अन्ना आन्दोलन बनाम भ्रष्टाचार …….. [आलेख] – शिवेंद्र कुमार मिश्र

पूज्य अन्ना का जनान्दोलन भ्रष्टाचार के विरूद्ध सशक्त विधायी संस्था लोकपाल की माग के साथ प्रारम्भ हुआ। देखते ही देखते लगातार की गर्इ रणनीतिक त्रुटियों के कारण यह आन्दोलन तीव्र गति पकड़ गया। जिन्हें जेoपीo के आन्दोलन की याद थी वह इससे तुलना करने लगे। लोकपाल का स्वरूप धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा।रामलीला मैदान का जनसैलाब न उन लोगों का हे जिन्हें भ्रष्टाचार की पर्याप्त समझ है और न ही उन लोगों का जो अण्णा की तरह शुचिता का दम भर सकें और अण्णा की ही तरह यह दावा कर सकें कि उनके दामन पर एक छोटा सा भी दाग नहीं है। मेरे एक मित्र का मानना है कि यह लोग जो भ्रष्टाचार किए हैं अथवा करते हैं वह तंत्र का दबाब है न कि उनकी स्वेच्छा। क्या अण्णा के सहयोगी भी ऐसा ही मानते हें। लगता तो नहीं। वह लोग टीoवीo चैनलों पर जो दावे कर रहे हैं उससे तो लगता है कि वह एक ऐसा तंत्र चाहते हैं जो चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री तक की जाच कर सके। वह सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक को इसकी परिधि से मुक्त नहीं करना चाहतें। राजनेताओं के साथ साथ राजकीय कर्मचारी विशेष रूप से उनके निशाने पर है। जहा तक राजकीय कर्मचारियों का प्रश्न हैं तो वह बलि का बकरा बन चुका है। उसकी साख का जनता के बीच समाप्त होने की बडी वजह उसके राजनैतिक और आर्इoएoएसo सम्प्रभु है। मित्र की बात का यदि समर्थन करें तो उसके भ्रष्टाचार की एक बडी वजह तंत्र का दबाब उसके विरूद्ध अपनी सम्पूर्ण र्इमानदारी के साथ न लड़ पाने की उसकी अक्षमता जिसके पीछे प्राय: उसका परिवार और कभी-कभी जनदबाव भी रहता है। जनदबाब ऐसे भ्रष्टाचार का समर्थन,प्रोत्साहन अपने निजी समूहगत कारणों से करता है। यानी कि कह सकते हैं कि जनसंस्थाएं भी ऐसे भ्रष्टाचार का बडा कारण हैं।


तथाकथित सिविल सोसाइटी इन जनसंस्थाओं द्वारा किए जाने वाले भ्रष्टाचार के बारे में कुछ भी नहीं कहती। मसलन अण्णा कहते हैं कि उन्होने अपनी संस्थाओं के लिए करोडों के प्रोजेक्ट लिए किन्तु कभी भी एक भी पैसा रिश्वत नहीं दी तो क्या सभी और उनके कर्ता धर्ता ऐसा ही दावा करता हैं। सब लोग जानते है कि एनoजीoओo अपनी संस्थाओं के लिए फण्ड लेने के लिए कैसी मारकाट करते हैं और क्या-क्या हथकण्डे अपनाते हैं। तो सारे एनoजीoओo लोकपाल के दायरें में क्यो नहीं आने चाहिए?

आप सभी जानते हैं कि भारत की लगभग 70प्रतिशत जनता वह है जिसकी दैनिक व्यय क्षमता 20रूo मात्र है। देश की अदालतों में करोडों मामले जो लमिबत है वह अधिकांशत: इसी जनता के है। प्रशान्त भूषण और शान्तिभूषण जैसे लोग भली भांति जानते हैं कि हमारे वकील मित्र अपने क्लाइण्ट से फीस की वसूली कितना चेक के माध्यम से करते हैं या कर सकते हैं। उनकी ऊँची-ऊची फीसे और कानूनों के मकडजाल से खुद को सुरक्षित रखने की उनकी काबिलियत किस तरह से सुरक्षित दूरी पर रहते हुए भी तथा कथित न्यायिक भ्रष्टाचार को बढावा देने में सहायक होती है और वह स्वयं इसमें लिप्त रहते हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं हैं। इनको लोकपाल या किसी के कठोर नियंत्रण में लाए जाने की आवश्यकता क्यो नही है। चेरेटी के नाम पर चलाए जाने वाले अस्पताल एवं विभिन्न संस्थाए किस प्रकार की चेरिटी कर रही हैं। यह छिपी हुर्इ बात नहीं है। 

