अथ श्री नारायण कथा .. [ आलेख ] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’


..एनडी तिवारी के खून का नमूना लिया गया—

 ….उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को पहलीबार सम्भवत: 1974-75 में संजय गान्धीके पैर छूते हुये उस आयु में देखा गया था जब वह इन्दिरा गान्धी की आयु के समकक्ष थे.. वह प्रसंग राजनीत हलकों में मुख्यमन्त्री पद की गरिमा के साथ बहुत सारी टीका टिप्पणी के साथ शान्त हुआ। नारायण जी ने कहा मैं इन्दिरा जी को बहन मानता हूं अत: श्री सन्जय गान्धी मेरे भांजे हैं। ब्राह्मण समुदाय में भांजे के पैर छूने की प्रथा को आगे लाकर उस विषय को किसी तरह शान्त किया गया था। वास्तविकता क्या थी वह सब जानते थे किन्तु उत्तर प्रदेश की जनता ने पहली बार अपने आपको लज्जित अनुभव किया था। उसके बाद देश में आपात स्थिति सहित जो भी हुआ वह .. इतिहास है । ……. एक और घटना नारायण कथा के अनेक प्रसंगों में से उल्लेखनीय है। पहली बार देश का कोई मुख्यमन्त्री दिल्ली से सड़क मार्ग से कार द्वारा निकला। सुधी मित्रों को अधिक स्मरण हो तो रास्ते में ही किसी ढाबे पर अथवा किसी अन्य ऐसे ही किसी स्थान पर अपनी सुरक्षा में सन्नद्ध कर्मियों को धता बताकर गायब हो गये। यह विगत समय के अरूणाचल एवं आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमन्त्री के हेलीकाप्टर के गायब होने वाली घटनाओं से कहीं अधिक बड़ी घटना थी। देश के सबसे बड़े प्रांत उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री लापता। सारे देश में लगभग लगभग हाहाकार मच गया। पुलिस से लेकर सुरक्षा तन्त्र की सभी एजेन्सियां खोजने में जुट गयीं। सम्भवत: साढ़े तीन घण्टे के उपरान्त मुख्य मन्त्री जी स्वयमेव प्रकट हो गये कि किसी रिश्तेदार के यहां मिलना था सो चले गये। गोया मुख्यमन्त्री पद पर पदासीन कोई जिम्मेदार व्यक्तित्व न होकर शेखचिल्ली मियां थे जो जिधर मन किया मुंह उठाया चल दिये। सम्भवत: सम्मेलन के स्थान पर कहीं कोई गोपनीय सम्मिलन कार्यक्रम था जो अगले दिन सभी समाचार पत्रों में सुर्खियों के साथ छपा था। ऐसे ही महान व्यक्तित्व की अनगिनत महान गाथायें हैं इतिहास बनाने के लिये … उनके पौरूष पर चर्चा भी सुर्खियों में रही है । बात कुछ अशोभनीय हो जायेगी .. अत: सभी बचे खुचे बुज़ुर्गों की इज़्ज़त का ध्यान करके अब मुंह बन्द कर लेना ही उचित है। अथ श्री नारायण कथा ।

©तृषा’कान्त’

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आत्याचारम् प्रणमामि …. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

लो स्वीकारो साधुवाद
कोटिश धन्यवाद
सादर प्रणाम
ओ मेरे वैचारिक आक्रान्ता

विश्वासघात
झूठ और फ़रेब तुम्हारा
हैं मेरी अनमोल निधि
और श्वास ..
चिर अक्षुण अक्षय
आत्याचार तुम्हारे

है अस्तिव तुम्हारा
मेरे कवि जीवन की थाती
तुमने ही तो दिया जन्म
कागज पर ‘कान्त’ बनाकर

कभी किया निष्काषन
घर से गाँव से
नैसर्गिक अधिकार से
स्तम्भित मत हो
प्रभो, प्रणाम स्वीकारो
ये जो पीछे भीड़ खड़ी है
उसे मत चकित निहारो
ये सब तो हैं आज
हमारे मीत…
किन्तु तुम ….
विगत कटु अतीत
आज आये हैं
यह सब मेरे साथ
आपका अभिनन्दन ..!

