दो जीवन समान्तर … [स्वर कथा] – श्रीकान्त मिश्र कान्त

©तृषा’कान्त’

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सुपर डैड …… [कहानी] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

“अंश ….”मोबाइल के स्क्रीन पर नाम देखते ही आंखों में आश्चर्य के साथ उसने पूछा। 

“अरे ऎसा कुछ नहीं.. यह तो बस घर का नाम … मैंने पहले ही कहा था| नाम बस अंग्रेजी के ए अक्षर से ही आरम्भ होगा। एग्जामिनेशन रोल वगैरा में ऊपर आता है। बाकी आप सब लोग जो भी नाम रखना चाहें। कृति ने मन की भावनायें छुपाने का असफल प्रयास किया।

“मुझे इससे कोई अंतर नहीं पड़ता .. ’अंश’ अच्छा नाम है। इसे ही रख लेंगे पहले उसे इस दुनिया में आने दो…” वर्षों की आकुल प्रतीक्षा के बाद मातृत्व सुख की देहरी पर खड़ी उस नव मां के उभरे हुये पेट पर उसने एक दृष्टि डाली और बात टालने के लिये दूसरे कमरे में चला आया।
बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी। … उसके मष्तिष्क में विचारों की आंधी उठ रही थी। 
उसका मस्तिष्क बस यही सोच रहा था कि सारे नाम…… सारी चर्चा ऎसी क्यों जिससे आभास हो कि बेटा ही आयेगा… कपड़े .. बातें भावी योजनायें सब से ऎसा प्रतीत होता कि आने वाले बेटे की बातें हो रही हैं… दादी, नानी, ताई और सम्भावी मां सब.. परिवार में छोटे बच्चे से बात करते तो उसके आने वाले भाई की बातें ही करते ….

वह यह सब देखता सुनता और स्वयं को आहत अनुभव करता। वह जितना सोचता.. बेटा और बेटी के बीच भेद भावना उसे प्रमुख रूप से महिलाओं में अधिक प्रतीत होती। उसका अपना जीवन तो महिलाओं के संरक्षण को सपर्पित था। पारिवारिक और सामाजिक विरोध की प्रतिकूल आंधी में भी नारी जागरूकता को समर्पित सामाजिक संस्था से वह निरन्तर से जुड़ा रहा। अपनी संस्था के माध्यम से आर्थिक अथवा सामाजिक वंचना की शिकार कई मानसिक बेटियों को उच्च शिक्षा ग्रहण कर समाजिक एवं आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त करने में सहयोग किया है।  यदि वह स्वयं भी इसी भेदभाव की भावना से विचार करता तो उसके कन्या समतामूलक आन्दोलन का क्या होता …? उन बच्चियों को सर्वांगीण प्रगति और स्वाभिमान का रास्ता उसने कैसे दिखाया होता। उसने सोचा…

किन्तु आज अपने ही घर में सबकी दृष्टि से ओझल इस अनजाने से होने वाले व्यवहार को वह अपने चिन्तन में भी नहीं सहन कर पा रहा है। उसने अनुभव किया कि सामाजिक कार्य के लिये अपने वैचारिक आन्दोलन को पुन: उसे घर से ही आरम्भ करना होगा अन्यथा अपने आन्दोलन से सम्बद्ध अनेकों बेटियों के माध्यम से समाज में वैचारिक परिवर्तन के उद्देश्य को प्राप्त करने का आजीवन प्रयास व्यर्थ हो जायेगा।

“ पापा आप भी आ जायें कृति दी को आपरेशन थियेटर में ले गये हैं…” सेल पर छोटी बेटी की आवाज उसका चिन्तन भंग करती है। “ हां बेटा मैं अभी आता हूं ….” फोन रखते ही वह घर से निकल पड़ा।
उसने सोचा.. नवजात तो कोई भी हो सकता है …… कन्या भी। इन महिलाओं का पता नहीं उसको ध्यान में रखकर कोई कपड़े रखे हों अथवा नहीं। यदि बेटी हुयी तो … बाद में यह सब जानकर क्या उसे हीन भावना नहीं होगी कि मैं तो अनाहूता हूं। मेरे लिये किसने तैयारी की थी। बस आ गयी तो ठीक है अन्यथा कोई विशेष बात नहीं।
“नहीं नहीं …ऎसा नहीं है। मैं हूं ना तुम्हारी मां का पापा … तुम्हारा पापा … तुम्हारी छॊटी मासी की हास्टल फ़्रेंडस, सभी लड़्कियों का सुपर डैड” उसने अपने आप से कहा।
“तुम्हारे लिये वैसी ही फ्राक ला रहा हूं जो कभी, तुम्हारी मां के लिये पहली बार ली थी। तुम अपनी मां और अपने पापा की नहीं अपितु अपने “सुपर डैड” की बेटी होगी मैं प्रतीक्षा कर रहा हूं अपनी बेटी की फिर से अपनी बाहों में लेने के लिये। हम दोनों मिलकर बदलेंगे इस सामाजिक सोच को। मैं पुरूषों में और तुम महिलाओं में … ” अपने आपमें बुदबुदाते हुये उसकी दृष्टि नर्सिंग होम के रास्ते में शोरूम में टंगी हुयी फ्राक पर अटक गयी और उसके कदम तेजी से काउण्टर की ओर बढ़ चले।
 

एक नयी दिशा …….[कहानी] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

[ यह कहानी वास्तव में १९७६ में देश पर थोपे गए आपात स्थिति के दिनों का एक अनजाने इतिहास का एक टुकडा भी है और आज के चुनाव के समय राष्ट्रीय सन्दर्भ में सबक भी. विगत के कई दशकों में देश में सामाजिक राजनीतिक दृष्टि से बहुत कुछ बदला है किन्तु जो नहीं बदला है वह है राष्ट्रीय समस्याओं का यथावत रहना. यही इस लम्बी कथा का सम्बन्ध आजके परिवेश से कराता है. लोकनायक जयप्रकाश के नाम से निकले उस समय के युवा आज के लालू और मुलायम के रूप में ना जाने कितने रूप धारण कर चुके हैं ……. ]

ताउम्र हमको मारने की कोशिश में तुम रहे…

हमने भी की है जिद मगर तुमको बचाने की ।

ये इश्क या जूनून कोई रंज है न ’कान्त’
हमने भी की है जिद मगर तुमको मनाने की।

जज्बात से यूं खेलना भाया उसे बहुत …
शब्दों ने की है जिद मगर उसको बताने की

जम्हूरियत की राह पर सब शख्स चल दिये..
कम्बख्त की है जिद मगर उसको मिटाने की।


इस नगर की सड़कों पर से गुजरने वाले जन समूह की एक इकाई मैं भी हूँ। यहाँ, इन्ही गलियों और सड़कों पर विचरण करते हुये मुझे एक अन्तराल हो चुका है । अतः मेरे लिये सब पुराना लगने लगा है । नवीनता की कोई अनुभूति नहीं । रोज – रोज वही सड़कें, वही गलियाँ, उन पर लटकते हुये पोस्टर, सभी पुराने से पड़ ग़ये हैं ।

संकरी गली से निकल कर चौराहा और वहाँ तैनात यातायात सुरक्षा कर्मचारी, उसकी सफेद ड्रेस, लाल पगड़ी, यह सब देखना भी मेरी दिनचर्या का अंग बन चुका है । कुछ देर तक चौराहे पर खड़े होकर हाथ उठा देना, आने जाने वाले वाहनों को आधे अधूरे मन से नियन्त्रित करना और फिर पास वाली पान की दुकान पर बैठ कर गप्पें लगाना. कर्तव्य पालन की भावना संभवतः गपशप करने में ही निहित है । जब भी उधर से गुजरता हूँ , पुलिस विभाग की इस अकर्मण्यता पर सहज ही कष्ट होता है । इस विभाग में कितने ही कर्मचारी हैं जो मात्र स्वयं की सर्वांगीण सुरक्षा में रात दिन सन्नद्ध रहते हैं। इनकी इसी स्वनिष्ठा का स्वाद थाने में किसी भी कार्य से गये हुये व्यक्ति को निश्चित रूप से चखना पड़ता है । इन सभी के सहयोग के लिये एक वर्ग सदैव ही प्रस्तुत रहता है । ये लोग अपने-अपने क्षेत्र के बेताज बादशाह होते हैं । आखिर थानेदार के कृपा पात्र जो ठहरे । थाने के आस – पास मँडराने वाले इस विशिष्ट वर्ग का पेशा प्रायः परम्परागत होता है । राजनीतिकों और पुलिस के बीच ये सेतु, किसी भी मामले को थाने के बाहर ही रफा-दफा करने के लिये रेट बता देते हैं । शेष इने-गिने कर्मचारी जो इस विभाग द्वारा देश एवं समाज के लिये कुछ करना चाहते हैं । उन्हें प्रायः निराशा ही हाथ लगती है । इस विभाग में अधिकांश लोग उन्हें उपहास के योग्य मानते हैं ।

ऐसे ही इस नगर में भ्रष्टाचार के प्रहरियों से रक्षित एवं आतंक के निविड़ में असुरक्षा की संपूर्ण भावना को संजोये हुये, मैं प्रातः उठते ही जल्दी-जल्दी तैयार होता हूँ । कहीं देर ना हो जाय यह सोचकर जैसे तैसे भोजन करता हूँ । भोजन का पर्याय मेरे जैसे स्तर पर प्रायः खिचड़ी ही होता है । हाँ मैं सौभाग्यशाली हूँ, जो कभी–कभी इसमें ही सब्जी आदि डालकर बना लेता हूँ अन्यथा आजादी के इतने दिनों बाद स्वराज में भी करोड़ों लोगों को प्रतिदिन भोजन नसीब नहीं होता है । सप्ताह में कई दिन भूखे पेट सोना अब तक उनकी नियति बना हुआ है.

गली से निकलते निकलते ही साढ़े नौ बज जाता है । लम्बे – लम्बे डग भरता हुआ तेजी से चल देता हूं । चौराहा पार करते ही रिक्शेवाला आवाज देता है ।
‘ रिक्शा बाबूजी ? ’
‘ नहीं भाई ‘ का संक्षिप्त उत्तर मैं बिना रूके ही दे देता हूँ । उसकी निराश ऑंखें दूर तक मेरा पीछा करती हैं ।

चौराहा पार हो चुका है । सामने डाक्टर भानु का नर्सिंग होम है । रोगियों के रिश्तेदारों को घुड़कती -हड़काती नर्से इधर-उधर आ जा रही हैं । डाक्टर भानु को देखते ही मैं नमस्कार करता हूँ ।
‘ नमस्ते बेटा ‘ का सम्बोधन मुझे बहुत अच्छा लगता है । डाक्टर भानु मुझे कुछ दिनों से ही जानते हैं । जब मेरी माँ गम्भीर रूप से बीमार हो गयी थी । मैं उन्हें इलाज के लिये यहीं लाया था । उन दिनों यह नसिँग होम लगभग निर्माणाधीन अवस्था में था । आज यहां कितना कुछ है । इतनी अल्पावधि में इसकी प्रगति के पीछे लोग अनेकों बाते कहते हैं ।
सोचते – सोचते ही मार्ग समाप्त हो गया है । कालेज के मेन गेट पर भेंट होती है साइकिल स्टैण्ड के चपरासी से ।
‘ आज साइकिल नहीं लाये ?
‘ नहीं, मेरी नहीं थी, जिसकी थी ले गया ।
उत्तर देकर मैं आगे बढ ज़ाता हूँ । कालेज कम्पाउण्ड में एक आम का बाग है । सारे विद्यार्थी उसे आम्रपाली कहते हैं ।
आम्रपाली में पडी बेन्चों पर आर्ट सेक्शन के विद्यार्थी बैठे हुये हैं । विज्ञान का कोई विद्यार्थी वहाँ नहीं होगा क्योंकि प्रोफेसर कटियार क्लास में पहुँच चुके हैं । लो आज भी पाँच मिनट लेट हो ही गया ।

यह पीरियड खाली है । बाहर मैदान में जाकर बैठ जाता हूँ । सुनहली धूप फैली हुयी है घास पर, बाग के ऊपर, खेतों पर, धूप का यह अनन्त विस्तार । सूर्य के दूसरी ओर देखता हूँ । स्वच्छ नीलिमा युक्त आकाश पर रूई के श्वेत गोलों की तरह छिटके हुये बादल – — लगता है किसी ने ढेर सारी कपास धुनकर फैला दी हो । दूर तक फैली हुयी हरियाली । शरद् ॠतु में हरियाली ऑंखों को कितनी सुखद लगती है ? मैं बचपन से ही प्रकृति- प्रेमी रहा हूँ ।

‘ बन्धु यहाँ किसी सब्जेक्ट पर रिसर्च हो रही है क्या ? 
आवाज सुनकर तन्द्रा भंग हो जाती है । सिर उठाकर सामने देखता हूँ । महीप मुस्कराता हुआ चला आ रहा है ।
तुम कहाँ थे भाई.. क्लास में तो नहीं.. ?’ मैं पूछता हूँ ।
‘ यार क्लास ही आ रहा था तब तक वह मिल गयी ‘ महीप मेरे पास ही घास पर बैठता हुआ उत्तर देता है ।
‘ वह …! वह कौन ? ‘ मैं प्रश्न सूचक दृष्टि से उसकी ओर देखता हूँ ।
‘अरे वही बी ए फाइनल की मिस अमिता’ महीप थोडा झेंपता हुआ बताता है ।
‘ अच्छा तो तुम बी ए में चलने वाले उपन्यास ‘अमिता’ के बारे में कह रहे हो ‘ मैं मजाक में कहता हूँ. और फिर हम दोनों हॅसने लगते हैं ।

