनका समय जाना जा सके।
दण्डकारण्य का भूगोल
रामायण में ’’दण्डकारण्य’’ का सर्वप्रथम परिचय हम आरण्यकाण्ड के प्रथम श्लोक में पाते हैं –
प्रविश्य तु महाराण्यं दण्डकारण्यमात्मवान।।
वन कैसा है: इसकी वीभत्सता और दण्डकारण्य के भौगोलिक विस्तार को आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझने के बाद हमें इस रामायण कालीन दण्डकारण्य एवं वर्तमान बस्तर’ (छत्तीसगढ़) एवं आन्ध्रा, उड़ीसा, महाराष्ट्र तक विस्तृत सीमाओं वाले इस क्षेत्र के वर्तमान आदिवासी निवासियों, एवं उनकी संस्कृति एवं परम्पराओं आदि का विश्लेषण करना होगा।
      रामायण के अनुसार यह वन अत्यन्त घना है। इतना सघन कि काले मेघ के समान दिखाई देता है। वन्य पशुओं के अतिरिक्त नरभक्षी राक्षसों का इस क्षेत्र में साम्राज्य है। इस दण्डकारण्य को आधुनिक विद्वानों ने चिह्नांकित किया है।
Wickipedia encyclopedia – Dandakarnaya is specritually significant region in india. It is roughly equivalent to the Baster District in the central east past of India. It covers about 35600 square miles (92,000 kms) of land which includes the “Abajhmar” hills in the west and the eastern ghat in the east. including parts of the Chattisgarh, Orissa, Maharastra and Andhrapradesh states. It spans 200 miles (320km) from north to south and about 300 miles (480km) from east to west.
Fro – Dandakaranya – Wikipedia ……. encyclopedia.
en.wikipedia.org/wiki/dandakranya.

