हमारे बच्चों को उनके पारिवारिक सामाजिक बुज़ुर्गों की गोद कैसे मिले .. [ आलेख] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

  क्या किसी व्यक्ति में कुपोषण मात्र शारीरिक दुर्बलता से ही परिलक्षित होता है ..? शारीरिक विकास हेतु सम्पूर्ण पौष्टिक आहार की उपलब्धता के साथ साथ विकास के समय शैशव से लेकर किशोर, तरूणावस्थातीत युवकों के लिये भी विकास के आरम्भिक चरण में समुचित मानसिक बौद्धिक खुराक के अभाव में वह शारीरिक रूप से तो सबल हो सकते हैं किन्तु मानसिक रूप से …

  नहीं नहीं मैं मानसिक अक्षमता की बात नहीं कर रहा हूं अपितु समुचित संस्कारों के अभाव की चर्चा कर रहा हूं। इनके अभाव में बहुत अच्छे परिवारों के बच्चे भी वयक्तित्व की दुर्बलता से ग्रस्त होकर अभिशप्त रास्ते पर चल निकलते हैं। माता पिता कई बार अतयधिक महत्वपूर्ण पदासीन अथवा धनोपार्जन में व्यस्त होने के कारण सारी व्यवस्थाओं का प्रन्बन्धन कर देते हैं मात्र अक व्यक्तिगत समय एवं इसी मानसिक पोषण के। क्योंकि यह किसी दुकान अथवा माल में पैसे या पद से सुलभ नहीं होता है। यह तो परम्परागत स्वरूप से दादा दादी नाना नानी की गोद में उपलब्ध होता आया है। 

  अब एकल परिवारों के कारण अथवा जीविकोपार्जन तथा अन्यान्य कारणों सहित यही गोद दुष्प्राप्य हो चुकी है। ऐसे में इन मानसिक दुर्बलता के शिकार नागरिकों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है और सामाजिक अपराध बढ़ते जा रहे हैं
   क्या इस साधारण से विष्लेषण को कोई समझना चाहता है ? क्या यह दायित्व भी हम सरकार पर डाल सकते हैं कि हमारे बच्चों को उनके पारिवारिक सामाजिक बुज़ुर्गों की गोद मिले .. ? सोचें जरा एक बार हम अपने अंतस में भी विचार करें..!!
©तृषा’कान्त’

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मेरा आदर्श भी वही है … तुम नहीं राम ..!! [कविता] – रश्मि भारद्वाज

हे राम !
जानते हो तुमसे
क्यों नहीं मांगी
किसी ने अग्निपरीक्षा…..!!??
क्योंकि ये अगाध प्रेम था किसी का
जो नहीं देख सकता था खड़ा
तुम्हें प्रश्नो के दायरे में
जो नहीं चाहता था
खंडित हो तुम्हारी छवि
मर्यादा पुरुषोतम की
इतना निश्चल प्रेम
ईश्वर बना दिया तुम्हें ….!!!!
और ये कैसा प्रेम तुम्हारा
जिसे थी प्रमाण की दरकार
दुनिया के लिए…..!!!

ये कैसा ईश्वरत्व तुम्हारा….!!??
जिसे बचाने के लिए
कर गए परित्याग भी तुम
हमेशा के लिए ………..
साबित कर दिए दुनिया के इल्ज़ाम
वह भी तब
जब सिर्फ तुम्हारी जरूरत थी उसे
तब कैसे पाओगे
तुम भी वह प्रेम……!!!
जो तुम्हारा था कभी
उसे तो जाना ही था
धरती के गर्भ में
आज से सदियों पहले ही
कर गया कोई
अपनी अस्मिता को
बचाने की पहल
प्रेम में होने के बाद भी …….
मेरा आदर्श भी वही है राम
तुम नहीं ……………..!!

 रश्मि भारद्वाज
©तृषा’कान्त’

आत्याचारम् प्रणमामि …. [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

लो स्वीकारो साधुवाद
कोटिश धन्यवाद
सादर प्रणाम
ओ मेरे वैचारिक आक्रान्ता

विश्वासघात
झूठ और फ़रेब तुम्हारा
हैं मेरी अनमोल निधि
और श्वास ..
चिर अक्षुण अक्षय
आत्याचार तुम्हारे

है अस्तिव तुम्हारा
मेरे कवि जीवन की थाती
तुमने ही तो दिया जन्म
कागज पर ‘कान्त’ बनाकर

कभी किया निष्काषन
घर से गाँव से
नैसर्गिक अधिकार से
स्तम्भित मत हो
प्रभो, प्रणाम स्वीकारो
ये जो पीछे भीड़ खड़ी है
उसे मत चकित निहारो
ये सब तो हैं आज
हमारे मीत…
किन्तु तुम ….
विगत कटु अतीत
आज आये हैं
यह सब मेरे साथ
आपका अभिनन्दन ..!

क्योंकि आपके
सत्ता और शोषण से
अनृत के पोषण से
तर्क पर कुतर्क से
शास्त्र पर शस्त्र से
विजयाभियान ने
स्रजित किया है
निरा निरीह करूण क्रन्दन

मत संकोच करो हे तात
जन्मदाता तुम कवि के
क्योंकि
तुम अटूट बेशर्म
तुम्हीं से युग चलता है
‘ विघटन’ का हर सूत्र
स्रजित तुमसे होता है

हे.! महाभ्रष्ट. पथ दिग्भ्रामक
बढ़ाना थोड़ा सा कुछ और
झूठ …… पाखण्ड …..
जन उपेक्षा और स्वार्थ
होगा तभी अमर शायद
युग-युग तक नाम तुम्हारा.

