नासा – बनाम संस्कृत एवं ब्राहम्ण .. [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

      एक समाचार मेरा ध्यान आकर्षित करता है। मैं संक्षेप में आपका ध्यान उस ओर आकर्षित करता हूँ। दैनिक जागरण, बरेली 26 मार्च 2012 – समाचार शीर्षक संस्कृत बनेगी नासा की भाषा

            यह समाचार यह बताता है कि 1985 में नासा ने संस्कृत भाषा के 1000 प्रकाण्ड विद्वानों को नौकरी देने का प्रस्ताव दिया था जिसे विद्वानो ने अपनी भाषा के विदेशी उपयोग के लिए सेवा देने के आधार पर ठुकरा दिया था। अब वह अपने ही लोगो को इस भाषा में पारंगत बनाने में जुटे हैं। समाचार पत्र की इस रिपोर्ट के अनुसार नासा के मिशन संस्कृतकी पुष्टि उसकी बेबसाइट भी करती है। उसने स्पष्ट लिखा है कि 20 साल से नासा संस्कृत पर काफी पैसा और श्रम व्यय कर चुकी है।

            इस समाचार के दो पक्ष हैं एक संस्कृत भाषा की वैज्ञानिक उपयोगिता और द्वितीय संस्कृत के विद्वानों द्वारा विदेशी प्रगति के लिए अपनी भाषा की सेवा से इन्कार कर देना। सामान्यतः इस देश में संस्कृत के अधिकांशतः विद्वान ब्राह्मण हैं। जब देश में ब्राहमणों पर देश के इतिहास, हिन्दुओं की सामाजिक श्रेणीगत व्यवस्था एवं राजनीति को प्रदूषित करने के आरोप पानी पी-पी कर लगाये जाते हैं। हमें अपमानित करने वाले नारे गढ़े जाते हैं। ऐसे में यह समाचार आंख खोलने वाला है। यह देश हमारा है। इसकी उन्नित में मिटटी की सुगन्ध है। भला पैसा और उच्चस्तरीय जीवन पद्धति उन आदर्शों और देश के मान-सम्मान से प्रतिस्पर्धा कैसे कर सकती है जो हमारे पूर्वजों ने आत्म गौरव के रूप मे हमें विरासत में दिए हैं। मैं जानता हूँ कि धर्म निरपेक्ष, प्रजातांत्रिक भारत में संस्कृत महत्वपूर्ण नहीं हो सकती क्योंकि यह हिन्दुओं की सांस्कृतिक भाषा है। यह ब्राह्मणों की विश्व-मानवता को अमूल्य धरोहर है और ब्राह्मण तो जिताऊ मतदाता नही हो सकता। लेकिन काश ! ब्राह्मण ही अपनी आंखे खोल पाते और संस्कृत के लोक जीवन के लिए संगठित प्रयास कर पाते।
(कृपया विस्तृत समाचार दैनिक जागरण हिन्दी समाचार पत्र दिनांक 26.03.12 पृद्गठ 15 पर देखा जा सकता है)

©तृषा’कान्त’

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पाकिस्तान की दुखद हकीकत .. [ समाचार प्रतिक्रिया] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

आज पाकिस्तान फिर से ज़म्हूरियत और सैन्य शासन के दोराहे पर खड़ा है। उसकी इस स्थिति के लिये एक राष्ट्र के तौर पर खुद पाकिस्तान की मानसिकता के अतिरिक्त कोई अन्य वजह जिम्मेदार भी नहीं है। जिस देश के राष्ट्रपति, पूर्व राष्ट्रपति से लेकर प्रधान मंत्री तक को अपनी सत्ता और कई बार अपने जीवन के अभयदान हेतु सऊदी जाकर भीख जैसी मांगनी पड़ती है वहां किसी भी सार्थक लोकतन्त्र के लिये कभी कोई स्थान हो भी नहीं सकता।

पाकिस्तान में जम्हूरियत का अर्थ सिर्फ़ हिन्दुस्तान के प्रति नफरत है .. वो पाकिस्तान जो अपने जन्म से पूर्व मात्र कूछ दशक पहले तक हिन्दुस्तान हुआ करता था। दुर्भाग्य से अपने सहोदर भारत के साथ शांति तथा सहअस्तिव को निरन्तर नकारते हुये कल तक अमेरिका और आज चीन सहित वह किसी भी अन्य देश के आगे बेशर्मी से गिड़गिड़ाने को तैयार है। भारत के साथ घृणा को ज़िन्दा रखने के लिये .. उसे सम्भवत: आने वाले दिनों में इसकी और भी भारी कीमत चुकाने के लिये तैयार रहना होगा। बदनसीब है पाक .. जो आज तक इस साधारण सी बात को समझ कर भी नज़रअन्दाज करता रहता है।

