जापान में भूकम्प और सुनामी: एक त्रासदी अथवा मानवीय सभ्यता के भयंकर अंत की पूर्वदस्तक एवं चेतावनी [आलेख] – शिवेंद्र कुमार मिश्र

[सुनामी का अर्थ, जापान में इतने भूकंप क्यों आते है कब-कब कहॉ-कहॉ भूकम्प आये और जान-माल का कितना नुकसान हुआ यह सब और कही ज्यादा आप तमाम सूचना माध्यमों और दिखाए गए ग्राफिक्स आदि से आप समझ चुके हैं। अत: मै आपको बोर नही करुंगा लेकिन कुछ ऐसी वातें अवश्य कहूंगा जो आपको अटपटी लग सकती है किंतु उन्हें आपके ध्यान की अपेक्षा है। इससे पहले एक खबर शायद आना चाहें।] 
11 मार्च-2011  मानवीय इतिहास की त्रासदी का भीषणतम् तिथियों में से एक तिथि के रुप में अंकित हो गई। इस दिन विश्व के मानचित्र पर विकसित देशों की कतार में नं दो या तीन पर खडे उगते सूर्य के देश के नाम से प्रसिध्द जापान पर द्वितीय विश्व युध्द के पश्चात से सबसे भीषण त्रासदी का दिन था। जापान के स्थानीय समयानुसार राजधानी टोक्यों से 380 कि.मी. उत्तर पूर्व में तड़के दो बजकर 46 मिनट भारतीय समयानुसार सुबह- 6.15 पर आए भयावह भूकंप के झटकों ने मानव जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया। (सूचना स्त्रोत दैनिक जागरण 12 मार्च 2011)

    लगभग 9 प्वाइण्ट रिचर स्केल की तीव्रता वाले भूकम्प और उसके पश्चात आई सुनामी की लगभग 13 से 30 फिट ऊंची लहरों ने मानव पर विपदा के वह दृश्य उपस्थित किये है जो भारत-चीन युध्द के पश्चात जन्म लेने वाली पीढी ने तो शायद आज तक महसूस ही नही किये होगें अपितु द्वितीय विश्व युध्द के पश्चात से आजतक ऐसी त्रासदी शायद ही अनुभव की गई हो। भय-आतंक विनाश के दृश्य आपने अपने टी.वी. पटल अथवा इण्टरनेट द्वारा अवश्य देखें होगें। मृतकों के आंकडे आज तक 20000 के आस-पास पहॅच गए है। सम्पति के विनाश के प्राथमिक आंकडे लगभग 100 अरब डालर के आस-पास के हैं। जापान के तीन परमाणु रिएक्टरों में विस्फोट हो चुका है। रेडियो धर्मी पदार्थ का रिसाव होने के संकेत है। इसी बीच शीघ्र ही 7.3 से अधिक तीव्रता वाले भूकंप और पुन: सुनामी आने के वैज्ञानिक कयास भी सामने आये हैं। इससे कहीं अधिक तमाम जानकारी आप समाचार पत्र, टी.वी. और इण्टरनेट के माध्यम से प्राप्त कर चुके होगे अत: उनकी पुनरावृत्ति कर मै आपको पकाना नही चाहूंगा। अस्तु! 

    सुनामी का अर्थ, जापान में इतने भूकंप क्यों आते है कब-कब कहॉ-कहॉ भूकम्प आये और जान-माल का कितना नुकसान हुआ यह सब और कही ज्यादा आप तमाम सूचना माध्यमों और दिखाए गए ग्राफिक्स आदि से आप समझ चुके हैं। अत: मै आपको बोर नही करुंगा लेकिन कुछ ऐसी वातें अवश्य कहूंगा जो आपको अटपटी लग सकती है किंतु उन्हें आपके ध्यान की अपेक्षा है। इससे पहले एक खबर शायद आप देखना चाहें।

 भूकंप जापान में,कलेजे कॉप रहे संभल में   [15 मार्च हिन्दुस्तान-आशीष त्रिपाठी मुरादाबाद]
    इस र्शीषक से प्रकाशित स्थानीय समाचार जापान में व्यापार करने वाले व्यापारियों से संबधित हैं। इसमें स्थानीय जापान में व्यापार करने वाले व्यापारी के माध्यम से प्रकाशित समाचार की यह पंक्तियॉ ध्यान देने योग्य है।-

‘जापान में कोरिया जैसे छोटे मुल्क तक से मदद की 5 फ्लाइट आ चुकी हैं पर इंडिया से अब तक कोई राहत नही आई।


