दो जीवन समान्तर … [स्वर कथा] – श्रीकान्त मिश्र कान्त

©तृषा’कान्त’

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सूखा घाट …….. [कविता एवं स्वर] श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

कवि के स्वर में सुने

सूखा घाट
और तालाब
पत्ते पीपल के
सूख चुके हैं सारे
’बरमबाबा’ की डालें
हिलती हैं जब हवा से,
सुनायी देती है मुझे
रुनझुन ….
तुम्हारी नयी पायल की आवाज
अब भी ….
खड़कते हुये पत्तों में

कैथे का पेड़
अब हो गया है
बहुत बड़ा,
सींचा था जिसे अक्सर
कलश की बची बूंदों से
तुमने …..
हर जेठ की तपती दोपहर को

’शिव जी महाराज’ ..
बच्चों से कभी
होते नहीं नाराज
यही तो कहते थे
हर बार ….

सामने की पगडंडी
खो जाती है अब भी
इक्का दुक्का पलाश,
और ‘ललटेना’’ की झाड़ियों में
आधुनिकता के प्रतीक
‘लिप्टस’ के जंगलों में

देखता हूँ अदृश्य पटल पर
तुम्हारी …
पलाश के दोनों में
करौंदे के प्रसाद वाली
दोपहर की दावत को
बरमबाबा का …
लबालब भरा तालाब
चहचहाती चिडियाँ
हरा भरा जंगल
अंकुरित आम की गुठलियाँ
और उन्हें यहाँ वहां गाड़ते
एक साथ हमारे नन्हे हाथ
अपने नाम को
अक्षुण करने की चाह में

बड़े हो चुके हैं अब आम
फल आते हैं इन पर
हर साल…..
बँटवारे मारकाट
और वलवे के

ढूंढ़ रहा हूँ
वर्षों बाद आज फिर
अस्ताचल से उठती
गोधूलि के परिदृश्य में
अपने विलोपित खेत खलिहान
और उसमें से झांकता
स्नेहिल आँखों से लबालब
ग्रामदेवी सा दमकता
तुम्हारा चेहरा …
जो खो गया है शायद
बीते युग के साथ
इसी सूखे तालाब के
वाष्पित जल की तरह
©तृषा’कान्त’

गीता पण्डित के साथ बातचीत……. [स्वर-साक्षात्कार] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

 नहीं लिखती हूं तो मेरे शब्द मुझे आहत करते हैं, इसलिये लिखना मेरी मजबूरी है। ऐसा विचार है कवियत्री गीता पण्डित का। कवि पिता स्व० मदनमोहन शलभ की पुत्री अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर तथा विपणन में एम बी ए शिक्षित गीता जी के प्रथम काव्य संग्रह मन तुम हरी दूब रहना की समीक्षा आप साहित्यशिल्पी पर पुस्तक चर्चा स्तम्भ के अंतर्गत पढ़ चुके हैं|
आज के सामाजिक अवमूल्यन, टूटते परिवार , बिखरते रिश्ते , प्रकृति से अंधाधुंध छेड़छाड़ , नैतिक मूल्यों में गिरावट , बदलती बेकाबू सोच , बाजारवादी गलाकाट प्रति स्पर्धा जैसे तमाम दबावों के बीच जहां पर कोमल कान्त भावनायें मन के भीतरी कोने में दुबकने को विवश हैं वहीं पर इन विषम परिस्थितियों के चलते समकालीन कविता में विचारों सरोकारों की प्रमुखता भी बढ़ गई है और भावनाओं को निजी मान लिया गया है। ऐसे में गीता पंडित की कवितायें शुष्क विचारों से कहीं अधिक भावनाओं की शीतल बयार हैं |

     प्रस्तुत है एक साहित्यकार तथा एक नारी के रूप में गीता जी से श्रीकान्त मिश्र कान्तकी बातचीत का संक्षिप्त आलेख। आप प्रश्न से सम्बन्धित पूरी बातचीत संलग्न प्लेयर से सुन भी सकते हैं। [निर्बाध बातचीत सुनने के लिये कृपया प्लेयर में बफर होने की प्रतीक्षा कर लें ]

01  ’कान्त’: गीता जी ! सबसे पहले आपके प्रथम काव्य संग्रह मन तुम हरी दूब रहना के प्रकाशन के लिये बहुत बहुत बधाई।
गीता पण्डित : आभार आपका … ….
(पूरी बात सुनें)