शायद आप सहमत हों कि यह संस्थाएं स्वयं तो आयकर मुक्त जीवन बिताती ही हैं दूसरों को भी आयकर चोरी में सहायता करती हैं। इन्हें लोकपाल या उससे भी सख्त संस्था के दायरे में क्यो नहीं आना चाहिए।

अण्णा की र्इमानदारी या सत्यनिष्ठा पर कोर्इ दाग नहीं है। क्या ऐसा ही अण्णा के बाकी सहयोगी भी कर सकते हैं अथवा उनके दावे पर भरोसा किया जा सकता है। मैगसेस पुरस्कार विजेताओं को विभिन्न मानवीय मनोवैज्ञानिक कारणों से हताशा एवं अवसाद ग्रस्त ऐसे लोगों की आड में जो वहा पर अपनी अपनी समझ के भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए इकटठा हैं जैसे महगार्इ,गलत भूमि कानूनों के शिकार,आदि क्या लोकतांत्रिक विधि मूल्यों से खिलवाड की इजाजत दी जानी चाहिए।

अब हम जे0पी0 आन्दोलन के आर्इने में भी जरा झांक लें। जे0पी0 ने सत्ता को एवं प्रजातांत्रिक मूल्यों को बंधक बनाने का आन्दोलन नहीं चलाया। उन्होने सत्ता परिवर्तन कर प्रजातांत्रिक मूल्यों की पुर्नस्थापना का आन्दोलन चलाया किन्तु अण्णा के शूरवीर ऐसी कोर्इ माग नहीं करते। इतना ही नहीं जनता के नाम पर पारदर्शिता की कोर्इ बडी लकीर भी वो खींचना नहीं चाहते। उदाहरणार्थ वह लोग सरकार पर तो यह आरोप लगा रहे हैं कि वह एक लचर बिल प्रस्तुत कर रही है और जनलोकपाल बिल के प्राविधानों को जा ज्यादा भ्रष्टाचार विरोधी हैं संसद के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले प्रस्ताव में शामिल नहीं कर रहे। अब वह अपना ही जन लोकपाल बिल प्रस्तुत करने पर अडे हैं। क्या यह उचित समय नहीं है कि हम अपने प्रजातंत्र को अधिक पारदर्शी बनाएं और लोकपाल के विभिन्न ड्राफ्ट जनता की रायशुमारी के आधार पर तैयार करें और फिर जनमत संग्रह के आधार पर उसको पारित कराएं। मैं मानता हू यह रास्ता लम्बा है किन्तु प्रजातंत्र को भीड द्वारा बन्धक बनाए जाने के तरीके से कहीं बेहतर। देश गांधीवादी अंहिसात्मक आमरण अनशन जो प्रजातांत्रिक मूल्यों के नाम पर किए गए थे कर्इ दुष्परिणाम आज तक भोग रहा हैं। कहीं ऐसा न हो अण्णा अनशन से उत्पन्न दुष्परिणामों से भावी पीढि़या कराहती रहें। 
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चक्रव्यूह में … अभिमन्यु …. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

घिर गया है फिर…..
चक्रव्यूह में …
आज का अभिमन्यु
भ्रष्टाचार का दुर्योधन
सत्ता के रथ पर सवार
कर रहा है निरंतर
वार पर वार

राजनीति के द्रोणाचार्य ने
रचा है मानव मूल्यों से दूर
अनैतिकता का व्यूह
सत्ता की भूमि जायेगी
शायद इस बार
इनके साथ साथ
मृत्यु महानद के पार
अब किसी भोज का
‘शोणित पत्र’ करता नहीं
विचलित इन्हें

वंचना के कृपाचार्य
कीर्ति कवलित कर्ण
मानव मर्यादाओं से दूर
राष्ट्र अभिमन्यु पर
नित नवीन वार

