राम मिथ या इतिहास…भाग – 4 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(4) इतिहासोपयोगी रामकथा
राम से संबंधित सामग्री का प्रमाणिक ग्रंथ है रामायण। जिसके कृतित्व का श्रेय ’वाल्मीकि’ को दिया जाता है। जैसा कि विगत अंको में मैने ’रामायण’ के साक्ष्य के आधार पर कहा है कि रामायण संहिता है जिसका अभिप्राय है कि मूलकथा को समय-समय पर विस्तार दिया गया। डॉ0 फादर कामिल बुल्के जैसे ’रामकथा’ के प्रसिद्ध शोधकर्ता रामायण के बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को प्रामणिक साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए उन्हें प्रक्षिप्त मानते हैं। डॉ0 बुल्के को आधार मानते हुए यदि सप्तखण्डीय प्रचलित रामायण में महीनतम् छलनी लगाकर ’’ऐतिहासिकता’’ के अनुसंधान हेतु ’रामकथा’ को शब्दो, आनुवांशिक कथाओं एवं अलंकारादि से रहित कर तलाश किया जाए तो ’रामकथा’ कुछ इस प्रकार कही जा सकती है।
संक्षिप्त ’’रामकहानी’’
श्री बुल्के के शोध प्रबन्ध के आधार पर प्राप्त तथ्यों के निचोड़ से जो रामकथा बनती है और हम जिसको राम एवं उनके समकालिकों की खोज में प्रयोग करने वाले हैं वह इस प्रकार है –
ऋग्वेद में ’राम’ दशरथ और इक्ष्वाकु का उल्लेख मिलता है। मिश्र के शासक रोमेसिस एवं मध्य एशिया की आर्य जाति ’मितान्नि’ में दशरथ नामक राजा का उल्लेख मिलता है। इन दोनों का काल 1300 से 1400 ई0सदी पूर्व श्री बुल्के मानते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कहानी यों कही जा सकती है कि इक्ष्वाकु के वंश में दशरथ पुत्र राम का (1300-1400 ई0सदीपू0) जन्म हुआ। राम पिता की आज्ञा से अनुज लक्ष्मण एवं पत्नी सीता सहित 14 वर्षों के लिए वन चले गए। वन में पत्नी सीता का त्रैलोक्यजयी, महान विजेता, राक्षस राज रावण के द्वारा अपहरण कर लिया गया। राम ने वानर, गृद्ध, ऋक्ष आदि कबीलाई शासकों/समूहों के सहयोग से रावण का उसकी समस्त सेना के सेनापतियों, भाई बान्धवों सहित वध करके उसके ही भाई विभीषण को लंका का राज्य हस्तगत करवा दिया।
इतनी सी कथा का आलंकारिक विस्तार रामायण में है जिसमें ऐतिहासिक तथ्यों की गवेषणा कर राम का ऐतिहासिक कालक्रम निर्धारित करना है। यह कार्य समुद्र से एक सच्चा मोती तलाश करने जैसा दुरूह कार्य है। हम कामिल बुल्के के तथ्यों को प्रथम दृष्ट्या अमान्य करते हैं। श्री बुल्के के काल निर्धारण को इसलिए स्वीकार नही किया जा सकता क्योंकि उनका शोध, रामकथा की ऐतिहासिकता की तलाश है। न कि राम रावण युद्ध के घटनाक्रम के ऐतिहासिकता की। ’रामकथा’ के पात्रों के नाम जहां तक प्राप्त हुए हैं श्री बुल्के उस कालखण्ड तक पहुंचे हैं किंतु रामायण में वर्णित तथ्यों पर उन्होने कोई भी अनुसंधानात्मक दृष्टि नही डाली है। अतः उनका मत (1300-1400 ई0 सदी पू0) अस्वीकार्य किए जाने के योग्य है।
©तृषा’कान्त’

राम मिथ या इतिहास…भाग – 3 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(3) अश्व बनाम गदहा ?
विकीपीडिया इनसाइक्लोपीडिया हमें जानकारी देता है कि गधे लगभग 5000 वर्ष से 4000 वर्ष में इजिप्ट या मेसोपोटामिया में पालतू बनाये गये और फिर वहां से सारे संसार में फैल गये। ’गदहा’ अश्व परिवार का पालतू जानवर है। घोड़े को संभवतः 3000 वर्ष से 4000 वर्ष में पालतू बनाया गया।