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02  कान्त’:  कबसे आरम्भ किया तथा इसकी प्रेरणा कैसे मिली सबसे पहली बार कब लिखा। 
गीता पण्डित : बचपन में  पापा से प्रेरणा मिली इसका परिणाम हुआ कि मैं अपनी पढ़ने वाली कापियों के पीछे लिखने लगी। बस वहीं से आरम्भ हुआ। फिर विवाह के उपरान्त एक चिड़िया के घोसले ने पूरी स्थिति ही बदल दी ……. बाद में पहली कविता के नाम पर यदि कहें तो आरकुट पर पापा को समर्पित एक कविता है …..
(पूरी बात सुनें)

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03  कान्त’:  पहले काव्य संग्रह का नाम मन तुम हरी दूब रहना इसके पीछे आपकी सोच।

गीता पण्डित :  मैं बहुत समय से स्त्री पर लिखना चाहती थी। स्त्री पर जो भी होता रहा है वह सब मुझे अन्दर तक उद्वेलित करता है। निम्न से लेकर तक उच्च वर्ग तक स्त्री किसी न किसी रूप में प्रताड़ित होती रही है। औरत तो प्रेम है … वह जीवन देती है फिर उसके साथ यह सब क्यों …….. 
(पूरी बात सुनें)

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04  कान्त’:  जन्म लेने के बाद से कन्या बेटी पत्नी एवं प्रेमिका और बाद में मां, नारी को भारतीय समाज में सैद्धांतिक रूप से सर्वाधिक मान्य माना जाता रहा है किन्तु साहित्यिक धरातल पर  ….. मात्र शोषित और त्याग करने वाली के रूप में निरूपित किया गया है। साहित्यकार के नाते  आपके विचार …

गीता पण्डित :  नारी धरणी कहलाती है। त्याग करना उसके स्वभाव में है। लेकिन आज की स्त्री जीना चाहती है … आज वह अबला रह्कर नहीं जीना चाहती …. आज वह चाहती है कि उसका अपना अस्तित्व हो ….

(पूरी बात सुनें)


05  कान्त’:  अस्तित्व के साथ जुड़ा हुआ एक पश्न ….. क्या ऐसा नहीं लगता कि अस्तित्व के नाम पर आज महिलाओं ने एक वर्ग संघर्ष खड़ा कर लिया है। वे भारतीय परिप्रेक्ष्य से भटक सी गयी हैं। 

गीता पण्डित :  आप सही कह रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है लेकिन इस सबसे अलग हटना होगा अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिये हमें यह तो देखना होगा कि हम किस रास्ते पर चल रहे हैं। भारतीय संस्कृति तो हमारे अन्दर रची बसी है …..  हमें स्त्री की मर्यादा को रखते हुये अपने अस्तित्व को बनाना है……….
(पूरी बात सुनें)


06  कान्त’:  गीता जी साहित्य का सम्बन्ध मानवीय संवेदनाओं और भावनाओं से होता है। भाषा मात्र माध्यम होती है …….. आपने अंग्रेजी साहित्य से स्नातकोत्तर किया है फिर भी साहित्य के लिये अंग्रेजी के स्थान पर हिंदी को माध्यम क्यों चुना।


गीता पण्डित :  हिन्दी हमारी अपनी मातृ भाषा है। …. पापा कवि थे ……. हिन्दी मुझे घुट्टी में पिलायी गयी है 
(पूरी बात सुनें)



07  कान्त’:  आपको ऐसा नहीं लगा कि अंग्रेजी के साथ अभिजात्यता जुड़ी हुयी है…. कभी ऐसा विचार मन में नहीं आया …
गीता पण्डित :  नहीं कभी ऐसा विचार नहीं आया। अपनी भाषा से ही मैं हर व्यक्ति के मन तक पहुंच सकती हूं। मेरा उद्देश्य ही यही है …..

(पूरी बात सुनें)


08   कान्त’:  आपके पति प्रवीण जी भी अच्छा लेखन करते हैं। कभी व्यक्तिगत जीवन मे दो रचनाकारों के बीच का अहं ………
गीता पण्डित :    यह सम्भव है किन्तु हम दोनों के बीच कभी ऐसा नहीं हुआ … प्रवीण जी बहुत ही सुलझे हुये 
व्यक्तित्व हैं। वह स्वयं भी मेरी बहुत सहायता करते हैं ……….

