ओ पिता ! ….. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’


फादर्स डे पर विशेष – पिता अर्थात एक अमिट अस्तित्व .. एक वजूद जो अपने स्वप्नों .. अपनी आकांक्षाओं को सन्तति के उज्ज्वल भाविष्य के लिये प्रसन्नता के साथ त्याग देता है .. अखिल विश्व के ऎसे सभी पिताओं को समर्पित अनुभूति पर मेरी एक रचना.. नमन – तृषाकान्त
ओ पिता !
लगा है एक युग मुझे,
पहचानने में तुम्हें

माँ होती है धरती,
गेहूँ अथवा जौ
बोया गया किस खेत में,
कोई अन्तर नहीं पडता,
हृदय पोषित तत्व से
उगती है जो फसल,
नाम क्या.. पहचान क्या,
फिर कौन हूँ मैं ..
वह तो है बोया बीज,
मैं जो भी हूँ वह हो तुम

हे पिता !
पीड़ा दी है
बहुत तुम्हें ..
स्वयं को त्यागी..
महान और वीतरागी,
सिद्ध करने के दर्प में,
क्षमा याची .. ढूंढता हूं
तुम्हारी गोद ,..
सब कुछ भूल,
आश्वासन बचपन का,
आज फिर
चिपट कर लिपट कर
रोना चाहता हूं ..
और पुकारता हूं..

हे पिता !
लगा है एक युग मुझे
पहचानने में .. तुम्हें,
दर्द से आकुल
सीने से उठता ज्वार
फूट पड़ता है आंखों से,
और तभी
केवड़े की गंध से
भर जाता है मेरा कमरा,
खिड़की से प्रवेश करता है
हवा का एक झोंका
मेरे आंसू सुखाने लगता है.
©तृषा’कान्त’

Advertisements