क्योंकि आपके
सत्ता और शोषण से
अनृत के पोषण से
तर्क पर कुतर्क से
शास्त्र पर शस्त्र से
विजयाभियान ने
स्रजित किया है
निरा निरीह करूण क्रन्दन

मत संकोच करो हे तात
जन्मदाता तुम कवि के
क्योंकि
तुम अटूट बेशर्म
तुम्हीं से युग चलता है
‘ विघटन’ का हर सूत्र
स्रजित तुमसे होता है

हे.! महाभ्रष्ट. पथ दिग्भ्रामक
बढ़ाना थोड़ा सा कुछ और
झूठ …… पाखण्ड …..
जन उपेक्षा और स्वार्थ
होगा तभी अमर शायद
युग-युग तक नाम तुम्हारा.

अतः हे श्रद्धेय या जाने हेय
तुमको प्रणाम तुमको प्रणाम
त्राहिमाम् त्राहिमाम्
©तृषा’कान्त’

निजी एयरलाइन को जनता के पैसे की रेवड़ी.. [समाचार प्रतिक्रिया] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

क्या भविष्य में किसी निजी कम्पनी के स्वामियों द्वारा ऐयाशी करते हुये उसे दुरूह स्थिति में पहुंच जाने पर व्यक्तिगत सरकारी सम्पर्क के बल पर जनता के पैसे से कम्पनी को उसके हाल पर छोड़ कर पुन: उसी ऐयाशी में सलग्न हो जाने का रास्ता खुल चुका है

निरंकुश स्वामित्व और प्रबन्धन को उसके किये गलत निर्णयों का दण्ड मिलने के स्थान पर पुरस्कार दिया जा रहा है। आर्थिक दुष्प्रबन्धन का इससे बड़ा कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलेगा

कोई व्यवस्था इस देश में है .. वेतन पर्ची से अग्रिम टैक्स देनेवाला वेतनभोगी व्यक्ति टैक्स देते देते मरा जा रहा हूं। उसके बच्चों के साधारण खर्चों के लिये, रसोई सहजता से चलाने के लिये तथा घर बनाने के लिये पैसे नहीं हैं और सरकार अपने मित्रों को कर्ज़ के नाम पर उदारता से पैसे बांट्ती जा रही है । कम्पनी अपनी ऐयाशी से पुन: उसी स्थिति में नहीं पहुंच सकती .. ??

सांप्रदायिकता बनाम बहुलतावाद कुछ ज्वलन्त प्रश्न एवं विश्लेषण . . . . [आलेख] – शिवेंद्र कुमार मिश्र

…. चोट तुम्हें भी लगी है और घाव हमने भी खाए हैं । अगर तुम हमेशा अपनी चोटें खुली रखोगे तो घाव सीना हम भी सीख नहीं पायेंगे। अत: उचित समय है कि इन कठमुल्ला, मौलवियों, पणिडतों और ढोंगी भगवाधारियों, बुद्धिजीवियों, नेताओं, कथित मानवाधिकार एवं सोशल कर्मियों और मीडिया की फ्लश लाइटों से बचिए। दो कदम तुम चलो और दो कदम हम चलें ताकि इस बहुलतावादी समाज को बचाया जा सके वरना कोर्इ राक्षस ब्रोविक पैदा हो जायेगा।