’’आमचो बस्तर’’ – श्री राजीव रंजन प्रसाद: श्री प्रसाद के इस औपन्यासिक वर्णन से पाठकों को ’’दण्डकारण्य’’ को समझने में सुविधा होगी – ’’बस्तर के भूगोल को नजरदांज नही किया जा सकता। चूंकि, यह केरल राज्य से भी बड़े भू मात्र का परिचय है। यहां कि मनोरम हरित वसना धरती पहाड़ों, पठारों और मैदानों में विभाजित है। उड़ीसा, महाराष्ट्र और आन्ध्रप्रदेश से घिरे इस वनांचल को मिलता है। पठार अपने विस्तार में दक्षिण की ओर गोदावरी के मैदानों से जा मिलता है तो पूर्व में इन्द्रावती नदी के मैदान हैं। लगभग दक्षिण में बैलाडिला की पहाड़ियों ने बस्तर को सजाया है। तो उत्तर-पश्चिम् में ’’अबूझमाड़’’ की पहाड़ियां सदियों से रहस्यमय रही हैं। दंतेवाड़ा की तराइयों, बीजापुर की ऊँचाइयों और केशकाल घाटी की खाइयों ने बस्तर की विविधता, विचित्रता और उन्मुक्ता दी है। तो रहस्य और रोमांच भी।’’ (आमचो बस्तर – रा0रं0 प्रसाद पृष्ठ-31) श्री प्रसाद बचेली (दंतेवाड़ा) छत्तीसगढ़ दक्षिण बस्तर के निवासी हैं और उन्हें लब्धख्यात आंचलिक उपन्यासकारों की श्रेणी में रखा जा सकता है। श्री प्रसाद के अनुसार बस्तर (दण्डकारण्य) के विस्तार को प्राकृतिक दृष्टि से छः भागों में बांटा जा सकता है
(अ) उत्तर का निम्न मैदान भाग – इसका विसतार उत्तर वस्तर, परलकेट, प्रतापपुर, कोटालीबेड़ा और अंतागढ़ तक है।
(ब) केशकाल – यह घाटी तेलिन सती घाटी से प्रारम्भ होकर जगदलपुर के दक्षिण में स्थित तुलसी डोंगरी तक लगभग 160 वर्गमील क्षेत्र में विस्तृत है।  
स- अबूझमाढ़ – यह क्षेत्र वस्तर के मध्य स्थित है। यहां कच्चे लोहे के विशाल भण्डार हैं।
द- उत्तरपूर्वी पठार – यह पठार कोडागांव और जगदलपुर में फैला है।
ई- दक्षिण का पहाड़ी क्षेत्र – इसके अंतर्गत दंतेवाड़ा, बीजापुर, व कोंटा के उत्तरी क्षेत्र आते हैं।
फ- दक्षिणी निम्न भूमि – इसके अंतर्गत कोंटा क्षेत्र का सम्पूर्ण भाग तथा बीजापुर क्षेत्र का दक्षिणी भाग आता है।
मैं समझता हूं कि ’’दण्डकारण्य’’ की ऐतिहासिक भूमि का भूगोल समझने में सुधी पाठकों को सहायता मिलेगी।
3 अप्रैल 2012 हिन्दी समाचार पत्र (अमर उजाला काम्पैक्ट) के समाचार इस पूर्वोक्त ’’दण्डकारण्य’’ का एक भाग ’’अंबूझमाड़’’ के सघन वन प्रदेश में स्वतंत्रता के पश्चात पहली बार पुलिस ने प्रवेश किया है और कुछ नक्सलियों को पकड़ा है। बस्तर दंतेवाड़ा अबूझमाड़ आदि आज भी नक्सली शस्त्र धारकों को भीषण हिंसा के शिकार हैं तो राम के समय में दण्डकरण्य की वाल्मीकि वर्णित भयावहता को पाठक समझ सकते हैं।
      इस तरह सम्पूर्ण वर्तमान बस्तर तथा आस-पास के कुछ क्षेत्र प्राचीन बस्तर या दण्डाकरण्य कहे जा सकते हैं। (आमचो बस्तर – रा0रं0 प्रसाद पृष्ठ – 48)
रामायण के राक्षस:- डा0 फादर कामिल बुल्के अपने शोध प्रबन्ध में रामायण के राक्षसों पर अपना मत प्रस्तुत करते हैं – ’’रायपुर जिले में रहने वाले गोंड़ अपने को रावण का वशंज मानते हैं। (पी0डेहों: रेलिजन एण्ड कस्टमस् ऑव दिन उराओंस, मैग्बयार्स ऑव दि एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल मात्र पृ0 16) उराँव भी मानते हैं कि रावण से उनकी जाति की उत्पत्ति हुई है और इसीलिए उनको उराँव नाम मिला (पूर्वोक्त) (बुल्के रामकथा – पृ0 92 – उपरोक्त स्त्रोत भी साक्ष्य हेतु श्री बुल्के ने ही उल्लिखित किए हैं)                                           (अनवरत्)

नोट:- अगले अंक में हम इतिहासकारों के अनुसार दण्डकारण्य की पहचान करेंगे एवं तत्पश्चात् ही इस क्षेत्र में ईराक, क्रोशिया और ईजराइल की भांति ऐतिहासिक अथवा प्राग्ऐतिहासिक शव गृहों की खोज कर काल निर्धारण का प्रयास करेंगे।
©तृषा’कान्त’

राम मिथ या इतिहास…भाग – 7 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें।  आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