(Horse – Introduction – Nature – October /  November – 2008 & June – 2010) (www.pbs.org.wnte/ nature/ episode/ horses/ introduction equine evoluation – The history of the horses and pony – By Kate Hinton Equus – Cabalus)
लगभग 55 मिीलयन वर्ष पूर्व एक छोटा प्राणी था जिसे Hyracotherium कहा जाता था। इसका आकार लगभग Terrier की तरह था और सारे समय इसका विकास घोड़े की तरह होता रहा। लगभग 5 मिलियन वर्ष पूर्व Equus का विकास Dino hippus के संबंधी वर्ग की तरह हो गया था। Equus का आकार मध्यम आकार के गदहे की तरह था। Equus उत्तरी अमेरिका के जंगलो से संभवतः आए थे। फासिल्स विशेषज्ञों द्वारा इसे नाम दिया Eohippus – the dawn horse प्रारम्भिक घोड़ा। लगभग 10000 ईसा पूर्व इस तरह के Dawn horses दूसरे प्राणियों जैसे मैमथ की भांति विलुप्त हो गए। निश्चित रूप से इनकी विलुप्ति का कारण बता पाना मुश्किल है। संभवतः पर्यावरणीय परिवर्तन एवं मानव द्वारा किए जाने वाले शिकार के कारण इनका लोप हो गया होगा। रामायण में वर्णित घटनाक्रम के काल निर्धारण में हमें उपरोक्त तथ्यों से कुछ सहायता प्राप्त हो सकती है। Terrier का विकास अब तक Dawn horses की तरह हो चुका था और इसकी प्रजाति अब प्रायः लुप्तप्राय थी। अतः राजाओं के उपयोग के लायक ही बची थी। एक बात और है कि इसके आकार के कारण इसे प्रायः ’खर’ ही कहा जाता था। किंतु इसकी विकसित नस्ल को कुछ लोग तुरंग (तुर+गम्+ खच+ मुम्) कहने लगे थे। अतः Terrier Dawn horses को ’खर’/तुरंग मान सकते है। ’तुर’ उपसर्ग गम् धातु के गमनार्थक अर्थ को गति प्रदान करता है। तुर्+गम्+खच्+मुम्, तुर-तुरेण वेगेन उदाहरण – तुरग खुर हतस्तथा रेणुः (अभि0शाकु0/कालिदास 1/28) लेकिन यह गतिशीलता आधुनिक अश्व की तरह तो निश्चय ही नही रही होगी। यदि हम उपरोक्त तथ्य पर सहमत हों कि रावण के रथ में अरण्यकाण्ड में जुतने वाला ’खर’ और युद्धकाण्ड में रथवाहक बनने वाला ’’तुरंगम’’ वस्तुतः एक ही है और वह है Terrier का वशंज Dawn horses जो कि उस समय अपनी अन्तिम् पीढ़ी के द्वारा रावण को अपनी सेवा दे रहा है तो हम राम अथवा रावण के स्थितिकाल को 10000 ई0पू0 की एक सीमा रेखा के अन्दर रख सकते हैं।(….अनवरत्)

©तृषा’कान्त’ 
(नोट:- तृषाकान्त की ओर हम यह अनुरोध करेंगे की कृपया तथ्य एवं विचारपूर्ण असहमति से अवगत कराएं ताकि एक प्रभावी शोध में सहायता प्राप्त हो) 

राम मिथ या इतिहास…भाग -2 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(2) अश्व बनाम गदहा
रामायण में युद्ध काण्ड तक घोड़ों का उल्लेख पाया तो अवश्य जाता है किंतु अश्व और अश्वारोंहियों की जैसी विशेषताओं से ऋग्वेद हमें परिचित कराता है, रामायण उसके लेशमात्र का भी स्पर्श नहीं कर पाती। इस संबंध में प्रस्तुत आलोचना में रामायण के बालकाण्ड एवं उत्तरकाण्ड को सम्मिलित नहीं किया गया है क्योंकि रामायण के अधिंकाशतः शोधकर्ता उत्तरकाण्ड एवं बालकाण्ड को प्रक्षिप्त मानते हैं जैसे फादर कामिल बुल्के ’रामकथा’। अतः प्रथम दृष्टया इस बात के पर्याप्त प्रमाण माने जाने चाहिए कि रामायण की मूलकथा ’अश्वों’ से अपरिचित सी है। बाद में संहिताकारों ने समकालिक प्रभाव को ग्रहण करते हुए इस प्राणी को रामकथा से जोड़ दिया। किंतु मूलकथा का भाग न होने के कारण संहिताकारों को वह स्वाभाविकता प्राप्त नहीं हुई जो ऋग्वेद के संहिताकारों को प्राप्त हुई।
यहां पर एक अन्य तथ्य की ओर ध्यान देना आवश्यक है। अयोध्याकाण्ड से युद्ध काण्ड पर्यन्त हम राक्षसराज रावण का प्रथमवार साक्षात्कार अरण्यकाण्ड में करते हैं। अकम्पन के उकसाने पर रावण सीताहरण में सहयोग के लिए आमंत्रित करने हेतु मारीच के पास जा रहा है। रावण का रथ एवं उसके जुते हुए पशु देखिए।