  प्रात: प्रतीची से उदित होते हुए सूर्य की प्रथम रश्मि संग कभी मंदिरों से प्रात:कालीन आरती और भजनों की यान्त्रिक और मानवीय ध्वनि सुनार्इ दिया करती थी किंतु अब ऐसी ध्वनियां विशेषत: मानवीय ध्वनियां अतीत की बात हो गर्इ हैं। अजान के स्वर अब भी मुंह अन्धेरे ही सुनार्इ देते हैं और साथ ही कावा में दफन होने की ख्वाहिश और किसी गाजी की प्रशंसा के गीत भी। मैं पंथनिरपेक्षता में पूर्ण विश्वास करता हूँ किंतु यह पंथनिरपेक्षता धार्मिक सहिष्णुता के गर्भ से उत्पन्न होती है और इसका समर्थन संविधान भी करता है। किंतु यह दुर्भाग्य है कि जब हमारे देवी-देवताओं के भजन-कीर्तनों के कार्यक्रमों को भी यदा-कदा छोटी सी शिकायत पर बन्द करा दिया जाता है और हमारे लोग नपुसंक क्रोध से मुठिठयां भींचते रहते हैं। दूसरी तरफ अन्य मत के लोग जरा सी बात पर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। दुकाने फूंक दी जाती हैं। लोग मार दिए जाते हैं। थोड़े दिन कर्फ़्यू लगता है। यदि हिंसा एक विशेष प्रकार के लोगो के खिलाफ होती है तो पंथनिरपेक्ष प्रशासन, आधुनिकता, पंथनिरपेक्षता के प्रतीक बुद्धिजीवी, मीडिया कोर्इ भी इस बात पर ध्यान नहीं देता। जबकि आतंकवाद के नाम पर ऐसी सुनियोजित हिंसा  कई बार किसी क्षेत्र विशेष से हिन्दू आबादी को निर्मूल कर देती है और कहीं कोई आवाज तक नहीं आती। शायद स्मृति पर बल दें तो स्मरण आ जाए। एक दशक पूर्व की एक हृदय विदारक घटना। जब कश्मीर घाटी एवं पाकिस्तान एक भयंकर भूकंप का शिकार हुआ था। अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के दौरे पर थे। ऐसे समय में भी जिहादी आतंकवादियों ने उस मानवीय आपदा के भीषण क्षणों में भी लगभग दस सिखों की नृशंस हत्या कर दी थी। 

  एक समाचार बरबस मेरा ध्यान खींचता है। केरल की विधानसभा में प्रस्तुत किए जाने हेतु प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण संबंधी एक बिल पर कैथोलिक चर्च द्वारा उठार्इ गर्इ आपत्ति। इस बिल में दो से अधिक संतान उत्पन्न करने वाले को 10000-रू0 अर्थदण्ड या एक वर्ष की सजा या दोनो का प्राविधान है। चर्च की आपत्ति निरन्तर कम होती र्इसार्इ जनसंख्या एवं हिन्दू जनसंख्या की ओर है। चर्च ने अपने हिन्दू मित्रों का ध्यान आकृष्ट करते हुए केरल के शीघ्र ही मुस्लिम बाहुल्य राज्य मे परिवर्तित हो जाने का उल्लेख किया है। अन्य संप्रदायों की तुलना में एक पंथ विशेष के अनुयायियों की बढ़ती जनसंख्या, जनसांख्यिक एवं राजनैतिक विषमता तो उत्पन्न करेगी ही।

  यह चिन्ता मेरे जैसे कलमघिस्सू भारतीय हिन्दू की ही हो ऐसा नहीं है। इसके सरोकार विश्व व्यापी हैं। यदि आपकी स्मृतियों पर समय की धूल की मोटी परत न चढ़ी हो तो मैं आपका ध्यान नार्वे की एक हिंसक घटना और उसके कर्ता की चिन्ताओं की ओर ले जाना चाहता हूँ। यहां स्पष्ट कर दूँ कि उस हिंसक घटनाकाण्ड की न तो प्रशंसा की जा सकती है और ही उस आतातायी की। किंतु यदि हिंसा के मूल में उस अपराधी की चिन्ताओं के सरोकार पर ध्यान न दिया जाए तो यह न्याय और बदलते मानविकी भूगोल से मुंह मोड़ लेना होगा।