देशप्रेम नैतिकता
निष्ठा के अर्जुन
घिर गये हैं
समरांगण से दूर

क्षत विक्षत घायल
आज फिर अभिमन्यु
परिचित अपरिचित
एक द्रष्टि
उसके तुणीर में
एक नयी स्रष्टि
शिष्य हूँ कृष्ण का
रणछोड घरछोड क़ा
होगी नहीं पुनरावृत्ति
उस विगत इतिहास की

अतः हे तात
आधुनिक राष्ट्र के दुयोधन
और सप्त महारथी सुनो
जन्म ले चुका है
एक नया अभिमन्यु
 इस राष्ट्र के गर्भ से

तब अन्ना अब रामदेव …. [राजनीतिक विश्लेषण] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

4 जून 2011 से प्रारम्भ हुए आन्दोलन पर आपत्ति में फिल्म कलाकार, भोंपू राजनेता और पत्रकार भी थे… उनका कहना था कि हमारा सनातन धर्म सन्यासी से राजनीति करने की अपेक्षा नही करता।

…… इनमें से किसी ने यह नहीं बताया कि क्या सनातन धर्म, चोगें, मक्कारों, जनता का विश्वास हार चुके धूर्तो को राजनीति करने की इजाजत देता है। …. जब छवि दूषण से भी काम नही चला तो आन्दोलन को कुचलने के लिए बाबा को ही आधी रात में उठा लिया।

अब बाबा अनशन पर है। सरकार उच्चतम न्यायालय के कटघरे में और काग्रेस पार्टी पब्लिक के जूते पर।

राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की प्र्रतिक्रियाएं बेहद खामोशी भरी है। दक्षिण के राजनेता, कम्युनिस्ट और ममता बनर्जी जैसे लोग चुप है तो माया और मुलायम की प्रतिक्रिया बेहद नपी तुली। भगवा ब्रिगेड गुस्से में है तो बाबा के अनुयायी और देश का आमजन स्तब्ध।
प्रश्न कई हैं। बाबा के राजनीति पर प्रश्नचिन्ह है तो मौलाना मदनी या अन्य धर्मगुरूओं की राजनीति या प्रश्नचिन्ह क्यों नही लगता।

रामलीला मैदान,नई दिल्ली। इतिहास के पन्नो पर दर्ज हुई तारीख 4/5.06.2011 रात्रि 1.30 AM बजे लगभग। भारत स्वाभिमान ट्रस्ट एवं पंतजलि योगपीठ के स्रष्टा, योग उद्धारक महान योगगुरू को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। अपराध देश की लाखों करोड़ सम्पति विदेशी बैंको में जमा करने वाले भ्रष्टाचारियों को मौत की सजा की माँग, अवैध काले धन को राष्ट्रीय सम्पति घोषित करने की माँग, शिक्षा व्यवस्था भारतीय भाषाओं में देने की माँग इत्यादि।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। जब-जब निर्लिप्त, अनासक्त सन्यासियों, त्यागी वीतरागी, महापुरूषों ने मदान्ध सत्ताओं को राष्ट्रहित, मानवहित, समझानें का प्रयास किया है, तब-तब सत्ताओं ने, सत्ताशीर्ष पर बैठे मदान्धों ने उन्हें ऐसे ही दुत्कारा है, प्रताडित किया है। अपमानित किया है।