तदेवमुक्त्वा प्रययौ खरमुक्तेन रावणः
     रथेना दिव्यवर्णेन दिशः सर्वाः प्रकाशयन्।
                          (अरण्य का./सर्ग 31/84)
विरोधाभास देखिए। रथ वाहक पशु है गधे और रथ सूर्यतुल्य संभवतः सोने का अथवा सोने जैसा।संस्कृत शब्द कोष ’खर’ का अर्थ करता है – ’गदहा’, खच्चर (वा.शि. आप्टे पृ0 324) गदहा हो अथवा खच्चर किंतु एक बात दोनों पशुओं में समान है। वह यह कि दोनो ही मन्दगामी पशु है। इन पशुओं की ख्याति गति और शक्ति के लिए नहीं है जैसे अश्व की है। 


पहली बार रावण मारीच तक जाता है। कितु मारीच के समझाने पर लंका वापस आ जाता है। पुनः जब शूपर्णखा लंका आती है। रावण को भड़काती है तो वह सीताहरण के लिए तैयार हो जाता है। पुनः मारीच के पास जाता है। पुनः उसका रथ देखिए !

   कामगं रथमास्थाय कांचनम् रत्नभूषितम्
पिशाचवदनै युर्क्त खरैः कनक भूषणैः।।
                               (अर का/सर्ग 35/6)
यहां स्पष्ट रथ सोने का है और वाहक ’’पिशाचवदनै युर्क्त खरैः अर्थात गदहे।’’ ’’पिशाच वदन’’ विशेषण से खच्चर मान सकते हैं क्या ? जो भी हो कितु मूलभाव यथावत ’’मंदगामी पशु’’। इसी काण्ड के सर्ग 42 में पुनः ’’पिशाच वदनै खरैः’’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। इस प्रकार अरण्यकाण्ड में ’’रावण का वर्णन जहां भी अपने रथ पर सवार योद्धा के रूप में हुआ है। वहां रथवाहक पशु गदहा ही है। 


अरण्यकाण्ड के पश्चात रावण को हम युद्धकाण्ड में प्रहस्त की नील के हाथों मृत्यु के पश्चात रथ पर सवार होकर युद्ध के मैदान में देखते हैं। किंतु यहां उसके रथ में ’’तुरंगोत्तम राजियुक्तम’’ (यु0का0/सर्ग 59/7) उत्तम घोड़ों को जुता हुआ देखते हैं। मेरा प्रश्न यह है कि –

प्र01- यदि अब घेाड़े जोत दिए तो पहले गदहे क्यों जोते थे ? यदि हम यह मानें कि अब रावण युद्ध में जा रहा है। अतः घोड़े जुते हैं। तो ’परनारी’ वह भी राम जैसे शूरवीर की पत्नी के अपहरण में युद्ध नही हो सकता, यह संभावना तो मूर्ख भी नही मानता। रामायणकार तो रावण को महायोद्धा ही नही विद्धान भी मानते हैं। अतः उसे युद्ध की संभावना नहीं होगी यह मानना मूर्खता है और युद्ध हुआ भी ’जटायू के संग’

प्र02- यदि यह तर्क दिया जाए कि रावण को अपमानित करने के लिए गदहे रथ में जुते दिखाए गये तो व्यर्थ का तर्क है। कारण एक तो पहले गदहे जोते तो बाद में घोड़े क्यों जोत दिए ? दूसरे ’’रामायण’’ एक महाकाव्य है। महाकाव्य के वैशिष्ट्य के अनुसार धीरोदत्त नायक के चरित्र को उभारने के लिए वैसा ही श्रेष्ठ खलनायक रखा जाता है न कि विदूषक खलनायक। तीसरे रामायणकार ने अपने सभी पात्रों के चरित्र के पूरी गंभीरता से विस्तार दिया है तो ’रावण’ जो कि महान योद्धा एवं विद्वान है, उसके चरित्र के साथ वह ऐसा मजाक करेंगे, बात गले नही उतरती। तो क्या मान लिया जाए कि तत्समय सम्राटों के प्रयेाग में गदहे हो सकते हैं ?