खुदा खैर करे .. !!
©तृषा’कान्त’

निजी एयरलाइन को जनता के पैसे की रेवड़ी.. [समाचार प्रतिक्रिया] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

क्या भविष्य में किसी निजी कम्पनी के स्वामियों द्वारा ऐयाशी करते हुये उसे दुरूह स्थिति में पहुंच जाने पर व्यक्तिगत सरकारी सम्पर्क के बल पर जनता के पैसे से कम्पनी को उसके हाल पर छोड़ कर पुन: उसी ऐयाशी में सलग्न हो जाने का रास्ता खुल चुका है

निरंकुश स्वामित्व और प्रबन्धन को उसके किये गलत निर्णयों का दण्ड मिलने के स्थान पर पुरस्कार दिया जा रहा है। आर्थिक दुष्प्रबन्धन का इससे बड़ा कोई अन्य उदाहरण नहीं मिलेगा

कोई व्यवस्था इस देश में है .. वेतन पर्ची से अग्रिम टैक्स देनेवाला वेतनभोगी व्यक्ति टैक्स देते देते मरा जा रहा हूं। उसके बच्चों के साधारण खर्चों के लिये, रसोई सहजता से चलाने के लिये तथा घर बनाने के लिये पैसे नहीं हैं और सरकार अपने मित्रों को कर्ज़ के नाम पर उदारता से पैसे बांट्ती जा रही है । कम्पनी अपनी ऐयाशी से पुन: उसी स्थिति में नहीं पहुंच सकती .. ??

छिनाल .. शब्द अथवा ववाल ……… ? [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

चूंकि शब्द प्रयोग ”छिनाल – बेबफा” माननीय कुलपति महोदय ने किया था। अत: मैने हिन्दी के प्रसिध्द विद्वान डा0 हरदेव बाहरी के ”शिक्षक हिन्दी शब्द कोष में इस शब्द का अर्थ तलाश किया। डा0 बाहरी के विषय में उल्लेखनीय है कि उनकी डी-लिट की डिग्री ”शब्दार्थ विज्ञान” …

……..भैय्या ! मैं तो इसीलिए ”बुध्दिजीवी” शब्द से ही घृणा करता हूं और उसे ”रूपजीवा” या ”रूपजीवी” शब्द के समान मानता हूं। अब अप जाने आपके लिए ”बुध्दिजीवी” का अर्थ बुध्दि यानी विवेक की ”वेश्यावृत्ति करने वाला” या ”बुध्दि से बेवफाई करने वाला।” वैसे आप मेरी मुफ्त की सलाह मानें तो मेरी ही तरह ”बौध्दिक” शब्द का प्रयोग कर सकते हैं वह भी मूर्खों में मेरी तरह न कि बुध्दिजीवियों में।

अभी कुछ दिन पूर्व समाचार पत्रों, टी0वी0 चैनलों पर एक बहस छिड़ी थी। एक विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति ने अपने एक साक्षात्कार में महिला लेखिकाओं के लिए ”छिनाल” शब्द का प्रयोग किया। कुलपति महोदय के इस ”शब्द प्रयोग”का प्रतिवाद हुआ। बुध्दिजीवियों ने कहा कि ”छिनाल” शब्द का अर्थ ”वेश्या” होता है तो क्या कुलपति महोदय महिला लेखिकाओं को ”वेश्या’ कह रहे हैं। अब कुलपति महोदय ने वास्तविक ”बुध्दिजीवी कुलाटी” मारी और बयान दिया कि ”छिनाल” से उनका अभिप्राय ”वेबफा” से था। अब यह मेरे जैसे मूर्खों के शब्दकोश में नई ज्ञानवृध्दि थी।

इस बीच कुछ अच्छे शीर्षकों से विभिन्न ”ब्लागों” पर मेरी दृष्टि गई। इस घटना से संबधित एक शीर्षक था – ”हम छिनाल ही भले।” इस बहस में जो पोस्ट दिखाई दिए उनमें जमकर बुध्दिजीवी नंगई स्पष्ट दिखाई दे रही थी। इस पर लिखना तो उसी समय चाह रहा था किंतु अन्य इससे अधिक महत्वपूर्ण विषय हाथ में थे और फिर दैनिक जीवन की व्यस्तताएं।