आप ईसा से लगभग 325 वर्ष पूर्व का महापदम नन्द का पाटलिपुत्र का वह राजदरबार याद करिये जब वीतरागी विचारक आचार्य चाणक्य विदेशी आक्रान्ताओं से राष्ट्रहित में राजा को सावधान करने जाते है और अपमानित होकर नन्दों के समूल विनाश की भीष्म प्रतिज्ञा करते है। ऐसी ही मदान्ध सत्ता सहस्त्रबाहु कार्तवीर्य अर्जुन की त्रेतायुग की याद करिए। जब तपस्यारत सन्यासी जमदग्नि के आश्रम को नष्ट भ्रष्ट कर हत्याएं की जाती है। और वीतरागी ‘राम’ परशुराम बन जाते है। उसी युग के वह दृष्य भी याद करिए जब अपनी तरह से अपनी जीवन पध्दति जीने वाले आर्यो को रावण की राक्षसी सत्ता जीने नही देती। दमन हत्याओं और रक्तपात से आर्यो की जीवन पध्दति ही संकट में पड जाती है। और इस सत्ता के विरूध्द संघर्ष का बिगुल बजाते हैं दो वीतरागी सन्यासी महान गाधितनय विश्वामित्र जो राम और लक्ष्मण को लेकर देश की आन्तरिक शक्तियों को संगठित करके एक सूत्र में राम के नेतृत्व में खडा करते हैं और दूसरे महान अगस्त जो दुश्मन की सीमा पर बैठकर राम के लिए शक्ति का संगठन करते है। इस देश में यह परम्परा कभी टूटी ही नहीं। गुरूगोविन्द सिंह, वीर वन्दा वैरागी, सन्यासी क्रान्ति, स्वामी दयानन्द एवं विवेकानन्द का जागरण, स्वामी श्रध्दानन्द का बलिदान, सावरकर बंधु महात्मा गाँधी से लेकर विनोवा और जयप्रकाश नारायण तक। और अब पूज्य अन्ना हजारे एवं संत श्री योगगुरू बाबा रामदेव।

4 जून 2011 से प्रारम्भ हुए आन्दोलन में लोगों ने बाबा के आन्दोलन करने पर आपत्ति जताई। इनमें फिल्म कलाकार, भोंपू राजनेता और ऐसे पत्रकार भी थे जो स्वयं को हिन्दू दर्शन का मर्मज्ञ मानते है। उनका कहना था कि हमारा सनातन धर्म सन्यासी से राजनीति करने की अपेक्षा नही करता। कुछ ने कहा…. वह व्यवसायी है। तो कुछ ने कहा बाबा संप्रदायिक ताकतों के साथ है। इत्यादि। इनमें से किसी ने यह नहीं बताया कि क्या सनातन धर्म, चोगें, मक्कारों, जनता का विश्वास हार चुके धूर्तो को राजनीति करने की इजाजत देता है। किसी ने यह भी नही बताया कि बाबा कौन सा मिलावट का व्यापार कर रहा है। अस्तु । जब छवि दूषण से भी काम नही चला तो आन्दोलन को कुचलने के लिए बाबा को ही आधी रात में उठा लिया।

अब बाबा अनशन पर है। सरकार उच्चतम न्यायालय के कटघरे में और काग्रेस पार्टी पब्लिक के जूते पर। राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की प्र्रतिक्रियाएं बेहद खामोशी भरी है। दक्षिण के राजनेता, कम्युनिस्ट और ममता बनर्जी जैसे लोग चुप है तो माया और मुलायम की प्रतिक्रिया बेहद नपी तुली। भगवा ब्रिगेड गुस्से में है तो बाबा के अनुयायी और देश का आमजन स्तब्ध।
प्रश्न कई हैं। बाबा के राजनीति पर प्रश्नचिन्ह है तो मौलाना मदनी या अन्य धर्मगुरूओं की राजनीति या प्रश्नचिन्ह क्यों नही लगता। बाबा इसलिए तो निशाने पर नही कि वह हिन्दु पुन: जागरण के प्रतीक न बन जाएं। आपको याद होगा राहत फतेह अली खान पाकिस्तानी गायक का फेरा में गिरफतारी का मामला। सारे नियम कानून ताक पर रखकर उसे छोड़ दिया गया किन्तु उसका भारत स्थित हिन्दू सचिव शायद आज तक जेल में है। सैकडों आतंकवादियों को फांसी देने की फाईल प्रधानमंत्री कार्यालय से राष्ट्रपति कार्यालय तक नही सरकती चाहे लोग आतंकियो को फांसी देने के लिए आत्मदाह ही क्यो न करें किन्तु बाबा का तम्बू आम नागरिक अधिकारों को कुचलते हुए रात्रि 1:30 बजे उखाड़ने का निर्णय प्रधानमंत्री कार्यालय और सोनिया जी ले लेती हैं और पुलिस के वीर सफलता भी हासिल कर लेते है।