यदि घोड़ो के प्रयेाग को संदिग्ध स्वीकार कर लिया जाए, साक्ष्य जिसकी अनुमति देते हैं, तो गदहे का प्रयोग वास्तविक सा लगता है। प्रश्न पुनः प्रथम अंक की तरह है कि अन्ततः सिद्ध क्या होता है ? बस यही की राम एवं उनके समकालिकों की ऐतिहासिकता की ओर एक कदम और। (अगले अंक में)
©तृषा’कान्त’

नासा – बनाम संस्कृत एवं ब्राहम्ण .. [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

      एक समाचार मेरा ध्यान आकर्षित करता है। मैं संक्षेप में आपका ध्यान उस ओर आकर्षित करता हूँ। दैनिक जागरण, बरेली 26 मार्च 2012 – समाचार शीर्षक संस्कृत बनेगी नासा की भाषा

            यह समाचार यह बताता है कि 1985 में नासा ने संस्कृत भाषा के 1000 प्रकाण्ड विद्वानों को नौकरी देने का प्रस्ताव दिया था जिसे विद्वानो ने अपनी भाषा के विदेशी उपयोग के लिए सेवा देने के आधार पर ठुकरा दिया था। अब वह अपने ही लोगो को इस भाषा में पारंगत बनाने में जुटे हैं। समाचार पत्र की इस रिपोर्ट के अनुसार नासा के मिशन संस्कृतकी पुष्टि उसकी बेबसाइट भी करती है। उसने स्पष्ट लिखा है कि 20 साल से नासा संस्कृत पर काफी पैसा और श्रम व्यय कर चुकी है।

            इस समाचार के दो पक्ष हैं एक संस्कृत भाषा की वैज्ञानिक उपयोगिता और द्वितीय संस्कृत के विद्वानों द्वारा विदेशी प्रगति के लिए अपनी भाषा की सेवा से इन्कार कर देना। सामान्यतः इस देश में संस्कृत के अधिकांशतः विद्वान ब्राह्मण हैं। जब देश में ब्राहमणों पर देश के इतिहास, हिन्दुओं की सामाजिक श्रेणीगत व्यवस्था एवं राजनीति को प्रदूषित करने के आरोप पानी पी-पी कर लगाये जाते हैं। हमें अपमानित करने वाले नारे गढ़े जाते हैं। ऐसे में यह समाचार आंख खोलने वाला है। यह देश हमारा है। इसकी उन्नित में मिटटी की सुगन्ध है। भला पैसा और उच्चस्तरीय जीवन पद्धति उन आदर्शों और देश के मान-सम्मान से प्रतिस्पर्धा कैसे कर सकती है जो हमारे पूर्वजों ने आत्म गौरव के रूप मे हमें विरासत में दिए हैं। मैं जानता हूँ कि धर्म निरपेक्ष, प्रजातांत्रिक भारत में संस्कृत महत्वपूर्ण नहीं हो सकती क्योंकि यह हिन्दुओं की सांस्कृतिक भाषा है। यह ब्राह्मणों की विश्व-मानवता को अमूल्य धरोहर है और ब्राह्मण तो जिताऊ मतदाता नही हो सकता। लेकिन काश ! ब्राह्मण ही अपनी आंखे खोल पाते और संस्कृत के लोक जीवन के लिए संगठित प्रयास कर पाते।
(कृपया विस्तृत समाचार दैनिक जागरण हिन्दी समाचार पत्र दिनांक 26.03.12 पृद्गठ 15 पर देखा जा सकता है)

©तृषा’कान्त’

