फिर भी बहता जीवन ….. [गीत] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’,


कुटिल विवशता छलती जाती
फिर भी बहता जीवन
कटी पतंग उड़ता है क्यों
ओ मेरे चंचल मन

धूप धूप चलते चलते सब
झुलस चुकी है काया
फूट चूके हैं पग छाले सब
धीरज भी चुक आया
पथ कंटकाकीर्ण है फिर भी
चलता तू हर्षित मन
फिर भी बहता जीवन

 एकाकी जीवन का सूना
कोलाहल कानों में
प्यासा अंतस् सूख रहा है
अंधकार भावों में
नागफणीं का पुष्पहार ले
मत निहार चंचल मन
फिर भी बहता जीवन

पंकित गलियारे जीवन के
नहीं नीर ऑंखों में
दीप शिखा भी स्नेह रहित है
निराधार हाथों में
डोल रहा जीवन लहरों संग
तू वावरा मेरा मन
फिर भी बहता जीवन

रेखाकार – पायल बत्रा

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