(पूरी बात सुनें)


09  कान्त’:  चलते चलते …. हमने आनलाइन ब्लाग्स और इनकी भीड़ के बीच इ-साहित्यपत्रिका साहित्यशिल्पी के रूप में एक प्रयोग किया। इसके बारे में आपके सुझाव और विचार… 
गीता पण्डित :  साहित्यशिल्पी को मैं पसन्द करती हूं यह हिन्दी के लिये निष्पक्ष रूप से काम कर रही है …… मुझे इसपर लिखना इसको पढ़ना अच्छा लगता है।

(पूरी बात सुनें)


10  कान्त’:  आपकी कोई दूसरी पुस्तक या कृति आने वाली है ……
गीता पण्डित :  हां जी … दूसरी मेरी प्रकाशित होने वाली है उसका नाम है मौन पलों का स्पन्दन…..

(पूरी बात सुनें)


11  कान्त’:  बहुत अच्छा लगा आपसे बात करके। हमारे पाठक भी आपके विचार जानकर प्रसन्न होंगे 
गीता पण्डित :  ………. मेरी दो लघुकथा स्त्री विषय पर ही हैं। मेरा पूरा ध्यान स्त्री पर ही जाता है …..  स्त्री ही मेरा विषय रहे ऐसी प्रार्थना आप सब हमारे लिये  करें।  कि मैं स्त्री के ऊपर ……….
कान्त’:   आपकी आगामी पुस्तक के लिये शुभकामनायें ……आपका लेखन इसी प्रकार निरन्तर रहे …… शिल्पी से वार्ता के लिये आपका बहुत बहुत आभार

(पूरी बात सुनें)

मुखौटे …… [कविता एवं स्वर] – श्रीकान्त मिश्र ‘कान्त’

घण्टनाद ..

शंखध्वनि.. आरती
एक कतार
दो कतार….
११०१ की कतार..
११००१ की कतार
विशिष्ट कतार….
वी वी आई पी कतार
एक कुण्ड ….
दो .. तीन….
…. एक्कीसवां कुण्ड
गीले वस्त्र
गर्भगृह परिक्रमा
विग्रह दर्शन
धक्कामुक्की
रेलमपेला….
पंक्तिबद्ध यौवन
नयनबन्द …
सम्पूर्ण समर्पण
टटोलती दृष्टि,
परम्परागत पुजारी
हुंह …. !
एक मुखौटा

अजान
एक शोर
फिर कतार
वजू तकरीर
हंसते चेहरे
नये कपड़े
रंगबिरंगी टोपी
खिलखिलाते बच्चे
सेवैयां
ईदी और बच्चियां
गले मिलते लोग
हंसी खुशी,
और बस …
एक विस्फोट
हाहाकार …
बिखरा खून
चीथड़े अंग
कौम खतरे में, जिहाद
आह… !
फिर एक मुखौटा

नीरव .. शान्ति
गूंज घण्टे की
सेवा.. प्रेम सन्देश
भाईचारा.. श्वेत वस्त्र
कन्फेशन …
प्रभु लेता है …
सारे पाप अपने ऊपर
और तुम पापमुक्त ..
भावनात्मक शोषण,
फिर एक नया पाप
झूलता पालना .. धर्मप्रसार
यह भी …. !
बस एक मुखौटा

मुखौटे अभी और भी हैं
मुखौटे ही मुखौटे …
इन्हें उतारने के प्रयास में
स्वयं को पहचानने के प्रयास में
हां नोंचने लगा हूं
मैं अपना चेहरा

शब्द ……. [कविता एवं स्वर] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

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शब्द लिफाफे हैं
खोल कर पढ़ो
छोड़कर नाव को,
घाट से आगे बढो,
कोष शब्दों का
पुराना है बहुत,
भावना और मनुज का
नाता पुराना है बहुत,
नाद से आकार तक,
युग यात्री हैं शब्द,
नयन और नेह की
अभिव्यक्ति हैं ये शब्द,
आज भाषा युध्द से
घायल हुये हैं शब्द,
शब्द ने जोडा सभी को
स्वयं टूटे शब्द,