अतः हे श्रद्धेय या जाने हेय
तुमको प्रणाम तुमको प्रणाम
त्राहिमाम् त्राहिमाम्
©तृषा’कान्त’

क्या यह राष्ट्र एक परिवार की जागीर है .. ? [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

यह राष्ट्र मेरा है। अचानक कहे गए इस कथन से चल रही बहस में एक ठहराव सा आ गया। तुम ऐसा कैसे कह सकते हो। यह कहते हुए कुछ क्षणो बाद मेरे साम्यवादी मित्र ने उस मरघटी शानित को भंग करते हुए कहा। मैने जबाब दिया – तू ही बता अब तेरी बारी है। आखिर मैं इस राष्ट्र का मालिकाना दावेदार क्यों नही हो सकता।

मित्र ने अपने तर्कों की धार को पैना किया हथियारों को परखा और बार कर दिया – तुम यह किस आधार पर कह रहे हो मुझे नही मालूम। अगर तुम ऐसा मानते हो कि हिन्दू या ब्राहम्ण होने के नाते इस राष्ट्र पर तुम्हारा ज्यादा हक बनता है। तो ठीक है, फासीवादी सोच के कारण तुम ऐसा मान सकते हो। किंतु हिन्दुओ के पूर्वज यानी कि आर्य तो इस देश के थे ही नही तो तुम्हारा दावा मजबूत कैसे हुआ ? और अगर तुम यह मानते हो कि तुम पहले विजेता थे तो भी किसी एक आक्रमणकारी का दावा किसी दूसरे से ज्यादा मजबूत कैसे हुआ।

मुझे लगा बहस सदियों से घर कर गए तर्कों की तरफ मुड़ गर्इ है। कुछ कहता इससे पहले ही अगला वार हुआ। इस बार दलित मित्र ने आक्रमण किया था – बोले – वैसे भी भारत के मूल निवासी तो दलित, शोषित, आदिवासी वनवासी बंधु है। जिन्हें आक्रान्ता आर्यों ने जंगलो में धकेल दिया और स्वंय शासक बन गए। उन्होने अपने कथन के समर्थन में कुछ दलित विचारकों को भी उदघृत किया। किंतु बाबा साहेब अंबेडकर जी तो ऐसा नही मानते और आप सहमत होंगे कि उनसे बड़ा दलित चिंतक अभी तक भारत में नही हुआ। मैने जबाब दिया। मैने दलित मित्र को संतुष्ट करने के लिए माननीय डा0 अम्बेडकर लिखित कुछ संदर्भ ग्रन्थो का हवाला देने की कोशिश की किंतु तभी एक और आक्रमण हुआ। इस वार का हमला सेक्युलर मित्र की ओर से था – काफिले आते गए और कारवां बनता गया। अमां इन आने वाले काफिलों में कौन तेरा था और कौन मेरा। किसे पता। फिर सबसे बाद में और लम्बे समय तक य हां आकर बसने वाले काफिलों में इस्लामिक काफिले थे। तुम तो जानते ही हो कि प्रगतिवादी ए वं आधुनिक मुसलमान होने के नाते मैं कभी दारूल हरम या दारूल हरब की अवधारणाओं में नही उलझ ता। किंतु तुम्हे भी माइनारिटी के हकों को समझ ना होगा। इसीलिए पणिडत नेहरू जैसे विचारकों ने इसे सेक्यूलर स्टेट माना। साम्यवादी ए वं दलित मित्रों ने सेक्युलरी भाव की हाँ में हाँ मिलार्इ। उन्होने मुझे ऐसे देखा मानो शिकार पर निकले शिकारी ने दिन भर की दौड़ धूप के बाद एक मुर्गाबी का शिकार कर लिया हो। अब मैने उत्तर दिया – मेरा यह दावा इस आधार पर है कि मै मानता हूँ कि मैं राहुल गांधी हूँ। मैं संजय गाँधी या राजीव गाँधी था। क्या तो भी यह बहसें जिन्दा रहती हैं। बाकी मित्र कुछ कह पाते कि पाण्डेय जी ने बहस खत्म की – चलो यारों देर हो रही है घर चलें। वैसे भी सकल भूमि गोपाल की। झगड़ना कैसा। चलो कल मिलते हैं और बहस खत्म हो गर्इ।
©तृषा’कान्त’

सांप्रदायिकता बनाम बहुलतावाद कुछ ज्वलन्त प्रश्न एवं विश्लेषण . . . . [आलेख] – शिवेंद्र कुमार मिश्र

…. चोट तुम्हें भी लगी है और घाव हमने भी खाए हैं । अगर तुम हमेशा अपनी चोटें खुली रखोगे तो घाव सीना हम भी सीख नहीं पायेंगे। अत: उचित समय है कि इन कठमुल्ला, मौलवियों, पणिडतों और ढोंगी भगवाधारियों, बुद्धिजीवियों, नेताओं, कथित मानवाधिकार एवं सोशल कर्मियों और मीडिया की फ्लश लाइटों से बचिए। दो कदम तुम चलो और दो कदम हम चलें ताकि इस बहुलतावादी समाज को बचाया जा सके वरना कोर्इ राक्षस ब्रोविक पैदा हो जायेगा।