छुट्टी हो चुकी है । महीप बालीवाल खेलने के लिये आग्रह करता है । बड़ी मुश्किल से पीछा छुडा सका हँ ।
‘ यार वह देखो टेपरिकार्डर आ रहा है ‘ दूर से आते हुये सुनील को देखकर महीप कहता है ।
‘ तुम बैठकर सुनो मैं चला ‘ महीप खिसकना चाहता है ।
‘ तुम भी कभी- कभी सुन लिया करो यार ‘ मैं महीप को पकड़ता हुआ कहता हूँ । वैसे मैं जानता हूँ महीप क्यों सुनील से भागता है ।
‘ अच्छा तो मिस्टर मजनूँ की दास्ताने लैला आज आप सुन रहे हैं ? सुनील सदा की भाँति महीप को चिढ़ाते हुये दूर से ही हाँक लगाता है ।
‘ आओ यार ! तुम भी सुनाओ क्या हाल है’ मैं उसे सम्बोधित करता हूँ.
‘ अपना क्या हम तो सदा ही मस्त रहते हैं. बस रोना है तो मेरे यार तुम्हारी सूरत पर. जब देखो दार्शनिकों की तरह सोचते ही नजर आते हैं. बैठे यहाँ हैं दिमाग किसी दूसरे लोक की घास चर रहा होता है. मै तो कहता हूँ … ‘
‘ बस बस यार तुमने तो मेरा पूरा पीरियाडिक क्लासीफिकेशन ही कर डाला ‘ मैं सुनील की बात काटते हुये कहता हूँ और हम सब हँसने लगते हैं.
‘ अच्छा तो मैं चलता हूँ फील्ड में, तुम मेरी साइकिल लेते जाना ‘ महीप साइकिल की चाबी मुझे देते हुये कहता है.
‘ और तुम’ मैं महीप से पूछता हूँ.
‘ खेलने के बाद पैदल आ जाऊंगा ‘
‘ मिस अमिता के साथ ‘ मैं चुटकी लेता हूँ.
और इसके साथ ही एक बार पुनः हँसी का झोंका सा आता है. सब खिलखिलाकर हँसने लगते हैं. बिल्कुल बच्चों जैसी निश्छल हँसी.

साईकिल लेकर चल पडा हूँ. बाग में इस समय छात्र छात्राओं की भीड़ है. कुछ छात्रों के क्लास इसी समय से प्रारम्भ होने वाले हैं. अतः वे क्लास प्रारंभ होने से पहले बाग में पडी बेन्चों पर बैठे हैं. कुल मिलाकर एक मेला सा लगा है. सभी चञ्चल चित्त प्रसन्न मन. सम्भवतः इन्हीं छात्रों की चपल भीड़ में कुछ मेरे जैसे अकेलेपन से सराबोर अन्य भी एक दो छात्र हों. हो सकता है वे समस्याओं की श्रृंखलाओं से जूझ रहे हों. इसी के फलस्वरूप उन्हें अकेलापन लगता हो. किन्तु मैं मेरी तो ऐसी कोई भी समस्या नहीं है. फिर क्यों मन इतना उदास, अकेला सा लगता है. मैं कभी भी स्थायी रूप से कुछ दिनों तक प्रसन्नचित्त नहीं रहा हूँ. छात्रों के समूह में जब सब जी खोलकर हँस रहे होते हैं, मैं देख रहा होता हूँ शून्य के उस पार अंतरिक्ष में बिलकुल अपना अस्तित्व भूलकर. कभी-कभार किसी के टोक देने पर मानो सोता सा जागता हूँ. … और फिर उनकी बातचीत हँसी मजाक के लम्बे सिलसिले में हॅसता भी हूँ मगर एक फीकी सी हँसी. एक ठण्डी सी लहर, उदासी का एक झोंका ताड़ जाते हैं सारे साथी और फलस्वरूप सबके सब एकदम से ठहर जाते हैं. एक सन्नाटा छा जाता है. सबको यकायक अपनी ओर ताकते देख‚ मैं टोकता हूँ.

‘ अरे ! क्या हो गया…. सब चुप कैसे हो गये ?’
‘ चुप क्या यार..!, तुम भी पूरे दार्शनिक हो. कभी कुछ बोलो भी क्यों ठण्डी आहें भरा करते हो प्यारे ‘ सुनील स्नेह युक्त नाराजी से कहता है.
‘ मुझे तो इनका मामला भी कुछ पुराना सा लगता है यार ‘
‘ और अब इनके पास ठण्डी आहें ही शेष हैं ‘ सुभाष की बात को महीप पूरा करता है.

इस बात पर सभी खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं. उनकी इस हँसी में मेरा भी स्वर होता है. थोडी देर के लिये उनके इस मजाक पर मैं भी प्रसन्न चित्त हो जाता हूँ. सोचते- सोचते ही आ गया हूँ नदी के पुल पर. थोडी देर के लिये रूक जाता हूँ. पुल की रेलिंग के सहारे टिक कर नदी के बीचो बीच देख रहा हूँ. पानी के बहते हुये प्रवाह से मन खोने लगता है. उदासी की एक और अनुभूति. तत्काल सिर को झटका देकर मैं विचारों से मुक्त होने का प्रयास करते हुये चल देता हूँ और तेजी से.

भोजन कर चुका हूँ. गाँधी पार्क की ओर चल पडा हूँ. शाम का अँधेरा घिरने लगा है. सड़कों पर कुहासा छाता जा रहा है. सड़कों पर भीड़ भी कम होने लगी है. पड़ोस में ही अमरूदों के बाग पर अभी-अभी सूर्यास्त हुआ है. सूर्यास्त की लाली अब तक आसमान में छायी है. जाड़े क़ी ॠतु अभी प्रारम्भ ही हुयी है, फलतः बहुत ठण्ड नहीं होती है. हाँ सड़कें अवश्य सूर्यास्त होते ही सुनसान होने लगती हैं. आवश्यक कार्य के अतिरिक्त कोई भी बाहर नहीं निकलता है. पता नहीं क्यों मैं नियमित रूप से यन्त्रचालित सा होकर चला आता हूँ यहाँ. यह स्थान मुझे बहुत प्रिय है. मैं स्वयं भी जानना चाहता हँ अपनी उदासी के कारण को. मैं क्यों इतना उदास रहा करता हूँ. एक यक्षप्रश्न सा मेरे मन में उठता है. क्या दुख मुझे खाये जा रहा है.

‘ क्यों इतने उदास रहते हो ‘ अपने अंतरमन से मैं प्रश्न करता हूँ.
‘ पता नहीं यों ही ‘ अंतर के दूसर कोने से स्वर उभरता है.
‘ कभी सोचा है कि इस यों ही का क्या प्रभाव पडा है तुम्हारे ऊपर ‘
‘………’ दूसरा अंतस निरूत्तर रह जाता है.

एक अजीब सी कशमकश से मैं तिलमिला उठता हूँ. सोचता हूँ जो लोग कल तक मुझे आदर्श बताते थे. दूसरों को मुझसे प्रेरणा लेने को कहते थे. आज जब मैं समाज का कुछ कार्य नहीं कर रहा हूँ तो रास्ता चलते हुये मुँह फेर लेते हैं. क्या समाज को मात्र कार्यरत कार्यकर्ता से ही स्नेह होता है. लगता है मेरी उदासी का हल भी यहीं कहीं आसपास में ही है.

पार्क की बत्तियाँ जल चकी हैं. पश्चिम की ओर पास में ही नदी का किनारा. संगमरमर का सुन्दर चबूतरा और उस पर स्थापित गाँधी जी की धवल मूर्ति. पास में ही बैठने के लिये बेञ्चें बनी हुयी हैं. मूर्ति के बिलकुल पास वाली बेञ्च पर बैठ जाता हूँ. पश्चिम की ओर क्षितिज पर सूर्यास्त की लालिमा अब तक छायी हुयी है. उसके नीचे रात्रि की कालिमा का साम्राज्य है. ऐसी ही अर्न्तद्वन्द की कई अंधेरी परतें मेरे मष्तिष्क में भी छायी हुयी हैं. नदी के किनारे-किनारे फैक्ट्रियों की चिमनियाँ दूर तक फैली हैं. नगर में सड़कों के किनारे जलती हुयी बत्तियाँ रोशनी के धब्बों की लम्बी चमकती हुयी रेखाओं जैसी प्रतीत होती हैं. सारा नगर यहाँ से एक सुन्दर दृश्यचित्र की भाँति अनुभूत होता है. मैंने कई बार यहीं पार्क में साँध्यबेला एवं रात्रि के इन चित्रों को कैनवास पर उतारने का प्रयास किया है. बचपन की एक घटना याद आती है. तब मैं बहुत छोटा था. पिताजी के साथ खेतों पर गया था. वहां काम कर रहे मजदूर एवं चारो ओर फैले पलाशवन की हरी पट्टियों को देखकर मैं मन्त्रमुग्ध था. चारो ओर फैले दृश्यो में ध्यानमग्न देखकर पिताजी ने मेरे कन्धे पर हाथ रखकर पूछा.

‘ क्या देख रहे हो बेटा ‘
कुछ न समझापाने की बेबसी से मैंने अपना हाथ जंगल की ओर उठा दिया.
‘ कैसा लगता है ‘ पिताजी ने पुनः पूछा था.
‘ अच्छा बहुत अच्छा ‘ बालसुलभ संकोच के साथ मैं बड़ी कठिनाई से बोला.
‘ क्या चित्रकार या कवि बनेगा रे ‘ पिताजी मुझे चूमते हुये प्यार से बोले. और मैंने उनके कन्धे से अपना सिर टिका दिया.

उसके बाद चल पड़ा था समय का एक लम्बा सिलसिला. गांव की अमराइयों में बिना भवन के चलने वाले प्राथमिक विद्यालय से होते हुये मैं पड़ोस के कस्बे से हाईस्कूल करके इस नगर में आ गया था. पिताजी जो क्रान्तिकारी रह चुके थे. धीरे धीरे वृद्ध होने लगे थे. उन दिनों मैं इण्टरमीडियेट के प्रथम वर्ष में था जब अविनाश के सम्पर्क में आया. वह एक सामाजिक संस्था के कार्यकर्ता थे. पिताजी से प्रोत्साहन और अनुमति मिलने पर मैंने भी उस संस्था के कार्यक्रम आदि में रूचि लेना प्रारम्भ किया. धीरे धीरे अविनाश से मेरी घनिष्ठ मित्रता हो गयी थी. वह मित्रता कब अंतरंगता में परिवर्तित हो गयी‚ पता ही नहीं चला. अब वह अविनाश दादा से मेरे अनुदा बन गये थे.

यह मेरा इण्टरमीडियेट का अंतिम वर्ष था. मैं परीक्षा की तैयारी में रात दिन जुटा हुआ था. उसी समय देश में आपात स्थिति की घोषणा कर दी गयी. सारा देश मानों सकते में आ गया था. कोई कुछ समझ पाता, उससे पहले ही अधिकतर राजनेता रातोंरात बन्दी बना लिये गये. जो बच गये उन्होंने सबसे पहले भूमिगत होना उचित समझा. सामाजिक संस्थाओं पर रोक और प्रेस पर सेंसर लगा दी गयी थी. प्रारम्भ में यह सब अप्रत्याशित सा लगा. बाद में लोगों के मन में कायरता का भाव आने लगा. प्रायः यह सुना जाता हमें क्या करना सरकार कुछ भी करे. हमें अपने कार्य से कार्य होना चाहिये. और फिर हम कर भी क्या सकते हैं. चारो ओर मानों आतंक का साम्राज्य छा गया था. सरकार की बुराई करने का जोखिम कोई नहीं लेना चाहता था. सत्तारूढ दल के लोग अपने प्रतिद्वन्दियों को ठिकाने लगाने में जुट गये थे. जो भी मँह खोलता सीधे मीसा अथवा डी आई आर में धर लिया जाता.

इधर अनुदा से काफी दिनों से भेंट नहीं हुयी थी. हाँ इतना अवश्य पता चला था कि वह सामाजिक संस्था भी प्रतिबंधित कर दी गयी थी जिसके लिये अनुदा कार्य करते थे. फलस्वरूप उसके कार्यकर्ताओं को भी भूमिगत होना पडा था. दो चार सदस्यों से अनुदा के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा श्वास भी मत निकालो. कहीं किसी ने सुन लिया तो पड़ ज़ाओगे सारी उम्र भर के लिये जेल के चक्कर में. सरकारी आतंक के कारण कोई बात तक नहीं करना चाहता था. किन्तु मुझे तो अनुदा से मिलना था. किसी ने कुछ भी ठीक न बताया था. हाँ इतना अवश्य पता लगा था कि पुलिस उनकी खोजबीन कर रही है. सम्भवतः गिरफ्तार भी हो गये हों. क्योंकि उन दिनों गिरफ्तारियाँ चुपचाप होतीं थीं. अखबार प्रतिबन्धित होने के कारण समाचार भी प्रकाशित नहीं होते थे. कई अखबारों के सम्पादक जेल में डाले जा चुके थे और उनके कार्यालयों पर ताला पड़ ग़या था. मैं सारे प्रयासों के उपरान्त भी अनुदा की कोई खबर न पा सका था. अन्त में उदास मन से चुपचाप परीक्षा की तैयारी में जुट गया.