राम मिथ या इतिहास…भाग -1 [आलेख] – शिवेन्द्र कुमार मिश्र

….हमें अपनी प्राचीनतम हिन्दू संस्कृति पर इसलिये सदैव गर्व रहा है कि हम कूप मण्डूक नहीं रहे हैं। ज्ञान की पिपासा को शांत करने के उद्देश्य से स्वस्थ चिन्तन मनन एवं मर्यादापूर्ण सहिष्णु शास्त्रार्थ हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे हैं। इसी के आलोक में ..विचार करते हुये हमें ध्यान है कि मर्यादा पुरूषोत्तम राम सदैव हमारे आराध्य देव हैं .. राम के बिना हम भारतीय संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।सहस्त्रों वर्षों से भगवान राम के विषय में अधिकाधिक जानने की उत्कंठा हमारे मन में रही है। अनेक ज्ञानी महानुभावों ने अपने अपने ढंग से यह प्रयास किया है। किन्तु एक साधारण मानव मस्तिष्क में कुछ सहज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं । इस आलेखमाला का उद्देश्य यही है कि इन बिन्दुओं पर बिना किसी पूर्वाग्रह के मात्र तथ्यों के आलोक में एक स्वस्थ चिन्तन करें। आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए अग्रिम आभार – तृषाकान्त

(1) रामायण में ‘अश्व’ 
   रामायण को भारतीय हिन्दू परम्परा इतिहास मानती है। थोड़ा सा संशोधन अपेक्षित है। रामायण में वर्णित घटनाक्रम इतिहास है। जबकि ”रामायण अर्थात ”राम का शौर्य वर्णन” (संस्कृत हिन्दी शब्द कोष-वा.शि. आप्टे पृ0 855) एक संहिता है जो कि प्राचीन काल में वाल्मीकि द्वारा कही गई है। (रामायण लंकाकाण्ड, सर्ग 128, श्लोक संखया 112, 113, 114 एवं 123) इदं काण्यं पुरा वाल्मीकिना कृतम्‌ अथवा चेमां संहितामृषिगणां कृतामं (वाल्मीकि रामायण – गीता प्रेस – गोरखपुर) 
   मेरा जिज्ञासा का विषय रामायणीय घटनाक्रम की ऐतिहासिकता का परीक्षण है। जिसके लिए मैं साक्ष्य रामायण में ही खोजकर उनका परीक्षण करना चाहता हूँ। विषयांकित ‘पशु’ को एक ऐसा ही साक्ष्य मैं स्वीकार करता हूँ। 
रामायण (उपरोक्त संस्करण) अयोध्याकाण्ड प्रथम सर्ग श्लोक-28 ”वारणवाजिनाम्‌” पद का प्रयोग किया गया है अर्थात्‌ हाथी, घोड़े। राम के राज्याभिषेक के समय प्रस्तुत सामग्री में जिन पशुओं का उल्लेख है, वह हैं – (अयो0का0 सर्ग-14 श्लोक 35 से 41) –

”हेमदामपिनद्धश्च ककुद्यान पाण्डुरोवृषा:,
 केसरी च चतुर्द्ष्टो हरिश्रेष्ठो महाबलः।”

   अर्थात स्वर्णमाला से अलंकृत ऊँचे डीलडौल वाला श्वेतपीतवर्ण वृषभ, चार दाढों वाला सिंह एवं महाबलवान उत्तम अश्व।” 