  प्रात: प्रतीची से उदित होते हुए सूर्य की प्रथम रश्मि संग कभी मंदिरों से प्रात:कालीन आरती और भजनों की यान्त्रिक और मानवीय ध्वनि सुनार्इ दिया करती थी किंतु अब ऐसी ध्वनियां विशेषत: मानवीय ध्वनियां अतीत की बात हो गर्इ हैं। अजान के स्वर अब भी मुंह अन्धेरे ही सुनार्इ देते हैं और साथ ही कावा में दफन होने की ख्वाहिश और किसी गाजी की प्रशंसा के गीत भी। मैं पंथनिरपेक्षता में पूर्ण विश्वास करता हूँ किंतु यह पंथनिरपेक्षता धार्मिक सहिष्णुता के गर्भ से उत्पन्न होती है और इसका समर्थन संविधान भी करता है। किंतु यह दुर्भाग्य है कि जब हमारे देवी-देवताओं के भजन-कीर्तनों के कार्यक्रमों को भी यदा-कदा छोटी सी शिकायत पर बन्द करा दिया जाता है और हमारे लोग नपुसंक क्रोध से मुठिठयां भींचते रहते हैं। दूसरी तरफ अन्य मत के लोग जरा सी बात पर हिंसा पर उतारू हो जाते हैं। दुकाने फूंक दी जाती हैं। लोग मार दिए जाते हैं। थोड़े दिन कर्फ़्यू लगता है। यदि हिंसा एक विशेष प्रकार के लोगो के खिलाफ होती है तो पंथनिरपेक्ष प्रशासन, आधुनिकता, पंथनिरपेक्षता के प्रतीक बुद्धिजीवी, मीडिया कोर्इ भी इस बात पर ध्यान नहीं देता। जबकि आतंकवाद के नाम पर ऐसी सुनियोजित हिंसा  कई बार किसी क्षेत्र विशेष से हिन्दू आबादी को निर्मूल कर देती है और कहीं कोई आवाज तक नहीं आती। शायद स्मृति पर बल दें तो स्मरण आ जाए। एक दशक पूर्व की एक हृदय विदारक घटना। जब कश्मीर घाटी एवं पाकिस्तान एक भयंकर भूकंप का शिकार हुआ था। अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के दौरे पर थे। ऐसे समय में भी जिहादी आतंकवादियों ने उस मानवीय आपदा के भीषण क्षणों में भी लगभग दस सिखों की नृशंस हत्या कर दी थी। 

  एक समाचार बरबस मेरा ध्यान खींचता है। केरल की विधानसभा में प्रस्तुत किए जाने हेतु प्रस्तावित जनसंख्या नियंत्रण संबंधी एक बिल पर कैथोलिक चर्च द्वारा उठार्इ गर्इ आपत्ति। इस बिल में दो से अधिक संतान उत्पन्न करने वाले को 10000-रू0 अर्थदण्ड या एक वर्ष की सजा या दोनो का प्राविधान है। चर्च की आपत्ति निरन्तर कम होती र्इसार्इ जनसंख्या एवं हिन्दू जनसंख्या की ओर है। चर्च ने अपने हिन्दू मित्रों का ध्यान आकृष्ट करते हुए केरल के शीघ्र ही मुस्लिम बाहुल्य राज्य मे परिवर्तित हो जाने का उल्लेख किया है। अन्य संप्रदायों की तुलना में एक पंथ विशेष के अनुयायियों की बढ़ती जनसंख्या, जनसांख्यिक एवं राजनैतिक विषमता तो उत्पन्न करेगी ही।

  यह चिन्ता मेरे जैसे कलमघिस्सू भारतीय हिन्दू की ही हो ऐसा नहीं है। इसके सरोकार विश्व व्यापी हैं। यदि आपकी स्मृतियों पर समय की धूल की मोटी परत न चढ़ी हो तो मैं आपका ध्यान नार्वे की एक हिंसक घटना और उसके कर्ता की चिन्ताओं की ओर ले जाना चाहता हूँ। यहां स्पष्ट कर दूँ कि उस हिंसक घटनाकाण्ड की न तो प्रशंसा की जा सकती है और ही उस आतातायी की। किंतु यदि हिंसा के मूल में उस अपराधी की चिन्ताओं के सरोकार पर ध्यान न दिया जाए तो यह न्याय और बदलते मानविकी भूगोल से मुंह मोड़ लेना होगा।

  जुलार्इ 2011 यूरोप के सामान्यत: सबसे शान्त देश नार्वे में एडर्स बेहरिंग ब्रेविक नामक एक नवयुवक ने एक भीषण नरसंहार को अंजाम दिया। लगभग 98 लोग मारे गए। हम इस युवक को बड़ी सहजता से विक्षिप्त या मानसिक रोगी करार दे सकते हैं। किंतु सच्चे जनतंत्र में विक्षिप्तों और मानसिक रोगियों को भी सुने जाने में कोर्इ हानि नही है। यहां भारत में हम उच्च पदस्थ मानसिक रोगियों को नित्य ही सुनते हैं और मीडिया में उन्हे प्रमुखता भी मिलती है तो ब्रेविक को सुने जाने में भी हानि नही है।

  ब्रेविक द्वारा 1500 पन्नो में लिखे अपने दस्तावेज – 2083 : अ यूरोपीय डिक्लेरेशन आफ इण्डिपेंडेंस में अपनी चिंताओं को व्यक्त किया है। ब्रेविक की चिंताओ में बहुलतावादी यूरोपीय समाज में मुसिलमों द्वारा स्वंय को अलग-थलग रखने, पाकिस्तान में हिन्दू, र्इसार्इ, अल्पसंख्यकों का बलात धर्मान्तरण आदि और दूरगामी चिंताओं में यूरोप में अनेक छोटे-छोटे मुस्लिम राष्ट्रों की कल्पना आदि थी। वस्तुत: उसने बहुलतावादी संस्कृति के उस स्वरूप पर भी सवाल उठाए हैं जहां मुस्लिम लड़कियों को यूरोपीय समाज में मिश्रित होने पर पाबन्दी होती है और मुस्लिम युवक नार्वे की लड़कियों को अच्छी नजर से नही देखते।