( 7 )  रावण का प्रेतकर्म   – जादू टोना


     रावण के प्रेत कर्म और मृतक के अन्तिम् क्रिया कर्म से संबंधित आश्वलायन गृहसूत्र में उल्लिखित पद्धति को ध्यान से पढ़े तो ऐसा लगता है कि किसी आदिम युगीन परम्परा के अवशेष हैं। संभव है कि धरती के किसी भाग पर ऐसी अथवा इससे मिलती जुलती शव निस्तारण संबंधी क्रूर परम्पराएं आज भी प्रचलित हों।
            ख्याति प्राप्त अन्तर्राष्ट्रीय यात्री एवं नोबुल पुरस्कार विजेता लेखक श्री बी0एस0 नायपॉल अपनी पुस्तक ’’द मॉस्क आफ अफ्रीका’’ (हिन्दी अनुवाद श्री नवेद अकबर – पेंगुइन प्रकाशन) के पृष्ठ 10 पर युंगाडा के धार्मिक/प्रशासनिक राजा कबाकाके अन्तिम् संस्कार का उल्लेख करते हैं – ’’कबाका मरते नहीं थे, गायब हो जाते थे। ……………..।’’ कबाका की तद्फीन सीधी सादी नही होती थी। इसमें बहुत से कार्य होते थे जो सुदूर अतीत से आए थे। ’(सुदूर क्योंकि जिन लोगों के पास लेखन या किताबें न हों वो अपने दादा, परदादा से आगे की चीजों को याद नहीं रख सकते) राजा की लाश को तीन माह तक धीमी आग पर सुखाया जाता था। फिर जबड़े की हड्डी को अलग करके उस पर मनकों और कौड़ियों का काम किया जाता। इसे मनकों के काम से मुक्त गर्भनाल, लिंग, अण्डकोष के साथ पशु त्वचा की थैली में रखकर यहां दफन कर दिष जाता। बाकी शरीर यानी गैर जरूरी आदमी को कहीं और फेंक दिया जाता।’’ क्या श्री नायपाल के उल्लेख, आश्वलायन के गृहसूत्र के वर्णन और रामायण में रावण के दाहकर्म के वर्णन के मध्य शव निस्तारण प्रक्रिया में वर्णित क्रूरता में कहीं कोई समानता है ? यदि हां तो श्री नायपाल का यह कथन भी मान्य होना चाहिए कि ऐसी मान्यताएं सुदूर अतीत का भाग होना चाहिए। इस प्रकार रामायण अथवा आश्वलायन में वर्णित शव निस्तारण कर्म में आदिमता की झलक स्पष्ट है। संभव है कि अफ्रीका की भांति भारत के आदिवासियों में भी यही अथवा ऐसी ही प्रथा प्रचलित हो।
(अनवरत्)  
                                                                                                                      

नोट:-किंतु श्रुतियों के रूप में हिन्दुओं ने इसका बेजोड़ तोड़ निकाला था। गाथाओं, कहानियों ने स्मृतियों को अक्षुण्ण बनाये रखने एवं ऐतिहासिक बीजों को अगली पीढ़ियों को हस्तान्तरित करने में सफलता प्राप्त की। 
©तृषा’कान्त’

राम मिथ या इतिहास…भाग – 6 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें।  आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(6 )  रावण का प्रेतकर्म (– गंताक से आगे )
आश्वालयन गृहसूत्र मृतक के हृदय पर मेध्य पशु का हृदय रखने के स्थान पर, मृतक के हृदय पर चावल या आटे के दो पिंड रखने का विकल्प प्रदान करता हैं। वह इस प्रेत कर्म पद्धति को आधुनिक हिन्दू समाज से जोड़ती है। इस प्रकार से रावण के दाहसंस्कार विधि का विश्लेषण करें तो जहां इसका एक सिरा आदिम मानवीय समाज तक जाता है तो वहीं दूसरी ओर यह आधुनिक हिन्दू समाज से जुड़ता है।
अरण्य काण्ड सर्ग 17 श्लोक 22 में शूपर्णखा राम को अपना परिचय देते हुए कहती है -’’वीरो विश्रवसः पुत्रो’’। यह वाक्य उसने स्वंय को रावण की बहिन बताने के बाद रावणादि का परिचय देते हुए कहा है। ’’विश्रवा’’ को आनुषांगिक साक्ष्यों में आर्य ऋषि माना गया है। इससे ’रावण’ राक्षस नाम्ना आदिम जाति का आर्य मुखिया सिद्ध होता है। ’शव’ के दाहसंस्कार की पद्धति संभवतः इसी कारण से राक्षसों द्वारा स्वीकार की गई हो। किंतु राक्षसों की कतिपय अन्य शाखाओं में ’शव’ को मिटटी में दबाने की (वर्तमान में मुस्लिम अथवा कतिपय अन्य धर्मानुयायियों की तरह) परम्परा थी। इस विषय में स्वंय वाल्मीकि रामायण ही प्रमाण है। अरण्यकाण्ड सर्ग 4 श्लोक 22 एवं 23 में विराध स्वंय को गड्ढे में गाड़ने के विषय में राम और लक्ष्मण से अनुरोध करते हुए कहता है –
अवटे चापि माँ राम निक्षिप्य कुशली ब्रज रक्षसां गतसत्त्वानामेब धर्मः सनातनः।
श्री राम ! आप मेरे शरीर को गड्ढे में गाड़कर कुशलपूर्वक चले जाइए। मरे हुए राक्षसों के शरीर को गड्ढे में गाड़ना सनातन धर्म है। (परम्परागत धर्म)