आस पास ही कहीं बांसुरी का स्वर मुखरित होना प्रारम्भ हुआ है. मेरी तन्द्रा भंग हो जाती है. सान्ध्य बेला की लालिमा एवं रात्रि का तम अब श्वेत धवल चाँदनी में परिवर्तित हो चुके हैं. नदी में कोई नाविक धीरे धीरे नाव खेता हुआ आ रहा है. आह बाँसुरी भी क्या गजब की होती है. और वह भी चाँदनी रात में नदी के किनारे. इसी के साथ मैं उच्छ्श्वास लेता हूँ. अनुदा भी बाँसुरी बहुत अच्छी बजाया करते थे. उनकी बाँसुरी बजा करती और हम सब चुपचाप सुना करते थे. मुझे अच्छी तरह से याद है कि एक बार यहीं पार्क में अनुदा और मैं टहलते हुये आ गये थे. उस दिन इसी बेंच पर बड़ी देर तक बैठे हुये चन्द्रमा की प्रच्छाया को नदी की लहरों से संघर्ष करते हुये देखते रहे और फिर वह बोले.

‘ देख रे! चन्द्रमा की यह छाया हमारा राष्ट्र है. नदी की लहरें अंग्रेजों से विरासत में मिली हमारे देश की समस्यायें हैं. खण्डित आजादी पाकर हमारा राष्ट्र आज इसी तरह जूझ रहा है भुखमरी, भ्रष्टाचार और अंतर्राष्ट्रीय भिखारीपन से. देश के बँटवारे से उपजी कलह और फूट का दंश आज भी हमारे समाज को डस रहा है ‘
‘ वह सब छोड़ो दादा, फिलहाल बाँसुरी सुनाओ ‘ मैंने उस पल उनकी गंभीर बातों में कोई रूचि न लेते हुये कहा.
‘ अरे बुद्धू…. बाँसुरी यहाँ कहाँ ‘ उन्होने भी गाम्भीर्य से बाहर आते हुये कहा.
‘ ये रही ‘ कहते हुये मैंने अपने साथ लायी बाँसुरी उनके आगे करदी. दादा से सुनने और सीखने की जिज्ञासा से मैं उन दिनों बांसुरी हर पल अपने साथ रखता. प्रायः दादा से छिपाकर.
‘ तुम इसे इसीलिये साथ लाये थे ‘ दादा ने बांसुरी मेरे हाथ से लेते हुये कहा.
‘ जी हाँ लेकिन अब सुनाइये फटाफट ‘ मैं बच्चों जैसा अधीर होने लगा था.
‘ इतने बड़े हो गये हो और बच्चों जैसा स्वभाव नहीं बदला. मालुम है तुम्हारी आयु में चन्द्रशेखर आजाद का चिन्तन क्या था’
‘ नहीं मालुम दादा. किन्तु वह सब फिर कभी‚ इस पल तो बस बाँसुरी की बात कीजिये ‘
और वह हँस पडे थे मेरी मुद्रा देखकर और हम बेन्च से उठकर छतरीदार चबूतरे पर आकर बैठ गये थे. दादा ने खम्भे से पीठ टिकाकर बाँसुरी बजाना प्रारम्भ किया. उनकी अंगुलियां बांसुरी पर बडी तेजी से उठ गिर रही थीं. और वातावरण में मुखरित हो उठा था मेरा प्रिय गीत

ज्योति जला निज प्राण की
बाती गढ बलिदान की‚
आओ हम सब चलें उतारें
मॉ की पावन आरती
भारत माँ की आरती

बांसुरी की स्वर लहरियां नगर के दक्षिणी पश्चिमी छोर पर बने इस पार्क में गूंज उठी थीं. गांधी चबूतरे से नदी के तट तक जाने वाली सीढियों पर एकाध नाव वालों को छोड़क़र सन्नाटा ही था. दादा बांसुरी बजाते-बजाते तन्मय हो गये थे. मैं भी कुछ देर तक बांसुरी का आनन्द उठाते हुये ठण्डी फर्श पर आराम से लेट गया था. उस दिन अनुदा बडी देर तक बांसुरी बजाते रहे. सम्भवतः उनका ध्यानमग्न होने का एवं चिन्तन करने का यही तरीका था. जब उन्होंने बांसुरी बजाना बन्द किया तो मुझे फर्श पर खर्राटे भरते हुये पाया था. आज इस पल वह सब स्मरण करके हृदय में एक भावावेग अनुभव करता हूँ और पुनः सोचने लगता हूँ.

उस दिन कालेज से अपने कमरे पर वापस लौट रहा था. सूचना कार्यालय के पीछे वाली सड़क से अभी गली में मुडा ही था कि एक क्लीनशेव्ड सूटेड-बूटेड युवक भी लम्बे कदमों से लपक कर मेरे साथ चलने लगा. मैने कोई विशेष ध्यान देने की आवश्यकता नहीं समझी. किन्तु मुझे तब आश्चर्य हुआ जब मेरा रहने का मकान पास आने पर‚ मेरे साथ ही वह भी रूक गया.

‘ किससे मिलना है आपको ‘ मैंने सहज जिज्ञासा के साथ पूछा.
‘ पहले चुपचाप अन्दर चलो फिर बात करते हैं ‘ उसने हाथ से कमरे की ओर संकेत किया.
आवाज सुनकर मैं मानो तन्द्रा से जागा था.
‘अरे …! दादा आप.. !! ‘ और मैने शीघ्रता से अन्दर आते ही कमरे का दरवाजा उढ़का दिया. मुझे अब तक अवाक् खडे देखकर उन्होंने कहा
‘ जल्दी से कुछ खाने का प्रबन्ध करो. कई दिन से खाली पेट हूँ. कुछ खा सकता इसका अवसर ही नहीं मिला ‘
‘ ओह हाँ’ मैं अब भी विस्मित था.
‘ जी अभी कुछ करता हूँ. लेकिन यह हुलिया और आपकी वह मूछें और कुर्ता-धोती कहां गये. मैं तो बिलकुल ही नहीं पहचान पाया.’ मन में बहुत सारे सवाल थे जिनका उत्तर जानने को बहुत उत्सुक था.
‘ पहले खाने की व्यवस्था करो. धीरे धीरे सब पता चल जायेगा ‘ उन्होंने समझाने की मुद्रा में कहा.

उस दिन खाने के उपरान्त दादा वहीं सो गये थे. उनका शरीर थकान से शिथिल था. मेरे बहुत पूछने पर उन्होंने केवल इतना ही बताया था कि उनसे वरिष्ठ कार्यकर्ता पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिये गये थे. संगठन की सारी व्यवस्था का भार इस समय उनके कन्धों पर था.

‘ माँ ‘भारती’ के लिये कुछ करने का साहस है ‘ पहली बार उन्होंने मुझसे सवाल किया‚ अन्यथा अबतक तो वह मेरे प्रत्येक प्रश्न का उत्तर स्वयं ही थे.
‘ मैं क्या कर सकता हूँ ‘ मैंने उनका मुंह ताकते हुये प्रतिप्रश्न पूछा.
‘ तुम… एक छात्र…. छात्र-शक्ति ही आज वह सर्वोच्च शक्ति है जो सारे देश से इस तमस को मिटा सकती है. भूल गये शहीद भगतसिंह, चन्द्रशेखर आजाद सब छात्र ही थे जब उन सभी ने देश के स्वाभिमान एवं स्वतन्त्रता के लिये अपना जीवन दाँव पर लगा दिया. आज उसी समय के क्रान्तिकारी वयोवद्व जयप्रकाश नारायण जी ने छात्रों का फिर आह्वान किया है. उन्होंने कहा है कि छात्रों को राष्ट्र की इस भयानक त्रासदी से संघर्ष करने के लिये सर्वस्व न्यौछावर करने का समय फिर आ गया है ‘ दादा का चेहरा आवेग से तमतमा उठा था. वह धारा-प्रवाह बोले जा रहे थे.
‘छात्र-शक्ति आज भी सारे देश को परिवर्तित करने की क्षमता रखती है. आवश्यकता है उसे सही दिशा की. मैं समझता हूँ जयप्रकाश जी ने आह्वान तो कर ही दिया है ‘
‘ किन्तु मैं व्यक्तिगत रूप से क्या कर सकता हूँ ‘ मैंने उन्हें टोका.
‘ समय आने दो सब पता चल जायेगा. बस साहस और उत्साह बनाये रखो. तब तक पूरे मन से पढायी करो और परीक्षा की तैयारी करो ‘ दादा ने कहा था.

अगली प्रातः मुँह अंधेरे ही वह जाने के लिये तैयार हो गये थे. उन्होंने मुझसे स्टेशन तक चलने के लिये कहा.
‘ इतनी सुबह आप कहां जायेंगे ‘ मैंने रास्ते में पूछा
‘ आवश्यकता पड़ने पर ही कोई बात बतायी जा सकती है. दादा ने चेतावनी देते हुये कहा.
‘ किसी बात को जब तक आज्ञा न हो जानने की चेष्टा मत करो. जितना आदेश उतना ही कार्य करने की आवश्यकता है. पूर्ण अनुशासन से ही आज हमारे कार्य की सफलता सम्भव है ‘ पुनः समझाते हुये बोले.
‘ पूरा मन लगाकर परीक्षा में प्रथम आने का प्रयास करो. मैं यथानुसार तुमसे स्वयं सम्पर्क करता रहूँगा. अच्छा अब तुम जाओ’ ऐसा कहकर उन्होंने मुझे स्टेशन के बीच रास्ते से ही लौटा दिया और वह स्टेशन की ओर बढ ग़ये थे. मैंने भी पहली बार दादा के साथ स्टेशन तक चलने का कोई आग्रह नहीं किया. बहुत दिनों बाद पता चला कि उन्हें कहीं जाना ही नहीं था. स्टेशन तक जाना उनका पुलिस से बचने का एक तरीका था. वहां तक जाकर वह सुरक्षित रास्ते से अपने गुप्त अड्डे पर लौट आया करते थे. यदि कोई उनका पीछा भी करता तो उन्हें बाहर गया हुआ समझता. इस प्रकार वह निर्विघ्न होकर कार्य करते रहते.

नदी का जल कल कल करता हुआ बह रहा है. और धीरे धीरे वह कल कल बदल जाती है एक सामूहिक गीत में. हम सब बैठे हुये गा रहे हैं

यह कल कल छल छल बहती
क्या कहती गंगा धारा‚
युग युग से बहता आया
यह पुण्य प्रवाह….

गीत समाप्त हो चुका है. परस्पर नमस्कार करके हम सब लेट जाते हैं. ठण्डी हवा का झोंका आता है और सभी अपने अपने कम्बल में सिमटना पा्ररम्भ कर देते हैं. ठण्डी हवाओं का एक एक झोंका हमारे शरीरों में सैकड़ों बर्छियां जैसी चुभोता हुआ निकलता है. जेल में वितरित कम्बल पर्याप्त नहीं हैं. इस कडाके की ठण्ड से निबटने के लिये. और फिर इन कम्बलों में पहले से ही मौजूद मानव परोपजीवी खटमल और चीलर भी हमें रक्तदान कर‚ पुण्य कमाने का भरपूर अवसर देते हैं. जेल का वार्डन शाम को हम लोगों के साथ नींद को नहीं बन्द कर पाता है. शायद नींद के लिये जेल की बैरकों में अब कोई जगह ही नहीं बची है. सारी बैरक में लेटने के लिये पंक्तिबद्ध सीमेण्ट की कब्रें जैसी बनी हुयी हैं. उन पर लेटे हुये हम सब सम्भवतः दफनायी हुयी रूह जैसे लगते हैं. ऐसा लगता है मानों कब्रिस्तान में कोई रूहानी सम्मेलन हो रहा हो. अपनी इस उपमा पर मैं बरबस ही मुस्करा उठता हूँ. मुझे जेल आये हुये आज चौथा दिन है. हम सब लोग अपने सौभाग्य को सराह रहे हैं जो माँ भारती की आपात स्थिति से पुनः स्वतंत्रता के लिये संघर्षरत हैं.कौन भला अपनी माँ को दासता के बन्धनों में जकड़ा हुआ देख सकता है. मुझे इस बात पर भी गर्व की अनुभूति होती है कि मेरे पिता देश की स्वतंत्रता एवं अखण्डता के लिये आगे बढे थे. आज उनके ही पदचिन्हों का अनुसरण मैंने भी किया था. पिताजी मुझसे जेल में मिलने नहीं आये. हाँ उनका संदेश अवश्य बडे भैया के माध्यम से मिला. ”मुझे तुमसे ऐसी ही अपेक्षा थी. कुछ भी हो किन्तु निजी स्वार्थ के लिये सम्पूर्ण राष्ट्र को एक बार पुनः अंधेरी सुरंग में ढकेलने वाली सरकार से माफी नहीं मांगना” यह संदेश सुनाते हुये भैया की ऑंखे भरभरा आयीं थीं.

अभी-अभी जेलर आया है. वह बता रहा है कि अनुदा भी पकड़े जा चके हैं. मुझपर इसकी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है. हमारी मनोवृत्तियाँ बदल चुकी हैं. दादा के आते ही हम सब ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया था. शायद उनके आने और मिलने से मुझे अच्छा नहीं लगा था. आन्दोलन जारी रहने के लिये उनका बाहर होना बहुत आवश्यक था. लेकिन हमारे ग्रुप का सत्याग्रह सफल होने से पुलिस बौखला उठी थी. उसे अनुदा के द्वारा आंदोलन के जारी रहने का पता चल चुका था. अतः उसने अविनाश दादा को पकड़ने का एक जोरदार अभियान छेड़ दिया था. अंततः एक दिन किसी मुखबिर की सूचना पर दादा पुलिस की गिरफ्त में आ ही गये थे.

