ओ पिता ! ….. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’


फादर्स डे पर विशेष – पिता अर्थात एक अमिट अस्तित्व .. एक वजूद जो अपने स्वप्नों .. अपनी आकांक्षाओं को सन्तति के उज्ज्वल भाविष्य के लिये प्रसन्नता के साथ त्याग देता है .. अखिल विश्व के ऎसे सभी पिताओं को समर्पित अनुभूति पर मेरी एक रचना.. नमन – तृषाकान्त
ओ पिता !
लगा है एक युग मुझे,
पहचानने में तुम्हें

माँ होती है धरती,
गेहूँ अथवा जौ
बोया गया किस खेत में,
कोई अन्तर नहीं पडता,
हृदय पोषित तत्व से
उगती है जो फसल,
नाम क्या.. पहचान क्या,
फिर कौन हूँ मैं ..
वह तो है बोया बीज,
मैं जो भी हूँ वह हो तुम

हे पिता !
पीड़ा दी है
बहुत तुम्हें ..
स्वयं को त्यागी..
महान और वीतरागी,
सिद्ध करने के दर्प में,
क्षमा याची .. ढूंढता हूं
तुम्हारी गोद ,..
सब कुछ भूल,
आश्वासन बचपन का,
आज फिर
चिपट कर लिपट कर
रोना चाहता हूं ..
और पुकारता हूं..

हे पिता !
लगा है एक युग मुझे
पहचानने में .. तुम्हें,
दर्द से आकुल
सीने से उठता ज्वार
फूट पड़ता है आंखों से,
और तभी
केवड़े की गंध से
भर जाता है मेरा कमरा,
खिड़की से प्रवेश करता है
हवा का एक झोंका
मेरे आंसू सुखाने लगता है.
©तृषा’कान्त’

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अथ श्री नारायण कथा .. [ आलेख ] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’


..एनडी तिवारी के खून का नमूना लिया गया—

 ….उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को पहलीबार सम्भवत: 1974-75 में संजय गान्धीके पैर छूते हुये उस आयु में देखा गया था जब वह इन्दिरा गान्धी की आयु के समकक्ष थे.. वह प्रसंग राजनीत हलकों में मुख्यमन्त्री पद की गरिमा के साथ बहुत सारी टीका टिप्पणी के साथ शान्त हुआ। नारायण जी ने कहा मैं इन्दिरा जी को बहन मानता हूं अत: श्री सन्जय गान्धी मेरे भांजे हैं। ब्राह्मण समुदाय में भांजे के पैर छूने की प्रथा को आगे लाकर उस विषय को किसी तरह शान्त किया गया था। वास्तविकता क्या थी वह सब जानते थे किन्तु उत्तर प्रदेश की जनता ने पहली बार अपने आपको लज्जित अनुभव किया था। उसके बाद देश में आपात स्थिति सहित जो भी हुआ वह .. इतिहास है । ……. एक और घटना नारायण कथा के अनेक प्रसंगों में से उल्लेखनीय है। पहली बार देश का कोई मुख्यमन्त्री दिल्ली से सड़क मार्ग से कार द्वारा निकला। सुधी मित्रों को अधिक स्मरण हो तो रास्ते में ही किसी ढाबे पर अथवा किसी अन्य ऐसे ही किसी स्थान पर अपनी सुरक्षा में सन्नद्ध कर्मियों को धता बताकर गायब हो गये। यह विगत समय के अरूणाचल एवं आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमन्त्री के हेलीकाप्टर के गायब होने वाली घटनाओं से कहीं अधिक बड़ी घटना थी। देश के सबसे बड़े प्रांत उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री लापता। सारे देश में लगभग लगभग हाहाकार मच गया। पुलिस से लेकर सुरक्षा तन्त्र की सभी एजेन्सियां खोजने में जुट गयीं। सम्भवत: साढ़े तीन घण्टे के उपरान्त मुख्य मन्त्री जी स्वयमेव प्रकट हो गये कि किसी रिश्तेदार के यहां मिलना था सो चले गये। गोया मुख्यमन्त्री पद पर पदासीन कोई जिम्मेदार व्यक्तित्व न होकर शेखचिल्ली मियां थे जो जिधर मन किया मुंह उठाया चल दिये। सम्भवत: सम्मेलन के स्थान पर कहीं कोई गोपनीय सम्मिलन कार्यक्रम था जो अगले दिन सभी समाचार पत्रों में सुर्खियों के साथ छपा था। ऐसे ही महान व्यक्तित्व की अनगिनत महान गाथायें हैं इतिहास बनाने के लिये … उनके पौरूष पर चर्चा भी सुर्खियों में रही है । बात कुछ अशोभनीय हो जायेगी .. अत: सभी बचे खुचे बुज़ुर्गों की इज़्ज़त का ध्यान करके अब मुंह बन्द कर लेना ही उचित है। अथ श्री नारायण कथा ।