भावना और भाव से
हैं दूर क्यों अब शब्द,
झाँको नयन में भावना
अब मत रहो स्तब्ध
‘कान्त’ शब्दाभाव अब तक
नये शब्दों को गढो
अर्थ समझो भावना से
शब्द लेकर मत लड़ो
हो सके तो आज से ऑंखे पढो
शब्द लिफाफे हैं खोलकर पढो,
 

सूरज हर दिन निकलता है …. [कविता एवं स्वर] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

सूरज निकलता है

हर सुबह …..
सर्द पसरी रेत पर
टीलों के पीछे से
लेने अर्ध्य, आस्था..
सुनने.. जय जयकार..
हो सप्ताश्व रथ पर सवार
दौड़ाता है श्रमित अश्वों को
तप्त शरीर, लोकहित धीर


बालू पर घरौंदों में
घर नहीं बसते
लगता है बस मेला
और…
मेले की भीड़ में
परिवार नहीं बनते
मिलते हैं…. बस
अस्ताचल पर विछड़ने के लिये

ईश्वर और प्यार …
दोनों ही अस्तित्वहीन
किन्तु चलते हैं,
किसी मुद्रा की भांति
ईश्वर ……
आस्था का व्यापार
और प्यार……
रिश्तों के सांचों में…
स्वार्थ का आधार

गोधूलि में ……
मुंह फेर लेते हैं
घर वापस लौटते
पशु पक्षी… जन, गण….
अस्त होते सूरज से
वापस लौटता है
फिर भी वह,
हर शाम…. झोंपड़े में …
चूल्हे की आग और
टिमटिमाती रोशनी के लिये..

हर घर में एक सूरज होता है
और सूरज हर दिन निकलता है

देश के सिस्टम पर प्रहार करता नाटक ‘फुटबाल के बराबर अंडा’ .. [नाटक ] – वीडिओ संपादन एवं प्रस्तुति श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’


चंडीगढ़। बेशक देश में लोकतांत्रिक प्रणाली है, लेकिन आम जनता क्या आजादी से अपने बारे में सोच सोचती है। क्या लोग आजादी से काम कर सकते हैं। इंसाफ पाने के इंतजार में आम आदमी मौत के द्वार तक पहुंच जाता है,लेकिन इंसाफ नहीं मिल पाता। इस सबके बावजूद आम जनता इसी सिस्टम का पालन करने को मजबूर है और मिलकर इस सिस्टम के खिलाफ आवाज नहीं उठाती।देश के सिस्टम पर प्रहार करता नाटक फुटबाल के बराबर अंडासेक्टर-17 स्थित आईटीएफटी की बेसमेंट के मंच पर पेश किया आईटीएफटी के कलाकारों ने। नाटक की कहानी में पुलिस तंत्र में फैले भ्रष्टाचार पर कटाक्ष किया गया।

अपराजिता एवं जगमीत पत्रकार तथा एसएचओ की भूमिका में
एसएचओ बेनीवाल अपने नए स्टेशन में आकर उस समय परेशान हो जाता है जब उसे पता चलता है कि उस थाना क्षेत्र में कोई चोरी या अन्य अपराध नहीं होता। वह अपने हवलदारों के माध्यम से डकैतों तक यह संदेश पहुंचाता है कि वे बेफिक्र होकर उसके क्षेत्र में अपनी गतिविधियां चला सकते हैं। इतना ही नहीं, वह हवलदार से किसी भी व्यक्ति को पकड़ लाने का आदेश देता है तो हवलदार एक तमाशा दिखाने वाले को पकड़ लाता है। एसएचओ तमाशे वाले की बुरी तरह पिटाई करवाता है जिस पर तमाशे वाले उसके खिलाफ कोर्ट में केस कर देता है। लेकिन 30 साल तक इंतजार के बाद भी उसे इंसाफ नहीं मिल पाता और अंत में इंसाफ मिलने की उम्मीद लिए ही उसकी मौत हो जाती है। तमाशे वाले का किरदार निभाने वाले अंश ने दर्शकों के दिल पर अमिट छाप छोड़ तो अन्य पात्रों एसएचओ बने जगमीत, पत्रकार बनी अपराजिता, हवलदार बने नम्रता और अमन ने भी अपने-अपने पात्रों के साथ बखूबी न्याय किया। नाटक का लेखन और निर्देश चक्रेश कुमार का था ।


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