ओस पड़ने से स्वेटर गीला हो चुका है. मैं बेन्च पर से उठकर छतदार चबूतरे पर बैठ जाता हूँ. सम्भवतः रात्रि अभी अधिक नहीं हुयी होगी. जाड़ों में लोग जल्दी ही सोने के लिये चले जाते हैं. फलतः सन्नाटा छाया हुआ है. मैं पुनः खो जाता हूँ वैचारिक झंझावातों में.

बार्षिक परीक्षा के लिये सशर्त जमानत मिली.परीक्षा के दिवस छोड़क़र नगर से चालीस किलोमीटर की परिधि में प्रवेश निषिद्ध. जेल से बाहर आते ही कार्य में जुट जाने का निर्देश मिला. अविनाश दादा का दायित्व अब विजय भैया के पास था. भूमिगत रूप से आंदोलन चलाने में उन्हें मानों महारथ हासिल थी. अब उनसे वही स्नेह और मार्गदर्शन प्राप्त होने लगा था. उनके निर्देशानसार ही जुट गया था छात्र-शक्ति को संगठित करने में. परीक्षा देनी थी और भूमिगत रूप से आंदोलन भी सक्रिय रखना था. मेरे लिये यही निर्देश था. पुलिस की आंखो में चकमा देना अब कठिन था क्योंकि वह सब मुझे पहचानते थे. इतना ही नहीं वरन् परीक्षा वाले दिवस तो वह मेरा पीछा बस स्टैण्ड तक करते. लेकिन जेल में रहते हुये हमारी सारी रूप रेखा पहले ही बन चुकी थी. स्वयं को गुप्त रखते हुये कार्य करना अब मेरे लिये उतना कठिन नहीं था. क्योंकि जितना पुलिस मुझे पहचानती थी उतना ही मैं भी उन्हें पहचानता था. विशिष्ट व्यक्तियों के गुप्त कार्यक्रम होने पर यह बहुत उपयोगी होता था. सादे कपड़ों में पुलिस का कोई व्यक्ति आस पास तो नहीं है‚ यह देखना अब मेरा दायित्व था. जैसे तैसे परीक्षा समाप्त हुयी. उसके उपरान्त मुझे दूसरे स्थान पर कार्य करने का निर्देश मिला. नये स्थान पर पुलिस के पहचानने का संकट समाप्त हो गया था.

शनैः शनैः काल चक्र ने पलटा खाया था. हम लोग आंदोलन बन्द करके जनजागरण अभियान में पूरी शक्ति से जुट गये थे. सारा दिन सड़क के मुख्य मार्ग को छोड़कर पैदल या अन्यान्य सवारियों से किसी भी परिचय के सहारे गांव गांव टिकते हुये रात्रि में अपनी बात लोगों के कानों में डालते हुये, प्रातः मुँह अधेरे उस गांव से निकल जाते थे. बाद में अगले दिन पता चलता कि पुलिस ने छापा मारा. इस तरह लुका छिपी का खेल कब तक चलेगा मालुम नहीं था. सम्भवतः स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह पहला आंदोलन था जब लगभग सभी बड़े नेता जेल में बन्द थे. निचले एवं मध्यम स्तर के कार्यकर्ता स्वविवेक से अपना सर्वस्व भूल कर यज्ञ की समिधा सदृश, राष्ट्रीय स्वतंत्रता हेतु हुत हो रहे थे.

उसी समय मानवता को त्राण मिलने का एक रास्ता निकला. सरकार के किसी चाटुकार ने यह सलाह दी कि इस समय चुनाव कराने से सरकार भारी बहुमत के साथ दूसरी बार सत्ता में वापस आ सकती है. तत्कालीन मदांध सरकार ने आंदोलन के दबाब और जनता में फैले विरोध से मुक्त होने के लिये ऐसा विश्वास करके चुनाव का निर्णय ले लिया. कहते हैं जब सियार की मौत होती है तो वह शहर की ओर भागता है. शायद इस कहावत का परिवर्तन चुनाव के बाद इस प्रकार हुआ था कि अलोकप्रिय शासन की जब मौत होती है तो वह जनता की तरफ यानी चुनाव की तरफ भागता है. चुनावों में सत्तारूढ दल की बुरी तरह पराजय हुयी थी. सारे देश में प्रसन्नता की लहर दौड़ ग़यी थी.

इसी के साथ पूरे देश में राजनीतिक कायाकल्प हो गया था. कल तक जो जेल में बन्द थे आज सरकार में शामिल होने के लिये वार्ता कर रहे थे. सत्तारूढ दल के सभी चाटुकारों ने अपनी निष्ठा रातोंरात बदल दी थी. अब वे सभी जीते हुये नेताओं के परचम पकड़े हुये सबसे आगे की पंक्ति में थे. सभी बड़े नेताओं का आग्रह लोकनायक जयप्रकाश जी से सरकार में आने का था जिसे उन्होंने बड़ी विनम्रता किन्तु दृढता के साथ ठुकरा दिया था. सच ही है जिन्हें जनजन के हृदय में स्वयमेव ही स्थान मिला हो उन्हें किसी अन्य स्थान पर बैठने की आवश्यकता कदापि नहीं.
अस्तु अनुदा भी जेल से छूटकर आ गये थे. वह बुरी तरह से अस्वस्थ थे. स्वस्थ होते ही उन्हें संगठन के कार्य से अन्यत्र स्थानान्तरित कर दिया गया. इस बीच मेरे पिताजी का भी देहान्त हो गया था. आर्थिक दायित्व का राक्षस मेरे सामने मुंह बाये खडा था. पढायी चौपट हो चुकी थी. और इसी के साथ प्रारम्भ हुयी थी मेरे अकेलेपन की अनुभूति. मुझे लग रहा था कि कहीं कुछ खो गया है. अकेलेपन के इसी अहसास से मैं स्वयं में ही सिमटने लगा था. प्रायः अनुभव करता कि अब मैं अप्रासंगिक हो गया हूँ. जहां भी जाता लोग सत्ता के गलियारों की बात करते मिलते. नयी सरकार ने छह महीने तक जेल में रहने वाले लोगों को स्वतंत्रता सेनानी का स्थान देने की घोषणा कर‚ अपने दायित्व की इतिश्री मानली. राजनीतिक आपाधापी के नये दौर में वास्तविक एवं जुझारू उन कार्यकर्ताओं को वह भी भूल गयी जिन्होंने अपना वर्तमान और भविष्य दोनों राष्ट्रयज्ञ में हुत कर दिया था. ये वह स्वाभिमानी लोग थे जो अपने लिये प्रमाण पत्र जुटाना अपमान समझते थे. अपने राष्ट्र के लिये उन्होंने निस्वार्थ भाव से तन मन धन और जीवन बिना किसी भय संकोच के अबिलम्ब झोंक दिया था. वहीं पर जिन लोगों ने आपात स्थिति में भूमिगत होकर जूझ रहे कार्यकर्ताओं के लिये अपने दरवाजे भी बन्द कर लिये थे‚ अब नयी सरकार के सर्वेसर्वा थे. बडे नेताओं की गणेश परिक्रमा करने वाले इन लोगों को राजनीति के गलियारों की अच्छी जानकारी थी. जेल से निकले अधिकान्श नेताओं का रिश्ता भी उन्हीं लोगों से था जो आपात स्थिति में चूहे की तरह बिल में जा घुसे थे अथवा माफीनामें जेब में लिये घूमते रहे थे.

ऐसे माहौल में राजनीति की उठापटक से बेखबर मैं एक छात्र‚ दिशाहीन सा रेगिस्तान में खडा था. मुझे समझ नहीं आ रहा था यहां से जाना कहां है. मैंने एक दिन उन सज्जन से मिलने के लिये पत्र लिखा, जो आपात स्थिति में मेरी वजह से कई बार जेल जाने से बाल बाल बचे थे. बहुत आभार और मित्र भाव मानते थे उन दिनों. आज की सरकार में वरिष्ठ मन्त्री थे. उत्तर मन्त्री जी के सहायक से मिला कि मन्त्री जी जब भी राजधानी में होते हैं प्रातः जनता दरबार में सभी से मिलते हैं. आगे मैंने जाने और उनसे मिलने की आवश्यकता ही नहीं अनुभव की. उन्हीं दिनों बडे भैया ने एक दुकान में कुछ कार्य करना प्रारम्भ किया और मुझसे उनके शब्दों में ‘नेतागीरी’ का चक्कर छोड़ दुबारा पढ़ायी करने को कहा. तबसे पढ़ायी चल रही है किन्तु मैं हर पल अपने को छला सा ठगा सा दिशाहीन पाता हूँ. सोचता हूँ क्या है दिशा मेरे जैसे युवकों की. क्या यही है हमारा भारत जिसके लिये लोकनायक ने हमारा आह्वान किया था. आज स्वतंत्रता की सुखद अनभूति का अर्थ किसके लिये है मुझ जैसे जनसाधारण को या रातोंरात पाला बदलने वाले सत्ता के गलियारों में काई की तरह चिपके हुये‚ गणेश परिक्रमा करने में चतुर नेताओं को … ?

सोचते-सोचते मन खिन्न हो उठा है. रात्रि बहुत हो चुकी है शायद. चलना चाहिये सोचकर उठता हूँ. तभी….
‘आतू…. अतुलेश’ कानों में स्वर पड़ता है. मैं चौंक कर पार्क की अंधेरी वीथी की ओर देखने का प्रयास करता हूँ. उधर से आती छाया ने भी शायद मुझे देख लिया है. लम्बे डग भरते हुये देखकर मैं उन्हें पहचान लेता हूँ. किन्तु आज मैं सदा की भांति चिल्लाकर उनका स्वागत नहीं करता हूँ. बस चुपचाप खड़ा रहता हूँ. अपलक उन्हें निहारता रहता हूँ. दादा आगे बढक़र मेरा कन्धा पकड़ कर हिलाते हैं.

‘क्यों क्या हो गया तुझे’ और वह प्यार से कन्धा थपथपाने लगते हैं.
‘दादा’ मैं भर्राये कण्ठ से बडी मुश्किल से बोल पाता हूँ.
‘ मैं नयी जगह पहुंचा ही था कि विजय जी का पत्र तेरे बारे में, विस्तार से मिला. अभी थोडी देर पहले ही ट्रेन से पहुंचा हूँ. मुझे मालुम था तू यदि अपने कमरे पर नहीं होगा तो यहीं मिलेगा. और फिर यह स्थान तो आपात स्थिति के हमारे कई गुप्त ठिकानों में से एक है ‘ वह बताने लगते हैं.
‘ क्या हो गया..? तू कुछ बोलता क्यों नहीं. हो जाय बांसुरी ‘ उनका ध्यान फिर मेरी चुप्पी पर जाता है.
‘ नहीं दादा अब बहुत रात हो गयी है ‘ मैं ठण्डे मन से उत्तर देता हूँ.
‘ अच्छा एक बात सुनेगा तू ‘ वह ध्यान से मेरा चेहरा देखते हुये कहते हैं.
‘ जी ‘ मैं उनकी ओर निर्भाव देखता हूँ.
‘मुझे संगठन की ओर से वापस यहीं कार्य करने का निर्देश मिला है ‘
‘ ओह दादा सच’ मैं इस अप्रत्याशित प्रसन्नता को अपने स्वर में मिला हुआ पाता हूँ.
‘ तो फिर हो जाय बांसुरी ‘ मैं अतिउत्साहित हो उठता हूँ.
‘ नहीं रे वह तो मैंने तुझे उत्साहित करने के लिये कहा था. अन्यथा बांसुरी नहीं है मेरे पास. मैंने काफी दिनों से बजाना ही छोड़ दिया है’ जीवन में पहली बार अपने आदर्श अनुदा को नैराश्य के भाव में देखता हूँ.
‘ चलें आतू कल से बहुत कार्य है. जुट जाना है ‘ वह आगे बढ लेते हैं.
‘ अब क्या दादा अब तो अपनी सरकार है. अब कौन सा पहले की तरह जन जागरण करना है या पुलिस से लुका छिपी करनी है’ मैं सहज भाव से कहता हूँ.
‘ नहीं रे राष्ट्रकार्य कभी समाप्त नहीं होता. बस कार्य के सन्दर्भ बदल जाते हैं. मात्र सरकार बदलने से कुछ नहीं होगा. जब तक लोगों का चिन्तन नहीं बदलेगा सारी सम्स्यायें वैसी की वैसी रहेंगी ‘ दादा का उत्तर है.
‘ तो फिर हमने संघर्ष क्यों किया’ मैं जिज्ञासा प्रकट करता हूँ.
‘ तब देश के लोकतांत्रिक अस्तित्व को खतरा था. आज देश की सारी व्यवस्था को भ्रष्ट लोगों द्वारा स्थापित राजनीतिक मूल्यों एवं परंपराओं से खतरा है’ दादा अब गंभीर हो चले हैं.
‘ तो इस नयी लडाई में मेरा क्या हिस्सा होगा’ मैं पूछता हूँ.
‘ अपनी शिक्षा संपूर्ण करना ताकि तुम आत्मिक रूप से जाग्रत होकर इस देश को नयी दिशा दे सको ‘ मैं दादा की ओर ध्यान से देखता हूँ. किन्तु लम्बे ड़ग भरते हुये वह अवस्थातीत लगते हैं.
‘ आज पुनः छात्र शक्ति का ही आह्वान करना होगा. भ्रष्ट राजनीति के इस कीचड़ को अपने पौरूष से वही मुक्त कर सकती है ‘ दादा अपने आप से बातें करते हुये आगे बढे ज़ा रहे हैं.