’’अवटे ये निधीयन्ते तेषां लोकाः सनातनः’’

जो राक्षस गड्ढे में गाढ़ दिए जाते हैं। उन्हें सनातन लोकों की प्राप्ति होती है।’’ इससे ऐसी सूचनाग्रहण की जा सकती है कि राक्षसों की स्थापित परम्परा ’शव’ को कब्र में दफन करने की है। किंतु रावण एवं उसके वंशजो ने दाहसंस्कार की परम्परा को अपनाया है। आश्वालयन गृहसूत्र में वर्णित विधि से विराध के कथन तक कुल मिलाकर एक ऐसा संकेत प्राप्त होता है जो संभवतः ठोस साक्ष्यों की ओर ले जाता है।

प्राचीन विश्व/भारत में कब्रों से प्राप्त साक्ष्य: आश्वालयन गृहसूत्र क्या किसी प्रचलित ’’शव निस्तारण’’ संबंधी कर्मकाण्ड का उल्लेख करता है अथवा किसी सुनी गई पूर्व परम्परा के तथ्यों को प्रचलित परम्परा के साथ मिलाकर प्रस्तुत करता है। मैं दूसरे के साथ हूँ।

विकीपीडिया इनसाइक्लोपीडिया:- Burial – wikipedia-en. International Burial, particularly with “grave goods, may be one of the earliest detectable forms of religious practice since as “Phillip Liberman” suggests, it may signify a “concern for the dead that transcends daily life.

Disputed, evidence suggests that the “Neanderthals” were the first human species to intentionally bury the dead. doing so in shallow graves along with stone tools and animal bones. इसके उदाहरण के लिए Shanidar ईराक में, इजराइल में Kebra और क्रोशिया में Krapenia. ऐसी कब्रों के सबसे पुराने प्रमाण 130000 वर्ष पुराने हैं। ऐसी कब्र Skhul cave at Qatzeh इजराइल में खोजी गई हैं।

Burial wekipedia encylopedia से ग्रहीत उपरोक्त उद्धरण से यह समझा जा सकता है कि 130000 वर्ष पुराने ऐसी कब्रों के पुरातत्विक साक्ष्य उपलब्ध हैं जो यह सिद्ध कर सकते हैं कि मानव के मृत शरीर के साथ मृत पशु अथवा उसके विभिन्न अंगो को मानवीय लाश के साथ दफनाया जाता था। किंतु प्रस्तुत साक्ष्य भारत उपमहाद्वीप से बाहर के हैं।
                                                                     (अनवरत्)
©तृषा’कान्त’

