धरती के फूल … [ कविता ] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

धरती के फूल
उग आए हैं इस बार….
राजनीति की आँधी,
और आतंक की बेमौसम
‘मुंबई बरसात’ से

होती हैं जड़ें बहुत गहरी
सुना है पाताल तक …
धरती के फूल की
कंक्रीट के जंगल में
पांचसितारा संस्कृति में
परोसे जाने वाले व्यंजन ने
फैला दी है अपनी
खेत खलिहान …
विलोपित जंगलों से लाई
खालिश देशज उर्जा
..और माटी की गंध सड़कों पर

धरती के फूल ……
यानी कुकुरमुत्ते की जाति…
उगते हैं उसी जगह
जहाँ करते हैं बहुधा ‘कुत्ते’
टांग उठाने की राजनीति
गाँव की ‘विलुप्त-बिजली के खम्भे’ पर
प्रधान जी के ‘स्कूलनुमा-बारातघर’ में
अथवा ‘भीड़तंत्री-गाड़ी’ के
‘अन्तुलाते’ ’दिग्विजयी’ पहिये पर
वोटबैंक की तुच्छ बीमारी से लाचार.. ..
सत्तालोलुपता से दंशित राष्ट्र
पी सकेगा क्या …?कभी भी ...!!
राष्ट्रीय स्वाभिमान का
उर्जावान पंचसितारा सूप
मिट्टी से पैदा धरती के फूल का

©तृषा’कान्त’

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आतंकवाद-सब कुछ अमेरिका करेगा-तो तुम क्या करोगे…? [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

मुम्बई पर दूसरे आतंकी हमले की बात अति सुन्दर पाकिस्तानी विदेश मंत्री की भारतीय यात्रा और संसद सत्र के आरम्भ होते ही पुरानी सी हो गयी है। साथ ही साथ भ्रष्टाचार की गंगोत्री में सभी राजनीतिक दलों ने इतने गोते लगाये हैं कि आरोप प्रत्यारोप की सुनामी में साधारण जनमानस के विवेक का आहरण हो गया सा लगता है। आखिर हम भारतीय ही हैं न..? एक के बाद एक खुलासे के बाद भी हम चुप हैं क्योंकि देश की आजादी के बाद हम ….. बस ताली बजाना सीख चुके हैं।

अब बस युवाओं से ही उम्मीद बची है किन्तु दुर्भाग्य से वह भी आरक्षण और अनारक्षण की रेखाओं उलझे हुये हैं ..। आज आतंकवाद सहित अनेकों पृश्न राष्ट्र के सम्मुख मुंह बाये खड़े हैं … ?? इन्हीं प्रश्नों के आलोक में आतंक के विषय पर शिवेन्द्र कुमार की यह प्रतिक्रिया समयिक लगती है। – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

  हमारे यहा रोज आतंकी हमले होते हैं। हर आतंकी हमले के बाद हमारे मीडिया मुगल बुद्धिजीवी सम्राट चिल्लाने लगते है- ”अमेरिका को पाकिस्तान पर दबाब डालना चाहिए”। उसकी सहायता रोक देनी चाहिए। उसको पाकिस्तान के साथ ऐसा करना चाहिए वैसा करना चाहिए। कोर्इ भी पाक आतंकी अमेरिका में पकडा गया या वहा किसी मुकदमें में उसने बयान दिया कि हमारी चिल्ल पो शुरू हो जाती है- अमेरिका में पाकिस्तान नंगा। ”पाकिस्तान एक बार फिर दबाब में। भारत में आतंकी हमले के राज अमेरिका में आतंकी ”क ने उगले। पाक आर्इ0एस0आर्इ0 का अब होने के सबूत। सरकार भी धीरे से कहती है।” अमुक मैत्री के दौरे में अमेरिका से पाक पर दबाब बनाने को दबाब बनाया जायेगा।”
अब इतसे कोर्इ यह पूछे कि :- भैय्या अगर सब कुछ आपके लिए अमेरिका करेगा तो आप क्या करेगें। कुछ करेगें भी कि नही। शायद इनका जबाब हो:- करेगें न देश की आबादी जो 1947 में 35 करोड थी। अब 2011 में 121 करोड कर दी। अगले ही दशक में 2 करोड करेगें। 1954-55 में जो कमीशन कुछ लाख रू0 या जीपें होती थी। अब हमने लाखों करोड कर दिया। आगे करोडों करोड तक ले जायेगें। पहले विधायको,सांसदों को पार्टी बदलवाते थे। अब कौरी तौर पर खरीद लेते है। आगे दैनिक मजदूरी पर लिया करेगें। हमने कफन बेचा,जमीन बेची,राष्ट्रीय महत्व के कामों में कमीशन खाकर राष्ट्रीय असिमता बेची,रक्षा के जरूरी उपकरणों में कमीशन खाकर देश बेचा, और आगे भी ये काम बदस्तूर करते रहेगें। अब अमेरिका हमारा थोडा काम कर देगा तो घिस थोडे ही जायेगा। और न करे तो हमी कौन उससे पाकिस्तान को धमकियाने के लिए मरे जाते है। वो तो हम कहते है। वो भी इसलिए कि नही तो कमबख्त जनता हमारे ही पीछे पड जायेगी कि तुमने ये नही किया तुमने वो नहीं किया।
हम इतने भी नासमझ नही कि ये न समझे कि अमेरिका क्या कर सकता है अथवा क्या करेगा। वियतानाम,इराक,अफगानिस्तान में अमेरिका ने कौन सा कददू में तीर मारा वो भी अपने लिए जो हमारे लिए पाकिस्तान में मारेगा। फलस्तीन समझौता कराकर कौन सा पानी डालकर आग बुझा दी। जब देखो तब इजराइल पेट्रोल डालकर अमेरिकी लाइटर से आग जला देता है। अगर हमें करना होता तो हम कर ही डालते। हमने पाकिस्तान को तोडकर बांग्लादेश बना डाला तो क्या अमेरिकी नानी के बालो का बिग पहनकर बांग्लादेश बनाया था। मि0डरावाले और पंजाब में आंतकवाद को नेस्तनाबूद कर दिया तो क्या वहा सैम अंकन बन्दूक चलाने आया। हमें इतना भी मूरख न समझों। वो तो हम है जो देश को इस गाने में लगा देते है- हम होगें कामयाब,हम होगें कामयाब,हम होगें कामयाब एक दिन।” और ये एक दिन का इंतजार करते है। और हम ये एक दिन का इंतजार करते है और हम हर घण्टे मौज।