उनकी चाल में तेजी आ गयी है. ऐसा लगता है कि अदृश्य लक्ष्य तक पहुँचने की शीघ्रता में वह दौडे चले जा रहे हैं. उनका अनुसरण करते हुये मैं स्वयं में अपूर्व ऊर्जा का अनुभव कर रहा हूँ. लगता है रेगिस्तान की मरीचिका में भटकते हुये मुझे एक नयी दिशा मिल गयी है. एक मरूद्यान का स्पष्ट बिम्ब मेरे सामने है. वह दूर प्रतीत होकर भी अब अप्राप्य नहीं लगता है.

ढीली गाँठ …… – स्वर कथा


तेंदू पत्ते के जंगलों से आच्छादित और पत्थरों के रूप में अनमोल खजाने से परिपूर्ण मध्यप्रदेश की आदिवासी बाहुल्य भूमि बस्तर … प्रायः नक्सल समस्या के लिए अख़बारों की सुर्खियों में रहा यह क्षेत्र आदिवासी और जनजातियों की निश्छल संस्कृति और सभ्यता की धरोहर को अपने अंचल में सदियों से संभाले हुए है. विगत कुछ दशकों से नगरीय सभ्यता और प्राकृतिक सम्पदा के अंधाधुंध दोहन में संलिप्त व्यवसायियों और ठेकेदारों के लालच और शोषण ने इस शांत वातावरण को कई स्तर पर नष्ट किया है . संभवतः नक्सली समस्या के मूल में कहीं न कहीं यह कारण भी जिम्मेदार हैं. बस्तर की समस्याओं पर रचनाकार श्री राजीव रंजन जी की कलम और पैनी दृष्टि ने बस्तर की समस्या और उससे जुड़ी मानवीय संवेदनाओं को सदैव प्रमुखता के साथ प्रस्तुत किया है.



बस्तर की ऐसी ही पृष्ठभूमि में मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी श्री राजीव रंजन जी की एक कहानी है ढीली गाँठजो नगरीय सभ्यता के अनियंत्रित अतिक्रमण से उपजती आदिवासी कुंठाओं और शोषण जनित पीड़ा का अमर दस्तावेज है. कथा का नायक सुकारू और नायिका बोदी की जंगलों में अपनी प्यार भरी भोली सी दुनिया है. नगरीय सभ्यता से संक्रमित सुकारू की भावनाएं, ठेकेदार के लालच और वासना की शिकार बोदी की यह मार्मिक कथा किसी भी पाषाण ह्रदय को प्रभावित करंते हुए उसके विवेक को झंकृत करती है … साथ ही यह एक मूक संदेश देने में भी सक्षम है. तो लीजिये प्रस्तुत है स्वर कथा ढीली गाँठ‘ :

रचनाकार – राजीव रंजन प्रसाद स्वर – श्‍वेता मिश्र

स्वराभिनय – शोभा महेन्द्रू और श्रीकान्त मिश्र कान्त


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ढीली गांठ स्वर कथा

नचकैया …….. [कहानी ] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’


हां होली और दीपावली पर उनका महिलाओं जैसा श्रृंगार जो कभी औरतों के बीच खासी चर्चा का विषय हुआ करता था तिवारी की मृत्यु के बाद उन्हें उसके विशेष रखरखाव में कोई रूचि नहीं रह गयी थी. सेटेलाइट प्रसारण से टी वी पर चोरी छुपे रैंप के फैशन कार्यक्रम तक देखने वाली गांव की औरतों कॊ अब नचकैया की सौंदर्य विषयक जानकारी में कोई रूचि नहीं थी. उनका पत्नी और बच्चों से प्राय: झगड़ा होता. उधर वीडिओ और टी वी के आगमन के साथ ही ग्रामीण उत्साह के प्रत्येक अवसर पर आयोजित होने वाले नौटंकी नाटक रहस आदि मृतप्राय हो चले थे. सामाजिक संरचना की सारी उथल पुथल के बीच विलुप्त होती लोककलाओं का एक संवेदनशील कलाकार उपेक्षा का दंश झेलते हुये टूट गया था……….


“आओ छोटे दादा..! आओ….!”


बाग की अमराई से बाहर उसे अपने खेत की मेड़ से गुजरते हुये देखते ही वह चहक कर बोले. तब तक वह भी उनकी आवाज से सकपका कर उधर देखने लगा था. वापस मुड़ने का कोई चारा न था और फिर ’बड़े घर के शेर बच्चे किसी से डरते नहीं’ इस बात की पोल खुलने का डर…. अत: उसने आगे बढ़ना ही उचित समझा. वैसे उनका अर्धनारीश्वर स्वरूप उसके जैसे बच्चे के लिये अप्रत्याशित था. कानों में सोने की बडी बड़ी बालियां …. लम्बे काले केशों का बड़ा सा जूड़ा बांधे वह खेत पर काम कर रहे थे. बिल्कुल गांव की औरतों की तरह मिस्सी और काजल लगाये, नीले रंग का चारखाना तहमद पहने वह अजीब से लग रहे थे. अपने बाग से होकर खेतों की ओर जाते हुये उनके जैसे व्यक्ति से भेंट हो जायेगी ऐसा तो उसने सपने में भी नहीं सोचा था. यद्यपि उनके इस प्रकार टोकने पर वह अंदर से बहुत डर गया था फिर भी ऊपर से निडरता का दिखावा करते हुये उसने अपना रास्ता नहीं बदला.

….. स्टूडियो में एक दूसरे के साथ बैठने से परहेज करने वाले समवेत स्वर में बोलने लगे. हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई सब धार्मिक नेता एक ही बात दोहराते समलैंगिकता अप्राकृतिक तथा अधार्मिक है. मीडिया जगत का प्रत्येक चैनल ज्वलंत बन चुके इस विषय को टी आर पी बढ़ाने का सर्वोत्तम अवसर मानकर कवर करने में जी जान से जुट गया. पक्ष विपक्ष में हो रहे बहस धरने प्रदर्शन के आलोक में एक प्रमुख चैनल की ओर से जब उसे इस विषय पर कवर करने को कहा गया तो अचानक ही उसे नचकैया का स्मरण हो आया. उसने सोचा कि नचकैया का इंटरव्यू इस विषय की गहराइयों पर एक नई रोशनी डालने के लिये सहायक हो सकता है…..


“पांव लागूं दादा….. ऐसे कहां चुपचाप निकले जा रहे हो पण्डित जी महाराज… आशीर्वाद तो देते जाऒ”

अब उसका साहस जबाब दे गया था.

“ खुश रहो ……..”

स्वभाववश आशीर्वाद देने की मुद्रा में हाथ उठाते हुये उसने कहने का प्रयास किया किन्तु आवाज मुंह से बाहर नहीं आयी. मात्र नौ वर्ष की वय में दादी से सुने जमींदारों के बहादुरीपूर्ण किस्सों के सहारे उसका साहस कब तक टिकता. उसने आज तक किसी भी पुरुष को इस तरह नारी वेश में नहीं देखा था. एक साहसपूर्ण दृष्टि उनकी ओर डालने का उसने प्रयास किया किन्तु उसका मन वहां से तेजी से भागने को हुआ. कच्ची पगडंडी पर जल्दी जल्दी पांव रखते हुये उसने शीघ्र निकलने का प्रयास ही किया.



“ खी खी ……. भाग रहे हो छोटे दादा”

उन्होंने खेत से निकाली हुयी घास मेंड़ पर रखते हुये जोर से कहा. किन्तु उसने मुड़्कर नहीं देखा. आम के बागों की कतार से दूर अपने खेतों तक पहुंचते हुये उसे स्मरण आया कि कई वर्ष पूर्व नौटंकी में उन्हें स्टेज पर पहली बार देखा था. तमाशबीनों भीड़ में अपने बालमित्र के साथ वह शामियाने से बाहर आकर खड़ा ही हुआ था कि एक महिला के वेश में कई अन्य रंगे पुते चेहरे वाले कलाकारों के साथ वह अचानक आ धमके.

“राजकुमार मिल गये”

वह जोर से बोले और उसे गोद में लेकर स्टेज पर वह इस तरह झपटे जैसे कोई चोरी का बच्चा लेकर भागा हो. तब तक हक्का बक्का घबराया हुआ वह बस रोने लगा था.

“ महाराज की जय हो .. ! धाय मां राजकुमार को आपके सन्मुख ले आयी हैं”

“ महामंत्री जी .. मेरा अंतिम समय अब सन्निकट है…. राजकुमार का राजतिलक किया जाये और उनके युवा होने तक शत्रुओं की दृष्टि से दूर रहने का प्रबंध किया जाये.”

“ जैसी आज्ञा महाराज”

“ मेरी मृत्यु के उपरांत साम्राज्य के प्रति वफादारी का वचन दें महामंत्री जी … ! और ……..”

कहते ही महाराज की गर्दन एक ओर को लटक गयी थी. सचमुच रोते हुये राजकुमार बच्चे को देखकर नाटक का वह दृश्य सजीव हो उठा था. लोग तालियां बजाये जा रहे थे. इस सब के बीच वह शीघ्रता से उसे स्टेज के पीछे अंधेरे में ले आये थे. उसे मिठाई देकर चुप कराते हुये उन्होंने कहा था

“आप राजकुमार हैं. राजकुमार रोते नहीं. अब घर जाओ……. यहां पर किसी को नहीं दिखना , शत्रु आपकी खोज में हैं. बड़े होकर आपको महाराज के सिंहासन पर बैठना है”

डर के मारे सीधा घर भाग आया था. घर पहुंचते ही उसने सबसे पहले अपनी दादी को सारी घटना बतायी थी. उन्होंने नचकैया लोगों को नीचा बताते हुये उनके सामने फिर कभी न पड़ने की सलाह दी थी.

अगले दिन दादी का पारा बहुत चढ़ा हुआ था. रात की घटना से वह बहुत नाराज थीं. नचकैया को काफी खरी खोटी सुनाते हुये उन्होंने पिता जी से कहा था.

“ एक नचकैया की इतनी हिम्मत…. जमाना बदल गया है नहीं तो ……” दादी के स्वर में धमकी थी.

“ रहने दीजिये वह कलाकार है .. मैं उसे समझा दूंगा”

“ समझाने से कुछ नहीं होगा. उसे अच्छी डांट पड़नी चाहिये ” दादी पिता जी की बात से संतुष्ट नहीं दिखीं. वह बड़ड़ाये जा रही थीं

“ …. पता नहीं यह तिवारी भी कैसा पण्डित निकला. एक नचकैया को लाकर गांव में बसा लिया. जब तक बीवी जिन्दा थी इसके नौटंकी वालों को घर पर नहीं फटकने दिया. अब जब देखॊ तब हमारे ही घर के पिछवाड़े बाज़ा (हारमोनियम) बजने लगता है. नाचने वाले उसके घर में हफ्तों टिके रहते हैं…..” वह बोले जा रही थीं

“ आप भी ….. “ पिता जी हंसते हुये चले गये. किन्तु बालबुद्धि वह कुछ भी नहीं समझ सका था. हां उस दिन से आज तक उन्हें कभी गांव में नहीं देखा था. उसे बाद में पता चला था कि वह एक मंजे हुये कलाकार थे और उस क्षेत्र के सबसे बड़े नचकैया. स्टेज पर कहानी के अनुरूप निरंतर प्रयोग करना उनका स्वभाव था. फिर भी उनका तमाशा देखने का विचार उसके मन में कभी नहीं आया.

यह संयोग ही था कि सदैव की भांति वह आज भी खेत पर नौकरों के लिये दादी का संदेश लेकर आया था और वह सामने पड़ गये थे. खेत पर उसकी भेंट रमुआ से हो गयी. रमुआ का पूरा नाम तो रामखिलावन था किन्तु सारे गांव में रमुआ हो..! रमुआ रे…!! की आवाज ही सुनाई देती थी. सब उसे इसी नाम से बुलाते थे. रमुआ की दुनियां उसके स्वयं के ’प्रतिपल विनिर्दिष्ट’ नियंत्रित जीवन से भिन्न बहुत निराली थी. रमुआ परम स्वतंत्र था. स्कूल तो बहुत पहले मास्टर जी के समझाने के उपरांत भी उसके बापू ने ही छुड़वा दिया था. पढ़ लिखकर कौन सा कलक्टर बनना था. सो सवेरे सवेरे बाप की डांट सुनता और घर से बाहर निकल जाता. सारा दिन गांव जंगल घूमता और जब कभी मन करता अपनी दादी के साथ बकरियां चराने निकल जाता. दिन भर झूले (ढाक, पलाश) के पत्तों से दोने पत्तल बनाता. बाद में पत्थर से चोट कर पाकड़ के तने से निकले दूध की बूंदे कुछ दोनों में लगाता. दोपहर को साथ ही चरती हुयी किसी भी गाय बकरी के थनों से उन्हीं दोनों में दूध निकाल लेता. कुछ समय किसी पेड़ की छांव में रख देता और दूध के दही जैसा बनते ही पेट पूजा कर लेता. बाद में पहले से दुही गाय बकरी के कम दूध देने पर गांव वालों से गाली खाकर भी रमुआ मस्त था. अलबत्ता यह भी सही था कि रमुआ से कोई लम्बॆ समय तक नाराज नहीं रह सकता था. वह सबके किसी न किसी काम आता था. उसका बाप अब भी खेतों में काम करता था और वह मटरगश्ती. गांव में सारी दुनियां जहान की खबरों का स्रोत रमुआ ही था. एक चलता फिरता अखबार.