अब मेरा ध्यान गया ”छिनाल” शब्द की प्रथम परिभाषा ”वेश्या” पर। प्रसिध्द संस्कृत-हिन्दी, शब्द कोश द्वारा श्री वामन शिवराम आप्टे में ‘वेश्या’ शब्द का अर्थ इस प्रकार किया गया है –
वेष्या – (वेशेन पण्ययोगेन जीवति – वेश् + यत् + टाप्) – बाजारू स्त्री, रंडी,
गणिका, रखैल (मृच्छ – 1/32, मेघ0 35)
मृच्दकटिकम् संस्कृत नाटक है और मेघदूतम् महाकवि कालिदास का खण्डकाव्य जिनमें इस शब्द का प्रयोग किया गया है।

इस प्रकार दो शब्द और मिले। रंडी एवं गणिका। जिन्हें संस्कृत शब्द कोष में तलाशा जा सकता था।

रंड: – (रम् + ड) वह पुरूष जो पुत्रही मरे,
रंडा – फूहड़ स्त्री, पुंश्चली, स्त्रियों को संबोधित करने में निन्दापरक शब्द,
रंडे पंडित मानिनि – पंचतंत्र
संभवत: रंड: से ही लोकभाषा में रांड़ और रण्डी शब्द प्रचलित हुआ होगा।
रत् – (मू0क0कृ0) रम् + क्त – प्रसन्नता, खुश

किंतु इससे एक शब्द बना
रतआयनी – वेश्या, रंडी

ऐसा अर्थ किया गया। संस्कृत का एक अन्य समानार्थी शब्द मिला –

गणिका – (गण् + ठञ + टाप्) रण्डी, वेश्या – गुणानुरक्ता गणिका च यस्य बसन्तशोभेव वसन्तसेना – मृच्छंकटिकम
इससे मिलते-जुलते अर्थ वाले एक अन्य शब्द का संस्कृत साहित्य में प्रयोग हुआ है – ”रूपजीवा”

रूपम – (रूप : क्, भावे अच् वा) – आजीवा – वेश्या, रंडी, गणिका

जहां तक ”छिनाल” शब्द का अभिप्रेत है तो एक शब्द मिला।
छिन्न – (भू0क0कृ0) छिद् + क्त) – छिन्ना – वारांगना, वेश्या

इसी तरह से ”वारांगना” शब्द भी ‘वेश्या’ अर्थ में अभिप्रेत मिला।
वार: – (वृ + घञ्) – सम: – अंगना – नारी, युवति, योषित, वनिता,
विलासिनी – सुन्दरी – स्त्री

अर्थात ”वार:” शब्द के साथ इनमें से कोई भी शब्द जोड़ लिया जाए तो उसका अर्थ होगा –
”गणिका, बाजारू औरत, वेश्या, पतुरिया, रण्डी। ”वैश्या” के अर्थ में एक अन्य शब्द मिला।
वारवाणि: या वारवाणी – वेष्या

इतने श्रम के पश्चात भी ‘वेश्या’ के तमाम अर्थ तो मिले जो ”छिनाल” का अर्थ बताया गया था, किंतु ”छिनाल” शब्द संस्कृत -हिन्दी कोश में नही मिला। यद्यपि मिलते-जुलते उच्चारण वाला ”छिन्ना” शब्द मिला जिसका अर्थ भी ‘वेश्या’ था।

चूंकि शब्द प्रयोग ”छिनाल – बेबफा” माननीय कुलपति महोदय ने किया था। अत: मैने हिन्दी के प्रसिध्द विद्वान डा0 हरदेव बाहरी के ”शिक्षक हिन्दी शब्द कोष में इस शब्द का अर्थ तलाश किया। डा0 बाहरी के विषय में उल्लेखनीय है कि उनकी डी-लिट की डिग्री ”शब्दार्थ विज्ञान” में ही है। उनके शब्दकोष में ”छिनाल” शब्द का अर्थ था।
छिनाल – (वि0) पर पुरूषों से संबध रखने वाली (स्त्री) दुश्चिरित्रा स्त्री-पुंश्चली।
एक अन्य मिलते जुलते शब्द ”छिनार” का भी यही अर्थ है।
छिनार – (स्त्री) व्यभिंचारिणी स्त्री, पुंश्चली