सम्पादन – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

मुम्बई हमले के एक वर्ष उपरांत … [आलेख एवं वीडिओ] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

[……. यथार्थ में आतंकवाद का दोषी कौन … क्या वो हाथ जिन्हें जन्म लेते ही बंदूक थमा दी गयी हैं अथवा वो मस्तिष्क जो अपने स्वार्थ के लिये आतंक की फैक्ट्री चलाते हैं ” स्वर अब तक कानों में गूंज रहे हैं …]

26/11 का आतंकवादी हमला. सम्पूर्ण घटनाक्रम के वीभत्स दृश्य एक वर्ष उपरांत ….. आज भी मस्तिष्क में ताजा हैं. सारे राष्ट्र में विभिन्न मंचों पर पक्ष विपक्ष में गरमागरम बहस के बीच बंद मुठ्ठी में फंसी रेत की तरह आज एक और वर्ष फिसल गया. गढ़्चिरौली में नक्सली गुटों द्वारा मारे गये 17 पुलिसवालों के रोते विलखते परिवारॊं … तथा टी वी पर छिड़ी नक्सल आंदोलन के पक्ष विपक्ष में बहस से आहत मन को चारो ओर पांव पसारते आतंक के वर्तमान परिवेश में पिछले दिनों स्कूल के बच्चों में आतंकवाद पर छिड़ी बह्स में एक बच्चे के शब्द “ …… मेरे पूर्वजों ने मेरे पीछे की पीढ़ी को एक शांत वातावरण दिया .. किन्तु आज हमारे अभिभावक समाज ने हमें चारों ओर आतंक की चीख पुकार क्यों दी है ……. यथार्थ में आतंकवाद का दोषी कौन … क्या वो हाथ जिन्हें जन्म लेते ही बंदूक थमा दी गयी हैं अथवा वो मस्तिष्क जो अपने स्वार्थ के लिये आतंक की फैक्ट्री चलाते हैं ” स्वर अब तक कानों में गूंज रहे हैं अंग्रेजी में दिये हुये भाषण की वीडिओ के कुछ अंश हमारे आत्म मंथन के लिये पर प्रस्तुत है इसे देखें सुने और अनुभव करें. प्रस्तुत वीडिओ के प्रश्नों के आलोक में सोचें कि आतंकवाद के विरुद्ध विश्वव्यापी अभियान में विगत एक वर्ष में हमने कोई सकारात्मक सहयोग किया है अथवा कुछ और किया जा सकता है. आपकी प्रतिक्रिया की मुझे व्यग्रता से प्रतीक्षा रहेगी …
….
आतंकवाद का दोषी कौन
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धरती के फूल

धरती के फूल
उग आए हैं इस बार….
राजनीति की आँधी,
और आतंक की बेमौसम
‘मुंबई बरसात’ से

होती हैं जड़ें बहुत गहरी
सुना है पाताल तक …
धरती के फूल की
कंक्रीट के जंगल में
पांचसितारा संस्कृति में
परोसे जाने वाले व्यंजन ने
फैला दी है अपनी
खेत खलिहान …
विलोपित जंगलों से लाई
खालिश देशज उर्जा
..और माटी की गंध सड़कों पर

धरती के फूल ……
यानी कुकुरमुत्ते की जाति…
उगते हैं उसी जगह
जहाँ करते हैं बहुधा ‘कुत्ते’
टांग उठाने की राजनीति
गाँव की ‘विलुप्त-बिजली के खम्भे’ पर
प्रधान जी के ‘स्कूलनुमा-बारातघर’ में
अथवा ‘भीड़तंत्री-गाड़ी’ के
‘अन्तुलाते’ पहिये पर
वोटबैंक की तुच्छ बीमारी से लाचार.. ..
सत्तालोलुपता से दंशित राष्ट्र
पी सकेगा क्या …?

इसबार ……
राष्ट्रीय स्वाभिमान का
उर्जावान पंचसितारा सूप
मिट्टी से पैदा धरती के फूल का