  जुलार्इ 2011 यूरोप के सामान्यत: सबसे शान्त देश नार्वे में एडर्स बेहरिंग ब्रेविक नामक एक नवयुवक ने एक भीषण नरसंहार को अंजाम दिया। लगभग 98 लोग मारे गए। हम इस युवक को बड़ी सहजता से विक्षिप्त या मानसिक रोगी करार दे सकते हैं। किंतु सच्चे जनतंत्र में विक्षिप्तों और मानसिक रोगियों को भी सुने जाने में कोर्इ हानि नही है। यहां भारत में हम उच्च पदस्थ मानसिक रोगियों को नित्य ही सुनते हैं और मीडिया में उन्हे प्रमुखता भी मिलती है तो ब्रेविक को सुने जाने में भी हानि नही है।

  ब्रेविक द्वारा 1500 पन्नो में लिखे अपने दस्तावेज – 2083 : अ यूरोपीय डिक्लेरेशन आफ इण्डिपेंडेंस में अपनी चिंताओं को व्यक्त किया है। ब्रेविक की चिंताओ में बहुलतावादी यूरोपीय समाज में मुसिलमों द्वारा स्वंय को अलग-थलग रखने, पाकिस्तान में हिन्दू, र्इसार्इ, अल्पसंख्यकों का बलात धर्मान्तरण आदि और दूरगामी चिंताओं में यूरोप में अनेक छोटे-छोटे मुस्लिम राष्ट्रों की कल्पना आदि थी। वस्तुत: उसने बहुलतावादी संस्कृति के उस स्वरूप पर भी सवाल उठाए हैं जहां मुस्लिम लड़कियों को यूरोपीय समाज में मिश्रित होने पर पाबन्दी होती है और मुस्लिम युवक नार्वे की लड़कियों को अच्छी नजर से नही देखते।

  क्या भारत में भी मुसलमान बहुसंख्यक अथवा अन्य अल्पसंख्यक समाजों के साथ मिश्रित नहीं होते ? भारत में यह समस्या अन्य रूप में है। आम मुस्लिम जन समाज के शेष हिस्से के साथ न केवल मिश्रित होना चाहते हैं अपितु वह स्वंय को शेष समाज का अविभाज्य अंग मानते हैं किंतु यहां के कुछ खास मानसिकता के लोग जो राजनेता, बुद्धिजीवी अथवा मीडियाकर्मी हो सकते हैं। यह नहीं चाहते कि मुस्लिम समाज शेष समाज से एकाकार हो और साझा सोच व संस्कृति का विकास हो। गुजरात दंगो के नाम पर एक विशेष प्रकार की मानसिकता के लोगो को लगातार वरीयता देना, वस्तनावी जैसे आधुनिक प्रगतिशील मुस्लिम विचारक को राष्ट्रीय पटल से पीछे धकेल देना ऐसी ही घटनाएं हैं। इतना ही नही जब अन्ना के आन्दोलनकारी भी मौलाना बुखारी जैसे कटटरपंथियों के यहां उन्हें मनाने पहुंचते हैं तो निशिचत रूप से किसी भी बहुलतावादी समाज में कटटरपंथियों की जिद को वरीयता मिलती है। ऐसे कटटरपंथियों को दुत्कारा जाना चाहिए भले ही वह दाढ़ी वाले हों या टोपी वाले।

