दो जीवन समान्तर … [स्वर कथा] – श्रीकान्त मिश्र कान्त

©तृषा’कान्त’

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ढीली गाँठ …… – स्वर कथा


तेंदू पत्ते के जंगलों से आच्छादित और पत्थरों के रूप में अनमोल खजाने से परिपूर्ण मध्यप्रदेश की आदिवासी बाहुल्य भूमि बस्तर … प्रायः नक्सल समस्या के लिए अख़बारों की सुर्खियों में रहा यह क्षेत्र आदिवासी और जनजातियों की निश्छल संस्कृति और सभ्यता की धरोहर को अपने अंचल में सदियों से संभाले हुए है. विगत कुछ दशकों से नगरीय सभ्यता और प्राकृतिक सम्पदा के अंधाधुंध दोहन में संलिप्त व्यवसायियों और ठेकेदारों के लालच और शोषण ने इस शांत वातावरण को कई स्तर पर नष्ट किया है . संभवतः नक्सली समस्या के मूल में कहीं न कहीं यह कारण भी जिम्मेदार हैं. बस्तर की समस्याओं पर रचनाकार श्री राजीव रंजन जी की कलम और पैनी दृष्टि ने बस्तर की समस्या और उससे जुड़ी मानवीय संवेदनाओं को सदैव प्रमुखता के साथ प्रस्तुत किया है.



बस्तर की ऐसी ही पृष्ठभूमि में मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी श्री राजीव रंजन जी की एक कहानी है ढीली गाँठजो नगरीय सभ्यता के अनियंत्रित अतिक्रमण से उपजती आदिवासी कुंठाओं और शोषण जनित पीड़ा का अमर दस्तावेज है. कथा का नायक सुकारू और नायिका बोदी की जंगलों में अपनी प्यार भरी भोली सी दुनिया है. नगरीय सभ्यता से संक्रमित सुकारू की भावनाएं, ठेकेदार के लालच और वासना की शिकार बोदी की यह मार्मिक कथा किसी भी पाषाण ह्रदय को प्रभावित करंते हुए उसके विवेक को झंकृत करती है … साथ ही यह एक मूक संदेश देने में भी सक्षम है. तो लीजिये प्रस्तुत है स्वर कथा ढीली गाँठ‘ :

रचनाकार – राजीव रंजन प्रसाद स्वर – श्‍वेता मिश्र

स्वराभिनय – शोभा महेन्द्रू और श्रीकान्त मिश्र कान्त


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ढीली गांठ स्वर कथा

कलम आज उनकी जय बोल


जला अस्थियां बारी बारी
छिटकाईं जिनने चिनगारी

जो चढ़ गए पुण्य-वेदी पर
लिए बिना गरदन का मोल
कलम आज उनकी जय बोल

प्रिय पाठकों !

यह सप्ताह भारत के इतिहास का एक विशिष्ट सप्ताह है। १०० वर्ष पहले इसी सप्ताह इस धरती पर दो महान विभूतियों ने जन्म लिया था। एक क्रान्तिदूत , शहीदे आज़म भगत सिंह और दूसरे राष्ट कवि रामधारी सिंह दिनकर। दोनो ने अपने-अपने दृष्टिकोण से देश को दिशा निर्देशन किया। एक जीवन की कला के पुजारी रहे और दूसरे ने सोद्देश्य मृत्यु अपनाकर विश्व को हर्ष मिश्रित आश्चर्य में डाल दिया। भगत सिंह का मानना था कि तिल-तिल मरने से अच्छा है स्वयं सहर्ष सोद्देश्य मृत्यु का वरण करो और दिनकर का मानना था कि जियो तो ऐसा जीवन जियो कि जान डाल दो ज़िन्दगी में। एक ने बलिदान की तथा एक ने संघर्ष की राह दिखाई। भगत सिंह एक विचारशील उत्साही युवा थे जिन्होने बहुत सोच समझकर असैम्बली में बम विस्फोट किया। वे जानते थे कि इसका परिणाम फाँसी ही होगा किन्तु ये भी समझते थे कि उनका बलिदान देश के क्रान्तिकारी आन्दोलन को एक दिशा देगा और अंग्रेजों का आत्मबल कम करेगा। मरा भगत सिंह ज़िन्दा भगत सिंह से अधिक खतरनाक साबित होगा और वही हुआ। उनके बलिदान के बाद क्रान्ति की लहर सी आ गई। २४ वर्ष की आयु में उन्होने वो कर दिखाया जो सौ वर्षों में भी सम्भव नहीं था। उन्होने देश को स्वतंत्रता, समाजवाद और धर्म निरपेक्षता का महत्व बता दिया। परिणाम स्वरूप आज़ादी के बाद लोकतंत्र की स्थापना हुई। ये और बात है कि यदि वे आज देश की दशा देखें तो दुखी हो जाएँ।
दूसरे महान व्यक्तित्व थे राष्ट कवि दिनकर। दिनकर जी जीने की कला के पुजारी थे। २ वर्ष की अवस्था में पिता का देहान्त हो गया। बचपन अभावों में बीता। सारा जीवन रोटी के लिए संघर्ष किया और अवसाद के क्षणों में काव्य की आराधना की। सरकारी नौकरी करते हुए देश भक्ति और क्रान्ति से भरा काव्य लिखा और क्रान्ति का मंत्र फूँका। हुँकार, सामधेनी, रश्मि रथी, कुरूक्षेत्र ने देश के लोगों में आग जला दी। पद्मभूषण और ग्यानपीठ पुरुस्कार प्राप्त करने वाला कवि साधारण मानव की तरह विनम्र था। कभी-कभी आक्रोश में आजाता था। उन्होने समाज में संतों और महात्माओं की नहीं , वीरों की आवश्यकता बताते हुए लिखा-
रे रोक युधिष्ठिर को ना यहाँ, जाने दे उसको स्वर्ग धीर।