मैं एक वाक्य प्रयोग करता हूं। मैं अपने मित्र से कहता हूं कि ”यार ! ”अमुक” बड़ी ”छिनाल” है वह इसका अर्थ ”वेश्या” समझता है। हां आप चाहें तो ”बेवफा” कह सकते हैं भैय्या ! मैं तो इसीलिए ”बुध्दिजीवी” शब्द से ही घृणा करता हूं और उसे ”रूपजीवा” या ”रूपजीवी” शब्द के समान मानता हूं। अब अप जाने आपके लिए ”बुध्दिजीवी” का अर्थ बुध्दि यानी विवेक की ”वेश्यावृत्ति करने वाला” या ”बुध्दि से बेवफाई करने वाला।” वैसे आप मेरी मुफ्त की सलाह मानें तो मेरी ही तरह ”बौध्दिक” शब्द का प्रयोग कर सकते हैं वह भी मूर्खों में मेरी तरह न कि बुध्दिजीवियों में।


शिवेन्द्र कुमार मिश्र
आशुतोष सिटी, बरेली उ. प्र.।

परशुराम जयन्ती और ब्राहम्णों को जाति दायरे में कैद करने की साजिश [आलेख] – शिवेंद्र कुमार मिश्र,

बैसाख शुक्ल तृतीया (अक्षय तृतीया) को ब्राहम्ण समाज परशुराम जयंती मनाता है। भगवान श्री परशुराम की जयंती पर यू०पी० के एक उत्साही मुख्यमंत्री ने इस दिन को एक राजकीय अवकाश घोषित कर दिया तब से बाकायदा छुट्टी मनाकर परशुराम जयंती मनाई जाती है। 

भगवान श्री परशुराम से लोक का परिचय रामायण और महाभारत के माध्यम से है। रामायण के परशुराम शस्त्र/शास्त्रविद और तपस्वी हैं और राजा जनक के दरबार में सीता जी के स्वंयवर के अवसर पर उपस्थित होते है। भगवान श्री राम द्वारा शिव धनुष भंग किया जा चुका है। शिव परशुराम जी के आराध्य एवं गुरु है। अत: उनका धनुष तोडे जाने से स्वाभाविक रुप से वह आहत है। प्रतिवर्ष सम्पूर्ण भारतबर्ष में रामलीला कमेटियों द्वारा आयोजित रामलीलाओं में कुशल कलाकारों द्वारा ‘परशुराम-लक्ष्मण संवाद’ से देश की हिन्दू जनता परिचित है। ग्रामीण हिन्दू जनता में तो इस उत्साही संवाद की तुलसीकृत रामचरित मानस की चौपाईयां प्रचलित है। विद्वान किन्तु क्रोधी, शिवभक्त, तपस्वी, विख्यात ब्राह्म्ण कुल मिलाकर यह है रामायण में भगवान परशुराम की लोकछवि।

लोक का भगवान श्री परशुराम से दूसरा परिचय महाभारत महाकाव्य के एक उदात्त नायक भीष्म के गुरु के रुप में है और अन्तत: गुरुशिष्य के मध्य हुए एक युद्व में शिष्य से पराजय के उपरान्त वह क्षत्रियों के शस्त्र शिक्षण से विमुख हो जाते है। महाभारत के एक दूसरे उदात्त नायक कर्ण को शस्त्र शिक्षा प्राप्त करने के लिए ब्राहम्ण का रुप धारण करना पडता है। महाभारत के एक अन्य नायक पाण्डवों और कौरवों के गुरु आचार्य द्रोणाचार्य के गुरु भी भगवान श्री परशुराम ही है। इस तरह महाभारत में इनकी छवि शास्त्रविद और क्रोधी ब्राहम्ण के रुप में (भीष्म राजकुमारी अम्बालिका प्रकरण) निखर कर आई है।


परशुराम की एक अन्य लोकस्मृति पितृभक्त परशुराम की है जिन्होने अपने पिता की आज्ञा मानकर माता रेणुका का सर काट डाला। बाद में पिता के द्वारा वरदान मांगने को कहने पर इन्होनें माँ के पुर्नजीवन का वरदान मांगा।

परशुराम की लोकमानस पर जो सर्वाधिक अंकित छवि है वह है क्षत्रियद्रोही और क्रोधी परशुराम की जिन्होनें 21 बार पृथ्वी को क्षत्रियविहीन कर डाला। परशुराम की वंश परम्परा यह बताती है कि परशुराम की मॉ रेणुका राजा प्रसेनजित की पुत्री और एक क्षत्राणी थी जबकि पिता जमदग्नि भृगुवंशी ब्राहम्ण। दोनो वंशों में पीढियों से शत्रुता थी। एक बार जब परशुराम की अनुपस्थिति में नरेश कार्तवीय सहस्त्रवाहु अर्जुन नें जमदग्नि के आश्रम को जला डाला और महर्षि जमदग्नि का वध कर कामधेनु गाय छीन ली तो परशुराम अत्यंत क्रोधित हुए और पृथ्वी को क्षत्रिय विहीन कर डालने की प्रतिज्ञा कर डाली। यह थे क्रोधीराम यानि कि परशुराम जिन्होनें इस प्रतिज्ञा को 21 वार क्षत्रियों का वध कर पूर्ण किया।

भगवान श्री परशुराम की लोकमानस में व्याप्त छवि क्या है?