एक और मजाक देखें। सोनिया जी के नेतृत्व में सरकार एवं काग्रेस के नुमाइन्दों की उच्चस्तरीय बैठक होती है और उसके बाद के काग्रेसी बयानों से स्पष्ट है छवि मलीनीकरण की राजनीति उच्च पदस्थ काग्रेसियों एवं सरकार की शह पर हो रही है। 1993 के बाद से जो सरकार दाउद को नही पकड़ सकी वह आधी रात में शान्ति प्रिय नागरिकों को पुलिसिया अन्दाज से भगा देती है। जन्तर-मन्तर जहाँ 8 तारीख को अन्ना हजारे को अनशन करना था वहॉ दफा 144 लगा देती है। और मोदी का मर्सिया पढ़ने वाले नागरिक अधिकारों की दुहाई देने वाले, राजनेता, बुध्दिजीवी राजनीतिक दल, मीडिया चैनल कुम्भकर्णी नींद में सोते रहते है। इतना ही नहीं कुछ चैनल तो सरकार की छवि-दूषक संस्कृति के ध्वजा वाहक बन जाते है। न ऐसा पहली बार हुआ है और न आखिरी बार।

ऐसा क्यो होता है? …

वस्तुत यह देश 712 ए0डी0 के बाद से ही निरन्तर दबाया गया है … कुचला गया है। फिर भी भारतीय राष्ट्रवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं जरा सा खाद पानी मिलता है तो अमर बेल की तरह बढ़ने लगती हैं। कांग्रेस को बस यही दर्द है। भारतीय राष्ट्रवाद हिन्दू राष्ट्रवाद तक जाता है जिससे गैर हिन्दू राष्ट्रवादी संस्थाओं को अपनी सत्ता, सुख-चैन सब … छिनता दिखाई देता है। ऐसा कोई भी आंदोलन जिससे भारत मजबूत होगा चाहे वह अन्ना करे या बाबा रामदेव। अगर वह व्यवस्था परिवर्तन से जुड़ा है तो सरकारें उसे कुचलेंगी ही क्योंकि वह भारतीय/हिन्दू राष्ट्रवाद का जनक बन सकता है। अन्यथा यह मजाक नही तो क्या है। कि पिछले दो दशक से बाबा रामदेव, उनके सहयोगी और उनकी संस्थाए काम कर रही है किन्तु सरकार को आज उनमें कोई नेपाली गुण्डा नजर आता है तो संस्थाए करचोर। विडम्बना देखिये …. आज बाबा को व्यापारी कहकर वह सरकार निन्दा कर रही है जिसने विशुध्द भारतीय व्यापारी संत सिंह चटवाल (अमेरिका-प्रवासी) को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया है। क्या सरकार बता सकती है कि श्री चटवाल का देश के विकास में कितना अमूल्य योगदान है?

अब आगे क्या?

बाबा अनशन पर हैं और अन्ना ने लोकपाल बैठकों का बहिष्कार कर दिया है। जनता स्तब्ध है। भगवा ब्रिगेड जो स्वयं को भारतीय राष्ट्रवाद का स्वयंभू लम्बरदार मानती है मौके को भुनाने की कोशिश में हैं/ऐसे में आगे क्या? भारतीय राष्ट्र के लिए आगे के दिन उथल-पुथल भरे हैं और सरकार के लिए मुश्किल पैदा करने वाले। ऎसे में यदि सर्वोच्च न्यायालय महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाला है तो शायद बाबा और हजारे को भी अनशन नहीं अपितु जनान्दोलन करना पडेगा। अनशन भी जनान्दोलन का ही एक तरीका है किन्तु यहाँ कारागर होगा कहना मुश्किल है। संभव है कि उच्चतम् न्यायालय के निर्देश और निगरानी में बाबा का डेरा फिर दिल्ली में ही जम जाए।


शिवेन्द्र कुमार मिश्र
आशुतोष सिटी, बरेली उ. प्र.।

देश के सिस्टम पर प्रहार करता नाटक ‘फुटबाल के बराबर अंडा’ .. [नाटक ] – वीडिओ संपादन एवं प्रस्तुति श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’