राम मिथ या इतिहास…भाग – 5 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(5) रावण का प्रेतकर्म
विगत अंको में आपने ’’रामायण में अश्व’’ पर परिचर्चा को पढ़ा। इस अंक में मैं एक अन्य दृष्टि से इस विषय को प्रस्तुत करने का प्रयास करूंगा। रामायण युद्ध काण्ड सर्ग 111 श्लोक संख्या 108 से 118 रावण की शवयात्रा एवं दाह संस्कार से संबंधित है। इन श्लोकों में से कुछ श्लोक ही विषय की दृष्टि से अधिक महत्वपूर्ण है। 112:- आगे जाकर रावण के विमान को एक पवित्र स्थान में रखकर अत्यन्त दुखी हुए। विभीषण आदि राक्षसों ने मलय, चन्दन, काष्ठ, पदमक्, उशीर, खस तथा अन्य प्रकार के चन्दनों द्वारा वेदोक्त विधि से चिता बनाई और उसके ऊपर रंकु नामक मृग का चर्म विछाया।’’ 114-115- उसके ऊपर राक्षसराज के शव को सुलाकर उन्होने उत्तम विधि से उसका पितृ मेध किया (दाह संस्कार) उन्होने चिता के दक्षिण पूर्व में वेदी बनाकर उस पर यथास्थान दधिमिश्रित घी से भरी हुई स्रुवा रावण के कंधे पर रखी और जांघो पर उलूखल रखा। 116:- काष्ठ के सभी पात्र, अरणि, उत्तराणि और मूसल आदि को भी यथा स्थान रखा। 117-118:- वेदोक्त विधि और महर्षियों द्वारा रचित विधि से वहां सारा कार्य हुआ। राक्षसों ने मेध्य पशु का हनन करके राजा रावण की चिता पर फैलाए मृगचर्म को घी से तर करके फिर रावण के शव को चन्दन और फूलों से अलंकृत करके वे राक्षस मन ही मन दुख का अनुभव करने लगे। 119:- फिर विभीषण के साथ अन्यान्य राक्षसों ने भी चिता पर नाना प्रकार के वस्त्र और लावा बिखेरे ………………। मैं उपरोक्त में से कुछ तथ्यों को अलग करता हूँ:- 1- रंकु नामक मृग का चर्म विछाना (श्लोक 112) 2- दधिमिश्रित घी से भरी श्रुवा रावण के कंधे पर व उलूखल जांघों पर रखना (115) 3- काष्ठ के सभी पात्र अरणि, उत्तराणि और मूसल आदि को यथा स्थान रखना (116) 4- मेध्य पशु का हनन करके राजा रावण की चिता पर ………….. मृगचर्म को घी से तर करके …………….. राक्षस मन ही मन दुःख का अनुभव करने लगे। कृपया प्रस्तुत तथ्यों को पुनः ध्यान से पढ़िए। पुनश्च डा0 बाबा साहब अंबेडकर द्वारा अपनी पुस्तक “The untouchables” हिन्दी अनुवाद’’ अछूत कौन और कैसे द्वारा आचार्य जुगुल किशोर बौद्ध में मृत क्रिया कर्म के संबंध में ’’आश्वलायन गृहसूत्र’’ से उल्लिखित इस क्रिया कर्म से तुलना करिए। (अछूत कौन और कैसे – डॉ0 बी.आर. अम्बेडकर अनुवादक (जुगुल किशोर बौद्ध) – पृष्ठ 89 से 90 अध्याय – क्या हिन्दुओं ने गौ मांस कभी नही खाया।) आश्वलायन गृहसूत्र 1. उसे तब निम्नलिखित (बलि के) औजारों को (मृत के शव पर) रख देना चाहिए। (यह यज्ञ-साधन है) 2. दाहिने हाथ में (चम्मच कहा जाने वाला) गुहु। 3. बाएं हाथ में (दूसरा चम्मच जिसे कहते हैं) उपभृत। 4. दाहिनी ओर स्फ्य कहा जाने वाली लकड़ी की बलिकर्म वाली खड्ग (तलवार), उसके बांई ओर अग्निहोत्री हवनी (अर्थात कलछी जिसके द्वारा अग्निहोत्र बलि का चढ़ावा चढ़ाया जाता है)। 