प्रश्न :- शंका यह है कि इस श्लोक में बैल और सिंह की शरीरगत विशेषताएं कहीं गई है जबकि अश्व की गुण अथवा भावगत। क्यों ? 
   अयोध्याकाण्ड के ही सर्ग 41 श्लोक 21 में रामायणकार राम के वनगमन के समय शोकाकुल नगरी का वर्णन करते हैं। पंक्ति है – ”सनागयोश्व” गणा ननाद च।” ……… हाथी, घोड़े और सैनिको सहित उस नगरी में भयंकर आर्त्तनाद होने लगा। 
   प्रश्न :- राम ”युवराज” हैं। युवराज का अश्व विशेष होगा पालतू पशु संवेदनशील होते हैं और ‘अश्व’ तथा ‘श्वान’ की स्वामिभक्ति तो प्रसिद्ध ही है। कवि की प्रतिभा की द्रष्टि से देखें तो भी यह विशेष अवसर है। ‘राम’ वन जा रहे हैं। उनका प्रिय ‘अश्व’ उनके साथ नहीं जा रहा। ऐसे में इस भाव को व्यक्त करने में कवि अपने विशेष कवि चातुर्य का परिचय दे सकता है। पर उसने ऐसा नही किया क्यों ? एक अन्य प्रश्न भी है ? 
   प्रश्न :- सर्ग 36 में दशरथ राम के साथ कोष और सेना भेजने का निर्देश देते हैं। कैकेयी विरोध करती हैं। सर्ग 39 में वनवास अवधि के प्रत्येक वर्द्गा के लिए सीता को आभूषण दिये जाते हैं। राम और लक्ष्मण सशस्त्र है। धनुष, तूणीर तलवार आदि उनके अस्त्र-शस्त्र हैं। ऐसे में वनवास काल के लिए वह तीनों अश्व क्यों नही ले जाते ? वनयात्रा में घोड़ा सुविधाजनक भी है। उसकी व्यवस्था सहज है। शत्रुओं से रक्षा में भी उपयोगी है। अन्ततः आभूषण, अस्त्र-शस्त्रादि वनवास यात्रा में ढोना आसान कार्य तो नही है। 
   रामायण में यत्र-तत्र सर्वत्र घोड़े का नाम बिखरा हुआ है, जैसे अ0का0 सर्ग 70 में कैकय नरेश अपने भांजे भरत को जो भेंट देते हैं उनमें हाथी, घोड़े, कुत्ते और (खरंज) खच्चर भी दिए। 
   इसी तरह अरण्यकाण्ड सर्ग 22 में राम के प्रतिद्वन्द्वियों में मात्र ‘खर’ के रथ में चितकबरे घोड़ों के जुते होने का उल्लेख है। किंतु अश्वारूढ सेना मे लाखों की संख्या में अश्वों का प्रयोग एका-एक दिखाई देता है जैसे अयोध्या काण्ड सर्ग 103 श्लोक 5 में ”सहस्त्राण्यश्रवनां समारूढ़ानि” पद का प्रयोग हुआ है। अरण्यकाण्ड में खर-दूषण की सेना के प्रस्थान के समय केवल खर के रथ के चितकबरे घोड़ों का उल्लेख है किंतु बाद के सर्गो में दूषण के रथ के घोड़ों सहित राम तमाम हाथी, घोड़ों का वध करते हैं। ऐसे प्रसंग स्थान-स्थान पर दिखाई देते हैं। लंकाकाण्ड, युद्धकाण्ड तक हम ऐसे तमाम प्रसंगो का उल्लेख कर सकते हैं। इस सम्बन्ध में अधिक साक्ष्य प्रस्तुत करने के स्थान पर कतिपय शंकाएं प्रस्तुत हैं – 
   प्र01- चाहें राम हो अथवा अयोध्या अथवा लंकापक्ष के अन्य गणमान्य योद्धा । किसी के भी व्यक्तिगत उपयोग के अश्व का वैशिष्ट्य एवं उसके नामादि सहित उल्लेख नही हैं। जबकि ‘राम’ के व्यक्तिगत उपयोग के हाथी का नाम ‘शत्रुज्जय” (सर्ग 15 श्लोक 46-अयो0का0) उल्लिखित है। जबकि इस सर्ग के प्रारम्भ में राम के गुणों के वर्णन में उन्हे घुडसवारी का श्रेष्ठ ज्ञाता बताया गया है। 
   2- चित्रकूट से दण्डकारण्य तक जगह-जगह ऋद्गिायों के आश्रम हैं। अगस्त जैसे ऋषि शस्त्रजीवी हैं। किंतु इन आश्रमों में शस्त्रागार तो उपलब्ध हैं किंतु अश्वशालाएं नहीं। 
   3- अश्व सेना की अपनी तकनीकी होती है और विशेषता भी। घुड़सवार अपने घोड़े से निजी संबंध विकसित करता है। पालतू पशुओं अथवा सैन्य प्रयोग के पशुओं के नाम रखे जाते हैं। मुगलकाल के राजपूत राजा महाराणा प्रताप और उनके घोड़े चेतक की कहानियां भारतीय इतिहास का हिस्सा हैं। ऐसा रामायण में नही दिखाई देता। 
   4- इस सम्बन्ध में ऋग्वेद के कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं :- ”1/3/24- ‘अश्वारोही इन्दु’, 1/16/4- ”हरिभिरिन्दु केच्चिभिः” केसर अथवा अयालों से युक्त अश्वों से” 1/16/9 में अश्वों की कामना की जाती है। 1/22/3- ”कशा मधुमर्त्या वना कशा” अर्थात घोड़े की चाबुक (उपमा में प्रयोग किया गया है) 1/28/4 में घोड़े की लगाम के लिए ‘उपमार्थक’ प्रयोग में ‘रश्मी’ शब्द का प्रयोग है। 1/30/16 में स्फूर्तिवाद, हिनहिनाते हुए, तीव्रगति वाले ‘अश्वों’ का प्रयोग आया है। 1/33/14 ”अश्व के खुरों से धूल आकाश तक फैल गई।” 1/35/5 ”सूर्यदेव के अश्व श्वेत पैर वाले हैं।” 1/63/5 हमारे अश्वों के मार्ग को मुक्त करें।” 1/64/7 ”लाल वर्ण वाली घोडियों”’ 1/64/8 धब्बेदार घोडियों। 1/73/9 ”हम अपने अश्वों से शत्रुओं के अश्वों ”दूर करें” 1/81/13 युद्धारम्भ होने पर मद टपकाने वाले (उमंग में आने वाले) अश्वों को अपने रथ में न जोड़ें। .1/82/3 ”हे इन्द्र देव आप ‘हरी’ नामक ‘अश्वों को रथ में नियोजित करें’ 1/87/4 स्वसृत पृष्ददश्वो” स्वसृत बिन्दुओं से चिहिन्त अश्व” 1/88/2 ”भूरे वर्ण वाले अश्व” 1/89/7 – बिन्दुवत्‌ चिह्‌नवाले चितकबरे अश्व” आदि। 
   ये ऋग्वेद के नायको एवं ऋषियों का अश्व विद्या एवं अश्वों के सैन्य प्रयोग का ज्ञाता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। (हिन्दी अनुवाद ऋग्वेद सहिता आचार्य श्री श्रीराम शर्मा से लिया गया है)
  रामायण अश्व शब्द के विभिन्न प्रयोग करती तो है किंतु उनमें ऋग्वेद अथवा महाभारत अथवा अनुवर्ती इतिहास की तरह अश्व प्रयोग की कुशलता की बात परिलक्षित नहीं होती। इससे मुझे लगता है कि रामायण में वर्णित ”मूलघटनाक्रम” को जानने वाले भले ही उन्होने इसे श्रुतियों और स्मृतियों के आधार पर जाना हो, उस घटना में अश्वों के प्रयोग से परिचित नहीं हैं। अतः यह सम्भावित है कि रामायण में अश्वों का सैन्य प्रयोग दिखाया जाना प्रक्षिप्त हो सकता है। आप कहेगें कि इससे सिद्ध क्या होता है ? मात्र इतना ही कि यदि हम रामायण में घोड़ों के प्रयोग को संदिग्ध मान लें तो हम रामायण की ऐतिहासिकता की खोज में एक कदम आगे बढ सकते हैं।
(आपके विचार और तथ्यपूर्ण आलोचना के लिए मैं आप सभी का आभारी रहूँगा) ©तृषा’कान्त’