चंडीगढ़। बेशक देश में लोकतांत्रिक प्रणाली है, लेकिन आम जनता क्या आजादी से अपने बारे में सोच सोचती है। क्या लोग आजादी से काम कर सकते हैं। इंसाफ पाने के इंतजार में आम आदमी मौत के द्वार तक पहुंच जाता है,लेकिन इंसाफ नहीं मिल पाता। इस सबके बावजूद आम जनता इसी सिस्टम का पालन करने को मजबूर है और मिलकर इस सिस्टम के खिलाफ आवाज नहीं उठाती।देश के सिस्टम पर प्रहार करता नाटक फुटबाल के बराबर अंडासेक्टर-17 स्थित आईटीएफटी की बेसमेंट के मंच पर पेश किया आईटीएफटी के कलाकारों ने। नाटक की कहानी में पुलिस तंत्र में फैले भ्रष्टाचार पर कटाक्ष किया गया।

अपराजिता एवं जगमीत पत्रकार तथा एसएचओ की भूमिका में
एसएचओ बेनीवाल अपने नए स्टेशन में आकर उस समय परेशान हो जाता है जब उसे पता चलता है कि उस थाना क्षेत्र में कोई चोरी या अन्य अपराध नहीं होता। वह अपने हवलदारों के माध्यम से डकैतों तक यह संदेश पहुंचाता है कि वे बेफिक्र होकर उसके क्षेत्र में अपनी गतिविधियां चला सकते हैं। इतना ही नहीं, वह हवलदार से किसी भी व्यक्ति को पकड़ लाने का आदेश देता है तो हवलदार एक तमाशा दिखाने वाले को पकड़ लाता है। एसएचओ तमाशे वाले की बुरी तरह पिटाई करवाता है जिस पर तमाशे वाले उसके खिलाफ कोर्ट में केस कर देता है। लेकिन 30 साल तक इंतजार के बाद भी उसे इंसाफ नहीं मिल पाता और अंत में इंसाफ मिलने की उम्मीद लिए ही उसकी मौत हो जाती है। तमाशे वाले का किरदार निभाने वाले अंश ने दर्शकों के दिल पर अमिट छाप छोड़ तो अन्य पात्रों एसएचओ बने जगमीत, पत्रकार बनी अपराजिता, हवलदार बने नम्रता और अमन ने भी अपने-अपने पात्रों के साथ बखूबी न्याय किया। नाटक का लेखन और निर्देश चक्रेश कुमार का था ।


घिन आने लगी है ‘घोड़ामण्डी’ से

लगते थे ….
बहुत अच्छे तुम
बातें तुम्हारी …..
सीधे दिल के अंदर
नसों में खून …..
उबलने लगता था
कुछ भी करने को आतुर

चिलचिलाती धूप में
पसीने से लथपथ ..
आते थे जब भी ..
भटकते हुए मांग कर
किसी से ‘लिफ्ट’
अथवा पैदल …

तुम्हारा भूखा प्यासा
पदयात्रा से थका चेहरा
कर देता था व्याकुल
हर गावं में मां को ..
दौड़ पड़ती थी बहना
ले पानी का गिलास
भाभी टांक देती थी बहुधा
तुम्हारे ‘फटे हुए कुरते’ के बटन
बाबा सोचते थे हरबार
देने को एक नया कुरता
मुझसे पहले ….. तुम्हें

सीखा मैंने जिज्ञासु
तुम्हारे थैले में भरी किताबों से
नैतिकता, राष्ट्रप्रेम, त्याग, समाजसेवा
इतिहास और आदर्श का हर पाठ
उत्प्रेरित हो तुमसे ही ….
……………..

किंतु ……
जबसे देखता हूँ तुम्हें…
पहने हुए तरह तरह के मुखौटे
बदलते हुए टोपियाँ …. हरपल
निकलते हुए कार से
गावं के उस मिटटी के चबूतरे का
उडाते हुए उपहास …..

धूलधूसरित मां …..
घंटों देखती रहती है
नीले, पीले, लाल, हरे,
केसरिया झण्डों को..
विस्फारित नेत्रों से ….
आज सुनती है जब
‘घोड़ामण्डी’ के भाव
थूक देती है पिच्च से ..
और उसके चेहरे पर
पढ़ते हुए भाव …..
मुझे घिन आने लगी है
तुम्हारी नौटंकी से…
तुम्हारे चेहरे से ….
तुमसे ….