5. उसकी छाती पर ध्रुवा (बलिकर्म की बड़ी जो कलछी कहलाती है)। उसके सिर पर पकवान। उसके दांतो में ठूंसे जाने वाले पत्थर। 6. नाक के दोनो ओर, छोटे बलिकर्म की कलछियां जिन्हें स्त्रुवा कहते हैं। 7. अथवा, यदि केवल एक स्त्रुवा उपलब्ध है, इसे तोड़कर (दो भाग करें)। 8. उसके दोनो कानों पर दो प्रसित्रहरण (अर्थात वे बर्तन, जिनमें ब्राहम्णों का बलि भोजन) रखा जाता है। 9. अथवा, यदि केवल एक प्रसित्रहरण है, इसे तोड़ दिया जाए (दो टुकड़ो में)। 10. पेट पर पत्री नामक बर्तन। 11. चपक (कप) जिसमें कटे हुए (बलि का भोजन) रखे जाते हैं। 12. उसके गुप्तांग पर सामी नाम की लाठी। 13. उसकी जंघाओ पर जलती लकड़ियां। 14. उसकी टांगो पर खल्ल (गारा) और मूसल। 15. उसके पैरों पर दो टोकरियां। 16. अथवा, यदि केवल एक (टोकरी) है, इसे तोड़कर दो भाग कर लिया जाए। 17. वह औजार जिनमें सूराख हैं (जिसमें तरल पदार्थ उडे़ले जा सकते हैं) छिड़काए गए मक्खन से भर लिए जाएं। 18. (मृतक का) पुत्र अपने लिए चक्की के नीचे और ऊपर के पाट ले ले। 19. तांबे, लोहे और मिटटी के बने औजार। 20. किसी मादा-पशु का झिल्ली (व्उमदजनउ) निकालकर उससे सिर और मुख (मृत व्यक्ति का) ढांक दे। (ऋग्वेद दस 16.7) का यह श्लोक पढ़े ’किन्तु अग्नि के विरूद्ध (जो तेरी रक्षा करेगा) कवच की गऊओं से प्राप्त होता है। 21. पशु के आंड (अण्डकोष) लेकर, वह उन्हें (मृत व्यक्ति के) हाथों में डाल दे, इस श्लोक (ऋग्चेद दस 14.10) के साथ शमीम के पुत्रों, दोनो कुत्तों से बचे दाहिना गुर्दा दाहिने हाथ में और बायां गुर्दा बाएं हाथ में हो। 22. पशुओं का हृदय मृतक के हृदय पर रख दें। 23. और कुछ आचार्यों के अनुसार आटे या चावल के दो पिंड। 24. केवल जब यदि आचार्य के अनुसार अंडकोष न हों। 25. पूरे (पशु के) अंग-अंग बांटने के बाद (इसके भिन्न-भिन्न अंग मृतक के वैसे ही अंगो पर रखकर) और उसे खाल से ढांक कर, वह उच्चारण करता है। हे अग्नि ! जब प्रणीता जल आगे ले जाया गया है तो इस कप को उलट मत देना’ (ऋग्वेद दस 16.8)। 26. अपने बांए घुटने को झुकाकर उसे बलि का चढ़ावा (नैवेद्य) दक्षिणा को अग्नि में इस मंत्र के साथ डालना चाहिए ’अग्नेय स्वाहा, कामाय स्वाहा, लोकाय स्वाहा, अनुमतये स्वाहा’। 27. (नैवेद्य) का पांचवा भाग मृतक के वक्ष पर इस मंत्र के साथ, ’निश्चय ही इससे हजारों का जन्म हुआ है। अब वह इसमें से पैदा हो स्वर्ग के लिए स्वाहा।’ आश्वलायन गृहसूत्र से उद्धृत ऊपर के परिच्छेद से यह स्पष्ट है कि प्राचीन इंडो-आर्यों में जब कोई व्यक्ति मर जाता था, एक पशु को मारा जाता था और शव को जलाने से पूर्व पशु के भागों को मृतक व्यक्ति के शरीर पर सभी भागों पर रखा जाता था।’’ यदि आश्वालयन गृहसूत्र में वर्णित उपरोक्त क्रिया से रामायण की दाह क्रिया की तुलना करें तो काफी कुछ समानता दिखाई देती है। इतना ही नही क्रमांक-23 इस शव निस्तारण की आदिम कर्मकाण्डीय प्रक्रिया को हिन्दुओं में प्रचलित आधुनिक शवदाह की प्रक्रिया से भी जोड़ता है। (अनवरत्)
©तृषा’कान्त’

