झरते हरसिंगार …. [नवगीत] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

उजसित शैशव जीवन सुरभित 
हुलसित मन आगार 
शेफाली शाखों सा झूमे 
झरते हरसिंगार 


मलयानिल सुरभित नासाग्रा 
होंठ वसन्ती कोंपल 
पल पल पुलकित स्पर्शों से 
हस्त पाद मृदु कोमल 
मृदुल मोहिनी शिशु किलकारी 
वारी सब संसार 


अखिल विश्व में नूतन अभिनव 
ईश स्वयं धर रूप सलोना 
डगमग धरता पग धरती पर 
मानवता का भूप खिलौना 
राग द्वेष से मुक्त स्नेह ही 
जीवन का आधार
©तृषा’कान्त’

वावरे ..! किस चाह में ….. [ गीत ] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

जीव जीवन पथ अकेला 
आदि से जग राह में 
क्यों फिरे उद्विग्न अंतस  
वावरे ..! किस चाह में 

नगर में मेले मिले तो 
भीड़ भी पुरशोर है 
डगर पथरीली कठिन भी 
मनुज मन कमजोर है 
बह गया बहुधा लहर से 
तुमुल करतल वाह में 
वावरे ..! किस चाह में 

कालिमा कुत्सित तमस की 
हाय मानव छल गयी 
मोह माया रज्जु बन्दी 
सकल उर्जा जल गयी 
डोर अब अव्यक्त खींचे 
ढोर बांधे रज्जु से 
छूटते सब संग साथी 
दिव्य आभा पुंज से 
अहा अब अभिसिक्त यौवन 
अलौकिक किस राह में 
वावरे..! किस चाह में 
©तृषा’कान्त’

सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है …… [कविता] – अमिता मिश्र ‘नीर’

 सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है
अपना ऑंचल फहराती है
केसरी जलधि नभ नील बना
मेरे मन की नैया जिसमें
क्यूं थिरक थिरक रह जाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

चलने का अन्त नहीं होता
फिर भी चलना पडता हमको
सुख दुख है इस जग की छाया
हमको तो यही बताती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

कितने ही जीवन के पथ में
हरिताभ मरूस्थल भी आये
सूरज डूब गया लेकिन
चन्द्रोदय की कुछ आस नहीं
लो पीडा कण बरसाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

कल्पना कुसुम क्या ‘नीर’ हुये
हैं सत्य कभी मन उपवन के
कुछ यक्ष प्रश्न इस जीवन में
युग युग से छोडे ज़ाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है
अपना ऑंचल फहराती है
©तृषा’कान्त’

सखी री ! देखो आया वसन्त… [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

सखी री !
देखो आया वसन्त
बौराई पछुआ को लेकर
मदमाती अँगड़ाई लेकर
तन-मन टूटे मदमस्त अंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

वन-वन खिलता द्रुम वनांगार
बासंती आहट ले फुहार
सेमल, टेसू कोयल पुकार
चित-चोर नयन हिय में अनंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

यौवन चंचल काया झूमें
अद्वैत बने प्रिय संग घूमें
कुसुमित उपवन
सब जड़ चेतन
हर्षित मन है उर में उमंग
सखी री !
देखो आया वसन्त
©तृषा’कान्त’

प्रणमामि शारदे् प्रणमामि ..[कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त

प्रणमामि शारदे् प्रणमामि
प्रणमामि शारदे् प्रणमामि
हे! आर्यावृत हे! भरत् पुत्र
हे! बाल्मीकि हे! कालिदास
प्रणमामि मनीषं प्रणमामि
 प्रणमामि ताण्डव सिंहनाद
प्रणमामि महाकाली निनाद

प्रणमामि शारदे् सप्तनाद
प्रणमामि काव्यरस सिन्धुनाद
प्रणमामि भरत् भू परम्परा
ॠषियों की पावन महाधरा
षट्ॠतुओं ने पाँखें खोलीं
मेघों ने अद्भुत रूप धरा
प्रणमामि प्रेरणे! प्रकृतिदेव्
तन्त्री के तार छेडते हो
‘सम्मोहित’ सिन्धु मनीषा से
हे! शारदेय शत् शत् प्रणाम
प्रणमामि मनीषं प्रणमामि
©तृषा’कान्त’

यह देश मेरा जल रहा .. [कविता] – श्रीकान्त ,मिश्र ’कान्त’

आतंक के अंगार बरसे
आज अम्बर जल रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

भ्रमित अरि के हाथ में
कुछ सुत हमारे खेलते हैं
घात कर के मातृभू संग
जो अधम धन तौलते हैं
आज उन सबके लिये
न्याय का प्रतिकार दो
विहंसता है कुटिल जो
अब युद्द में ललकार दो

नीर आंखों का हुआ है व्यर्थ सब
और अब तो क्षीर शोणित बन रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

आग यह किसने लगायी
क्यों लगायी किस तरह
राष्ट्र के सम्मुख खड़े हैं
कुछ यक्ष प्रश्न इस तरह
किस युधिष्ठिर की चाह में
राष्ट्र के पाण्डव पड़े हैं
प्रतीक्षा में कृष्ण की हम
मूक जैसे क्यों खड़े हैं

आतंक की हर राह में
सैनिक हमारा छल रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा

कुटिल अरि ललकारता है
मातृभू हुंकारती है
महाकौशल के लिये
फिर जन्मभू पुकारती है
उठो जागो ….
सत्यसिंधु सजीव मानस
कर गहो गाण्डीव
फिर से बनो तापस

रक्त अब राणा शिवा का
युव धमनि में जल रहा
शीष लेकर हाथ में हर
‘कान्त’ युगपथ चल रहा
त्रस्त घर उसका नहीं
यह देश मेरा जल रहा
©तृषा’कान्त’

स्वागत हे नववर्ष … [नवगीत] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’


उर उमंग की किरण संजोये
ऊषा से आशा ले आया
कोहरे की चादर में सिमटा
द्वारे यह नववर्ष
स्वागत हे नववर्ष

शीतल सूरज की आहट से
अम्बर पनघट नींद उनींदी
रजनी तम आलस तजती है
भोर किरण से हर्ष
स्वागत हे नववर्ष

काल चक्र पर कुछ हिचकोले
सहमे जीवन मन भी डोले
विगत विचार पुष्प बीने हैं
अभिनव से उत्कर्ष
स्वागत हे नववर्ष

आगत की आशा में भूले
उत्साहित मानव मन झूले
विगत विदा सर्वदा हुआ है
अद्भुत ये निष्कर्ष
स्वागत हे नववर्ष
©तृषा’कान्त’

Previous Older Entries