  किसी भी ऐसे समाज में जहां विभिन्न, आस्थाओं, मान्यताओं वाले लोग एक साथ रहते हो वहां पारस्परिक समांजस्य एवं सदभाव का दायित्व आम नागरिकों से लेकर बुद्धिजीवियों, सत्ताधीशों एवं समुदाय के नेताओं का समान रूप से होता है। सांप्रदायिक घटनाओं पर समय की धूल डालना, हर प्रकार के कटटरपंथ का कठोरता से दमन, समुदाय को दी जाने वाली सुविधाएं सभी समुदायों को समान रूप दिया जाना, इस सामंजस्य के लिए आवश्यक है। मुस्लिमों को हजयात्रा पर सब्सिडी समझ में आती है पर यही छूट सिक्खों, र्इसाइयों और हिन्दुओं को क्यों नही मिलनी चाहिए।

  गोधरा के दंगो और मोदी को निरन्तर नए जख्म जैसे दुष्प्रचार के रूप में एक दशक से प्रस्तुत किया जा रहा है। तो क्या हाशिमपुरा, मलियाना के दंगो को भी मुसलमानों को याद नहीं रखना चाहिए। एक पूर्व प्रधानमंत्री का सिक्खों के नरसंहार पर दिए गए वक्तव्य को याद करिए – एक बड़ा वृक्ष गिरता है तो थोड़ा बहुत तो धरती कापंती ही है। सन 84 के दंगो को नरसंहार क्यों न कहा जाए। वर्ष 1916 गांधी के खिलाफत असहयोग के कार्यकाल के भीषण मोपला दंगो को याद करिए जहां हजारों हिन्दुओं का कत्ल हुआ, बलात्कार और बलात धर्म परिवर्तन हुए और गांधी तथा उनकी कांग्रेस एक निन्दा प्रस्ताव भी अपराधियों के विरूद्ध पास न कर सकी। डा0 अम्बेडकर जैसे विचारक भारत में सांप्रदायिकता की शुरूआत खिलाफत असहयोग से ही मानते हैं और उक्त दंगो की भीषण निन्दा भी करते हैं। (पाकिस्तान अथवा भारत विभाजन – डा0 बी0आर0 अम्बेडकर) अन्तत: सभी दंश समाज ने भुलाए ही हैं। चोट तुम्हें भी लगी है और घाव हमने भी खाए हैं । अगर तुम हमेशा अपनी चोटें खुली रखोगे तो घाव सीना हम भी सीख नहीं पायेंगे। अत: उचित समय है कि इन कठमुल्ला, मौलवियों, पणिडतों और ढोंगी भगवाधारियों, बुद्धिजीवियों, नेताओं, कथित मानवाधिकार एवं सोशल कर्मियों और मीडिया की फ्लश लाइटों से बचिए। दो कदम तुम चलो और दो कदम हम चलें ताकि इस बहुलतावादी समाज को बचाया जा सके वरना कोर्इ राक्षस ब्रोविक पैदा हो जायेगा।
©तृषा’कान्त’