हमारे बच्चों को उनके पारिवारिक सामाजिक बुज़ुर्गों की गोद कैसे मिले .. [ आलेख] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

  क्या किसी व्यक्ति में कुपोषण मात्र शारीरिक दुर्बलता से ही परिलक्षित होता है ..? शारीरिक विकास हेतु सम्पूर्ण पौष्टिक आहार की उपलब्धता के साथ साथ विकास के समय शैशव से लेकर किशोर, तरूणावस्थातीत युवकों के लिये भी विकास के आरम्भिक चरण में समुचित मानसिक बौद्धिक खुराक के अभाव में वह शारीरिक रूप से तो सबल हो सकते हैं किन्तु मानसिक रूप से …

  नहीं नहीं मैं मानसिक अक्षमता की बात नहीं कर रहा हूं अपितु समुचित संस्कारों के अभाव की चर्चा कर रहा हूं। इनके अभाव में बहुत अच्छे परिवारों के बच्चे भी वयक्तित्व की दुर्बलता से ग्रस्त होकर अभिशप्त रास्ते पर चल निकलते हैं। माता पिता कई बार अतयधिक महत्वपूर्ण पदासीन अथवा धनोपार्जन में व्यस्त होने के कारण सारी व्यवस्थाओं का प्रन्बन्धन कर देते हैं मात्र अक व्यक्तिगत समय एवं इसी मानसिक पोषण के। क्योंकि यह किसी दुकान अथवा माल में पैसे या पद से सुलभ नहीं होता है। यह तो परम्परागत स्वरूप से दादा दादी नाना नानी की गोद में उपलब्ध होता आया है। 

