सखी री ! देखो आया वसन्त… [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

सखी री !
देखो आया वसन्त
बौराई पछुआ को लेकर
मदमाती अँगड़ाई लेकर
तन-मन टूटे मदमस्त अंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

वन-वन खिलता द्रुम वनांगार
बासंती आहट ले फुहार
सेमल, टेसू कोयल पुकार
चित-चोर नयन हिय में अनंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

यौवन चंचल काया झूमें
अद्वैत बने प्रिय संग घूमें
कुसुमित उपवन
सब जड़ चेतन
हर्षित मन है उर में उमंग
सखी री !
देखो आया वसन्त
©तृषा’कान्त’

Advertisements

होली आयी रे….. [होली विशेष कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

होली आयी रे
होली आयी रे
मदमाती पुरवा के झोंके
टेसू के रंगों को लेके
हरियाली में पवन वसन्ती
लेके आयी रे
होली आयी रे
लाल हरा बैंगनी वसन्ती
धूर अबीर भंग की मस्ती
मदमाते मस्तों की टोली
लेके आयी रे
होली आयी रे

सुख दुख बांटे मिलकर आयें

रंग अबीर गुलाल लगायें
सब लोगों को एक बनायें
ये संदेशा
लेके आयी रे
होली आयी रे

कहां है दीन और इस्लाम …. हे राम.! [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

बाशिद चाचा ……
कहां हो तुम,
तुम्हारे ……
पंडी जी का बेटा
तुम्हारा दुलारा मुन्ना
हास्पिटल के वार्ड से
अपनी विस्फोट से
चीथड़े हुयी टांग
अंत:स्रावित अंतड़ियों की पीड़ा ले
डाक्टरों की हड़्ताल
और दवा के अभाव में तड़पती,
वीभत्स हो चुके चेहरे वाली
मुनियां की दहलाती चीखों और
परिजनों के हाहाकार के बीच
तंद्रावेशी देखता है बार बार
तुम्हारे पन्डीजी… और तुमको 


शायद अब भी मनाते होंगे
होली और ईद साथ साथ
ज़न्नत या स्वर्ग में जो भी हो
खाते हुये सेवैयां और …..
पीते हुये शिव जी का प्रसाद भंग
होली की उमंग और ठहाकों के संग
टूटती … उखड़ती जीवन की
नि:शेष श्‍वासों के बीच
छोटे से मुझको लेने होड़ में
मेरा ललाआपस में जूझते
शरीफ़ुल और इकबाल भैया
हिज़ाब के पीछे से झांकती
भाभीजान का टुकटुक मुझे ताकना
और अचानक मुझे लेकर भागना
इंजेक्शन का दर्द
चच्ची के मुन्ने को अब नहीं डराता है
विस्फोट की आवाज के बाद से,
टी वी पर देखा …. वो अकरम,
मेरा प्यारा भतीजा …….
मारा गया किसी एन्काउंटर में
….. कहां खो गया सब
औरतों को ले जाते हुये 
लहड़ू में…. पूजा के लिये 
हाज़ी सा दमकता… 
वो तुम्हारा चेहरा
मंदिर पर भज़नों के बीच
ढोलक पर मगन चच्ची


छीन लिये हैं आज…  
वोट वालों ने हमसे हमारे बच्चे…
और भर दिये हैं उनकी मुठ्ठी में
नफ़रत के बीज
कहां है दीन और इस्लाम
हे राम……..! 

होली के रंग और उमंग भरे पर्व की हार्दिक शुभकामना !

सुधी मित्रो ! 

होली के रंग और उमंग भरे पर्व की हार्दिक शुभकामना ! 

रंग और भंग दोनों में ध्वनि साम्य अवश्य है किन्तु आज के दिन भंग के कारण रंग में भंग नहीं होता है अपितु उमंग का साथ मिलता है. सो सभी माननीय और ज्ञाननीय मित्रों को उमंग भरे स्नेह और अभिवादन के साथ यही है कि

नीम सभी पीले हुए त्यागे कड़वे ढंग
सेमल पत्ते त्याग के है मौसम से दंग 
टेसू कानन देख के पीपल हो गया नंग 
बौराई सब मंजरी होली के हुड़दंग
………….. 
गोरी सब पूछे लगीं क्यों टूटे सखि अंग 

पुनः सप्रेम शुभकामना