अन्ना आन्दोलन बनाम भ्रष्टाचार …….. [आलेख] – शिवेंद्र कुमार मिश्र

पूज्य अन्ना का जनान्दोलन भ्रष्टाचार के विरूद्ध सशक्त विधायी संस्था लोकपाल की माग के साथ प्रारम्भ हुआ। देखते ही देखते लगातार की गर्इ रणनीतिक त्रुटियों के कारण यह आन्दोलन तीव्र गति पकड़ गया। जिन्हें जेoपीo के आन्दोलन की याद थी वह इससे तुलना करने लगे। लोकपाल का स्वरूप धीरे-धीरे स्पष्ट होने लगा।रामलीला मैदान का जनसैलाब न उन लोगों का हे जिन्हें भ्रष्टाचार की पर्याप्त समझ है और न ही उन लोगों का जो अण्णा की तरह शुचिता का दम भर सकें और अण्णा की ही तरह यह दावा कर सकें कि उनके दामन पर एक छोटा सा भी दाग नहीं है। मेरे एक मित्र का मानना है कि यह लोग जो भ्रष्टाचार किए हैं अथवा करते हैं वह तंत्र का दबाब है न कि उनकी स्वेच्छा। क्या अण्णा के सहयोगी भी ऐसा ही मानते हें। लगता तो नहीं। वह लोग टीoवीo चैनलों पर जो दावे कर रहे हैं उससे तो लगता है कि वह एक ऐसा तंत्र चाहते हैं जो चपरासी से लेकर प्रधानमंत्री तक की जाच कर सके। वह सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तक को इसकी परिधि से मुक्त नहीं करना चाहतें। राजनेताओं के साथ साथ राजकीय कर्मचारी विशेष रूप से उनके निशाने पर है। जहा तक राजकीय कर्मचारियों का प्रश्न हैं तो वह बलि का बकरा बन चुका है। उसकी साख का जनता के बीच समाप्त होने की बडी वजह उसके राजनैतिक और आर्इoएoएसo सम्प्रभु है। मित्र की बात का यदि समर्थन करें तो उसके भ्रष्टाचार की एक बडी वजह तंत्र का दबाब उसके विरूद्ध अपनी सम्पूर्ण र्इमानदारी के साथ न लड़ पाने की उसकी अक्षमता जिसके पीछे प्राय: उसका परिवार और कभी-कभी जनदबाव भी रहता है। जनदबाब ऐसे भ्रष्टाचार का समर्थन,प्रोत्साहन अपने निजी समूहगत कारणों से करता है। यानी कि कह सकते हैं कि जनसंस्थाएं भी ऐसे भ्रष्टाचार का बडा कारण हैं।


तथाकथित सिविल सोसाइटी इन जनसंस्थाओं द्वारा किए जाने वाले भ्रष्टाचार के बारे में कुछ भी नहीं कहती। मसलन अण्णा कहते हैं कि उन्होने अपनी संस्थाओं के लिए करोडों के प्रोजेक्ट लिए किन्तु कभी भी एक भी पैसा रिश्वत नहीं दी तो क्या सभी और उनके कर्ता धर्ता ऐसा ही दावा करता हैं। सब लोग जानते है कि एनoजीoओo अपनी संस्थाओं के लिए फण्ड लेने के लिए कैसी मारकाट करते हैं और क्या-क्या हथकण्डे अपनाते हैं। तो सारे एनoजीoओo लोकपाल के दायरें में क्यो नहीं आने चाहिए?

आप सभी जानते हैं कि भारत की लगभग 70प्रतिशत जनता वह है जिसकी दैनिक व्यय क्षमता 20रूo मात्र है। देश की अदालतों में करोडों मामले जो लमिबत है वह अधिकांशत: इसी जनता के है। प्रशान्त भूषण और शान्तिभूषण जैसे लोग भली भांति जानते हैं कि हमारे वकील मित्र अपने क्लाइण्ट से फीस की वसूली कितना चेक के माध्यम से करते हैं या कर सकते हैं। उनकी ऊँची-ऊची फीसे और कानूनों के मकडजाल से खुद को सुरक्षित रखने की उनकी काबिलियत किस तरह से सुरक्षित दूरी पर रहते हुए भी तथा कथित न्यायिक भ्रष्टाचार को बढावा देने में सहायक होती है और वह स्वयं इसमें लिप्त रहते हैं। यह बात किसी से छिपी नहीं हैं। इनको लोकपाल या किसी के कठोर नियंत्रण में लाए जाने की आवश्यकता क्यो नही है। चेरेटी के नाम पर चलाए जाने वाले अस्पताल एवं विभिन्न संस्थाए किस प्रकार की चेरिटी कर रही हैं। यह छिपी हुर्इ बात नहीं है। 

शायद आप सहमत हों कि यह संस्थाएं स्वयं तो आयकर मुक्त जीवन बिताती ही हैं दूसरों को भी आयकर चोरी में सहायता करती हैं। इन्हें लोकपाल या उससे भी सख्त संस्था के दायरे में क्यो नहीं आना चाहिए।

