ईद और रामलीला के वो पुराने दिन ..[ डायरी का एक पन्ना] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

वर्षों बीत गए हैं बचपन की उन गलियों को छोड़े हुए जहाँ रामलीला और नवरात्रों के साथ सहरी के लिए उद्घोषकों की आवाज कानों में पड़ने के साथ ही जागा करता था. शाहजहांपुर के वो दिन और बचपन में लखीमपुर में अपने गाँव की वो ढेर सारी यादों के बीच कोई ईद ऐसी नहीं गुज़री जब पिता जी का यह पूंछना आज ….. अपने बटाईदार बाशिद चाचा के घर कब जाओगे … और मेरा यह जबाब कि चच्ची ने आपके लिए सेवइयां रखी हैं ….. अरे ! तुम कब हो आए, उनका स्तंभित होकर यह पूंछना …. और साथ ही उनकी आंखों में यह संतोष उभरता कि उनके दिए संस्कार सही दिशा में हैं.

आज सब बहुत याद आ रहा है. विगत तीस वर्षों में प्रायः ऐसा ही संयोग रहा कि कोई न कोई मित्र मेरे सामने इस प्रकार रहा है कि हर ईद पर मुझे मेरी सेवैयाँ मिल सकें. सिर्फ़ इस बार मेरा पड़ोस खाली है और मैं डायरी में हाफिज, शकील, इकबाल दादा सहित …. अपने मित्रों के वर्षों पहले के नंबर डायरी में खोज रहा हूँ …..

यह भी संयोग है कि आज ईद के साथ ही पूज्य बापू और शास्त्री जी की जयंती भी है. चारो तरफ़ विस्फोटों की गूँज, गलियों बाज़ारों की अफरातफरी, हाहाकार और अस्पतालों में मची चीख पुकार के बीच मन बहुत ही उद्विग्न है. किस से शिकायत करें और क्या कहें …. दिल के बहुत करीब यह बातें आज किसी से करने का मन है और आँखे नम हैं.

चलो दुआ करें की यह धुंआ जो आंखों में भरता जा रहा है जल्दी ही छंटे. और हर बार की तरह बुराई के रावण पर अच्छाई की विजय हो….. आज के दिन अपनी अवधी संस्कृति की सुरभित स्मृति के साथ मेरे यह विचार मुठ्ठी भर बीज की तरह सब शांतिप्रिय मित्रों को सप्रेम भेंट.