त्रासदी के पीछे के कारणों की खोज में-

”आ नो भद्रा: क्रतवो यन्तु विश्वत:”
    अर्थात (भद्रक्रतव:) कल्याण करने वाली बुध्दियां (विश्वत:) सभी ओर से (न:) हमारे पास (आ यन्तु) आवे अर्थात ज्ञान की उत्तम धाराए हमें प्राप्त हों।” यह एक वैदिक मंत्र है। इसका उल्लेख मैने यह कहने के लिए किया है कि सभ्यताएं अथवा मानव समूहों ने जब भी अदृश्यके चितंन को आदर्श माना है तो उनका विकास नैतिक सांस्कृतिक एव उच्च मूल्यों वाले समाज के रुप में हुआ जिसे एक संस्कृति के रुप मे अभिहित किया गया। दूसरी ओर वह मानव समूह भी है जिन्होंने विकास निरन्तर सुधरती हुई तकनीक और उसके सापेक्ष निरन्तर आने वाले परिवर्तनों को स्वीकार किया है। तकनीक का सतत परिवर्तन और तत्सापेक्ष विकास, डार्विनवादी विकास प्रक्रिया का माडल है। इस प्रक्रिया में मानवीय सृष्टि व विकास निरन्तर प्राकृतिक तकनीकी के परिमार्जन या उसमें आने वाले बदलाव का नतीजा है जबकि वैदिक संस्कृति अद्रश्य शक्तियों विषयक, चितंन सापेक्ष दृष्टिकोण के कारण मानवीय अथवा सृष्टि के विकास को नियंता का लीला-विलास अथवा कर्मप्रधान मूल्य सापेक्ष सृष्टि के विकास की वात करता है। उपरोक्त मंत्र इसी प्रकार की प्रार्थना है और इसके मूल में- 

”एकोऽहं बहुस्याम, प्रजायेय”

    अर्थात मै अकेला हॅ, बहुत हो जाऊं, प्रजाओं की सृष्टि करु।’ यह ईश्वरीय संकल्प निहित है। भारतीय परम्परा में उल्लिखित अनेकानेक देवासुर संग्रामों के अन्तर में ऐसे ही कारणों को चिह्नित किया जा सकता है।

    डार्विनवादी विकासवादी माडल को मानने वाले निरन्तर तकनीकी परिमार्जन को विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया मानते है और वे प्रकृति के रहस्यों के निरन्तर भेदन में विश्वास करते हैं और तकनीकी विकास की गति को तेज करते है। आधुनिक विकास इसी माडल की देन है। जो तकनीकी विकास की गति को तीव्र रखने के क्रम में प्रकृति के विरोध में जाकर खडा हो जाता है। वैदिक विचारधारा में असुर एवं राक्षस परंपरा को विकास के इस क्रम के साथ खडा कर सकते है अपितु दोनों के मध्य एक मूल अंतर है। किन्तु उसकी चर्चा यहॉ प्रासंगिक नही है।

    इस चर्चा से ऐसा स्वीकार कर लेना मूर्खता होगी कि प्रथम प्रकार के अथवा वैदिक अवधारणा के मानव समूह तकनीकी विकास को महत्व नही देते है। अपितु यह वर्ग तकनीकी विकास को ईश्वरीय वरदान मानता है और इसी कारण प्रक्रति के विरुध्द न जाकर उसके साहचर्य एवं सहवास में प्रसाद स्वरुप तकनीकी का विकास करता है। उदाहरणार्थ ऋषियों ने भी जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में असुरों और राक्षसों से उच्चतर स्तर की खोजें की। इस प्रकार विकास का डार्विनवादी माडल निरन्तर तकनीकी विकास की श्रेष्ठता के दंभ को बनायें रखने के क्रम में प्रकृति पर श्रेष्ठता स्थापित करने का प्रयास करता है। इससे प्राकृतिक असंतुलन जन्म ले रहा है। उसको नियंत्रित करने के क्रम में प्राकृतिक उत्पात के साथ मानवीय तकनीक भी नष्ट भ्रष्ट होकर उत्पात मचाना प्रारम्भ कर देती है जैसे परमाणु उर्जा संयत्रों से रेडियोधर्मी पदार्थो का रिसाव। निश्चित ही यह अथवा इस प्रकार की तकनीकी भूलें मानवीय जीवन पर तो भारी पडेंगी ही अपितु प्रकृति ने स्वयं को संतुलित करने के लिए जो विनाश लीला रची है। उसे भी व्यर्थ कर देगी । अर्थात इस विनाश के बाद भी प्रकृति अधिक समय तक संतुलित रह पाए मुश्किल है। 

    मानवीय विकास का डार्विनवादी माडल जो बंदर से मानव को विकसित मानती है और एक कोशकीय जीव से सृष्टि का विकास मानता हैं। दरअसल उसने सम्पूर्ण विकास का तकनीकी और मात्र तकनीकी तथा प्रौद्योगिकी के निर्मम हाथों का खिलौना बना दिया है। जिसमें जिसके हाथ में डुगडुगी यानी तकनीक एवं प्रौद्योगिकी है वह मदारी एंव शेष बंदर । यह मदारी आए दिन अपने दंभ का शिकार होकर प्रकृति को पददलित करके अपने ही विनाश के बीज वो रहा हैं क्या यह चेतावनी है अथवा हमें भी पुराण पुरुष मनु की तरह पछताना पडेगा।

शिवेन्द्र कुमार मिश्र
बरेली

Advertisements