  क्या भारत में भी मुसलमान बहुसंख्यक अथवा अन्य अल्पसंख्यक समाजों के साथ मिश्रित नहीं होते ? भारत में यह समस्या अन्य रूप में है। आम मुस्लिम जन समाज के शेष हिस्से के साथ न केवल मिश्रित होना चाहते हैं अपितु वह स्वंय को शेष समाज का अविभाज्य अंग मानते हैं किंतु यहां के कुछ खास मानसिकता के लोग जो राजनेता, बुद्धिजीवी अथवा मीडियाकर्मी हो सकते हैं। यह नहीं चाहते कि मुस्लिम समाज शेष समाज से एकाकार हो और साझा सोच व संस्कृति का विकास हो। गुजरात दंगो के नाम पर एक विशेष प्रकार की मानसिकता के लोगो को लगातार वरीयता देना, वस्तनावी जैसे आधुनिक प्रगतिशील मुस्लिम विचारक को राष्ट्रीय पटल से पीछे धकेल देना ऐसी ही घटनाएं हैं। इतना ही नही जब अन्ना के आन्दोलनकारी भी मौलाना बुखारी जैसे कटटरपंथियों के यहां उन्हें मनाने पहुंचते हैं तो निशिचत रूप से किसी भी बहुलतावादी समाज में कटटरपंथियों की जिद को वरीयता मिलती है। ऐसे कटटरपंथियों को दुत्कारा जाना चाहिए भले ही वह दाढ़ी वाले हों या टोपी वाले।

  किसी भी ऐसे समाज में जहां विभिन्न, आस्थाओं, मान्यताओं वाले लोग एक साथ रहते हो वहां पारस्परिक समांजस्य एवं सदभाव का दायित्व आम नागरिकों से लेकर बुद्धिजीवियों, सत्ताधीशों एवं समुदाय के नेताओं का समान रूप से होता है। सांप्रदायिक घटनाओं पर समय की धूल डालना, हर प्रकार के कटटरपंथ का कठोरता से दमन, समुदाय को दी जाने वाली सुविधाएं सभी समुदायों को समान रूप दिया जाना, इस सामंजस्य के लिए आवश्यक है। मुस्लिमों को हजयात्रा पर सब्सिडी समझ में आती है पर यही छूट सिक्खों, र्इसाइयों और हिन्दुओं को क्यों नही मिलनी चाहिए।

  गोधरा के दंगो और मोदी को निरन्तर नए जख्म जैसे दुष्प्रचार के रूप में एक दशक से प्रस्तुत किया जा रहा है। तो क्या हाशिमपुरा, मलियाना के दंगो को भी मुसलमानों को याद नहीं रखना चाहिए। एक पूर्व प्रधानमंत्री का सिक्खों के नरसंहार पर दिए गए वक्तव्य को याद करिए – एक बड़ा वृक्ष गिरता है तो थोड़ा बहुत तो धरती कापंती ही है। सन 84 के दंगो को नरसंहार क्यों न कहा जाए। वर्ष 1916 गांधी के खिलाफत असहयोग के कार्यकाल के भीषण मोपला दंगो को याद करिए जहां हजारों हिन्दुओं का कत्ल हुआ, बलात्कार और बलात धर्म परिवर्तन हुए और गांधी तथा उनकी कांग्रेस एक निन्दा प्रस्ताव भी अपराधियों के विरूद्ध पास न कर सकी। डा0 अम्बेडकर जैसे विचारक भारत में सांप्रदायिकता की शुरूआत खिलाफत असहयोग से ही मानते हैं और उक्त दंगो की भीषण निन्दा भी करते हैं। (पाकिस्तान अथवा भारत विभाजन – डा0 बी0आर0 अम्बेडकर) अन्तत: सभी दंश समाज ने भुलाए ही हैं। चोट तुम्हें भी लगी है और घाव हमने भी खाए हैं । अगर तुम हमेशा अपनी चोटें खुली रखोगे तो घाव सीना हम भी सीख नहीं पायेंगे। अत: उचित समय है कि इन कठमुल्ला, मौलवियों, पणिडतों और ढोंगी भगवाधारियों, बुद्धिजीवियों, नेताओं, कथित मानवाधिकार एवं सोशल कर्मियों और मीडिया की फ्लश लाइटों से बचिए। दो कदम तुम चलो और दो कदम हम चलें ताकि इस बहुलतावादी समाज को बचाया जा सके वरना कोर्इ राक्षस ब्रोविक पैदा हो जायेगा।
©तृषा’कान्त’

सुपर डैड …… [कहानी] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

“अंश ….”मोबाइल के स्क्रीन पर नाम देखते ही आंखों में आश्चर्य के साथ उसने पूछा। 

“अरे ऎसा कुछ नहीं.. यह तो बस घर का नाम … मैंने पहले ही कहा था| नाम बस अंग्रेजी के ए अक्षर से ही आरम्भ होगा। एग्जामिनेशन रोल वगैरा में ऊपर आता है। बाकी आप सब लोग जो भी नाम रखना चाहें। कृति ने मन की भावनायें छुपाने का असफल प्रयास किया।

“मुझे इससे कोई अंतर नहीं पड़ता .. ’अंश’ अच्छा नाम है। इसे ही रख लेंगे पहले उसे इस दुनिया में आने दो…” वर्षों की आकुल प्रतीक्षा के बाद मातृत्व सुख की देहरी पर खड़ी उस नव मां के उभरे हुये पेट पर उसने एक दृष्टि डाली और बात टालने के लिये दूसरे कमरे में चला आया।
बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी। … उसके मष्तिष्क में विचारों की आंधी उठ रही थी। 
उसका मस्तिष्क बस यही सोच रहा था कि सारे नाम…… सारी चर्चा ऎसी क्यों जिससे आभास हो कि बेटा ही आयेगा… कपड़े .. बातें भावी योजनायें सब से ऎसा प्रतीत होता कि आने वाले बेटे की बातें हो रही हैं… दादी, नानी, ताई और सम्भावी मां सब.. परिवार में छोटे बच्चे से बात करते तो उसके आने वाले भाई की बातें ही करते ….