©तृषा’कान्त’

झरते हरसिंगार …. [नवगीत] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

उजसित शैशव जीवन सुरभित 
हुलसित मन आगार 
शेफाली शाखों सा झूमे 
झरते हरसिंगार 


मलयानिल सुरभित नासाग्रा 
होंठ वसन्ती कोंपल 
पल पल पुलकित स्पर्शों से 
हस्त पाद मृदु कोमल 
मृदुल मोहिनी शिशु किलकारी 
वारी सब संसार 


अखिल विश्व में नूतन अभिनव 
ईश स्वयं धर रूप सलोना 
डगमग धरता पग धरती पर 
मानवता का भूप खिलौना 
राग द्वेष से मुक्त स्नेह ही 
जीवन का आधार
©तृषा’कान्त’

वावरे ..! किस चाह में ….. [ गीत ] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

जीव जीवन पथ अकेला 
आदि से जग राह में 
क्यों फिरे उद्विग्न अंतस  
वावरे ..! किस चाह में 

नगर में मेले मिले तो 
भीड़ भी पुरशोर है 
डगर पथरीली कठिन भी 
मनुज मन कमजोर है 
बह गया बहुधा लहर से 
तुमुल करतल वाह में 
वावरे ..! किस चाह में 

कालिमा कुत्सित तमस की 
हाय मानव छल गयी 
मोह माया रज्जु बन्दी 
सकल उर्जा जल गयी 
डोर अब अव्यक्त खींचे 
ढोर बांधे रज्जु से 
छूटते सब संग साथी 
दिव्य आभा पुंज से 
अहा अब अभिसिक्त यौवन 
अलौकिक किस राह में 
वावरे..! किस चाह में 
©तृषा’कान्त’

हमारे बच्चों को उनके पारिवारिक सामाजिक बुज़ुर्गों की गोद कैसे मिले .. [ आलेख] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

  क्या किसी व्यक्ति में कुपोषण मात्र शारीरिक दुर्बलता से ही परिलक्षित होता है ..? शारीरिक विकास हेतु सम्पूर्ण पौष्टिक आहार की उपलब्धता के साथ साथ विकास के समय शैशव से लेकर किशोर, तरूणावस्थातीत युवकों के लिये भी विकास के आरम्भिक चरण में समुचित मानसिक बौद्धिक खुराक के अभाव में वह शारीरिक रूप से तो सबल हो सकते हैं किन्तु मानसिक रूप से …

  नहीं नहीं मैं मानसिक अक्षमता की बात नहीं कर रहा हूं अपितु समुचित संस्कारों के अभाव की चर्चा कर रहा हूं। इनके अभाव में बहुत अच्छे परिवारों के बच्चे भी वयक्तित्व की दुर्बलता से ग्रस्त होकर अभिशप्त रास्ते पर चल निकलते हैं। माता पिता कई बार अतयधिक महत्वपूर्ण पदासीन अथवा धनोपार्जन में व्यस्त होने के कारण सारी व्यवस्थाओं का प्रन्बन्धन कर देते हैं मात्र अक व्यक्तिगत समय एवं इसी मानसिक पोषण के। क्योंकि यह किसी दुकान अथवा माल में पैसे या पद से सुलभ नहीं होता है। यह तो परम्परागत स्वरूप से दादा दादी नाना नानी की गोद में उपलब्ध होता आया है। 

  अब एकल परिवारों के कारण अथवा जीविकोपार्जन तथा अन्यान्य कारणों सहित यही गोद दुष्प्राप्य हो चुकी है। ऐसे में इन मानसिक दुर्बलता के शिकार नागरिकों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है और सामाजिक अपराध बढ़ते जा रहे हैं
   क्या इस साधारण से विष्लेषण को कोई समझना चाहता है ? क्या यह दायित्व भी हम सरकार पर डाल सकते हैं कि हमारे बच्चों को उनके पारिवारिक सामाजिक बुज़ुर्गों की गोद मिले .. ? सोचें जरा एक बार हम अपने अंतस में भी विचार करें..!!
©तृषा’कान्त’

दो जीवन समान्तर … [स्वर कथा] – श्रीकान्त मिश्र कान्त

©तृषा’कान्त’

सखी री ! देखो आया वसन्त… [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

सखी री !
देखो आया वसन्त
बौराई पछुआ को लेकर
मदमाती अँगड़ाई लेकर
तन-मन टूटे मदमस्त अंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

वन-वन खिलता द्रुम वनांगार
बासंती आहट ले फुहार
सेमल, टेसू कोयल पुकार
चित-चोर नयन हिय में अनंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

यौवन चंचल काया झूमें
अद्वैत बने प्रिय संग घूमें
कुसुमित उपवन
सब जड़ चेतन
हर्षित मन है उर में उमंग
सखी री !
देखो आया वसन्त
©तृषा’कान्त’

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