पर फिरा हमें गाँडीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।
कह दे शंकर से आज करें, वे प्रलय नृत्य फिर एक बार।
सारे भारत में गूँज उठे, हर-हर बम-बम का महोच्चार
देश के शत्रुओं को भी उन्होने ललकारा और लिखा-
तुम हमारी चोटियों की बर्फ को यों मत कुरेदो।
दहकता लावा हृदय में है कि हम ज्वाला मुखी हैं।

वीररस के साथ-साथ उन्होने श्रृंगार रस का मधुर झरना भी बहाया। उर्वशी उनका अमर प्रेम काव्य है। जिसमें प्रेम की कोमल भावनाओं का बहुत सुन्दर चित्रण है। दिनकर का काव्य आज भी उतना ही प्रासंगिक है। उनकी कविता भारत के लोगों में नवीन उत्साह जगाती है। सारा जीवन कठिनाइयों का विषपान करने पर भी समाज को अमृत प्रदान किया। ऐसे युग पुरूष को मेरा शत-शत नमन।

एक पाती नेह की

दिल की कलम से
लिखती हूँ रोज़
एक पाती नेह की
और तुम्हें बुलाती हूँ
पर तुम नहीं आते
शायद वो पाती
तुम तक जाती ही नहीं
दिल की पाती है ना-
नाजाने कितनी बार
द्वार खटखटाती होगी
तुम्हें व्यस्त पाकर
बेचारी द्वार से ही
लौट आती होगी
तुम्हारी व्यस्तता
विमुखता लगती है
और झुँझलाहट
उस पर उतरती है
इसको चीरती हूँ
फाड़ती हूँ
टुकड़े-टुकड़े
कर डालती हूँ
मन की कातरता
सशक्त होती है
बेबस होकर
तड़फड़ाती है
और निरूपाय हो
कलम उठाती है
भावों में भरकर
पाती लिख जाती है
ओ निष्ठुर !
कोई पाती तो पढ़ो
मन की आँखों से
देखो-
तुम्हारे द्वार पर
एक ऊँचा पर्वत
उग आया है
मेरी पातियों का
ये पर्वत

बढ़ता ही जाएगा
और किसी दिन
इसके सामने
तुम्हारा अहम्
बहुत छोटा हो जाएगा

होली के रंग

होली के रंग
और तुम्हारी याद
दोनो साथ-साथ
आ गए….
खिले हुए फूल
और…
बरसते हुए रंग
कसक सी….
जगा गए
आती है जब भी
टेसू की गन्ध
दिल की कली
मुरझा सी जाती है
रंगों में डूब जाने की
चाहत….
बलवती हो जाती है
चेतना बावली होकर
पुकार लगाती है
और शून्य में टकराकर
पगली सी लौट आती है
फाग में झूमती
मस्तों की टोली में
बेबाक….
तुम्हें खोजने लगती हूँ
और आँखें….
अकारण ही बरस जाती हैं
होली की गुजिया
और गुलाल के रंग
बहुत फीके से लगते हैं
कानों में तुम्हारी हँसी
आज भी गूँजती है
आँखें…..
तुम्हे देख नहीं पाती
पर आस है कि
मरती ही नहीं
कानों में….
तुम्हारे आश्वासन
गूँजने लगते हैं
और…..
रंगों को हाथ में लिए
दौड़ पड़ती हूँ
दिमाग पर…
दिल की विजय
यकीन दिलाती है
तुम जरूर आओगे
और मुझे…..
फिर से
अपने रंग दे जाओगे

नाच रे मन बावरे

नाच रे मन बावरे
मधुमास आया–
चहुँ दिशि चहुँ ओर है
आनन्द छाया–

सज उठी है प्रकृति बाला
फूलों के श्रृगार से
उड़ रही है फिर सुगन्धि
मदन के अहसास से
पाँव में थरकन नयन में
प्रेम का उन्माद छाया—

तितलियाँ चहुँ ओर फिर हैं
नाचती हो बावली
भँवरों की टोली दिवानी
डोलती मदहोश सी
कामनाओं का हृदय से
जैसे हो झरना बहाया—

प्रेम की ऋतु है बसंती
प्रेम की मदिरा बही
हर कली हर फूल में फिर
दिख रही आभा नई
पीहू-पीहू की पुकारें
संग अपने वायु लाया—

टूटी है फिर से समाधि
योगी रूप महादेव की
कामतीरों से हैं जागी
प्रेम की सूखी नदी
चिर सुखी चिर तृप्त हृदय में
शून्यता का भाव आया—