वह यह सब देखता सुनता और स्वयं को आहत अनुभव करता। वह जितना सोचता.. बेटा और बेटी के बीच भेद भावना उसे प्रमुख रूप से महिलाओं में अधिक प्रतीत होती। उसका अपना जीवन तो महिलाओं के संरक्षण को सपर्पित था। पारिवारिक और सामाजिक विरोध की प्रतिकूल आंधी में भी नारी जागरूकता को समर्पित सामाजिक संस्था से वह निरन्तर से जुड़ा रहा। अपनी संस्था के माध्यम से आर्थिक अथवा सामाजिक वंचना की शिकार कई मानसिक बेटियों को उच्च शिक्षा ग्रहण कर समाजिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करने में सहयोग किया है।  यदि वह स्वयं भी इसी भेदभाव की भावना से विचार करता तो उसके कन्या समतामूलक आन्दोलन का क्या होता …? उन बच्चियों को सर्वांगीण प्रगति और स्वाभिमान का रास्ता उसने कैसे दिखाया होता। उसने सोचा…

किन्तु आज अपने ही घर में सबकी दृष्टि से ओझल इस अनजाने से होने वाले व्यवहार को वह अपने चिन्तन में भी नहीं सहन कर पा रहा है। उसने अनुभव किया कि सामाजिक कार्य के लिये अपने वैचारिक आन्दोलन को पुन: उसे घर से ही आरम्भ करना होगा अन्यथा अपने आन्दोलन से सम्बद्ध अनेकों बेटियों के माध्यम से समाज में वैचारिक परिवर्तन के उद्देश्य को प्राप्त करने का आजीवन प्रयास व्यर्थ हो जायेगा।

“ पापा आप भी आ जायें कृति दी को आपरेशन थियेटर में ले गये हैं…” सेल पर छोटी बेटी की आवाज उसका चिन्तन भंग करती है। “ हां बेटा मैं अभी आता हूं ….” फोन रखते ही वह घर से निकल पड़ा।
उसने सोचा.. नवजात तो कोई भी हो सकता है …… कन्या भी। इन महिलाओं का पता नहीं उसको ध्यान में रखकर कोई कपड़े रखे हों अथवा नहीं। यदि बेटी हुयी तो … बाद में यह सब जानकर क्या उसे हीन भावना नहीं होगी कि मैं तो अनाहूता हूं। मेरे लिये किसने तैयारी की थी। बस आ गयी तो ठीक है अन्यथा कोई विशेष बात नहीं।
“नहीं नहीं …ऎसा नहीं है। मैं हूं ना तुम्हारी मां का पापा … तुम्हारा पापा … तुम्हारी छॊटी मासी की हास्टल फ़्रेंडस, सभी लड़्कियों का सुपर डैड” उसने अपने आप से कहा।
“तुम्हारे लिये वैसी ही फ्राक ला रहा हूं जो कभी, तुम्हारी मां के लिये पहली बार ली थी। तुम अपनी मां और अपने पापा की नहीं अपितु अपने “सुपर डैड” की बेटी होगी मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं अपनी बेटी की फिर से अपनी बाहों में लेने के लिये। हम दोनों मिलकर बदलेंगे इस सामाजिक सोच को। मैं पुरूषों में और तुम महिलाओं में … ” अपने आपमें बुदबुदाते हुये उसकी दृष्टि नर्सिंग होम के रास्ते में शोरूम में टंगी हुयी फ्राक पर अटक गयी और उसके कदम तेजी से काउण्टर की ओर बढ़ चले।
 

वैदिक परिप्रेक्ष्य और यौनिक स्वच्छ्न्दता की तलाश में आधुनिक पाश्चात्यवादी नारी कुंठा (भाग – 3) [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र


.अथर्ववेद का मंत्र देखें :-
आ नो अग्ने सुमतिं संभलो गमेदिमां कुमारीं सहनो मगेन्
जृष्टावरेषु समनेषु वल्गुरोयां पत्या सौभगत्वमस्यै। अथर्ववेद 2.36
इस मंत्र से ऐसा प्रतीत होता है कि – ”प्राय: माता-पिता पुत्री को अपने प्रेमी (भावी पति) के चयन के लिए स्वतंत्र छोड़ देते थे और प्रेम प्रसंग में आगे बढ़ने के लिए उन्हें प्रत्यक्षत: प्रोत्साहित करते थे।
………..यह पूर्णत: पवित्र व आनन्द का अवसर था जिसमें न तो किसी प्रकार कलुष था और न अस्वाभाविकता।

अन्त में महाभारत के निम्न उध्दरण को प्रस्तुत करना चाहूंगा –
”सकामाया: सकामेन निर्मन्त्र: श्रेष्ठ उच्यते।” (म.भा. 4.94.60)
अर्थात् सकामा स्त्री का सकाम पुरूष के साथ विवाह भले ही धार्मिक क्रिया व संस्कार से रहित क्यो न हो, सर्वोत्त्म है।”
….
डा0 राजबली पाण्डेय कृत हिन्दू संस्कार – विवाह संस्कार से ”गृहीत उक्त सन्दर्भ से यह भलीभांति समझ में आ सकता है कि स्त्री को ”यौन स्वतंत्रता” हिन्दू/वैदिक समाज के लिए महत्वपूर्ण रहा है। ………..स्पष्ट है कि स्त्री की ”यौन संतुष्टि” का भाव हमारे सामाजिक सहचारी जीवन की व्यवस्था करते समय नीतिकारों के मन में कितना गहरा बैठा हुआ है। ..