  अब एकल परिवारों के कारण अथवा जीविकोपार्जन तथा अन्यान्य कारणों सहित यही गोद दुष्प्राप्य हो चुकी है। ऐसे में इन मानसिक दुर्बलता के शिकार नागरिकों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है और सामाजिक अपराध बढ़ते जा रहे हैं
   क्या इस साधारण से विष्लेषण को कोई समझना चाहता है ? क्या यह दायित्व भी हम सरकार पर डाल सकते हैं कि हमारे बच्चों को उनके पारिवारिक सामाजिक बुज़ुर्गों की गोद मिले .. ? सोचें जरा एक बार हम अपने अंतस में भी विचार करें..!!
©तृषा’कान्त’

दो जीवन समान्तर … [स्वर कथा] – श्रीकान्त मिश्र कान्त

©तृषा’कान्त’

मेरा आदर्श भी वही है … तुम नहीं राम ..!! [कविता] – रश्मि भारद्वाज

हे राम !
जानते हो तुमसे
क्यों नहीं मांगी
किसी ने अग्निपरीक्षा…..!!??
क्योंकि ये अगाध प्रेम था किसी का
जो नहीं देख सकता था खड़ा
तुम्हें प्रश्नो के दायरे में
जो नहीं चाहता था
खंडित हो तुम्हारी छवि
मर्यादा पुरुषोतम की
इतना निश्चल प्रेम
ईश्वर बना दिया तुम्हें ….!!!!
और ये कैसा प्रेम तुम्हारा
जिसे थी प्रमाण की दरकार
दुनिया के लिए…..!!!

ये कैसा ईश्वरत्व तुम्हारा….!!??
जिसे बचाने के लिए
कर गए परित्याग भी तुम
हमेशा के लिए ………..
साबित कर दिए दुनिया के इल्ज़ाम
वह भी तब
जब सिर्फ तुम्हारी जरूरत थी उसे
तब कैसे पाओगे
तुम भी वह प्रेम……!!!
जो तुम्हारा था कभी
उसे तो जाना ही था
धरती के गर्भ में
आज से सदियों पहले ही
कर गया कोई
अपनी अस्मिता को
बचाने की पहल
प्रेम में होने के बाद भी …….
मेरा आदर्श भी वही है राम
तुम नहीं ……………..!!

 रश्मि भारद्वाज
©तृषा’कान्त’

सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है …… [कविता] – अमिता मिश्र ‘नीर’

 सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है
अपना ऑंचल फहराती है
केसरी जलधि नभ नील बना
मेरे मन की नैया जिसमें
क्यूं थिरक थिरक रह जाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

चलने का अन्त नहीं होता
फिर भी चलना पडता हमको
सुख दुख है इस जग की छाया
हमको तो यही बताती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

कितने ही जीवन के पथ में
हरिताभ मरूस्थल भी आये
सूरज डूब गया लेकिन
चन्द्रोदय की कुछ आस नहीं
लो पीडा कण बरसाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है

कल्पना कुसुम क्या ‘नीर’ हुये
हैं सत्य कभी मन उपवन के
कुछ यक्ष प्रश्न इस जीवन में
युग युग से छोडे ज़ाती है
सन्ध्या सिन्दूर लुटाती है
अपना ऑंचल फहराती है
©तृषा’कान्त’

सखी री ! देखो आया वसन्त… [कविता] – श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

सखी री !
देखो आया वसन्त
बौराई पछुआ को लेकर
मदमाती अँगड़ाई लेकर
तन-मन टूटे मदमस्त अंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

वन-वन खिलता द्रुम वनांगार
बासंती आहट ले फुहार
सेमल, टेसू कोयल पुकार
चित-चोर नयन हिय में अनंग
सखी री !
देखो आया वसन्त

यौवन चंचल काया झूमें
अद्वैत बने प्रिय संग घूमें
कुसुमित उपवन
सब जड़ चेतन
हर्षित मन है उर में उमंग
सखी री !
देखो आया वसन्त
©तृषा’कान्त’

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