शायद आप सहमत न हों किन्तु मेरा मानना है यह छवि क्षत्रिय मानमर्दक ब्राहम्ण योद्धा भगवान श्री परशुराम की है। जब आप किसी के विरोध में स्थापित होते है तो स्वयं को सीमित कर लेते है। यह सीमितीकरण ही जाति है। जातियां अपने को वर्ण में समावेशित मानते हुये भी वर्ण नहीं होतीं और प्राय: अपने कृत्यों से वर्ण विरोधी होती है। उदाहरण के लिए ब्राहम्ण अपने को लोकमात्र में पण्डित कहते है किन्तु सरयूपारिण कान्यकुब्ज आदि लगभग 72 विभेद हैं। इनमें भी शर्मा, मिश्रा, शुक्ला, घर, विस्वा आदि पर विभेद है। और इन विभेदों के आधार पर संगठन भी। क्षत्रिय वर्ण लोकभाषा में ठाकुर हो गया और उसमें भी चौहान, राठौर, कठेरिया, जाधव परमार आदि भेद और अनेको उपभेद। वैश्य लोकभाषा में लाला जी या साहू जी हो गया तथा उसके भी अग्रवाल, कलवार, गुप्ता,खत्री आदि अनेकों भेद उपभेद हो गये। अतीत का शूद्र वर्ण पिछड़ा और दलित पुनश्च पिछड़ा, अति पिछड़ा दलित और अति दलित में वदल गये। इस वर्ण ने कोई वर्णगत सामोहिक व्यंजनात्मक शब्द तो नही खोजा किन्तु उपवर्गों और जातियों मे संगठन और नेता खड़े कर लिए। बहिन मायावती दलित की बेटी हो गयी और लालू, मुलायम, कल्याण आदि पिछड़े नेता। इनके अपने-अपने महापुरुष भी वंट गये जैसे रामायण के संत भगवान वाल्मीकी दलित नेता हो गये तो शिवाजी महाराज पिछड़े। महाराणा प्रताप क्षत्रिय महापुरुष हो गये तो सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य (मुख) जाति के महापुरुष। वस इसी श्रंखला में पण्डित (ब्राहम्ण) महापुरुष हो गय भगवान श्री परशुराम। अब हमारा जाति नायक दूसरों के लिए खलनायक है तो बना रहे। अगर यह जातीय महापुरुष सम्पूर्ण राष्ट्र की अस्मिता और हिन्दू संस्कृति को विभाजित करते दिखाई देते हैं तो ऐसा हुआ करे पर वोट की राजनीति में तो चलते ही हैं और एक सरकारी छुट्टी भी दिलाते हैं – वाल्मीकी जयंती रैदास जयंती -अम्बेडकर परिनिर्वाण दिवस और परशुराम जयंती।

ब्राहम्ण के लिए एक अन्य शब्द है पुरोहित जिसका अपभ्रंश हुआ शायद पुजारी पण्डित जी। शब्द भी सम्भवत: पुरोहित से अदभुत हुआ होगा। पुरोहित के लिय वेद कहता है- ”वयं राष्ट्र जाग्रयाम”: पुरोहित हम पुरोहित राष्ट्र को जाग्रत रखते है यानी कि ब्राहम्ण राष्ट्र का अनुयायी है। हिन्दुत्व का पुरोधा है। जातियों में बंटा समाज, राष्ट्र, हिन्दुत्व को कमजोर करता है और राष्ट्र कमजोर होता है, हिन्दुत्व जीर्ण-शीर्ण होता है तो हम तो मर ही जाते है। इस राष्ट्र में हमारा कोई हिस्सा नही है। सत्ता क्षत्रियों के लिए हैं। व्यापार वैश्यों के लिए है। और सेवा कर्म शुद्रों के लिए है। यह सारे हिस्से आपस में अन्त: परिवर्तनीय है। किन्तु हम ब्राहम्णों का कोई हिस्सा नही है। क्योंकि लोकभावन, लोकसंगठन, सशक्तराष्ट्र सबल संस्कृति यही हमारा हिस्सा हैं। इसके लिए भोजन हम नागरिकों से भिक्षा के द्वारा प्राप्त करते है। ताकि प्रत्येक नागरिक को राष्ट्रहित में नियोजित रखा जा सके। यह भिक्षा भी समाज को शिक्षा देकर प्राप्त करना चाहतें है। हमारे पास अपना कुछ नही है जो भी है राष्ट्र का है, हिन्दुत्व का है, राष्ट्र का है, मानवता का है (इदं राष्ट्राय इदन्न मम) । और इस परम्परा के प्रतीक भगवान श्री परशुराम नहीं है अपितु है आचार्य ”चाण्क्य”। ईसा से 323 वर्ष पूर्व भारत के महान सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य के महामात्य, तक्षशिला विश्वविद्यालय के आचार्य अर्थशास्त्र जैसे लोक विश्रुत ग्रंथ के स्रष्टा आचार्य चाणक्य तो फिर ब्राहम्ण महापुरुष के रुप में आचार्य चाणक्य की जयंती क्यो नहीं मनाई जाती। वर्ण विभेदक परशुराम की जयंती क्यों ?