विवाह :- वैदिक परम्परा में पत्नी को जो स्थान प्राप्त था उससे ही विवाह के महत्व को समझा जा सकता है।

”जायेदस्तम् मघवनत्सेदु योनिस्तदित त्वा युक्ता हस्यो वहन्तु। यदा कदा च सुनवाम् सोममग्निष्टवा द्रतो धन्वात्यछा।(ऋ 3.83.4)। भावार्थ यह है कि पत्नी ही घर होती है। वहीं घर में सब लोगो का आश्रय स्थान है। स्त्री के कारण ही परिवार का संगठन होता है। ऋग्वेद का ही मंत्र संख्या 3.53.6 भी स्त्री (पत्नी) का ऐसे ही गौरवान्वित करता है। ऋग्वेद के इन मंत्रो में आधुनिक नारी जिस अस्तित्व और अस्मिता के संकट से गुजर रही है शायद उसका समाधान मिल जाए। अस्तित्व संकट कार्य है। संकट प्रोमिला के.पी. के शब्दो में देखिए – ”वरजीनिया वुल्फ” ने अपने कमरे को लेकर जो बाते बताई थीं : उसकी पूरी संभावनाएं कम से कम आज की मध्यवर्गीय औरत के पास हैं। पर उसने अपनी रसोई को छोड़ दिया : उसे उपभोगवादी सामग्री के हवाले कर दिया। घरेलू जगह में भी ऐसे अनेक कोने थे जो स्त्रियों के अपने थे। – पर हड़बड़ी में जगह ही खोने की नौबत उभर आई।” यह है आधुनिकता के दंभ में छिपा आधुनिक नारी का दर्द। किंतु वैदिक ऋषि तो कहता है ”जायेदस्तम्” पत्नी ही घर है। कोना नहीं सारा आवास ही आपकी कृपा के आश्रित हैं। श्रीमति प्रोमिला के.पी. का यह आरोप कि भारत में वात्स्यायन के पश्चात से हिन्दू धर्म भी मनुवादी रास्ते पर चला अर्थात यौनिकता या देह को हेय मानने का रास्ता। यह आरोप सर्वथा गलत है मनु विवाह के संबंध में कहते हैं – सुंख चेहेच्छता नित्यं योsधार्यों दुर्बलेन्द्रियौ: अर्थात दुर्बलेन्द्रिय व्यक्ति ग्रहस्थाश्रम को धारण नही कर सकता।” (मनु. स्मृति 3-99-79) स्पष्ट है कि यह कथन स्त्री पुरूष की यौनिकता को ध्यान में रखकर ही कहा गया होगा। आइये, इस तथ्य का परीक्षण वैदिक मनीषियों द्वारा स्वीकार्य विवाह पध्दतियों के अनुशीलन से किया जाए।
वैसे तो आठ विवाह स्वीकार किए गए है – चार प्रशस्त या श्रेष्ठ और चार अप्रशस्त या निष्कृष्ट। यहां पर हम उन्हीं प्रकारों की संक्षिप्त चर्चा करेंगे जिसमें स्त्री के स्त्रीत्व की मर्यादा का सबसे अधिक ध्यान रखा गया हो। विवाह पध्दतियों में ”पिशाच विवाह” को मैं प्रथम स्थान पर रखना चाहूंगा।

पिषाच विवाह :- ”सुप्तां, मत्तां, प्रमत्तां व रहो यत्रोपगच्छति। सा पापिष्ठो विवाहानां पैशाचाष्टमोsधम: मत। प्रमत्त, अथवा सेती हुई कन्या से मैथुन करना। (म.स्मृ.3.24) ही पिशाच विवाह है।” वस्तुत: यह विवाह उस कन्या को विवाह, गृहस्थ जीवन, संतानोत्पति और सामाजिक वैधता का अधिकार देता है जिसके साथ बलात्कार किया गया हो। यद्यपि प्रत्येक स्थिति में ऐसा संभव नही होता होगा तो उसके लिए दण्ड संहिताओं मे अलग से विधान है – जिनका अध्ययन एक अलग विषय है। किंतु जिस नारी और विशेषत: कन्या से या अविवाहिता से, बलात्कार किया गया हो उसकी पीड़ा वही स्त्री ही समझ सकती है। प्राय: ऐसी स्थिति में लड़कियों को चुप रहने या आत्महत्या करते ही देखा गया है। आधुनिक राज्य और उनके दण्ड विधान इस दिशा में दोषी को दण्ड (जो त्रृटिपूर्ण व्यवस्था में प्राय: नहीं हो पाता) और पीड़िता को कुछ रूपयों का अनुतोष प्रदान करता है। ”बलात्कार” के बदले ”अनुतोष” की स्थिति क्या दयनीय और मजाकिया नहीं लगती ? इस व्यवस्था से उत्पन्न क्षोभ देखिए कि अभी हाल ही समाचार पत्रों की सुर्खियां बना यह समाचार कि एक निचली अदालत की जज ने बलात्कार के वाद में निर्णय देते हुए यह सुझावात्मक टिप्पणी की – ”कि बलात्कारियों को इंजेक्शन द्वारा नपुसंक बना देना चाहिए।”

