एकलव्य ……… [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

एकलव्यहूँ मैं ढूँढ़ता


हे द्रोणकहाँ हो,


एकाकी शर संधान से


हे तात! उबारो.



प्रश्न नहीं मेरे लिये


बस एक अंगूठा,


कर लिये कृपाण हँ


लो हाथ स्वीकारो.



है चाह नहीं देव..!


अजुर्न की धनुर्धरता,


एकलव्य ही संतुष्ट मैं


बस शिष्य स्वीकारो.



उर ज्वाल नहीं संभलती


गुरूवर! शरण में लो


मम् शीष भी है समर्पित


चरणों में बिठा लो.



वन वानिकों का मीत


शाकुन्तलों का सौख्य


गुरूदेव तज प्रासाद


हृदय वन में पधारो.



कानन में डोलता हूँ


लिये धधकता आगार,


दुष्यन्त रूप धार


मृगया न बिचारो.



एकलव्य आज कान्त


उर में धधकता लावा


असहाय युग एकलव्यको


इस बार उबारो.

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