अण्णा की र्इमानदारी या सत्यनिष्ठा पर कोर्इ दाग नहीं है। क्या ऐसा ही अण्णा के बाकी सहयोगी भी कर सकते हैं अथवा उनके दावे पर भरोसा किया जा सकता है। मैगसेस पुरस्कार विजेताओं को विभिन्न मानवीय मनोवैज्ञानिक कारणों से हताशा एवं अवसाद ग्रस्त ऐसे लोगों की आड में जो वहा पर अपनी अपनी समझ के भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए इकटठा हैं जैसे महगार्इ,गलत भूमि कानूनों के शिकार,आदि क्या लोकतांत्रिक विधि मूल्यों से खिलवाड की इजाजत दी जानी चाहिए।

अब हम जे0पी0 आन्दोलन के आर्इने में भी जरा झांक लें। जे0पी0 ने सत्ता को एवं प्रजातांत्रिक मूल्यों को बंधक बनाने का आन्दोलन नहीं चलाया। उन्होने सत्ता परिवर्तन कर प्रजातांत्रिक मूल्यों की पुर्नस्थापना का आन्दोलन चलाया किन्तु अण्णा के शूरवीर ऐसी कोर्इ माग नहीं करते। इतना ही नहीं जनता के नाम पर पारदर्शिता की कोर्इ बडी लकीर भी वो खींचना नहीं चाहते। उदाहरणार्थ वह लोग सरकार पर तो यह आरोप लगा रहे हैं कि वह एक लचर बिल प्रस्तुत कर रही है और जनलोकपाल बिल के प्राविधानों को जा ज्यादा भ्रष्टाचार विरोधी हैं संसद के समक्ष प्रस्तुत किए जाने वाले प्रस्ताव में शामिल नहीं कर रहे। अब वह अपना ही जन लोकपाल बिल प्रस्तुत करने पर अडे हैं। क्या यह उचित समय नहीं है कि हम अपने प्रजातंत्र को अधिक पारदर्शी बनाएं और लोकपाल के विभिन्न ड्राफ्ट जनता की रायशुमारी के आधार पर तैयार करें और फिर जनमत संग्रह के आधार पर उसको पारित कराएं। मैं मानता हू यह रास्ता लम्बा है किन्तु प्रजातंत्र को भीड द्वारा बन्धक बनाए जाने के तरीके से कहीं बेहतर। देश गांधीवादी अंहिसात्मक आमरण अनशन जो प्रजातांत्रिक मूल्यों के नाम पर किए गए थे कर्इ दुष्परिणाम आज तक भोग रहा हैं। कहीं ऐसा न हो अण्णा अनशन से उत्पन्न दुष्परिणामों से भावी पीढि़या कराहती रहें। 

चक्रव्यूह में … अभिमन्यु …. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

घिर गया है फिर…..
चक्रव्यूह में …
आज का अभिमन्यु
भ्रष्टाचार का दुर्योधन
सत्ता के रथ पर सवार
कर रहा है निरंतर
वार पर वार

राजनीति के द्रोणाचार्य ने
रचा है मानव मूल्यों से दूर
अनैतिकता का व्यूह
सत्ता की भूमि जायेगी
शायद इस बार
इनके साथ साथ
मृत्यु महानद के पार
अब किसी भोज का
‘शोणित पत्र’ करता नहीं
विचलित इन्हें

वंचना के कृपाचार्य
कीर्ति कवलित कर्ण
मानव मर्यादाओं से दूर
राष्ट्र अभिमन्यु पर
नित नवीन वार

देशप्रेम नैतिकता
निष्ठा के अर्जुन
घिर गये हैं
समरांगण से दूर

क्षत विक्षत घायल
आज फिर अभिमन्यु
परिचित अपरिचित
एक द्रष्टि
उसके तुणीर में
एक नयी स्रष्टि
शिष्य हूँ कृष्ण का
रणछोड घरछोड क़ा
होगी नहीं पुनरावृत्ति
उस विगत इतिहास की

