अन्ना, अनुपम और आन्दोलन के सबक ……. [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

[मित्रो अन्ना हजारे का अनशन समाप्त हो चुका है। भारतीय इतिहास में पहली बार….निरन्तर निरंकुश होते जा रहे राजनीतिकों को प्रजातन्त्र की वास्तविक शक्ति एवं उनकी अपनी औकात का पता चला है। किन्तु पहली सीढ़ी मात्र है। सम्पूर्ण घटनाक्रम के आलोक में प्रस्तुत है शिवेन्द्र मिश्र का यह आलेख … कृपया अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य अवगत करायें.] 

05 – 09 अप्रेल -2011सर्वप्रथम अन्ना के साहस को प्रणाम, भारतीय ’जन’ के चरणों में नमन, गण को धिक्कार और भारतीय मन को कोटिशः साधुवाद। अन्ना। आप हमारे लिए प्रखर राष्ट्रवाद के प्रतीक हैं जो अपने प्रतिनिधियों को शर्मनाक कार्य करते हुए देखता है तो साइबर पानी में डूबकर मर जाना चाहता है। (क्योंकि वास्तविक पानी तो इन नेताओं ने गरीब की आँखों और भ्रष्टाचार की नदी के अलावा छोड़ा ही कहाँ है!) अन्ना आपने नागरिकों का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया है। अन्ना ’वन्दे मातरम्’ ’भारत माता की जय’ इन उद्घोषों से आपका स्वागत है।

अनुपम खेर ने एक बयान दिया और शुरू हो गई अन्ना की जूती से मार खाए नेताओं की अपनी खाल बचाने की चिकचिक। अभी वही चीख रहे हैं जिन्हें जूती सीधी पड़ी है किंतु चीखेंगे सभी जरा धीरे-धीरे थम-थम के। बस देखते जाइये।

अनुपम के बहाने कुछ प्रश्न हवा में है। अनुपम का कथित बयान जो मीडिया के माध्यम से जानकारी में आया है, वह है – यदि संविधान में बदलाव जरूरी है तो किया जाना चाहिए। ’’मैं समझता हूँ इस बहस को आगे बढ़ाना चाहिए।’’ मैं इसे आगे बढ़ाते हुए कुछ प्रश्न रख रहा हूँ: आप अवश्य सहभाग करेंगे:-

1- संविधान की प्रस्तावना पढ़िए ’’हम’’ भारत के लोग – – – एतद्द्वारा संविधान को आत्मर्पित, अध्यर्पित एवं समर्पित करते हैं।’’

बड़ा कौन ? हम भारत के लोग अर्थात् जनता ? या संविधान ?

2- क्या संविधान स्वयं को बदल डालने का अधिकार जनता को नही देता? यदि नहीं तो संविधान संशोधन क्यों? यह भी तो संविधान का बदलाव ही है? एक खास बात कहना चाहूँगा कि संविधान परिवर्तन न होता तो इन शुतुरमुर्गी सेकुलर नेताओं का क्या होता क्योंकि ’’धर्म निरपेक्ष’’ शब्द संविधान परिवर्तन की देन है।

3- यदि अनुपम खेर का बयान संविधान का अपमान है तो इस पर विचार करने का अधिकार किसका होना चाहिए?

4- संविधान अथवा संवैधानिक विधि की समीक्षा का अधिकार मा. सर्वोच्च न्यायालय को है जबकि विधायिकाओं का गठन संविधान द्वारा प्रदत्त व्यवस्थाओं के अन्तर्गत होता है तो ’’संविधान के अपमान’’ के प्रश्न पर विचार करने का अधिकार किसका होना चाहिए विधायिका का अथवा सर्वोच्च न्यायालय का?

5- याद करिए कि हिटलर एक चुना हुआ प्रतिनिधि था और पाकिस्तान के तमाम तानाशाहों ने सत्ता हथियाने के बाद जनतांत्रिक माध्यम का उपयोग करते हुए अपने चयन को वैध ठहराया। तो कहीं महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा अनुपम खैर के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का मामला बनाना इस बात का संकेत तो नहीं कि भारतीय राजनीति व्यक्तिगत/संस्थागत तानाशाही की तरफ बढ़ रही है।

6- भारत में कौन सा तंत्र है? लोकतंत्र, जनतंत्र अथवा प्रजातंत्र। मेरी समझ में तो नेता जिसे जनता कहते हैं वह तो प्रजातंत्र का हिस्सा है। किसी पार्टी अथवा नेता की ’’परजा’’ दलित है तो कहीं यादव, कहीं सेकुलर तो कहीं हिन्दू। इसी के दम पर आपस में सांठ-गांठ करके (गठबंधन बनाकर) कहते हैं हमें तो जनता ने चुना है अतः हम पर उँगली नहीं उठा सकते। क्या यह ठीक है?

7- क्या उपरोक्त ’’जन’’ अर्थात ’’परजा’’ को तंत्र को समझने की समझ है। मैं कहता हूँ बिल्कुल नहीं शायद इसी को अरस्तू ने कहा था ’’जनता तो भेड़ है।’’ जनतंत्र अथवा लोकतंत्र का जन अथवा लोक तो अन्ना हजारे के साथ हैं, गांधी, एनीबेसेन्ट और तिलक के साथ था। विवेकानन्द के साथ था। किंतु इन्हें तो ’’परजा’’ ने किसी संसद अथवा विधानसभा के लिए नहीं चुना तो क्या विधायक जी अथवा सांसद जी कानून की बाध्यता पैदा कर नाम के आगे ’’माननीय’’ लगवा लेंने से गांधी या अन्ना हजारे से बड़े हो गए।

कृपया इन प्रश्नों पर बहस छेड़कर इसे आगे बढ़ाए।


शिवेन्द्र कुमार मिश्र
बरेली

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