“सुन रे रास्ते में अमराई के पास तिवारी जी के खेत पर वह औरतों जैसा वेश बनाये क्या कर रहा है”

“ कौन …. वह नचकैया…. ? अरे वह तो कई दिनों से अपने गांव में ही है.”

“ क्यों …… “

“ कोई नौटंकी तमाशा का काम इन दिनों ठीक से नहीं चल रहा है … और अब तो तिवारी जी ने अपना घरबार जमीन जायदाद भी उसके नाम कर दी है” रमुआ ने सयानों की तरह उसे समाचार दिया.

“ तो अब वह गांव में ही रहेंगे…. ?” उसने सशंकित होकर पूछा.

“ हां … क्यों …. तू क्यों पूछ रहा है….? अच्छा अब समझा वह बचपन की राजकुमार वाली घटना तुम्हें अब तक याद है. तुझे अब तक उनसे डर लगता है ..? हा.. हा….” वह जोर से हंसा.

“नहीं नहीं .. ऐसी कोई बात नहीं” वह रमुआ के सामने स्वयं को डरपोक नहीं प्रदर्शित करना चाहता था.

उस दिन की बात आयी गयी हो गयी थी. दादी का देहांत हुये कई वर्ष बीत चुके थे. घर के पिछवाड़े नौटंकी वाले तिवारी जी की संपत्ति का एकमात्र उत्तराधिकारी नचकैया ही था. पूरे जीजान से तिवारी जी की सेवा करना खेतों मे काम और कभी कभार क्षेत्र में नौटंकी. आसपास के गांवों मे तिवारी जी और नचकैया के प्रेम संबन्धों की चर्चा और थू थू कुछ दिनों तक ही चली. तिवारी जी का लोटापानी घॊषित रूप से तो बंद नहीं था परन्तु उनके घर पानी पीने वालों पर सबकी निगाह रहती. चोरी छिपे सभी उनके घर पानी पी लेते और प्रत्यक्षत: तिवारी की लुटिया बंद होने का दिखावा करते. स्वयं के कुलीन ब्राह्मण होने का दंभ भरने वाले लोग अक्सर नचकैया से खेत के लिए बीज और सिंचाई के लिए उधार मे पैसे मांग लेते. कभी कभार कोई नाचने वाली ’बाई’ नाच सीखने के लिए कुछ दिन तिवारी जी के घर रुक जाती. उन दिनों तिवारी के घर खूब महफ़िल लगती. प्राय: गांव के सभी लोग किसी न किसी बहाने से कलाकारों की परोगाम रिहलसल (प्रोग्राम रिहर्सल) देखने पहुंच जाते. उन दिनों गांव के बाग में पेड़ों के नीचे लगने वाले प्राइमरी स्कूल के बच्चों को बहुत प्यास लगती. स्कूल से एक दो लंबर (नंबर) के नाम पर निकले बच्चे सीधे नचकैया के घर पहुंच जाते. पानी पीने के नाम पर नाचने वाली का चेहरा देख आते और बाद में नमक मिर्च लगाकर बखान करते. लोटापानी बंद की बात अब पुरानी हो गयी थी.

अब तिवारी जी के काफी बाल सफेद हो चले थे. वंश आगे बढ़ाने की भावना से उन्होंने नचकैया को विवाह करने का आग्रह किया. छोटी जाति के नचकैया की बारात में शामिल होने की कामना रखने के बावजूद गांव से कोई नहीं गया था. सबको अपने अपने मुखौटे नुच जाने का डर था. नचकैया की पत्नी मां बनने वाली हैं यह खबर सारे गांव में महीनों चर्चा में रही. उनके बेटे के जन्म पर तिवारी जी ने बड़ी धूमधाम की. गांव के सभी लोगों के साथ साथ अपने परिचित बूढ़े जवान सारे कलाकारों को आमंत्रण भेजा था. नवजात के नामकरण संस्कार पर नौटंकी विधा के कार्यक्रमों को सप्ताह भर गांव में आयोजित करने की घोषणा भी कर डाली थी. पिता बनने से नचकैया भी बहुत खुश थे. बेटे के जन्म पर वह अपनी कला का सर्वोत्तम प्रदर्शन अंतिम बार करेंगे उनकी यह घोषणा जंगल में आग की तरह फैल गयी थी. क्षेत्र के आस पास सभी गांवों में लोग उनकी कला के कद्रदान थे. उन दिनों यह अफवाह भी जोरों पर थी कि अपने लम्बे बाल कटवा कर वह अब संपूर्ण पुरूष बन जायेंगे. बेटे के पिता के रूप में वह नारी वेश त्याग देंगे. वहीं पर कुछ लोगों ने तो नवजात शिशु के उनके अथवा तिवारी के होने पर भी सवाल उठा दिया था. जितने मुंह उतनी बातें…….. फिर भी उस समय के श्रेष्ठ कलाकार का मंच से अंतिम प्रदर्शन देखने से कोई भी चूकना नहीं चाहता था.

पिता जी के कहने पर इस बार वह भी नौटंकी देखने वालों की भीड़ में बैठा था. नगाड़े की थाप और हारमोनियम की धुन पर नौटंकी के परम्परागत संवाद….. सदैव नारी पात्र का अभिनय करने वाले नचकैया ने उस रात अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था. जीवंत अभिनय और भावपूर्ण संवाद ……. उसने अनुभव किया कि कला सिर्फ कला होती है. लोगों के मुंह से कही सुनी बातों से अलग हटकर …… नचकैया उसे असाधारण कलाकार एवं एक सामान्य व्यक्ति लगे थे. नौटकी के दृश्यों के बीच लोगों की फूहड़ टिप्पणी पर उसे हर बार बुरा लगता. उसे लगता कि लोग नचकैया और उनकी कला का अपमान कर रहे थे. उसने तय किया कि वह उनसे बात करेगा. परन्तु ऎसा न हो सका. अच्छी शिक्षा के लिये उसे गांव से दूर बोर्डिंग स्कूल भेज दिया गया था. उसके बाद नचकैया से मिलना और उसका बात करना कभी न हो सका.

अनेक वर्षॊं की लम्बी पढ़ाई तदुपरांत मीडिया और प्रसारण की उच्च शिक्षा के बाद कवरेज और प्रोग्राम की महानगरीय व्यस्तता के बीच वह नचकैया को भूल चुका था. इस बीच परिवार के साथ महानगर सेटल होने के बाद पैतृक गांव से सन्बंध भी लगभग समाप्त हो गया था. टी वी और चैनल की चकाचौंध में व्यस्त उसकी जिन्दगी के बीच एक दिन माननीय उच्च न्यालय द्वारा धारा 377 पर की गयी एक टिप्पणी ने सारे देश में भूचाल ला दिया. टिप्पणी को अपने पक्ष में मानने से उत्साहित होकर चोरी छिपे रहने वाले गे संगठन विभिन्न नगरों में सार्वजनिक रूप से बाहर निकल पड़े. समाज संस्कृति और राष्ट्रीय परिवेश सहित पारिवारिक ताने बाने को प्रभावित करने वाले इस विषय पर सब ओर चर्चा हो रही थी. वैचारिक आंदोलन की इस घटना ने धुर विरोधी विभिन्न धर्मगुरूओं को भी इसके विरोध में एक साथ ला दिया. प्राय: स्टूडियो में एक दूसरे के साथ बैठने से परहेज करने वाले समवेत स्वर में बोलने लगे. हिन्दू मुस्लिम सिख इसाई सब धार्मिक नेता एक ही बात दोहराते समलैंगिकता अप्राकृतिक तथा अधार्मिक है. मीडिया जगत का प्रत्येक चैनल ज्वलंत बन चुके इस विषय को टी आर पी बढ़ाने का सर्वोत्तम अवसर मानकर कवर करने में जी जान से जुट गया. पक्ष विपक्ष में हो रहे बहस धरने प्रदर्शन के आलोक में एक प्रमुख चैनल की ओर से जब उसे इस विषय पर कवर करने को कहा गया तो अचानक ही उसे नचकैया का स्मरण हो आया. उसने सोचा कि नचकैया का इंटरव्यू इस विषय की गहराइयों पर एक नई रोशनी डालने के लिये सहायक हो सकता है. लोगों के विचार से तिवारी और नचकैया के संबन्ध इसी श्रेणी के थे. यदि नहीं तो क्या वह दो कलाकारों के बीच का सहज अनुराग था. तिवारी ने स्वयं उन्हें विवाह करने का आग्रह किया था और वह पिता भी बने थे. क्या समवर्ती समाज में अथवा उससे पूर्व इस प्रकार के संबन्ध उपस्थित रहे हैं. तिवारी और उनका सच क्या था ? ऎसे अनेकों पृश्न उसके मस्तिष्क में तीव्रता से आ रहे थे.

वर्षों पुरानी स्मृतियां ताजा करते हुये कलम कैमरा और माइक संभाले वह आज अपने गांव की ओर ड्राइव कर रहा था. पलाश के जंगल का कहीं कोई नामो निशान नहीं सभी जगह बस खेत ही नजर आ रहे थे. आम का कोई पुराना बाग भी उसे दूर तक नहीं दिखाई दिया. उसके बचपन के खेत और आम की कतारों का गांव बिल्कुल बदला हुआ था. गांव के बाहर इकलौते बचे पुराने पीपल को पहचान कर उसने कार रोक दी. कुछ पल वीडिओ प्रस्तुति एवं पृश्नों की रूप रेखा बनाते हुये उसका ध्यान कार के पास आते हुये युवक की आवाज से भंग हुआ.

‘ अरे ददुआ तुम कब आये …! कित्ते साल बादि . गाड़ी हिंया काहे रोकि दई’

उसे कार में पहचानते हुये चुपचाप बैठे देखकर उसने टोका.

‘ कुछ नहीं ऎसे ही. आज बहुत वर्षों बाद वापस लौटा हूं न… ’बरम्बावा का थान’ देख रहा था. गांव में सब कैसे हैं… !’ युवक को संतुष्ट करने के लिये उसने कहा

‘सब ठीक हंई ददुआ’

‘और वह रमुआ….? आजकल क्या कर रहा है’

‘वोइ तौ परधान हंइ. अबकी परधानी सीट निजरब(रिजर्व) हुइ गयी रहइ … सबने उसैह क लड़ाइ दऒ’

‘हूम्म …. और वो नचकैया दद्दा…. वो कहां और कैसे हैं..’

‘वोइ तउ तिवारी जी के मरन के बादि गांव छोड़ि के चले गये …..’

‘क्या हुआ …. उनके पास तो तिवारी जी की बहुत सारी जमीन थी .. वह सब … ‘

‘का बतावैं ददुआ पूरी कथा हइ. उनइं त जमीन जायदाद सब बेंचन क परि गयी. आधे से जादा त बीमारी म लगि गई…… सुनी हइ कि अब तउ कहुं नदी के किनारे झोंपड़ी बनाइ के रहत हंइ’

“क्या तुम मुझे विस्तार से बताओगे कि पिछले दिनों उनके साथ क्या हुआ था ”

उसे व्यग्रता हो चली थी. उसकी रूचि पैतृक गांव में अपने पुराने घरबार से कहीं अधिक उनमें थी. गांव में मिली जानकारी के अनुसार वह अपनी पत्नी के साथ गांव में ही अलग घर बना कर रहने लगे थे. तिवारी जी के मकान में उनकी महफिल कम हो चली थीं. गांव की सभी औरतों से अधिक लम्बे काले और घने रहने वाले उनके बाल कटवाने से उन्होंने मना कर दिया था.

“यह केश तिवारी जी के रखवाये हैं. मेरे मरने के बाद ही जायेंगे” उन्होंने कहा था. बेटे और पत्नी से इसको लेकर उनका बहुत झगड़ा हुआ था परन्तु वह नहीं माने थे.

हां होली और दीपावली पर उनका महिलाओं जैसा श्रृंगार जो कभी औरतों के बीच खासी चर्चा का विषय हुआ करता था तिवारी की मृत्यु के बाद उन्हें उसके विशेष रखरखाव में कोई रूचि नहीं रह गयी थी. सेटेलाइट प्रसारण से टी वी पर चोरी छुपे रैंप के फैशन कार्यक्रम तक देखने वाली गांव की औरतों कॊ अब नचकैया की सौंदर्य विषयक जानकारी में कोई रूचि नहीं थी. उनका पत्नी और बच्चों से प्राय: झगड़ा होता. उधर वीडिओ और टी वी के आगमन के साथ ही ग्रामीण उत्साह के प्रत्येक अवसर पर आयोजित होने वाले नौटंकी नाटक रहस आदि मृतप्राय हो चले थे. सामाजिक संरचना की सारी उथल पुथल के बीच विलुप्त होती लोककलाओं का एक संवेदनशील कलाकार उपेक्षा का दंश झेलते हुये टूट गया था.

