मां तू वापस आ जा …. [ कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

कहाँ हो तुम आज
ओ माँ ..!

डब-डब…
गूँजती है आवाज़
आज भी ….

मेरे कानों में
और तैरता हूँ मैं
मछली की तरह
बँधा हुआ…

स्नेह की 
उसी रज्जु से

सुनता हूँ ….
धक्-धक्
पीता हुआ अमृत
आज भी ..

तुम्हारे आँचल में
और सींचता हुआ
स्वयं को

निहारते हैं
टुक्-टुक् …
मेरे दो नयन
आज भी ..

बलिहारी तेरा चेहरा
मेरी हर मुस्कान पर

माँ …
तुम्हे डर नहीं लगा
कभी भी अँधेरों से
क्योकि …
गूंजते हैं   आज भी
तेरे वे शब्द .. वीथी में
ये तेरी ….
बिटिया है.. बहना है
अपने घर ..गाँव.. देश
और परिवेश का गहना है

तू है ना .. !!
इन सब का पहरेदार
पार्वती का गणेश

यही सिखाती थीं ना?
तुम …
सारे बेटों को माँ

वृद्ध डंडा टेकते
वो बाबा…
बूढ़ी दादी की लाचारी
और वो अंधा भिखारी
अरे ! उस जानवर को
डंडा मत मारना
उसके पेट में बच्चे हैं
वो माँ है.. मेरी तरह
इनकी रक्षा करते हैं
सीख देती …
मुझे सब याद है माँ

दुखी हूं मैं आज मां
ये मेरे नन्हें ..
मेरे छोटे ..सब भटक गए हैं
देख….
ये सबको कब से छेड़ रहे हैं
और 
मेरी नसों में …
दौड़ रही है बिजली

क्या तू कहीं खो गई है मां 
शायद …
किसी ब्यूटी पार्लर में..
या फिर ….
पश्चिमी आधुनिकता की
अंधी चकाचौध में
तू वापस आजा माँ

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