अतः हे तात
आधुनिक राष्ट्र के दुयोधन
और सप्त महारथी सुनो
जन्म ले चुका है
एक नया अभिमन्यु
 इस राष्ट्र के गर्भ से

अन्ना आन्दोलन के सौन्दर्यवादी तत्व [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

पिछले कुछ दिनों से अन्ना के आन्दोलन की हर तरफ धूम है। पिछले दिनों अन्ना तिहाड़ में थे और लोग सड़कों पर। ऐसे ही समय एक सुबह आपने शायद अपने टी0वी0 स्क्रीन पर सड़क पर अखबार बिछाकर अपने पिता की गोद में सर रखकर निशिचन्तता से सोर्इ हुर्इ एक 14-15 वर्षीया मासूम सी बालिका को देखा होगा। उसके पिता ने टी0वी0 संवाददाता को शायद बताया था कि उसके तीन बच्चे है। वह उन्हें इस आन्दोलन में इसलिए लाया था ताकि वह स्वयं देख सके। और महसूस कर सके कि उनके भविष्य की बुनियाद ऐसे ही आन्दोलनों से मजबूती से रखी जा सकेगी। कुछ ऐसा हो।

आपने उस सोती हुर्इ मासूम बालिका के चेहरे को गौर से देखा? क्या लगा? मुझे तो लगा जैसे कोर्इ योद्धा युद्ध के कुछ समय के लिए थम जाने के कारण सो गया हों। चलो कुछ देर थकान उतार लें ” लेकिन जैसे ही कोर्इ आहट होगी अपनी बन्दूक थामें उठ जायेगा और चीखेगा”थम। पिता की गोदरूपी बैरक उसकी सुरक्षित चाहर दीवारी है जहा दुश्मन की गोलियां असर नही कर सकती।

दृश्य:-2 इस आन्दोलन ने संसद की सर्वोच्चता को बहस के दायरे में ला दिया। किसी ने कहा संसद सर्वोच्च नहीं है किन्तु जनता ने अपनी सर्वोच्चता सांसदों के माध्यम से संसद में निहित की है। भले ही टी0वी0 बहस में उठी यह आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज सिद्ध हो किन्तु हाब्स लाक रूसो का राज्योत्पति का सिद्धान्त भी तो यही कहता है कि लोगों ने अपनी सम्प्रभुता पारस्परिक सहमति से राज्य को हस्तान्तरित की। भारतीय संविधान तो अपने होने की वजह ही भारत के लोगों को स्वीकारता है:- ” हम भारत के लोग

एतदद्वारा इस संविधान को आत्मार्पित एवं समर्पित करते है। इसे माने तो संविधान ने संसद और उसकी सर्वोच्चता को जन्म दिया और संविधान की यह शक्ति ” हम भारत के लोगो” द्वारा उसे स्वीकार करने पर उसको प्राप्त हुर्इ। चलो हम भारत के लोग बहस का विषय तो बने।
दृश्य:-3 आन स्क्रीन बहस में कुछ लोगों को इस आन्दोलन में दलित भागीदारी नजर नहीं आर्इ और यह आन्दोलन मध्य मवर्गीय एवं उच्चजातियों का नजर आया। पूज्य डा० अम्बेडकर के संविधान निर्माता होने के कारण उसकी सुरक्षा की ठेकदारी का अहसास भी उन्हें अपना नितान्त निजी लगा। आन्दोलन के मध्य मवर्गीय होने से तो हमें भी कोर्इ एतराज नहीं किन्तु भैय्या …! स्वत: स्फूर्त आन्दोलन में भागीदारों की जाति पूछना कुछ ज्यादा नहीं हो गया ? क्या पाकिस्तान की गोली से शहीद होने वाले सैनिक को भी अल्पसंख्यक, दलित, पिछडा और सामान्य में बाटोंगे। अब बस भी करो यारों।

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