आईये खुले नेत्रों से काल के पटल पर लगभग 2330 वर्ष पूर्व का एक चित्र आपके सामने प्रस्तुत करते है।

वितस्तता की लहरों में काफी उष्णता अनुभव की जा सकती है। खूबसूरत वादियां युद्ध के स्वरों से झंकृत हो रही है। प्रेमी युगल दूर देश से आने वाले प्रबल झञ्झावात की चर्चा करते हैं। प्रेमिकाओं के कुरंग-नेत्रों में प्रेमी के युद्धक्षेत्र मे जाने की आशंका स्पष्ट देखी जा सकती है। नगरों की बीथिकाएं, चौपालें, पंचायतें, भावी युद्ध की आशंकाओं से ग्रसित हैं। उडन्त कथाओं में यूनान के किसी बहादुर राजा की चर्चा हुआ करती थी। नगर में आने वाले विदेशी व्यापारी और विद्यार्थी कामगार आदि सिकन्दर की चर्चा बढा-चढाकर किया करते थे। लोग चर्चा करते थे कि कैसे एक दूरदेश के छोटे से देश का महत्वाकांक्षी शासक सिकन्दर एक महान विजेता बन गया। अरबेला के मैदान मं (330 ई.पू.) कैसे उसने पार्शिया के महान सम्राट दारयवहु (डेरियस III) को परास्त कर पर्शियन साम्राज्य को नष्ट भ्रष्ट कर दिया था। और अब उसके आतंकी कदम भारतीय उपमहाद्वीप की ओर वढ रहे थे।

अन्तत: आक्रमण हुआ। पूर्व पर्शियन सम्राटों ने भारत प्रवेश के लिए जो मार्ग चुना था सिकन्दर ने भी उसी रास्ते से भारत में प्रवेश किया। भारत का पश्चिमोत्तर सीमान्त अव्यवस्था का शिकार है। सभी छोटे-बडे राजतंत्र, गणतंत्र पारस्परिक ईष्या द्वेष से ग्रसित हैं। डा० राय चौधरी ने ऐसे 28 राज्यों का उल्लेख किया है। हिन्दूकुश अरवेला के मैदान में विजय प्राप्त कर जब वह हिन्दूकुश पर्वत श्रखला पार कर हिन्दू भारत में पदार्पण करता है तो सर्वप्रथम तक्षशिला नरेश अम्भि और एक अन्य नरेश शशिगुप्त जैसे देशद्रोही राजा उसका स्वागत करते हैं। 

निकाई नगर में अपनी सेना को दो भागों में बॉटकर एक दल हेकेस्टियन और पार्डिक्स के नेतृत्व में पुष्कलावती के अष्ठक को हराते हुए खैबरदेई के रास्ते सिन्धु नदी के तट पर पहुंचा। दूसरा दल सिकन्दर के नेतृत्व मे कुनार एंव स्वात नदी को दुर्गम घाटी के मार्ग से अस्पेसियन जाति से जा टकराया। यद्यपि नीसा रणराज्य ने सिकन्दर की अधीनता बिना लड़े ही स्वीकार कर ली। किन्तु शुरईयन अरसेकेनस आदि ने उसके विश्व विजेता होने के दर्प को भीषण आघात पहुंचाया। मस्सग दुर्ग में भयंकर युद्व हुआ और मस्सग सेनानियों ने उसके अहं को भीषण चोट पहुंचायी। इसके अतिरिक्त स्वाभिमानी पोरस से यहॉ तक आते-आते उस विश्व विजेता सेना को असली युद्ध का स्वाद खूब चखने को मिल चुका था। इस बीच चाणक्य के नेतृत्व में तक्षशिला के आचार्य और स्नातक मिलकर जहॉ सिकन्दर के आगे भयानक चुनौतियों का भय बढ़ा रहे थे वहीं पीछे के रास्ते पर पत्थर रख रहे थे। सिकन्दर के सैनिकों में मगध की विशाल सेना और उसके अमात्य, राक्षस को लेकर अफवाहों का दौर जारी था। चाणक्य के स्नातक वखूबी इस काम को अंजाम दे रहे थे।