वावरे ..! किस चाह में ….. [ गीत ] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

जीव जीवन पथ अकेला 
आदि से जग राह में 
क्यों फिरे उद्विग्न अंतस  
वावरे ..! किस चाह में 

नगर में मेले मिले तो 
भीड़ भी पुरशोर है 
डगर पथरीली कठिन भी 
मनुज मन कमजोर है 
बह गया बहुधा लहर से 
तुमुल करतल वाह में 
वावरे ..! किस चाह में 

कालिमा कुत्सित तमस की 
हाय मानव छल गयी 
मोह माया रज्जु बन्दी 
सकल उर्जा जल गयी 
डोर अब अव्यक्त खींचे 
ढोर बांधे रज्जु से 
छूटते सब संग साथी 
दिव्य आभा पुंज से 
अहा अब अभिसिक्त यौवन 
अलौकिक किस राह में 
वावरे..! किस चाह में 
©तृषा’कान्त’

राम मिथ या इतिहास…भाग – 4 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(4) इतिहासोपयोगी रामकथा
राम से संबंधित सामग्री का प्रमाणिक ग्रंथ है रामायण। जिसके कृतित्व का श्रेय ’वाल्मीकि’ को दिया जाता है। जैसा कि विगत अंको में मैने ’रामायण’ के साक्ष्य के आधार पर कहा है कि रामायण संहिता है जिसका अभिप्राय है कि मूलकथा को समय-समय पर विस्तार दिया गया। डॉ0 फादर कामिल बुल्के जैसे ’रामकथा’ के प्रसिद्ध शोधकर्ता रामायण के बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को प्रामणिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए उन्हें प्रक्षिप्त मानते हैं। डॉ0 बुल्के को आधार मानते हुए यदि सप्तखण्डीय प्रचलित रामायण में महीनतम् छलनी लगाकर ’’ऐतिहासिकता’’ के अनुसंधान हेतु ’रामकथा’ को शब्दो, आनुवांशिक कथाओं एवं अलंकारादि से रहित कर तलाश किया जाए तो ’रामकथा’ कुछ इस प्रकार कही जा सकती है।
संक्षिप्त ’’रामकहानी’’
श्री बुल्के के शोध प्रबन्ध के आधार पर प्राप्त तथ्यों के निचोड़ से जो रामकथा बनती है और हम जिसको राम एवं उनके समकालिकों की खोज में प्रयोग करने वाले हैं वह इस प्रकार है –
ऋग्वेद में ’राम’ दशरथ और इक्ष्वाकु का उल्लेख मिलता है। मिश्र के शासक रोमेसिस एवं मध्य एशिया की आर्य जाति ’मितान्नि’ में दशरथ नामक राजा का उल्लेख मिलता है। इन दोनों का काल 1300 से 1400 ई0सदी पूर्व श्री बुल्के मानते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहानी यों कही जा सकती है कि इक्ष्वाकु के वंश में दशरथ पुत्र राम का (1300-1400 ई0सदीपू0) जन्म हुआ। राम पिता की आज्ञा से अनुज लक्ष्मण एवं पत्नी सीता सहित 14 वर्षों के लिए वन चले गए। वन में पत्नी सीता का त्रैलोक्यजयी, महान विजेता, राक्षस राज रावण के द्वारा अपहरण कर लिया गया। राम ने वानर, गृद्ध, ऋक्ष आदि कबीलाई शासकों/समूहों के सहयोग से रावण का उसकी समस्त सेना के सेनापतियों, भाई बान्धवों सहित वध करके उसके ही भाई विभीषण को लंका का राज्य हस्तगत करवा दिया।
इतनी सी कथा का आलंकारिक विस्तार रामायण में है जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों की गवेषणा कर राम का ऐतिहासिक कालक्रम निर्धारित करना है। यह कार्य समुद्र से एक सच्चा मोती तलाश करने जैसा दुरूह कार्य है। हम कामिल बुल्के के तथ्यों को प्रथम दृष्ट्या अमान्य करते हैं। श्री बुल्के के काल निर्धारण को इसलिए स्वीकार नही किया जा सकता क्योंकि उनका शोध, रामकथा की ऐतिहासिकता की तलाश है। न कि राम रावण युद्ध के घटनाक्रम के ऐतिहासिकता की। ’रामकथा’ के पात्रों के नाम जहां तक प्राप्त हुए हैं श्री बुल्के उस कालखण्ड तक पहुंचे हैं किंतु रामायण में वर्णित तथ्यों पर उन्होने कोई भी अनुसंधानात्मक दृष्टि नही डाली है। अतः उनका मत (1300-1400 ई0 सदी पू0) अस्वीकार्य किए जाने के योग्य है।
©तृषा’कान्त’

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