इससे यह तो स्पष्ट है कि तमाम महिला संगठनों और बड़े-बड़े कानूनो व दावों के बाद भी बलात्कार से पीड़िता ”नारी के हक” में कुछ भी नहीं कर पाता। ”पिशाच विवाह” कम से कम निम्न वर्गीय महिलाओं जैसे खेतिहर, मजदूर, वनवासी, खदानों में काम करने वाली, श्रीमती के घरो में काम करने सेविकाओं को आदि यौन शोषण के विरूध्द सामाजिक सुरक्षा, सम्मान और नारी के अधिकार प्रदान करता है। जो आधुनिक समाज भी देने में सक्षम नहीं है। इसके पीछे निश्चय ही राज्य की सहमति और शक्ति रही होगी क्योंकि उसके बिना ”बलात्कृता नारी” को ”विवाह” की सुरक्षा प्रदान कर पाना संभव ही नहीं। यह ध्यान रखना चाहिए कि प्राचीन हिन्दू समाज में ”बहुपत्नी प्रथा” स्वीकार्य थी। अत: ऐसे विवाह के लिए बाध्य किए गए पुरूष को अन्य पत्नियों का चयन करने में और पुन: पूर्ववत् हरकत करने में, दोनो ही स्थितियों में विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता होगा।

राक्षस विवाह :- मनु ने इसके लक्षण में कहा है –

”हत्वा, छित्वा, च भित्वा च क्रोशन्तीं, रूदतीं गृहात्
प्रसध्यं कन्यां हरतो, राक्षसो विधिरूच्यते।” (मनु-3.33)
अर्थात रोती, पीटती हुई कन्या का उसके संबंधियों को मारकर या क्षत विक्षत कर बलपूर्वक हरण कर विवाह करना ”राक्षस” प्रकार का विवाह कहा जाता था।

मैं इस पध्दति को ”नारी” की सामाजिक स्वीकार्यता और सम्मान से जोड़कर क्यों देखता हूं : उसका कारण है। पहली बात यह विवाह ”अपहरण और बलात्कार नही हैं।” अपितु इसमें विवाह पूर्व ”प्रेम” का स्थायी भाव पुष्पित होता है। ऐसा कतिपय विद्वान स्वीकार करते हैं। भगवान कृष्ण और रूक्मणी तथा पृथ्वीराज चौहान और संयुक्ता के विवाह को उदाहरण में रख सकते हैं। जहां ”राक्षस विवाह” हुआ है और विवाहपूर्व ”प्रेम” का स्थायी भाव विद्यमान है। यद्यपि इसके विरूध्द भी उदाहरण दिए जा सकते है किंतु बहुमान्य तथ्य विवाह पूर्व प्रेम का स्थायी भाव ही है।

अब मैं अपना मत रखता हूं कि यह नारी के ”सम्मान” से कैसे संबंधित है। सामान्यत: यह विवाह राजन्यों या क्षत्रियों कुलों में सम्मानित माना गया। विवाह पूर्व ”प्रेम” की स्थिति में एक अन्य उपाय ”गान्धर्व विवाह” था (असुर विवाह भी) किंतु चोरी छिपे विवाह करने में वीर ”स्त्री-पुरूषों” का सामाजिक अपमान था तो इस तरह ”राक्षस” प्रकार के विवाह में दोनो पक्षों से निकट संबंधियों के युध्द में मारे जाने का भय था। ऐसी स्थिति में इन हत्याओं का सामाजिक कलंक नववधू को ही ढोना था। उल्लेखनीय है कि आज भी यदि नववधू के आगमन के पश्चात परिवार में कोई दुर्घटना हो जाए तो अशिक्षित परिवारों की तो छोड़िए शिक्षित परिवारों में भी इसका दोष ”नवागन्तुका” के सिर पर ही थोप देते हैं। ऐसी स्थिति से ”कन्या” को बचाने व युगल के ”प्रेम” को सर्वोच्च सम्मान देते हुए ”राक्षस विवाह” को न केवल स्वीकार किया गया अपितु क्षत्रियों के लिए सर्वाधिक प्रतिष्ठित विवाह पध्दतियों में रखा गया। स्पष्ट है कि राक्षस विवाह का विधान नारी की प्रतिष्ठा और सामाजिक सम्मान को बनाये रखने और विवाह पूर्व युगल के प्रेम को सामाजिक स्वीकरोक्ति का ही प्रकार है।

गान्धर्व विवाह :- यह संभवत: विवाह संस्था के जन्म से भी पूर्व से विद्यमान विवाह पध्दति है जिसे बाद में सभ्य समाज ने सामाजिक स्वीकरोक्ति प्रदान की है। मनु की गान्धर्व विवाह की परिभाषा देखें –
”इच्छायाsन्योन्यसंयोग: कन्यायाश्च वरस्य च
गान्धर्वस्य तु विज्ञेयो मैथुन्य: कामसंभव:।” (मनु 3.32)
अर्थात कन्या और वर पारस्परिक इच्छा से कामुकता के वशीभूत होकर संभोग करते हैं। ऐसे स्वेच्छापूर्वक विवाह को गान्धर्व विवाह कहा जाता है।” यह परिभाषा बहुलत: स्वीकार्य है।

इस विवाह में विवाह पूर्व कामुकता के वशीभूत स्वेच्छया किए गए संभोग को सामाजिक स्वीकृति से विवाह में बदल दिया गया है। इसमें न केवल नारी के सम्मान और गरिमा की रक्षा हुई है अपितु विवाह पूर्व जो बीज नारी के गर्भाशय में स्थापित हुआ है। उसकी भी मर्यादा और सामाजिक सम्मान का संरक्षण हुआ।