सिकन्दर के सैनिकों में यह अकवाहु थी कि मगध के पास इतनी विशाल सेना थी कि जहॉ तक दृष्टि जाती थी सेना ही सेना दिखाई देती थी। और आमात्य राक्षस तो सैनिकों को जीवित ही आहार कर जाता था। अन्तत: यूनानियों का मनोबल छूट गया और वापसी का निर्णय हुआ।

सिकन्दर की वापसी का स्वागत आचार्य चाणक्य के स्नातकों ने व्यवस्थित किया था। अब तक पश्चिमोत्तर सीमान्त के राज्यों में राष्ट्रभक्ति की अलख जगाई जा चुकी थी और परिणाम था अस्सकोनोई, अद्रेस्तार, कठ, वसाती आदि राज्यों के साथ भयंकर सैनिक युद्ध।इन्ही मुठभेड़ों मे लगे किसी तीर के घाव ने सिकन्दर को 323 ईसा पू० में बेबीलोन में मृत्यु की नींद सुला दिया।

किन्तु आचार्य चाणक्य ने इस आक्रमण से सबक लिया था और सिकन्दर को आर्यावत की सीमा से वापस धकेलने के बाद भी यह महान स्वप्न द्रष्टा ब्राहम्ण राष्ट्र को एक सूत्र में बांधकर एक सशक्त राष्ट्र के निर्माण को कृत संकल्प था। ”इदं राष्ट्राय इदन्न ममं” के मंत्र का जाप करते हुए इस महान नेता ने 322 ई० पू० में चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध के सिहांसन पर आरुढ़ किया। एक ओर जब सिकन्दर अपनी मृत्यु की ओर बढ रहा था तो भारत अपनी सम्पूर्ण चेतना, यौवन और उत्साह के साथ नई सुबह का स्वप्न देख रहा था। और इन दोनों ही द्रष्यों का स्वप्नद्रष्टा था-महान आचार्य चाणक्य -ब्राहम्ण चाणक्य।

मित्रों मैं आलेख के समापन की ओर आ गया हूं। मेरा विचार से अब तक आप समझ ही चुके होंगें कि क्यों ब्राहम्णों के नायक के रुप में जनतंत्रीय नेताओं और दलों को परशुराम भाते हैं चाणक्य नहीं। परशुराम विघटन के प्रतीक हैं। भेद के प्रतीक हैं और प्रतीक हैं मात्र एक जाति के, जो वोट बैंक हो सकती है किन्तु चाणक्य तो राष्ट्र की थाती हैं। चाणक्य राष्ट्रीय अस्मिता के प्रतीक है ब्राहम्ण चाणक्य की धरोहर सम्पूर्ण राष्ट्र है कोई एक जाति नहीं किन्तु यह वोटबैंक की राजनीति के माफिक नहीं। यह तो एक राष्ट्रवादी , सांस्कृतिक विचारधारा है और जिसके कुछ खास राजनीतिक संकेत। मित्रों चाणक्य का रास्ता ही हमारा रास्ता हो सकता है। हम सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए हैं। 

याद है वेद का घोष- ”वयं राष्ट्रे जाग्रयाम: पुरोहित:” तो आइए चाणक्य जयंती का भव्य आयोजन कर राष्ट्रदेव को विनम्र प्रणाम करें।

नियंत्रण रेखा पर फायरिंग पाकिस्तान की सोची समझी हुयी रणनीतिक चाल…. [आलेख] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

