प्रणमामि शारदे् प्रणमामि ..[कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त

प्रणमामि शारदे् प्रणमामि
प्रणमामि शारदे् प्रणमामि
हे! आर्यावृत हे! भरत् पुत्र
हे! बाल्मीकि हे! कालिदास
प्रणमामि मनीषं प्रणमामि
 प्रणमामि ताण्डव सिंहनाद
प्रणमामि महाकाली निनाद

प्रणमामि शारदे् सप्तनाद
प्रणमामि काव्यरस सिन्धुनाद
प्रणमामि भरत् भू परम्परा
ॠषियों की पावन महाधरा
षट्ॠतुओं ने पाँखें खोलीं
मेघों ने अद्भुत रूप धरा
प्रणमामि प्रेरणे! प्रकृतिदेव्
तन्त्री के तार छेडते हो
‘सम्मोहित’ सिन्धु मनीषा से
हे! शारदेय शत् शत् प्रणाम
प्रणमामि मनीषं प्रणमामि
©तृषा’कान्त’

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