उपरोक्त के अतिरिक्त प्राजापत्य विवाह जिसे प्रशस्त विवाह श्रेणियों में माना गया है। को भी मैं नारी के सम्मान और गरिमा को महत्व प्रदान करने वाला विवाह मानता हूँ।

प्राजापात्य विवाह :- मनु की परिभाषा देखिए :-
”सहोभौ चरतां धर्मीमति वाचानुभाटय च
कन्याप्रदानमभ्यचर्य प्राजापत्यो विधि स्मृत:।”
अर्थात ”विवाह का वह प्रकार जिसमें तुम दोनों धर्म का साथ-साथ आचरण करो” ऐसा आदेश दिया जाता है।” इसमें विशेष बात यह है कि वर स्वंय वधू के पिता के पास प्रार्थी के रूप में आता था और पिता उसकी योग्यता पर विचार कर उस वर के साथ पाणिग्रहण संस्कार सम्पन्न कर देता था।” वर का स्वंय वधू के पिता के पास प्रार्थी के रूप में आना वर-वधू का परस्पर पूर्व परिचय आकर्षण, एवं प्रेम सिध्द करता है और वधू के पिता द्वारा योग्यता के परीक्षणोपरान्त विवाह सम्पन्न करना पिता के दायित्व और कन्या के परिचय एवं प्रेम के बीच अद्भुत समन्वय का उदाहरण है।

उपरोक्त विवाह प्रकारों पर चर्चा करते हुए हम यह समझ सकते हैं कि वैदिक हिन्दू व्यवस्था द्वारा सुविचारित ”नारी विमर्श” कितना आधुनिक और नारी की यौन स्वतंत्रता एवं सामाजिक मर्यादा के बीच कितना अद्भुत सामंजस्य स्थापित करता है।

आधुनिक सहचारी जीवन का चिन्त्य विषय स्त्री-पुरूष मित्रता और नारी की यौन स्वतंत्रता आदि कितना आधुनिक है। इसको यदि हिन्दू सभ्यता के परम्परागत साहित्य के द्वारा देखने का प्रयास करें तो स्थिति स्वत: स्पष्ट हो जायेगी।

सभ्यता के शैशव काल में युवक तथा युवतियां बिना किसी शक्ति अथवा छल के स्वंय परस्पर आकर्षित होते रहेंगे। ऋग्वेद 10.27.17 के अनुसार – ”वही वही वधु भ्रदा कहलाती है जो सुन्दर वेश-भूषा से अलंकृत होकर जनसमुदाय में अपने पति (मित्र) का वरण करती है।” युवा लड़कियां ग्राम-जीवन अथवा अन्य अनेक उत्सवों व मेलों में जहां उनका स्वतंत्र चुनाव तथा परस्पर आकर्षण उनके संबंधियों को अवांछित न लगे इस प्रकार से एक दूसरे के सहवास का अनुभव कर चुके हो अथर्ववेद का मंत्र देखें :-

आ नो अग्ने सुमतिं संभलो गमेदिमां कुमारीं सहनो मगेन्
जृष्टावरेषु समनेषु वल्गुरोयां पत्या सौभगत्वमस्यै। अथर्ववेद 2.36

इस मंत्र से ऐसा प्रतीत होता है कि – ”प्राय: माता-पिता पुत्री को अपने प्रेमी (भावी पति) के चयन के लिए स्वतंत्र छोड़ देते थे और प्रेम प्रसंग में आगे बढ़ने के लिए उन्हें प्रत्यक्षत: प्रोत्साहित करते थे। ऋ.वे. 6.30.6 के अनुशीलन से ऐसा विदित होता है कि कन्या की माता उस समय का विचार करती रहती थी जब कन्या का विकसित यौवन (पतिवेदन) उसके लिए पति प्राप्त करने मे सफलता प्राप्त कर लेगा। यह पूर्णत: पवित्र व आनन्द का अवसर था जिसमें न तो किसी प्रकार कलुष था और न अस्वाभाविकता।

अन्त में महाभारत के निम्न उध्दरण को प्रस्तुत करना चाहूंगा –
”सकामाया: सकामेन निर्मन्त्र: श्रेष्ठ उच्यते।” (म.भा. 4.94.60)
अर्थात् सकामा स्त्री का सकाम पुरूष के साथ विवाह भले ही धार्मिक क्रिया व संस्कार से रहित क्यो न हो, सर्वोत्त्म है।”

डा0 राजबली पाण्डेय कृत हिन्दू संस्कार – विवाह संस्कार से ”गृहीत उक्त सन्दर्भ से यह भलीभांति समझ में आ सकता है कि स्त्री को ”यौन स्वतंत्रता” हिन्दू/वैदिक समाज के लिए महत्वपूर्ण रहा है। महाभारत के उपरोक्त श्लोक में ”सकामा” शब्द पर बल देना भी यही स्पष्ट करता है कि यदि कामातुरा नारी कामातुर पुरूष से संबंध बना ले तो किसी विधि विधान के बिना भी वह ”सर्वोत्तम” विवाह है। महाभारतकार ”श्रेष्ठ” शब्द का उच्चारण कर रहे हैं। स्पष्ट है कि स्त्री की ”यौन संतुष्टि” का भाव हमारे सामाजिक सहचारी जीवन की व्यवस्था करते समय नीतिकारों के मन में कितना गहरा बैठा हुआ है।
  …….  ( क्रमश:)

सम्पादन – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

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