युवक से मिली जानकारी नोट करते हुये उसके मस्तिष्क में फिर पृश्न कौंधे. क्या तिवारी जी और नचकैया के संबंध आज की गे विचारधारा का पूर्ववर्ती काल था. आज के दौर में टीवी पर होने वाले भोंडे प्रदर्शन के बिना उनका वर्षों का संबंध और पारस्परिक समर्पण…. क्या था वह ? उसने सोचा था कि वह सीधे उनके घर जायेगा. नौटकी, रास, धमाल एवं विलुप्त होती अन्य पुरानी कलाओं के विषयों पर गहन चर्चा के अतिरिक्त समाज और समलैंगिकों के ऊपर चर्चा करने….. मंच परित्याग के उपरांत उनके अनुभवों को सामने लाने के लिये…… उनको क्या बीमारी हुयी और कैसे…? कोई सहायता करने. क्या यह संभव होगा…? क्या वह मिलेंगे. अपने विशेष कार्यक्रम के लिये अब उसे नचकैया का इण्टरव्यू मात्र प्रासंगिक ही नहीं अपितु अपरिहार्य लग रहा था. क्या था उनका सच…. मीडिया के सामने वह उनसे ही पूछेगा. अपनी राय एवं सही गलत का निर्णय दर्शकों पर थोपे बिना. इसके साथ ही उसकी गाड़ी एक झटके के साथ गांव छोड़ती हुयी युवक के बताये रास्ते पर नदी की ओर दौड़ पड़ी.

मुक्तिद्वार की सीढियां …[कहानी] श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

“हेलो “


” हेलो… आज इतने दिनों बाद “

” हाँ आज तुम्हारा स्मरण बहुत आवेग के साथ कर रहा था “

” सच पूछो तो मैं भी कल से ….”
” क्लासेस …? डिस्टर्ब तो नहीं ….. “

” नहीं .. नहीं … अभी फ्री हूँ. स्टूडेंट्स एनुअल फंक्शन की रिहर्सल में बिजी हैं . इतने दिनों बाद कम से कम आधा घंटा तो हम बात कर ही सकते हैं. वैसे भी तुम बात करने में बहुत कंजूस हो “

” … सच पूछो कल से बहुत ही अन्यमनस्क अनुभव कर रहा था”
” फिर इतना बिलम्ब कैसे ..? कल ही क्यों नहीं काल किया. तबियत ठीक है ना.. तुम भी .. “


” नहीं नहीं .. ऐसा कुछ नहीं. बस पिछले कुछ दिनों बहुत अकेला सा अनुभव किया. जीवन की आपाधापी भरी तंग गलियों से जब भी गुजरा.. हरबार संभवतः उसी मोड़ पर पहुँच गया जहाँ पर कई बार अपनी परछाई तलाश करने लगता हूँ … मेरा स्वभाव तुम्हें पता ही है “

” वैसे मैं भी इस बार तुमसे बहुत नाराज़ हूँ … शायद थी अब नहीं. सोचा इस बार कोई फोन नहीं करूंगी… बहुत स्वार्थी हो गए हो …. बस नाम… नाम और काम. शायद मेरा अस्तित्व अब कहीं नहीं. इन दिनों तुम्हारे बारे में बहुत सोचा. जब भी याद किया… बस यही तय किया कि जब तक तुम्हारा काल नहीं आएगा, फोन नहीं करूंगी “

” थैंक्स… पता नहीं इसे क्या कहें जब भी मुझे या तुम्हें, दूसरे की तीव्र अनुभूति होती है, अगले की काल अपने आप ही आ जाती है “

” तो स्वयं की परछाई मिली ……”

” … संभवतः एक नाम …. एक सुखद सा अहसास … जब मन में थोड़ा झाँका और पास गया ..पहचाना … यह तो तुम्हारा ही चेहरा था…..”

” ऐसा कैसे होता है …. ? “


” कैसा …!!! “

” हम दोनों जीवन में अब तक मात्र एक बार मिले हैं और वह भी एक सार्वजनिक कार्यक्रम में. निजी जीवन में अपने अलग अलग क्षेत्रों में व्यस्त होने के बाद भी लगता है कि युगों से एक साथ ही चल रहे हैं. है ना यह आश्चर्यजनक ? “

” हाँ यह है तो … शायद ही कोई हमारी बात पर विश्वास कर सके ….. “

” किंतु हम जानते हैं कि यही सत्य है .. उस एक बार की हमारी संक्षिप्त सी भेंट और औपचारिक हाथ मिलाने का स्पर्श … लगता है जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है. जीता जा रहा हूँ तब से….. अब तक का लंबा अंतराल कैसे गुजर गया पता ही नहीं चला “

” तुम्हारी सारी बातें मुझे अब तक याद हैं. एक दिन तुमने कहा था ‘मुझे लगता है कि हमारे मानवीय जीवन की डगर का कोई ऐसा आयाम भी है जो सर्द रात्रि में भावना की गरमी और जीवन के जटिल संघषों की तपिश में एक घनेरी छाँव बनकर आकारहीन और आधारहीन होते हुए भी एक स्वरुप बनकर हमारे साथ हो लेता है ’ “

” ….. सच में जब भी थकता हूँ … खोजता हूँ स्वयं को … अंतस में तुम्हारा चेहरा उभरने लगता है. “

” .. हूँम्मऽ.. बस कहते रहो …. मन का सारा प्रस्तार बाहर आने दो “

“तुमने अपने बारे में आज तक मात्र एक बार इतना ही बताया कि तुम विवाहित हो. आगे तुम्हारी अनिच्छा के कारण मैंने अब तक तुम्हारे बारे में कुछ भी जानने की चेष्टा नहीं की. किंतु आज बताना चाहता हूँ कि जब भी अपना अस्तित्व तलाश करने का प्रयास करता हूँ.. अंतस में बस तुम्हारा ही स्मरण आता है और मैं ध्येय कामना विहीन निराबोध शिशु सा तुम्हारी ओर निहारने लगता हूँ “

“… हा हा… तुम इतने निराबोध हो …? “

” इसका उत्तर तो तुम ही दे सकती हो, स्वयं को और मुझे भी. फिर भी संभवतः सर्वज्ञ होने का हमारा दंभ ही हमें बहुत बेचैन करता रहता है. यही कारण है कि तुम्हारे सान्निध्य में एक निराबोध शिशु सा होकर मैं बहुत ही सहज अनुभव करता हूँ………”

” रहने भी दो…आनलाइन ही सही किन्तु वर्षों से तुम्हें जानती हूँ, लगता है चाटुकारिता के विद्यालय में पहली बार प्रवेश लिया है. यह तुम्हारे वश की बात नहीं. तुम जैसे हो वैसे ही अच्छे लगते हो … “

” नहीं ….ऐसा नहीं है. कह लेने दो मुझे.. आज जो अनुभव हो रहा है वही तुमसे कहा …. ”

” ओह गाडऽ …. ! तो तुम किसी स्थान पर मन्दिर के किनारे…. क्या संसार में कोई विश्वास कर सकेगा कि अपने समय का ख्यातिनाम ब्लागर और रचनाकार… कंप्यूटर और अंतरजाल से परे किसी अनाम आश्रम का वासी होकर… !!! “

” नहीं नहीं .. ऐसी कोई बात नहीं है बस प्रकृति की गोद में… जगत्जननी पृथ्वी और स्रष्टि के आलोक में… इसके सान्निध्य में स्वयं को ढूंढ रहा हूँ …. तुम ई – मेल कर सकती हो … मैं साप्ताहिक रूप से किसी श्रद्धालु के लैपटाप पर….. “



” हूँम्मऽ…. आज सोचती हूँ कि साइबर संपर्कों में गाम्भीर्य का नितांत अभाव और शाब्दिक नग्नता से आहत जब मैंने यह तय किया था कि तुम्हारे जैसे गंभीर रचनाकार की नेट पर वास्तविकता को परख कर ही रहूंगी तो यह कभी नहीं सोचा था कि तुम नेट पर भी संन्यासी जैसी बातें ही करोगे. राष्ट्रप्रेम, दर्शन .. अध्यात्म और यही सब दुरूह बातें.साईबर वर्ल्ड में तुम्हें दूसरों से भिन्न पाकर आरम्भ में आश्चर्यचकित थी…. अन्यथा मैंने बड़े बड़ों को दो या तीन बार आनलाइन होते ही उनकी औकात पर आते हुए देखा था. सोचती थी कि तुम भी देर सवेर वैसे ही निकालोगे किंतु ऐसा न हुआ “

“छोडो वह सब … हमें पता है कि हमारे जीवन अपने अपने मार्ग पर सहज ढंग से चल रहे हैं. आगे भी इसी प्रकार चलते रहेंगे. कदाचित यह समय समय पर पारस्परिक भावनात्मक निर्भरता हमें बांधे हुए है.इसकी अनुभूति संसार की सभी परिभाषाओं से परे होकर भी अप्रतिम है. क्या है यह …? “

” मैं नहीं जानती … इस बात का उत्तर भी बहुधा तुमने स्वयं ही दिया है. तुम्हारे शब्द ही दोहरा रही हूँ …. यह जीवन की एकाकी नीरसता को भंग करते हुए वय के उत्तरार्ध की, हमारे मन की नैसर्गिक खोजी प्रवृत्ति ही है…. यह शारीरिक आकर्षण न होकर … विशुध्द बौद्धिक और भावनात्मक आवश्यकता है जो जीवन के नीरस ठहराव, स्थायित्व और उससे उपजी जड़ता को चैतन्य प्रदान करने लगती है … उससे लड़ने के लिए वय के ढलाव के प्रतिकूल उसमें ऊर्जा भरती है….. तुमने ही तो इसे परिभाषित किया है कई बार.. फिर …? “

” कहो तुम्हारे मुंह से सुनना अच्छा लगता है… “


” तुमने आज तक विवाह क्यों नहीं किया …?”

” बस … यूँ ही. जब विवाह की अभिलाषा हुयी लगा भावनात्मक जीवन में…मैं तुम्हारी कक्षा में प्रवेश ले चुका था. और वह शिक्षा अब तक पूरी नहीं हुयी”

“ठीक है ठीक है …. अभी स्टूडेंट्स को देखना है.. बर्षों बाद ही सही फ़िर कभी आनलाइन आना होगा ..? ”

” शायद नहीं, बहुत लम्बा अन्तराल हो चुका है. मन्दिर के पार्श्व की सीढियां मुक्तिद्वार से होकर नदी के किनारे बढ़ती हुयी मुख्यधारा से मोक्ष मार्ग तक तो ले जाती हैं परन्तु विज्ञान और बिजली जैसी कोई सुविधा … यहाँ नहीं है “

” ओह गाडऽ …. ! तो तुम किसी स्थान पर मन्दिर के किनारे…. क्या संसार में कोई विश्वास कर सकेगा कि अपने समय का ख्यातिनाम ब्लागर और रचनाकार… कंप्यूटर और अंतरजाल से परे किसी अनाम आश्रम का वासी होकर… !!! “


” नहीं नहीं .. ऐसी कोई बात नहीं है बस प्रकृति की गोद में… जगत्जननी पृथ्वी और स्रष्टि के आलोक में… इसके सान्निध्य में स्वयं को ढूंढ रहा हूँ …. तुम ई – मेल कर सकती हो … मैं साप्ताहिक रूप से किसी श्रद्धालु के लैपटाप पर….. “

” क्या लैपटॉप बाबा बनने का विचार है “

” नहीं नहीं .. वह बेचारा तो राष्ट्रवाद के उन्मुक्त भावना प्रवाह में बहकर सही होकर भी अनुचित दिशा में बह गया. मेरा विचार ऐसा नहीं है. सही विचार को सही मार्ग और दिशा पर चलकर ही वांछित फल प्राप्त करना श्रेयस्कर है अस्तु …. “

” … तुम नहीं सुधरोगे “

” चलती हूँ. इस संवाद को ब्लाग की अपेक्षा हो सकती है. डाल दूँ ?”

” तुम्हारे लौकिक जीवन में मेरा कोई हस्तक्षेप नहीं रहा जो भी करोगी अच्छा लगेगा “

” ठीक है चलती हूँ अभी… अपना ध्यान रखना और यदि सम्भव हो तो काल करते रहना. वैसे मैं भी फोन करती रहूंगी. … अब लगता है… तुम मेरे जीवन की कक्षा के चिरंतन विद्यार्थी हो … तुमसे दूसरी भेंट सीधे मुक्तिद्वार की सीढ़ियों पर शीघ्र ही होगी.. “

“अर्थात ……!!!”

“यह बताने के लिए कि मैंने तुमसे मात्र एक ही झूठ बोला था कि मैं विवाहित हूँ …”

” ओह गाडऽ …. ! तुम भी … हरिओमऽऽ…. “

अस्तित्व [कहानी]

इस बार बारिश खूब जम के हुयी थी. सारे गाँव में खूब हलचल रही पूरे मौसम भर. बरसात का मौसम कब खत्म हुआ पता ही नहीं चला. लोगों के घरों में पुरानी रजाइयां आंगन में पड़ी ख़ाट पर धूप के लिये फैलनें लगीं. नये पुराने स्वेटरों की बुनावट और मरम्मत के लिये जानकार बहू बेटियों की तलाश उन दिनों जोरों पर होती। ऐसे में हम सब अपनी बाल मण्डली के साथ खाट पर फैली रजाइयों में नमी की चिर परिचित गन्ध सूंघते हुये लुका छिपी खेला करते. आसमान में उड़ते हुये बादलों और नयी पुरानी रूई समेटती हुयी अपनी दादी के सामने धूप में चटाई पर फैली रूई के सफेद गालों में न जाने क्या क्या साम्य ढूँढ़ा करते.