पाकिस्तान आर्मी द्वारा कश्मीर क्षेत्र में नियंत्रण रेखा पर स्वघोषित युद्धविराम का उल्लंघन करते हुये  फायरिंग करना सोची समझी हुयी रणनीतिक चाल है. इस चाल के पीछे पाकिस्तान सरकार और उसके सभी महत्वपूर्ण संस्थानों में तालिबान से सहनुभूति रखने वाले तत्व उपस्थित हैं. पाकिस्तानी सेना को पहली बार देश के अंदर आतंकवाद का सामना करते हुये उसी तालिबान से युद्ध करना पड़ रहा है जिसे उसने स्वयं ही पोषित और पल्लवित किया है. एक समय इसी तालिबान को जनरल मुशरर्फ और सरकार के शक्तिशाली पदों पर बैठे हुये अन्य लोगों द्वारा विशेष रणनीतिक सहयोगी बताया जा चुका है. ऎसे में पाकिस्तान सेना आधे अधूरे मन से युद्ध करते हुये तालिबान के सामने कभी भी सफलता नहीं पा सकती है. इसके साथ ही समस्या है कि बहुत बड़ी संख्या में अब तालिबान दाढ़ी साफ करके जन साधारण में घुल मिल चुके हैं. वह गुरिल्ला युद्ध करते हुये आत्मघाती हमले कर रहे हैं. तालिबान नाम का जो भस्मासुर पाकिस्तान ने खुद उत्पन्न किया है अब वह उस पर ही भारी पड़ रहा है. इन परिस्थितियों में पाकिस्तान येनकेनप्रकारेण तालिबानी आतंकवादियों से जूझती एवं मार खाती हुयी अपनी सेना को स्वात घाटी से बाहर निकालने का मार्ग  ढ़ूंढ़ रहा है. 

युद्ध विराम का उल्लंघन करते हुये नियंत्रण रेखा पर फायरिंग करने से पाकिस्तान एक साथ कई लक्ष्य साधने का प्रयास कर रहा है. प्रथमत: वह भारत को भड़काते हुये कश्मीर समस्या को वैश्विक आतंकवाद से जोड़ना चाहता है ताकि निहित स्वार्थों के चलते हुये विश्वसमुदाय का ध्यान पाक-अफगान पर आतंक के मुख्य क्षेत्र से हटकर कश्मीर पर हो जाये. इससे एक तरफ वह अपने ही देश में तालिबान समर्थक कट्टरपंथी तत्वों को शांत करना चाहता है जो तालिबान के साथ युद्ध छिड़्ने से नाराज हैं. दूसरी ओर यदि किसी भी कारण से भारत भड़्काने की कार्यवाही से उत्पन्न स्थिति में प्रतिक्रियावश कोई कार्यवाही करता है तो उसे अपनी हतोत्साहित सेना को स्वात घाटी से अबिलम्ब बाहर निकालने का बहाना मिल जायेगा. और यदि भारत कोई कार्यवाही नहीं करता है तब भी वह भारत में अघोषित अपने प्राक्सीवार को सहायता पहुंचाने का ल्क्ष्य साध रहा है.

इस तरह पाकिस्तान कश्मीर क्षेत्र में नियंत्रण रेखा पर स्वघोषित युद्धविराम का उल्लंघन करते हुये एक तीर से कई लक्ष्य साधने का कार्य कर रहा है.

एक और नये खतरे की घण्टी बज चुकी है……[समाचार प्रतिक्रिया] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

अपने ही देश में सैनिकों को कोयम्बटूर के पास खदेड़ने की घटना ……. खतरे की घण्टी बज चुकी है……

विगत दिवस कोयम्बटूर के पास आर्मी के कानवाय पर तथाकथित लिट्टॆ समर्थकों द्वारा हमला करके आर्मी की युनिफ़ार्म पहने सैनिकों का अपने ही देशवासियों द्वारा खदेड़ा जाना राष्ट्रीय जनमानस के लिये बहुत ही अशुभ संकेत है. पहले से ही पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद और नक्सली समस्या से प्रभावित भारतवर्ष के लिये अब ’लिट्टे समर्थन’ के नाम पर मात्र राजनीतिक लाभ के लिये तमिल भावना को गलत दिशा देते हुये अपने सैनिकों के साथ इस प्रकार का वर्ताव नितान्त निन्दनीय राष्ट्रविरोधी दुष्कृत्य है.

सैनिकों ने बहुत ही संयम का परिचय देते हुये हुल्लड़ मचाती भीड़ से ट्कराव बचा लिया अन्यथा हथियारबन्द सैन्य समूह की थोड़ी सी भी असवधानी के दूरगामी परिणाम हो सकते थे. अपने देशवासियों से ट्कराव बचाने उनका प्रयास सराहनीय है. सैनिकों द्वारा टकराव बचाने के लिये तथाकथित तमिल भीड़ के उपद्रवी लोगों के सामने से हट जाने को भीड़ के नेता अपनी शेखी से भले ही जोड़ लें किन्तु यह नितान्त राष्ट्रद्रोह है. आगामी समय के लिये खतरे की घण्टी बज चुकी है…… जागो हिन्दुस्तान जागो.. !!!