मेरे आंगन को बाहर के अहाते से अलग करने वाली कच्ची दीवार इस बार बरसात के मौसम में ढह गयी थी. मौसम की भेंट चढ़ चुकी दीवार पर फिसलते हुये हम खूब खेला करते. अधगिरी दीवार की तुलना मैं पहाड़ क़ी चोटियों से करते हुये अक्सर खुद को पर्वतारोही समझता. कई बार मैं भगवान से प्रार्थना करता कि हे भगवान..! इस दीवार को ऐसे ही रहने दिया जाय. लुका छिपी करते हुये हम सब बच्चों को न जाने कितनी डाँट पड़
ती किन्तु खेल में मिलने वाले आनन्द की तुलना में यह बहुत छोटी सी कीमत होती. न जाने कितनी कल्पनायें घेरे रहती थीं उन दिनों.

एक दिन देखा गिरी हुयी दीवार के ढेर से एक अंकुर फूटा था. ध्यान से देखा वह नीम का अंकुर था. अब मैंने अपने खेल को संयत कर लिया था. जब भी समय मिलता उस बढ़ते हुये अंकुर के पास दौड़ ज़ाता. बढ़ते हुये अंकुर को निहारते हुये घण्टों बीत जाते पता ही नहीं चलता. स्कूल से वापस आते ही बस्ता फेंकता और पहले वहीं पहुँचता. कोई उस छोटे से नीम के पेड़ क़ो नोच न ले मैं इसका बिशेष ध्यान रखता. सींचने की कभी जरूरत ही नहीं पड़ी. बस बचपन की लुका छिपी खेलते खेलते वह पेड़ और मैं कब बड़े होते गये पता ही नहीं चला.

अम्मा उस पर सवेरे की पूजा के बाद एक लोटा जल अवश्य चढ़ाती थीं. ‘नीम के पेड़ में देवी का वास होता है’ एक दिन उन्होंने मुझे बताया था. जब भी फुसर्त के क्षणों में नीम के पेड़ की ओर देखता वह अपनी डालों को हिला हिला कर मुझसे बातें करता प्रतीत होता. कभी लगता उसे मेरे बचपन की हर बात याद है . अक्सर अपने लौंछों के साथ झूम झूम कर वह अपनी खुशी मुझसे प्रकट करता.

समय बीतते देर नहीं देर नहीं लगती. मैं स्कूल की पढ़ायी समाप्त कर कालेज की पढ़ायी के लिये शहर आ गया था. धीरे धीरे घर सूना होने लगा अम्मा दादी से भी पहले चली गयीं. नीम के पेड़ पर अब जल¸ कभी- कभार दादी ही चढ़ाती थीं. बार बार शेव करने से मेरी दाढ़ी के बाल कठोर होने लगे थे. साथ ही कठोर हो चली थी नीम के पेड़ क़ी छाल भी. एक दिन दादी भी नीम के पेड़ क़े नीचे चिरनिद्रा में सो गयीं. मिट्टी की दीवारें, कोठरी और दादी, सबके साथ छोड़ने के बाद नयी बहुयें घर में आ चुकी थीं . एक के बाद एक सारी कच्ची दीवारें पक्की होती चली गयीं. अब नीम के पेड़ पर कोई जल न चढ़ाता था. बस दादा की खटिया जरूर नीम के पेड़ क़े नीचे पड़ी रहती. उन्होने भी मानो अघोषित सन्यास ले लिया था. घर में अब नीम के पेड़ क़े अलावा मेरा कोई पुराना साथी नहीं रहा था.

जब भी छुट्टियों में गाँव जाता नीम के पेड़ क़ी छाँव में ही लेटता. मुझे लगता नीम का पेड़ और मैं, एक दूसरे से बातें कर सकते थे. वह अपनी डालें हिला हिलाकर लौंछों के साथ झूम झूमकर मुझसे ढेर सारी पुरानी बातें करता प्रतीत होता.

पक्की दीवारों के नये घर में पक्के ऑंगन के साथ अब पीढ़ी भी बदल रही थी. बच्चों की संख्या काफी बढ़ चुकी थी. नीम के पेड़ क़ी डालों पर अक्सर झूले पडते. वक्त जरूरत पर लकड़ी के लिये डालें भी काट ली जाती. मैं छुट्टियों में जब भी शहर से गाँव पहुँचता नीम अपनी मूक कहानी मुझे सुनाता. प्रायः कहता अब बाबूजी भी किसी से कुछ नहीं कहते. तने को घेरे वह चबूतरा जिसे हम होली दीवाली रंग पोत कर साफ सुथरा रखते थे, अब उजाड़ मिट्टी का ढेर था. सूने तने के साथ बाबू जी की गाय ‘श्यामा’ बँधी रहती. नीम का पेड़ उसे छाया और गाय उसे खाद देते हुये एक दूसरे के साथी थे. अब कोई पेड़ क़ी परवाह नहीं करता. किन्तु नीम सब कुछ चुपचाप सहता रहता. आखिर उसका जन्म इसी घर में हुआ था. वह खुद को परिवार का अंग समझता. हरसाल पतझड़ में सारे पत्ते झड़ने के बाद

नयी कोंपलें आ जातीं और पेड़ फ़िरसे हरा भरा हो जाता. प्रायः परिवार के छोटे बच्चों को अपने नीचे किलकारियां भरते देख वह निबौरियों के साथ हवा में झूम कर अपनी खुशी प्रकट करता. परिवार में बाँटने के लिये उसके पास दूर तक फैली छाया और ढेर सारी खुशी ही थे. और फिर एक दिन बाबू जी भी उसकी छाया में सदा के लिये सो गये. गाय और नीम का पेड़ मूक एक दूसरे को चुपचाप देखते रह गये बस. गाय की ऑंखों से बहते ऑंसू और नीम के नीचे फैले सन्नाटे पर किसी का ध्यान न गया.

गाँव में टीवी और ट्रैक्टर के प्रवेश के साथ ही नया जमाना आया. पशुओं की संख्या कम होने लगी. अब घर में गाय नहीं है. कौन उठाता है गोबर, कहीं टिटनेस हो जाय तो….? आज के लोगों को सब कुछ मालुम है. पेड़ अब उदास रहता है. उसकी छाया में खड़े ट्रैक्टर से जब भी धुऑं निकलता है उसको घुटन होती है. इस बार पतझड़ क़े बाद उसकी दो शाखाओं में नन्हीं कोंपलें नहीं आयीं. नीम की दोनों डालें सूख गयीं. शायद जमीन के नीचे जल स्तर काफी नीचे चला गया है. खेत खेत में बोरवेल हैं. अन्धाधुन्ध जलदोहन जारी है. पहले की तरह नहीं दो बैलों के पीछे तक-तक बाँ-बाँ करते रहो और फिर ‘ कारे बदरा कारे बदरा पानी तो बरसा रे ‘ गाओ ढोल के साथ. आज की पीढ़ी क़ा किसान¸ खेती और गाँव सब आधुनिक हैं.

अस्तु… नीम की डालें क्यों सूखीं किसी ने ध्यान नहीं दिया. हाँ एक दिन मजदूर बुलाकर दोनों डालें काट दी गयीं. इसबार गाँव गया तो भुजाहीन मनुष्य की तरह दुखी लगा नीम. हवा के साथ झूम झूमकर मुझसे बातें करने वाला पेड़ बस चुपचाप¸ ठूंठ की भाँति खड़ा रहा. सब कुछ अप्रत्याशित लगा.

इस बार गाँव से कोई स्फूर्ति कोई नवउत्साह अथवा उर्जा लेकर नहीं लौटा था. वापस शहर की आपाधापी भरी जिन्दगी में आने पर भी वह भुजाहीन पेड़ मेरी ऑंखों से विस्मृत न होता. लगातार कहीं कुछ कचोटता रहता. आफिस में¸ घर में, सब कुछ सूना सूना लगता. लगता जीवन में कोई हादसा हो गया है. मन नहीं माना¸ पखवाड़े क़े भीतर ही छुट्टियाँ लेकर वापस गाँव लौटा.

गाँव पहुँचते ही मेरी कल्पना से परे दृश्य, मेरे सामने था. नीम का पेड़ पूरा काट दिया गया था. मुझे कोई खबर तक नहीं. शायद इसकी कोई जरूरत भी नहीं थी. मैं स्तंभित था. समझ नहीं आया किससे क्या कहूं. जहॉ पर कभी नीम का भरा पूरा पेड़ हुआ करता था, अब वहाँ पर गढ्ढा था. कुल्हाडी क़ी मार से छिटके हुये तने के छोटे छोटे टुकड़े चारे ओर छितरे थे. युद्ध के मैदान में लड़ते हुये शहीद होने वाले योद्धा के शवावशिष्टों की भाँति. किन्तु यह तो कोई युद्ध नहीं था. बेचैनी से पेड़ क़ी जड़ों के पास गया. देखा वर्षों से जमी जड़ों के अवशेषों से हफ्तों बाद भी उसका जीवन रस पानी… अब तक रिस रहा था. मुझे लग रहा था… जैसे यह घर मेरा नहीं है. इस घर में मेंरेपन की पहचान.. मेरा बचपन का साथी, यह पेड़ ही तो था. लगता है अब कोई साथी, कोई पहचान नहीं है यहाँ पर. मिट्टी की दीवारें, वह बचपन की मेरी कोठरी, अम्मा, दादी, दादा सभी तो एक एक करके साथ छोड़ते चले गये थे. किन्तु यह पेड़.. यह मरा तो नहीं था. मेरी अन्तिम सांस तक वह मेरी हर छुट्टी का इन्तजार करता रहेगा, मैं जानता था. परन्तु नयी पीढ़ी क़ो तो अपनी पसन्द का हाल बनवाने के लिये उसी भूमि की आवश्यकता थी जहाँ यह अभागा पेड़ था.

अपनी जरूरतों के लिये नीम को बेदखल कर दिया गया. उसका अपराध क्या था. गली कूचे फुटपाथ और शमसान तक की भूमि पर कब्जा करने वाले मनुष्य उसे बेदखल करने वाले से मुआवजा माँगते हैं. किन्तु आज उसी सभ्य समाज में नीम के पेड़ क़ो अपनी जरूरत के लिये उसकी भूमि से हटा दिया गया…. हटा दिया …. नहीं नहीं काट दिया. क्या यह उसकी हत्या नहीं. कहीं कोई सुनवाई नहीं. पैतृक अधिकार की दुहाई देने वाले समाज में पेड़ पौधों को लगानें सींचने वाले पुरखों को क्या इस बात की वसीयत करनी पड़ेगी कि उनके बाद उनके लगाये पेड़ पौधों की रक्षा की जिम्मेदारी उनकी सम्म्पत्ति पाने वाले की होगी. अपने बच्चों के साथ साथ मानव पेड़ पौधों को भी क्या बच्चों की तरह नहीं पालता है.

वो झूले, वो सरसराती हवा के साथ झूम झूमकर बातें, कुछ भी आकृष्ट न कर सका, किसी को भी. हा रे मानव! कहीं कोई कृतज्ञता नहीं. मेरा अन्तिम साथी भी चला गया. आखिर मनुष्य की भाँति पेड़ पौधों को पूरा जीवन जीने का अधिकार क्यों नहीं?

लगता है मेरा सारा शरीर शिथिल होता जा रहा है. क्या मेरे शिथिल शरीर को अपनी जरूरतों के आड़े आने पर ये लोग मुझे भी अपने रास्ते से हटा देंगे. नीम की जड़ों से निकलने वाला पानी उसके ऑंसू थे. शायद उसने अपने अन्तिम क्षणों में मुझे याद किया होगा कि मैं उसके बचपन का साथी काश उसकी रक्षा कर सकता. किन्तु ऐसा न हुआ. मैं उसके प्रति अपने कतृव्य का निर्वहन न कर सका. हृदय विदीर्ण हो गया है ऑंखों में ऑंसू अब रूक नहीं पाते हैं. मेरा साथी मेरा चिर मित्र चला गया. लगता है कोई मुझे झकझोर रहा है.

‘अरे उठोगे नहीं क्या’ पत्नी की आवाज से मैं जाग जाता हूं. वह चाय का प्याला पास की टेबल पर रखती है. मैं जागकर उठ जाता हूँ. लगता है मेरी ऑख की कोरों से तकिया गीला हो गया है.

‘आज आफिस नहीं जाना है?’ वह शेविंग का सामान टेबल पर रखते हुये फिर पूछती है.

‘आज शाम हम गाँव जा रहे हैं. तुम तैयारी कर लेना’ मैं उसकी बात को अनसुना करते हुये अपनी बात कहता हूँ.

‘कोई भयानक सपना देखा है? उसका ध्यान मेरी ऑंखों की गीली कोरों पर जाता है.

अचानक निर्णय से वह मुझे ताकती रह जाती है. किन्तु मैं जानता हूँ कि मुझे गाँव जाकर नीम के पेड़ क़ी रक्षा के लिये स्थायी व्यवस्था करनी है. मैं जानता हँ कि मेरे अपने घर में मेरा अस्तित्व उस पेड क़े होने से ही है. मैं चाहता हूँ कि एक दिन मैं भी अपने पिता की भाँति अपने चिर मित्र की छांव में शान्ति के साथ सो सकूं. यदि मैं शीघ्र ऐसा न कर सका तो एक दिन मेरा अस्तित्व भी नहीं रहेगा.

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